ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
इबारत देवदास
01-Dec-2016 12:00 AM 2466     

इबारत

ज़िन्दगी से शिकायत अक्सर तो कभी बाद मुद्दत करते हैं,
उस मुलाकात के बाद अब हम  रंगों से मुहब्बत करते हैं
हम चंद हर्फ़ लिखते हैं जज़्बात से  हमे शायर न समझो
वो करते हैं सजदा अक्सर और हम  ऐसे इबादत करते हैं
हम ज़मीर वालों को नहीं मालूम खुशामदी का सबक
न जाने लोग कैसे किसी के  अहसासों से तिज़ारत करते हैं
ज़रा इज़्ज़त बख्शो इस जमीं और मादर-ए-वतन को
पागल नहीं हैं नौजवाँ वो जो सरहदों पर शहादत करते हैं
बैठो उनके पास कि बुजुर्गों के साये में ही असली इनायत है
कितना भी पढ़-लिख लो वो अब भी दुरुस्त तुम्हारी इबारत करते हैं!

देवदास

देवदास सिर्फ वो नहीं जो शराब पीता है
और पारो की याद में जीता है
नौकरी से थका हारा, जीवन की आपाधापी में
हर वो आदम जो रोज़ कठिनायों का ज़ाम पीता है
वो देवदास को जीता है
सब कुछ अपना अर्पण करके भी
दामाद से झोली फैलाये
और फिर बेटी की खुशहाली के
मुगालते में जिसका जीवन बीता है
हर वो बाप देवदास को जीता है
बेकारी और बदहाली में
हर रात गुज़रती तंगहाली में
मज़बूरी मायूसी महंगाई
निर्दयी प्रणाली के थपेड़ों से
जूझता खसीटता ज़िन्दगी के
जो कड़वे घूट पीता है
वो देवदास को जीता है
देवदास कोई कृत्य कोई ज़ुबानी नहीं
देवदास कोई कहानी नहीं
एक संकल्पना है देवदास
सपने वो पारो हैं
जिनको पाने की दौड़ में
उठते-गिरते हैं घावों को सीते हैं
मैं, तुम और हम सब
देवदास को जीते हैं!

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