ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मैं केहि कहौं बिपति अति भारी
CATEGORY : चिन्तन 01-May-2018 06:19 PM 458
मैं केहि कहौं बिपति अति भारी

ईश्वर का धाम शरीर ही है, जो सबको मिलता है। जिसमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द होकर वह सकल संसार में व्यापा है। शरीरों में हृदय ही उसका भवन है। प्रभु के घर में काम, क्रोध और लोभ घुस आये हैं। महाकवि तुलसीदास जी कहते हैं कि हे राम! वे मुझे अनाथ समझकर तुम्हारे ही घर को लूट रहे हैं। मुझे चिन्ता है कि जगत में तुम्हारा अपयश न फैल जाय-
मैं केहि कहौं बिपति अति भारी।
मम हृदय भवन प्रभु तोरा।
तहँ बसे आइ बहु चोरा।।
अति करहिं उपद्रव नाथा।
मरदहिं मोहिं जानि अनाथा।।
कह तुलसिदास सुनु रामा।
लूटहिं तस्कर तव धामा।।
चिन्ता यह मोहिं अपारा।
अपजस नहिं होय तुम्हारा।।
सिर्फ़ प्रभु का भवन ही नहीं, सीता की रसोई भी खतरे में पड़ी है। काम, क्रोध और लोभ को बढ़ाता बाजार रसोई घर में घुसकर पारंपरिक स्वाद छीन रहा है। वह रूप पर हमला करके उसे छिन्न-भिन्न कर रहा है। वह सीता रूप शब्द को शोर में बदल रहा है। वह राम रूप अर्थ का अनर्थ कर रहा है। राम, सीता की रसोई में भी रहते हैं। रसोई की आँच से सम्बन्ध जोड़े बिना प्रेम सम्भव नहीं।
इस पुरातन आँच के आसपास फूलता-फलता जीवन ही जगत को सियाराम मय बनाता है। सीता की रसोई के बिना राम-रसायन की कल्पना व्यर्थ है।
सिर्फ़ दैहिक और भौतिक ही नहीं, दैविक के भी बीहड़ों को पार करने के बाद ही सियाराममय जगत की झलक दिखायी पड़ती है। पर जब इस धरती पर कहीं न पहुँचने वाली होड़ मची हो और स्त्री-पुरुष की आध्यात्मिक एकता ही भंग हो रही हो, ऐसे समय में सारे जगत को सियाराममय जानकर प्रणाम करने वाला जीवन कैसे निर्मित होगा -
आकर चारि लाख चौरासी।
जाति जीव जल थल नभ वासी।।
सीय राममय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।
चौरासी लाख योनियों से भरे इस जगत में चार प्रकार के जीवधारी निवास करते हैं। इनमें कुछ तो श्रम बिन्दुओं से और कुछ अण्डों से उत्पन्न होते हैं। कुछ उगने वाले हैं और कुछ गर्भ से जन्म लेते हैं। महाकवि तुलसीदास इन सबको सीताराममय जानकर दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम कर रहे हैं।
संसार को गौर से देखो तो यही अनुभव में आता है कि इसे जरूर किसी पुरातन प्रेमी और प्रेमिका ने मिलकर रचा है। इस पुरातन युगल को कोई तो पुरुष और प्रकृति के रूप में देखता है। कोई अद्र्धनारीश्वर-शिव और पार्वती के रूप में उसकी स्तुति करता है। कोई उसे विष्णु और लक्ष्मी के रूप में भजता है और कोई राधिका-कन्हाई सुमिरन के बहाने से उसमें लीन हो जाता है।
कोई उसे शब्द और अर्थ की सम्पृक्ति के रूप में, कोई नाम और रूप के एकत्त्व में और कोई निगुर्ण-सगुण के विन्यास में अनुभव करता है। कोई ऐसा भी है जो उस प्रेमी युगल को अपनी श्रद्धा और विश्वास के रूप में ही पाता है। उसी पुरातन प्रेमी युगल को कलिकाल में सियाराममय जानकर महाकवि तुलसीदास प्रणाम करते हैं।
इस नाम और रूप से भरे जगत में न जाने क्या-क्या टूटता है, बिखरता है, बदलता है। पर यह पुरातन प्रेमी नहीं बदलता, उसकी प्रियतमा भी नहीं बदलती। कीट-पतंगों, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों और नर-नारियों को एक ही अनादि प्रेम की डोर बाँधे हुए है, जो कभी टूटती ही नहीं। किसी का भी जीवन कोश कभी खाली नहीं होता।
जगत के माता-पिता चौरासी लाख योनियों में बिना किसी भेदभाव के एक साथ बसेरा करते हैं। पिता हर पल बीज रूप होकर मातृभूमि पर बिखरते हैं। वे प्रत्येक देह में उसी का पारंपरिक सौन्दर्य प्रकट कर उसी देह की मर्यादा में बँध जाते हैं और उसी देह के छोटे-से जीवन के तप से आलोकित होते रहते हैं। तप और कर्म-सौन्दर्य की मर्यादा के आलोक में डूबे तुलसीदास के सियाराम चौरासी लाख योनियों में विचरते प्राणियों के हृदय भवन में रमे हुए हैं। तभी तो इस संसार में प्रत्येक उपस्थिति प्रणाम के योग्य है, वन्दनीय है। यहाँ कोई दूसरा नहीं, सब अपने हैं।
वैसे तो यह सृष्टि गुण और अवगुणों से सनी हुई है। कदम-कदम पर द्वैत दिखायी देता है। महाकवि कहते हैं कि- माया-ब्रह्म, जीव-ईश्वर, देव-दानव, साधु-असाधु, ब्राह्मण-कसाई, स्वर्ग-नरक, काशी-मगध, दिन-रात, पाप-पुण्य, ऊँच-नीच, सुजाति-कुजाति, राजा-रंक, सम्पत्ति-दरिद्रता, सुख-दुख, अनुराग-वैराग्य, अमृत-विष और जीवन-मृत्यु सब इसी सृष्टि में हैं। पर इनसे परे एक जगत प्रसिद्ध पुरातन परमात्म भी तो है जो इस परस्पर विरोधी द्वन्द्व से मुक्त करता है।
राम और उनकी प्रियतमा जानकी इसी पुरातन परमेश्वर और उसकी शक्ति के प्रतिनिधि हैं। जो अपनी ही इच्छा से अपना तन निर्मित करते हैं। वे शिव और पार्वती की तरह अभिन्न होकर अवतरित होते हैं। उन्हें अपनी पुरातन प्रीति की याद सदैव बनी रहती है। वे जब भी मिलते हैं, हर बार एक दूसरे को पहचान लेते हैं, पर जन्म-जन्मान्तरों में भटकता बहुसंख्यक जीवन इस पुरातन प्रेम को भूलकर बार-बार गठजोरा करता है।
माता-पिता को तात्विक रूप से पहचाने बिना सिर्फ़ शरीर में पलते कोरे सपनों से संसार का हित होता नहीं दिखता। न जाने क्यों यह सम्भावना फलीभूत ही नहीं हो पाती कि संसार के सभी स्त्री-पुरुष वाक् और अर्थ की तरह सम्पृक्त होकर जी सकें। वे श्रद्धा और विश्वास होकर इस धरती पर विचर सकें।
शिव अपनी प्रियतमा पार्वती से कह रहे हैं -
उमा जे राम चरन रत।
विगत काम मद क्रोध।।
निज प्रभुमय देखहिं जगत।
केहि सन करहिं विरोध।।

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