btn_subscribeCC_LG.gif
मैं अकेला नहीं
01-Aug-2018 12:32 AM 2483     

हमारी टोली में तीन-तीन प्रशिक्षणाधीन मजिस्ट्रेटों को जिला मुख्यालय पर जिला न्यायाधीश के पास तीन माह के प्रशिक्षणार्थ भेजा गया था। राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी मरुभाग बीकानेर में मेरा प्रशिक्षणकाल वैसे तो आनन्दपूर्वक ही बीता। लेकिन उन दिनों मई, जून और जुलाई के तीन महिनों में 47 सेल्सियस से भी अधिक तापमान में डाक बंगले से न्यायालय तक साइकिल से आना-जाना एक यातना ही थी। लगता था कि सूरज इस मरुभूमि से अपेक्षाकृत अधिक निकट है। प्रायः धूल भरी आंधियां व बंवडर के दृश्य और उसके बाद मामूली बूंदाबांदी से शीतलता मानो हमारे भावी जीवन में आने वाले तूफानों के संकेत हों और हमें शांत, धीर व गंभीर रह कर उनका मुकाबला करने का प्रशिक्षण दे रहे हों। प्रशिक्षण के पहले ही दिन जब जिला न्यायाधीश ने हमें कहा कि न्यायपालिका की नौकरी एक तपस्या है तब मैंने यह नहीं सोचा था कि इस तपस्या में ऐसी भयंकर गर्मी और झुलसाने वाली तपन भी साथ जुड़ी हुई है। खैर, नौकरी चाहे मजिस्ट्रेट की हो अथवा पटवारी की, प्रशिक्षण काल में विद्यार्थी की सी स्वच्छंदता, उच्छृंखलता व थोड़ी दायित्वहीनता का अपना ही आनन्द होता है।
उस दिन हम तीनों साथी हमारे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के कक्ष में बैठे उनसे ज्ञान ले रहे थे। बेहद सीधे, ईमानदार व भले इंसान थे वे। इसलिए अन्य अधिकारियों की तरह हम भी उन्हें मुखियाजी ही कहने लगे थेेे। कृषकाय, काम में चुस्त। कानून से अधिक तकनीकी कार्य अर्थात् पेन से लेकर स्कूटर तक की मरम्मत करने को आतुर। ऐसी किसी वस्तु के तंत्र में अपने आपको घंटों खपाए रखते और अंत में परिणाम वही - ढाक के तीन पात। उनकी मेज पर पड़ी घंटी पांच बार दबाने पर एक बार थोड़ी सी बजती थी। एक दिन आखिर वही हुआ जिसकी आशंका थी। वे उस मामूली घंटी की दशा सुधारने के चक्कर में उस घंटी को मात्र पेपरवेट बना बैठे। मुखियाजी के ही रीडर ने एक दिन हमें बताया कि एक बार सुबह जब वह साहब के बंगले पर पहुंचा तब मुखियाजी अपने स्कूटर के सभी पुर्जों को खोल कर बड़ी तल्लीनता से स्कूटर के पेट्रोल की प्रति लीटर क्षमता बढ़ाने में लगे थे। उनके अनुसार वे अपने लक्ष्य के निकट ही थे। लेकिन दो घंटे बाद रीडर ने बाजार में देखा कि साहब का चपरासी उनके स्कूटर के सारे अस्थि पंजर एक हाथ ठेले में डलवाए किसी मिस्त्री की दुकान पर ले जा रहा था।
मुखियाजी प्रायः बीमार रहते थे। सो रंग-बिरंगे कैपस्यूल उनकी मेज पर पड़े एक प्लास्टिक डिबिया की शोभा बढ़ा रहे थे। उस दिन हमने देखा कि उन्होंने एक कैपस्यूल को खोल कर उसमें पाउडर नुमा दवा कागज पर उड़ेली और उसे गौर से देखा व फिर मुंह में डाल लिया। फिर पानी का एक बड़ा घूंट लेकर उसका अंदर ही अंदर कुल्ला कर दवा को गले के नीचे उतार लिया। हम तीनों साथी उत्सुकता व आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे। कैपस्यूल में भरी दवा बहुत कड़वी होती है। अतः इस तरीके से मुखियाजी को दवा लेते देखकर मुझसे रहा नहीं गया।
मैंने पूछा, "सर, आप कैपस्यूल की दवा इस तरह कागज पर निकालकर क्यों लेते हैं?"
वह तपाक से ज्ञान देने की मुद्रा में बोले, "आप तो जानते हैं कि हम बुद्धिजीवी वर्ग के हैं। जैसे कोई भी कानूनी आदेश देने से पूर्व तत्संबंधी प्रावधान को बार बार देखना चाहिए वैसे ही किसी दवा के सेवन से पहले यह जरूर देख लेना चाहिए कि हम क्या ले रहे हैं।"
मैंने अपने साथियों की ओर देखा। उनकी आंखों में व्यंग्य और कौतूहल की चमक जरूर थी लेकिन वे एक वरिष्ठ अधिकारी से बहुत सोच समझकर ही बात करने में विश्वास रखते थे।
मैंने ही हिम्मत की, "लेकिन सर, यहां कोई प्रयोगशाला तो है नहीं कि दवा क्या है उसे जांचा जा सके। हां, यह संभव है कि कैपस्यूल में से निकले पाउडर में कोई चींटी या मक्खी हो तो उसको भले ही अलग कर लिया जाए और तो सर हम क्या देख सकते हैं?"
मुखियाजी समझ तो गए कि यह कल का छोकरा उनका मजाक उड़ा रहा है। लेकिन यह उनकी महानता ही थी कि बस बिना कुछ बोले धीमे से मुस्करा दिए। चार दिन बाद हमारा प्रशिक्षण पूरा होने वाला था। स्वतंत्र रूप से प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्ति के आदेश आ चुके थे। मुझे परिवहन मजिस्ट्रेट के पद पर जयपुर में तैनात किया गया था। प्रशिक्षण के अंतिम दिन मुखियाजी ने हम तीनों साथियों को रात्रि भोज में भावभीनी विदाई थी। उनकी आत्मीयता व स्नेह ने हमारी पलकें गीली कर दी थी।
उस समय सुबह के ठीक दस बज कर दस मिनट हुए थे। मैं उस समय जयपुर के जिला न्यायाधीश केवलकृष्ण के कक्ष में था। केवलकृष्ण अपनी सख्ती, समय की पाबंदी व न्यायप्रियता के लिए विख्यात थे। संविधान की रक्षा व पालन की शपथ दिलाने के बाद हम नव-नियुक्त मजिस्ट्रेटों को उन्होंने केवल तीन बातें कहीं। "अक्षमता सहन की जा सकती है लेकिन बेईमानी कभी नहीं। हां, अदालत में बैठते समय सुबह दस इकत्तीस भी नहीं होना चाहिए। आप सभी के लिए उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएंंं।"
मैं ऑटोरिक्शा कर न्यायालय पहुंचा और ठीक समय पर प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट की कुर्सी पर अकड़ कर बैठ गया। आपातकाल के दिन थे। तब करीब नौ लाख की आबादी वाला जयपुर एक महानगरी से कम नहीं था। सुबह नौ बजे साइकिल से रवाना होकर अदालत पहुंचता और शाम छः बजे तक थका मांदा पक्षी सा अपने घोंसले में लौट कर पड़ा रहता। पुलिस की सेल्यूट और नमस्ते करने वाले सैकड़ों चेहरों में निस्वार्थ-आत्मीय मिनख कभी कभार ही दिखाई देता। जयपुर में तब कुल सत्तरह मजिस्ट्रेट तैनात थे। छोटी जगह तो लोग यह भी जानते हैं कि हाकिम के घर में आज क्या सब्जी बनी है। यहां किसी को किसी के लिए फुर्सत नहीं थी। अतः कभी कभार अपनी मजिस्ट्रेटी भूलकर रामनिवास बाग में किसी साथी अधिकारी के साथ आइसक्रीम या गोलगप्पे बेहिचक खाने चला जाया करता था।
धीरे-धीरे नौकरी में संघर्ष का अहसास होने लगा। यद्यपि आपातकाल की घोषणा से हवा में डर के कारण ही सही, कुछ अनुशासन प्रवृत्ति चेती हुई थी, फिर भी जयपुर के मोबाइल मजिस्ट्रेट का कार्य चुनौती भरा था। मैं अपने कार्य से जयपुर यातायात की व्यवस्था में अभूतपूर्व प्रभाव एवं मुकदमों के सर्वाधिक निपटारे का एक कीर्तिमान स्थापित करना चाहता था। कुछ दिन तक निपटारा कम व समस्या का गहन अध्ययन करता रहा।
पहले दिन जब हम अपने अभियान पर निकले तो ड्राइवर ने पूछा साहब कहां चलना है। मैंने कहा, कहीं भी ले चलो। अब हम दिल्ली रोड़ पर थे। ट्रकों, मेटाडोरों, कारों, मोटर साइकिलों के चालान व जुर्माने का सिलसिला शाम तक चला। पहले ही दिन मैंने गौर किया कि पुलिस कर्मचारी जयपुर के पंजीकृत ट्रकों व भारी वाहनों को छोड़कर केवल बाहर की गाड़ियों का ही चालान कर रहे हैं। दूसरे दिन आगरा रोड़ पर जीप में बैठे हुए मैंने देखा कि वही बात बड़ी सावधानी से दोहराई जा रही है। एक बार एक सब-इंस्पेक्टर ने एक ट्रक को रोक कर ड्राइवर से ट्रक के कागजात मांगे तो उसने एक हरे रंग की तख्ती दिखला दी। इस पर उस सब-इंस्पेक्टर ने उसे चले जाने का इशारा कर दिया। मैंने सब-इंस्पेक्टर से पूछा कि यह क्या माजरा है। वह बोला साहब मैं इस ट्रक को जानता हूं, कागज पूरे रखता है। मैंने कहा, आपने तो कागजों के स्थान पर हरी तख्ती ही देखी थी। वह कुछ झेंपता हुआ बोला, "हां साहब, उस हरी तख्ती में ही कागजात होते हैं।"
लेकिन मुझे दाल में कुछ काला नजर आया। दूसरे दिन वह राज खुल गया। वास्तव में यातायात पुलिस विभाग में यदि कुछ व्यवस्थित था तो वह था उनका भ्रष्टाचार तंत्र। जयपुर के करीब-करीब सभी ट्रकों व भारी वाहनों के मालिक यातायात पुलिस को माहवारी बंधी देते थे। माहवारी बंधी वाले हर वाहन को एक विशेष चिह्न की हरी तख्ती दी हुई थी जिसे दिखाने पर यातायात से संबंधित पुलिस कर्मचारी उस वाहन का चालान नहीं करता था। माहवारी का हिसाब व नीचे से ऊपर तक का बंटवारा किसी शेयर होल्डर कंपनी की व्यवस्था से कम नहीं था।
सुबह से शाम तक भारी जांच से शहर में टेंपो, सिटी बसों व अन्य वाहनों की बिगड़ी हुई यातायात व्यवस्था में अप्रत्याशित सुधार हो गया था। एक बार दिन में दो सौ दस चालान तय कर मैंने एक कीर्तिमान स्थापित कर दिया था। कुछ ही दिनों में जयपुर में पंजीकृत भारी वाहनों पर भारी जुर्मानों के कारण स्थानीय भारी वाहन व टेंपो मालिकों ने पुलिस को बंधी यानि मंथली देनी बंद कर दी। जुर्माना और मंथली दोनों ही वे कैसे दे सकते थे? मंथली बंद होते ही पुलिस अपने असली रूप में आ गई।
"कमलनाथ, यातायात पुलिस के दो अफसरों ने आपके दुव्र्यवहार की मौखिक शिकायत की है।" जिला न्यायाधीश केवलकृष्ण ने मुझे एक दिन अपने कक्ष में बुलाकर कहा। "साहब, पुलिस की शिकायत उनकी मंथली बंद होने के कारण है, वैसे आप चाहें तो किसी और मजिस्ट्रेट को लगा दीजिए।" मैंने विनम्रतापूर्वक कहा। "नहीं-नहीं, बिल्कुल नहीं। मैं जानता हूं आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, शहर में यातायात व्यवस्था का रूप ही बदल गया है। आप अपना काम करते रहिए।" न्यायाधीश ने मुस्कराकर मुझे विदा किया।
एक बार फिर मोटर वाहनों की चैकिंग का दौर जोर-शोर से चला और उसमें चन्द वरिष्ठ आईएएस अधिकारी तथा राज्य के प्रधान कर-आयुक्त तक की कारों पर जुर्माना किया गया। एक कैबिनेट मंत्री के दामाद की गाड़ी पर जुर्माना होने से उसने मौके पर ही मंत्री जी की धौंस और बदतमीजी शुरू कर दी थी। उस पर मैंने उसे न्यायालय की अवमानना में गिरफ्तार कर अलग से जुर्माना कर दिया। इससे जहां जनता में अच्छा संदेश गया वहीं अपराधियों में भय व्याप्त हो गया था।
इधर नियमित घूस मिलनी बंद होने से तो उधर जांच में बड़े-बड़े प्रभावशाली लोगों पर जुर्माना होने के कारण ऊपर से खिंचाई होने से पुलिस परेशान थी। साथ ही कुछ परेशान मैं भी हो गया था। पुलिस द्वारा मेरे विरुद्ध कराई गई एक झूठी शिकायत पर उच्च न्यायालय के सतर्कता अधिकारी ने मेरा स्पष्टीकरण मांगा था। मुझ पर एक मात्र आरोप था कि मैंने पुलिस की जीप घर पर मंगवाई थी। चैकिंग के लिए जीप का घर से मुझे लेना व छोड़ना आवश्यक था। पर एक बार तनाव मेरे मन में भी उत्पन्न हो ही गया था। तभी हमारे वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी जो राज्य के विधि सचिव थे ने मुझे बुलाया। प्रशिक्षण के दौरान वे एक बार हमें न्यायिक अधिकारी के कर्तव्यों आदि पर विशेष व्याख्यान दे चुके थे। उन्होंने मेरे छः फुटे कसरती शरीर को नीचे से ऊपर तक चश्मे के अन्दर से झांक कर देखा। "मिस्टर कमलनाथ, आप तो अभी प्रोबेशनर हैं और अभी से आपने सचिवालय के एक बड़े तबके को नाराज कर दिया है।" उनकी भौंहें बात खत्म होने पर भी तनी हुई थी। मुझे यह चतुर व्यावहारिकता पूर्ण उलाहना कुछ अच्छा नहीं लगा।
"साहब, इस नौकरी के पहले दिन ही मुझे संविधान के पालन की शपथ दिलाई गई थी। लेकिन सभी को खुश रखना होगा - ऐसा कोई बॉन्ड तो मैंने नहीं भरा था।" मैं अपने दुस्साहस से यहां भी बाज नहीं आया। सचिव महोदय के चेहरे पर तैरते आश्चर्य व क्रोध से साफ था कि उन्हें एक प्रोबेशनर से ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी।
"आप क्या कह रहे हैं? होश में तो हैं आप? शायद आप नहीं जानते कि उच्च न्यायालय बिना कारण बताए ही आपकी सेवाएं समाप्त कर सकता है।" वे मुझ पर बरस पड़े।
मेरी भी खिन्नता बढ़ गई थी। मोबाइल मजिस्ट्रेट का कार्य ही टेढ़ा था। मौके पर भीड़ से घिरे मजिस्ट्रेट को कानून तोड़ने वाले सभी के साथ एक-सा व्यवहार करना न केवल न्यायहित में जरूरी होता है अपितु मौके पर अनुकूल वातावरण बनाए रखने के लिए भी आवश्यक होता है। मैंने कहा, "मैंने अपना कर्तव्य पालन करने की शपथ खाई है। और आपने भी तो अपने भाषण में हमें बिना भय और पक्षपात के काम करने की सीख दी थी।" इस बार वे नरम हो गए। बोले, "अरे भाई, वह तो ठीक है पर व्यावहारिकता भी तो कोई चीज होती है।"
मैं उन्हें अभिवादन कर बाहर चला आया। रास्ते भर बिना कारण बताए नौकरी समाप्त हो सकने की बात मेरे मस्तिष्क में कौंधती रही। यही सोचता रहा कि आदमी निष्पक्षता व ईमानदारी की साधना में तपने के बाद भी डरता क्यों है। वह सहज क्यों नहीं रहता? आज मैं बहुत अकेला था। पुलिस व अदालत के स्टॉफ की ऊपरी कमाई करीब-करीब बंद हो गई थी। वकीलों के लिए काम था नहीं। अनेक प्रभावशाली अधिकारी नाराज हो गए थे वह अलग। गनीमत थी कि जिला न्यायाधीश मेरे कार्य से प्रभावित थे सो मुझे उनका वरदहस्त प्राप्त था। फिर भी मुझे लगा कि मैं मजिस्ट्रेट की कुर्सी पर बैठा चारों ओर से हो रही तीरों की बौछार को अकेला अपने काले कोट पर झेल रहा हूं। लेकिन साथ ही अति आत्मविश्वासी होने से मेरी स्थिति बौनों द्वारा बंधनग्रस्त समुद्रतट पर पड़े गुलिवर की सी थी। मन में यह विश्वास था कि इस बंधन को एक दिन मैं जरूर तोड़ डालूंगा।
अचानक सामने गाय आ जाने पर ड्राइवर ने जीप को ब्रेक मारा और उस हलके से झटके से मेरे विचारों का तानाबाना टूट गया। मैंने ड्राइवर को गाड़ी पांच बत्ती चौराहे पर लेने को कहा। शाम करीब छः बजे का समय था। मिर्ज़ा इस्माइल रोड़ पर कारों, स्कूटरों, मोटर साइकिलों के आवागमन का तांता सा लगा था। उस चौराहे पर मोटर गाड़ियों की जांच आरम्भ हो गई और वहीं मेरे द्वारा चालान निपटाने व जुर्माने का सिलसिला चालू हो गया। अचानक मैंने देखा कि पुलिस बीकानेर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट उर्फ हमारे मुखियाजी के स्कूटर का चालान भरकर उन्हें मेरे सामने ला रही है। कुछ दूरी पर स्कूटर के पास भाभीजी और एक और महिला, जो शायद उनकी साली थीं, खड़ी थीं। मुझे तुरन्त याद आया कि जयपुर में मुखियाजी की ससुराल है। मुझे काटो तो खून नहीं।
"सर, आप?"
उन्होंने मुझे देखा तो एक पल के लिए मुस्करा दिए और अपने मुंह पर उंगली रखकर मुझे चुप रहने का इशारा किया। पुलिस को उन्होंने अपना परिचय नहीं दिया था। लेकिन यह सब देख कर पुलिस सब-इंस्पेक्टर सकपका गया और "माफ कीजिए, साहब" कहते हुए चालान वापस ले जाने लगा। तीन-चार लोग जिनका वहां चालान हुआ था मेरे सामने खड़े कभी मेरी ओर तो कभी मुखियाजी की ओर व कभी पुलिस सब-इंस्पेक्टर की ओर देख रहे थे। इससे पहले कि कोई छींटाकशी करता मुखियाजी ने तुरन्त ही पुलिस सब-इंस्पेक्टर को बुलाया और उनके विरुद्ध भरा हुआ चालान मेरे समक्ष रखते हुए बोले, "श्रीमान्, मैंने स्कूटर पर तीन सवारियां बैठाकर अपराध किया है। मैंने कानून तोड़ा है। कृपया शीघ्र ही फैसला करें। हम फिल्म के लिए लेट हो रहे हैं।"
मुझे याद आया कि बीकानेर में मुखियाजी से प्रशिक्षण लेने के बाद मैंने उनसे एक दिन मजाक में कहा था, "साहब, आपने न तो हमारी परीक्षा ली और न गुरु-दक्षिणा!"
"जल्दी क्या है?" उन्होंने कहा था। मुझे लगा आज वे दोनों ली जा रही हैं।
दुपहिया वाहन पर तीन सवारियों के अपराध में सभी पर मैं पचास रुपये जुर्माना कर रहा था, सो बड़े भारी मन से मुखियाजी पर भी पचास रुपए जुर्माना करना पड़ा। मुखियाजी तपाक से जुर्माना राशि मुझे देकर जाते हुए बोले, "जुर्माने की रसीद कल ले लूंगा और हां, अब मेरी पत्नी और साली यहां से सिनेमा हाल तक ऑटोरिक्शा में जाएंगी। उसका खर्चा कल आपके घर आकर मिठाई खाकर वसूल करेंगे।"
मुखियाजी के व्यक्तित्व की दिव्य आभा से मेरे भीतर का हर कोना जगमगा उठा। अब भला कौन कह सकता था कि न्यायपालिका में मुखियाजी के रहते हुए मैं अकेला था।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^