ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मैं ऑरगेनिक नहीं हूँ
01-Feb-2018 10:28 AM 1331     

मैं ऑरगेनिक नहीं हूँ
मुझे फ़र्टिलाईज़र और पेस्टिसाईड देकर
बड़ा किया गया है
रात-रात जागकर
फिज़िक्स की प्रॉब्लम्स
और गणित के समीकरण
हल किए हैं मैंने
अंग्रेज़ी के कई कठिन शब्द
याद किए हैं मैंने

देखो तो सही
अभी दस साल का हुआ नहीं है
और इसे सौ तक के सारे
प्राईम नम्बर्स
स्क्वेयर रूट्स
और क्यूब रूट्स
मुँह जबानी याद है
मैं इसे
बोर्नविटा पिलाती हूँ
मेधावटी खिलाती हूँ
रोज सुबह दस बादाम का
हलवा खिलाती हूँ
देखना एक दिन जरूर आईआईटी जाएगा
और विदेश जाकर अपना घर बसाएगा

मैं ज़िंदगी के पहले बीस-बाईस वर्ष
इसी तरह गुज़ार देता हूँ
फ़्लैट की चार-दीवारी में
होस्टल के गलियारों में
टेबल-लैम्प की रोशनी में
पंखों के शोर में

ज़िंदगी का मतलब हो जाता है
कोचिंग
कम्पीटिशन
और पैसा कमाना


शरीर बड़ा हो जाता है
लेकिन दिमाग में
आंकड़े
फ़ार्मूले
रेस्निक-हेलिडे के हल
घर कर जाते हैं
त्योहार, रस्में, रीत-रिवाज़
सारे के सारे
दरकिनार हो जाते हैं
होली एक हुड़दंग

दीवाली पटाखों का शोर
और पूजा-पाठ
एक आडम्बर
बन कर रह जाते हैं

मैं धीरे-धीरे
अलग हो जाता हूँ
अपने परिवार से
अपने समाज से
अपनी संस्कृति से


बड़ा हो जाने पर
मुझे धो-पोछ कर
सजा-धजा कर रख दिया जाता है
वो आते हैं
और मुझे लेकर चले जाते हैं

आज पार्टी है घर में
थोड़ा सलाद के लिए
खीरे-टमाटर-मूली-गाजर भी ले चले
और हाँ, उस डॉट-नेट प्रोजेक्ट के लिए
ये तीन ठीक रहेंगे
ताजा भी हैं
दाम भी कम है

जैसे क्रेडिट कार्ड से कोई
सब्जी खरीदता है
वैसे ही ग्रीन कार्ड देकर
मुझे साथ लेकर चले जाते हैं

और देखते ही देखते
मैं धनाड्यों की फ़्रिज़ की
शोभा बढ़ाने लग जाता हूँ
और उस नियंत्रित वातावरण में
खुद को
सुरक्षित
और भाग्यशाली
समझने लगता हूँ

न आँधी का डर
न तूफ़ां का खौफ़
न चिलचिलाती धूप
न भिनभिनाते मच्छरों का डर

मैं ऑरगेनिक नहीं हूँ
ऑरगेनिक होता
तो कब का मिट्टी में मिल गया होता
फ़र्टिलाईज़र और पेस्टिसाईड्स के कारण
फ़्रिज के नियंत्रित वातावरण के कारण
एक लम्बी दासता का बोझ है मुझ पर

यही है दास्तां मेरी
कि
मैं ऑरगेनिक नहीं हूँ।
भूलते नहीं हम

 

घर-घर होती है ऐसे ही भोर
प्लास्टिक के मग्गों में दहाड़ते पानी का शोर
लोहे की बाल्टी के हैण्डल की खटपट
फ़्लश की गड़गड़ाहट
गीज़र की घर-घर

घर-घर होती है ऐसे ही भोर
लेकिन भूल जाते हैं सब शोर किशोर
याद रहती हैं कुछ वो बातें
जो दिन-रात करती हैं भाव-विभोर

याद रहती हैं
माँ के हाथ की रोटी
पहली बरसात की भीनी खुशबू
देर रात तक दोस्तों की गुफ़्तगू
गाजर का रंग
अपनों का संग

भूलते नहीं हम
बचपन का बाग
सरसों का साग
सावन का राग
सर्दी की आग

भूलते नहीं हम
घुलते नहीं हम
जुड़ते नहीं हम
फलते नहीं हम

लिविंग रुम के कम्फ़र्ट में
कट फ़्लावर्स लगते हैं सुंदर
लेकिन पनपते हैं वो
कीचड़-मिट्टी में ही पल कर।

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