ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हम जो समझा किये
01-Aug-2016 12:00 AM 1228     

कागज पर कभी कोई सवाल हल नहीं हो पाता। वह उन कागजों को पढ़ डालने से भी हल नहीं होता जो सदियों से लिखे पड़े हैं। कई पीले पड़कर सड़ गये, कई हवा में उड़ गये। दुनिया कागज सँभालकर थक गयी है पर उन्हें रोज कोई न कोई गूदता ही रहता है। कागजों पर संसार का कोई नक्शा आज तक बन नहीं पाया। ईश्वर का कोई रूप थिर नहीं हुआ। इतिहास झूठा साबित हुआ। अब ईश्वर, इतिहास और कविता की मृत्यु की घोषणाओं से कागज भरे जा रहे हैं। जीने को समझ नहीं पाये तो उसके अन्त की घोषणाओं से ही कागज भरते चलो। दार्शनिक और जीवन के बीच एक कोरे कागज पर युध्दक्षेत्र रचा गया है और जिस पर जीवन को जबरन खींचकर उसे उन शब्दों से विखण्डित किया जा रहा है जो एक बार फिर दार्शनिक को चकमा देकर न जाने कहाँ खो जायेंगे और जीवन फिर पकड़ से बाहर ही बना रहेगा। जीवन को पकड़ा नहीं जा सकता, उसे बदला भी नहीं जा सकता। दुनिया पानी हिला-हिलाकर हार गयी, जीवन का बहाव रोका नहीं जा सका। उसके स्वभाव को पहचानकर उसके बने रहने के कुछ उपाय ही किये जा सकते हैं। नयी सभ्यता के रचनाकार उसके स्वभाव को पहचाने बिना उसे हाँक रहे हैं, अभी तक वे उसे कहाँ बसा पाये हैं। वे तो जीवन को दौड़ा-दौड़ाकर थका रहे हैं और उसे बाँध-बाँधकर थक रहे हैं। वह भाग निकलता है और वे उसका पीछा करते रहते हैं। वे उसके हृदय के उद्गार को समझे बिना उसे तकनीक से बाँध रहे हैं। तकनीक तो जीवन में लोभ और क्रूरता को ही अब तक बढ़ाती आयी है और लगता है कि इसके रचनाकार यही चाहते हैं। अस्तित्त्व की हानि की चिन्ता प्रकट करने वाली मानुषी विश्व-प्रभुता ही उसे मिटाते जाने में ही अपनी खैर मनाती-सी लगती है। वह यह मानने में अब भी असमर्थ दिखायी पड़ती है कि पूरी दुनिया के साथ रहकर ही जिया जा सकता है, आधी दुनिया को अपने लिए मिटाकर अपनी दुनिया कैसे बचायी जा सकती है?
सृष्टि-क्रम के मार्ग में बाधायें खड़ी करके जीवन को किसी विश्व-बाजार दृष्टि से नहीं चलाया जा सकता। अस्तित्त्व ही अस्तित्त्व को पालता-पोसता रहता है। वह सबको मनवांछित फल देने वाली कामधेनु की तरह है जिसे सबकी कामनाओं की पूर्ति के लिए सुरक्षित रखना पड़ता है, उसे मारकर खा जाने में किसी की खैर नहीं। संसार पर पड़ने वाली किरणें ही जीवन को मार्ग दिखती हैं, दर्शन तो अँधेरे में ही भटकते रहते हैं। जीवन कोरी बातचीत से नहीं चलता, उसे तो पृथ्वी पर खड़े होकर विराट में विचरते प्रकाश को जल का अघ्र्य देना पड़ता है। प्रकाश-किरणें ही उस जल को पृथ्वी से गगन में उठाकर कामधेनु बन जाती हैं। शब्दकल्पद्रुम् इस कामधेनु को बादलों जैसी उजली कहता है जो उनमें जल की सूक्ष्म इकाई के रूप में बसी रहती है फिर यही पृथ्वी को धन-धान्य से समृध्द कर पूरे जीवन में अर्थ और काम के पुरुषार्थ को साधने में सहायक होती है। पृथ्वी पर जो राज्य सृष्टि के इस कामधेनु स्वभाव को पहचाने बिना चलाये जाते हैं वे संसाधनों को नष्ट करके जीवन को पालने-पोसने की व्यर्थ जिम्मेदारी उठाते हैं।
अब दुनिया में मानवजाति के अधिकारों की माँग पर आधारित राज्य व्यवस्थाओं के दिन लद गये हैं, वे संसार को सँभाल नहीं रहीं, घसीटकर न जाने किस गर्त में धकेल रही हैं। समूचे जीवन को गर्त में धकेले जाने की यह राजनीति किसी बड़े कर्तव्यबोध के जागने से ही बदली जा सकती है। जीवन के आसपास सुलभ साधनों को कहीं दूर उठा ले जाने का बाजारू राजनीतिक गठबन्धन मनुष्य को खुद उठ खड़े होकर तोड़ना पड़ेगा और अपने रूप-रस-गंध-स्पर्श और शब्द की जिम्मेदारी खुद उठाना पड़ेगी। जीवन को कोई और नहीं सँवार सकता, उसे खुद ही सँवारना पड़ता है।
जीवन को किसी दार्शनिक गणित में सदियों तक उलझाकर भी नहीं रखा जा सकता, उसे तो अपने मन-गणित से चल सकना चाहिए। अपने मन-गणित से चलने वाले जीवन को मनमानी करने से फिर खुद जीवन ही बचाता है। वह दुनिया को लूटने के लिए गिरोह बनाकर और किसी से पट्टे लेकर नहीं निकल पड़ता, वह तो जहाँ होता है वहीं अपने लिए सहकार और सद्भाव पा लेता है। झगड़ता है तो आपस में अपना निपटारा जल्दी करने की सोचता है क्योंकि उसे अच्छी तरह यह अनुभव होने लगता है कि वह साथ रहकर ही जी सकता है। वह एक-दूसरे को दूर बनाये रखने के लिए न्याय को स्थगित नहीं करता। राज्य व्यवस्थायें तो सबको एक-दूसरे से दूर बनाये रखकर ही अपनी जान बचाती रहती हैं।
बाजार जीवन से उस समय को खरीद रहा है जिसमें जीवन सुखपूर्वक बीतने की कामना से बसना चाहता है। कोई अपनी जगह और अपने समय में नहीं रह पा रहा है। लगता है कि जैसे सब बाजार के लिए अपनी जगह और समय छोड़ने के लिए राजी कर लिये जा रहे हैं। जो अभी भी बाजार के पक्ष में राजी नहीं हो रहे उन्हें वह राज्य व्यवस्था बेदखल करने पर निर्लज्जता से तुली हुई है जिसे उनने अपने भले के लिए चुना है। लगता है लोकतंत्र में जनता अब अपने प्रतिनिधि नहीं, उनके वेश में वे प्रापर्टी-ब्रोकर्स चुन लेती है जो जनता से अधिकार-पत्र लेकर देश के संसाधनों का सौदा किसी से भी कर सकते हैं। अपने ही देश के राजनीतिक दल उन कम्पनी बहादुरों के रँग में रंगे दिखायी देते हैं जो कभी ढाई सौ बरस पहले यहाँ आकर सारी जड़ें हिला गये और अब ये वृक्ष ढहाने के बचे हुए काम को पूरा करने में लगे हुए हैं।
अजीब विडम्बना है कि जो व्यक्ति किसी राजनीतिक दल का समर्थक नहीं वह असहाय और असुरक्षित महसूस करने लगा है। उसके लिए कोई आवाज ही नहीं उठ सकती। वह इस भ्रम को पालकर संतुष्ट बने रहने में ही अपनी खैर मनाये हुए है कि उसे सत्ताधारी दल में विश्वास करने वाला मान लिया जाये। वह अब देश का जिम्मेदार नागरिक नहीं, पार्टी का पेशेवर कार्यकर्ता बनकर जीना चाहता है। वह आगे बढ़कर जैसे खुद कुछ कर ही नहीं सकता। उसने किसी न किसी के पीछे चलना स्वीकार कर लिया है। लोकतंत्र में नागरिकों के ओझल होते जाने से देश भी ओझल होने लगता है। क्या देश किसी तरह जीवन काट लेने की किसी जगह का नाम भर है? एक-दूसरे से दूर बसते जाते लोगों के आसपास दूर दुनिया से भरती जाती चीजों का फैला हुआ बाजार ही दीखता है, उसमें घूमते हुए खरीददार दीखते हैं पर उसमें कहीं देश नहीं दीखता।
रेस्तराँ में, बार में, शाँप में, होटेल में, किसी इण्टर नेशनल सेंटर में ही मित्रों से मुलाकात होती है, अब घर मिलने जगह नहीं रही। वह जितना बाजार के पास है उससे ज्यादा लोगों से दूर है। घर ही क्या, नदी के किनारे और उपवन भी मिलने की जगह जैसे नहीं लगते, वे बाजार में खोते जा रहे हैं। पिता ने करीब पचास बरस पहले सहज भाव से एक छोटी-सी कविता कही थी -- देश अपना है, घर अपना है, देश में अपना घर है पर घर में अपना देश नहीं है। आधी सदी से देश से दूर जाते घर को आज गौर से देखता हूँ तो उसमें मेरे देश की चीजें ही दिखायी नहीं देतीं। बस किसी कोने में अनमने-से कृष्ण बैठे रहते हैं और सँझा आरती की जोत के प्रकाश में उनकी प्रतिमा पर छाया अवसाद झलकता रहता है। लगता है अब उसे भी अनुभव करने का समय नहीं बचा। उनकी प्रतिमा की आरती उतारते हुए उनका सामना करने से जी घबराता है।
इस अकेले होते जाते जीवन में कवि कितने अकेले पड़ते जा रहे हैं पर यह कोई नयी बात नहीं है। वे जो पहले हो गये और जो आगे हो रहे हैं उन्हें लगता रहा है कि कोई किसी की नहीं सुन रहा। अब तो जलती-बुझती और कुछ भभकती-सी कविताएँ ठण्डी होती जाती राख में चिलकती-सी लगती हैं। कवि मुक्तिबोध ने अधूरी और सतही जिन्दगी के गर्म रस्तों पर चलते हुए अपनी एक कविता में यही अनुभव किया। उन्हें लगा कि जैसे कवि ही इस भयानक अंधे दौर में हृदय में बसी प्रभाओं, प्रश्न-मुद्राओं और जन समस्याओं को कुचलता चल निकला है, कोई झनझनाती आग उसे हर पल चीखने को विवश तो करती है पर चीखती हुई कविता बनाने में उसे लज्जा आती है।
कवि श्रीकान्त वर्मा की कविता को याद करते हुए कहने का मन होता है कि यह नकली कवियों की नहीं, लज्जित कवियों की वसुन्धरा है जहाँ कविता का प्रमुख उपकरण जीवन ही कवि की स्वभाविक पहुँच से दूर है। एक-दूसरे से अपरिचित होती जाती दुनिया में आखिर कवि अपना परिचय किसको दें? कवि बच्चन यही कह गये कि -- क्षण भर जीवन मेरा परिचय। कविता में क्षण के विस्तार का अवसर अब समय खोता जीवन देता ही कहाँ है।
अब बहुत कम कविताएँ कवियों के जीवन से बाहर आयी लगती हैं। वे कवि से उत्पन्न और उसी में विसर्जित होती रहती हैं। इसे कुछ आलोचक कवियों का स्वराज्य कहकर उनका बचाव भी करते रहे हैं क्योंकि वह कवि की स्वान्तःसुखाय सर्जना है। हर कवि की अभीप्सा कविता को अपने से बाहर ले आने की होती है। वह उसे ले आता है और अगर संसार में कविता के लिए जगह न मिले तो कविता को फिर कवि में ही समा जाने के अलावा और उपाय ही क्या बचता है। अनुभव में यही आता है कि कविता अपने उद्गम की ओर लौट जाने के लिए सदा आतुर है। उसने अपने घर लौटना कभी नहीं छोड़ा

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