ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चल लिये कितने कदम
CATEGORY : कविता 01-Aug-2018 01:19 AM 121
चल लिये कितने कदम

मानवता की राह पर, बढ़ चलें अब ये कदम,
भूलकर निज स्वार्थ हम, थाम लें हर हाथ हम
न पैर अपने डगमगायें, न तूफ़ान हमको रोक पाये
न समन्दर में हो दम, रोक ले अपने कदम
आये पर्वत राह में, लाँघ कर उसके शिखर
जब तलक मंज़िल मिले, न रुकें अब ये कदम
अपने लिये तो इस जनम, चल लिये कितने कदम।

पाप से संग्राम कर, पुण्य की हो कामना
प्यार से जग जीतने की, मन में लेके भावना
झूठ और अज्ञान के, हम मिटा दें सब भरम
अंध हर विश्वास का, हम करेंगे सामना
सत्य की थामे मशाल, रोक सके न हमको काल
हर अँधेरे को मिटाने, बढ़ चलें अपने कदम
अपने लिये तो इस जनम, चल लिये कितने कदम।

आसमाँ के चाँद-तारे, हम ज़मीं पे लायेंगे
जो हो सका न कभी, वो हम कर दिखायेंगे
हर दुखी असहाय की, प्यार से झोली भरें
हर खुशी का रंग हम, हर आँख में खिलायेंगे
जो अंग से लाचार हों, हम बनें उनके कदम
हर दर्द की पुकार सुन, चल पड़ें अपने कदम
अपने लिये तो इस जनम, चल लिये कितने कदम।

इस धरा पर इन्द्र का, स्वर्ग हम उतार लें
हर दुखी की पीर को, हम खुशी से बाँट लें
जिसका है कोई नहीं, हम लगा उसको गले
आँसुओं को पोंछ कर, हर ज़िन्दगी सँवार दें
गैर भी बन जाये अपना, ऐसे हों अपने करम
हर अबल औ निर्बला के, साथ हों अपने कदम
अपने लिये तो इस जनम, चल लिये कितने कदम।

जब भूख से या रोग से, कोई भी बेहाल हो
जब किसी निर्दोष पर, अनर्थ अत्याचार हो
हारकर इस कशमकश से, छोड़ दी हर आस हो
हर ज़िंदगी के रंग से, जो हो गया उदास हो
फिर जगा दें दिल में उसके, उम्मीद की नूतन किरण
उसकी राह की मुश्किलों को, रौंद दें अपने चरण
अपने लिये तो इस जनम, चल लिये कितने कदम।

आग बन ये भावनायें, फैलें हरेक देश में
इस कारवाँ में साथ हो, हर कोई हर वेश में
मानवता बन लहू, बहती है जिसमें हर कहीं
साथ हों उसके कदम, देश और परदेश में
हर भेद औ हर द्वेष को, आज हम कर दें दफ़न
प्यार की इस राह पर, बढ़ चले अब हर कदम
अपने लिये तो इस जनम, चल लिये कितने कदम।

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