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विदेशों में सेवा का सम्मान
01-Sep-2019 07:00 PM 771     

भारतीय संस्कृति में "सेवा" और "दान" को अति उच्च कोटि के पुण्य कार्यों में गिना जाता है। ये दोनों कार्य ऐसे कार्य हैं जो व्यक्ति को न केवल समाज से जोड़ते हैं, बल्कि नि:स्वार्थ भावना की धनात्मक तरंगों द्वारा समाज का कल्याण भी करते हैं। यही कारण था कि हमारे ऋषि-मुनियों ने सेवा को धर्म से जोड़ दिया। उनका सोचना था कि यदि इसे धर्म से जोड़ दिया जायेगा तो धर्म के साथ-साथ सेवा की भावना भी जीवित रहेगी। किन्तु दु:ख की बात ये है कि आज सेवा की भावना केवल धार्मिक स्थलों तक ही सीमित रह गई है। वैसे आज भी अनेकों धार्मिक और सामाजिक संस्थायें हैं जो जरूरतमंद बस्तियों, गाँवों तथा स्थानों पर समय-समय पर जाकर अपनी सेवायें देती रहती हैं। आज के भारत में स्वार्थ की भावना सुरसा के मुख की तरह प्रति पल बढ़ती जा रही है। इसी स्वार्थ की भावना, समय के अभाव और अपने सुखों की चिंता जैसी सोच ने सेवा और स्वयंसेवक की भावना को भारतीय समाज से लगभग लुप्त कर दिया है। दूसरी ओर विदेशों में "सेवा" या स्वयंसेवक के कार्यों को अत्यधिक सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। यहाँ प्रतिवर्ष विभिन्न श्रेणियों तथा क्षेत्रों में स्वयंसेवक संस्थाओं को पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाता है। ऐसा करने से उन संस्थाओं तथा उनके द्वारा किये जा रहे कार्यों के बारे में समाज को जानकारी मिलती है तथा अनेक नये स्वयंसेवक उस संस्था से जुड़ते हैं।
आज अमेरिका तथा अनेक अन्य देशों में "सेवा" के राष्ट्रभक्ति के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि इस अच्छी मानसिकता को समाज में व्याप्त करने के लिये बच्चों को स्कूल से ही "सेवा" की भावना सिखायी जाती है। उनकी कक्षाओं और रुचि के अनुसार छोटे-छोटे क्लब बना दिये जाते हैं जो वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, भोजन संग्रह, वस्त्र संग्रह, कोट तथा कंबल संग्रह, खिलौने संग्रह, स्टेशनरी सामग्री का संग्रह, धनराशि संग्रह, अस्पतालों में सेवा देना, पुस्तकालयों तथा पाठशालाओं में सेवा देना आदि कार्य बड़े गर्व के साथ करते हैं। बचपन से ही बच्चों के मन में ये भावना घर कर जाती है कि वे अपने फुरसत के कुछ क्षण यदि समाज की सेवा में लगाते हैं तो वे अपनी पाठशाला, पार्क, बस्तियों और शहर को सुंदर और रहने के लिये अधिक सुखद बना सकते हैं। इस प्रकार के काम करने से बच्चों के मन में देशप्रेम की भावना जागृत होती है। छोटे-छोटे काम करने की शर्म और कठिन काम करने का डर समाप्त हो जाता है। स्कूल में सभी छोटे, बड़े, अमीर, गरीब, पढ़ने में कुशाग्र बुद्धि छात्र और मंद बुद्धि छात्र सभी मिलकर काम करते हैं। ऐसा करने से समानता की भावना बढ़ती है और स्वार्थ की भावना कम होती है।
अमेरिका में बच्चों की तरह बड़ों के लिये भी अनेक सेवा कार्य हैं जैसे- पाठशालाओं में, अस्पतालों में प्रवेश करने वाले लोगों की पहचान करना। छुट्टी होने पर तेज वाहनों को रोककर विद्यार्थियों को रास्ता पार करवाना (बच्चों को बड़ी दुर्घटनाओं से बचाना), अभिभावकों की ओर से शिक्षकों तथा पाठशाला के अन्य कर्मचारियों को त्यौहारों पर भोज तथा उपहार देकर सम्मानित तथा प्रोत्साहित करना। विभिन्न खेलों की टीमों के कोच बनना। पुस्तकालयों, मेलों, पार्किंग लॉटों में अनुशासन तथा व्यवस्था बनाने में सहायता करना। अस्पतालों, वृद्धाश्रमों तथा नर्सिंग होमों में एम्बुलेंस चलाने का कार्य करना। ये कुछ ऐसे छोटे-बड़े सेवा कार्य हैं जो हर व्यक्ति कर सकता है।
ऐसा नहीं है कि भारतीयों के मन में सेवा की भावना नहीं है किन्तु शर्म, आलस और दूसरों के भरोसे (साहबगिरी) रहने की आदत ने उन्हें सेवा से दूर रखा है। हमारी सामाजिक व्यवस्था ऐसी नहीं है कि व्यक्ति को आसानी से अपना मनपसंद सेवा कार्य करने का अवसर अपने आसपास ही मिल सके। एक और सोच इसमें बाधा उत्पन्न करती है और वह है "धन की आवश्यकता"। भारत में अधिकांश लोग ये सोचते हैं कि बिना धन के वे कोई समाज सेवा नहीं कर सकते। हमारे देश की अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने भी "साहब प्रवृत्ति" वाले स्नातकों की संख्या को बढ़ाया है।
आज भारत में सेवा कार्यों को वह सम्मान प्राप्त नहीं है जो विदेशों में "सेवा" को प्राप्त है। यही कारण है कि हम हर कार्य के लिये सरकार, नगर निगम या वेतनभोगी सेवकों के भरोसे ही रहते हैं। आधुनिक शिक्षा ने लोगों को अपनी संस्कृति और धर्म की शिक्षा से दूर कर दिया है और यही कारण है कि धार्मिक भावना की कमी के कारण भी सेवा कार्यों में गिरावट आई है। लोगों के पास अनावश्यक धन होना भी इसका एक कारण है। पर "सेवा" से दूर होने का सबसे बड़ा कारण मैं आज भारतीय नागरिकों की रोजमर्रा की परेशानियों के मानती हूँ। वहाँ प्रतिदिन के जीवन में हर व्यक्ति किसी न किसी परेशानी या कठिनाई से जूझ रहा है और वह अपनी परेशानियों के रहते "सेवा" करने के बारे में सोच भी नहीं सकता।
सेवा न करने के इतने सारे कारण होते हुये भी तब सुखद आश्चर्य होता है जब दूरदर्शन में कुछ गरीबों, विदेशियों और विकलांगों को बिना धन के, बिना सहयोग के और बिना साधनों के सेवा करते हुये देखने का अवसर मिलता है तो स्वयं को उन्हें प्रणाम करने से नहीं रोक पाती। आज हमने विदेशों की नकल करके वहाँ की सभ्यता की कई बातों को अपना लिया है। इनमें से अधिकतम बातें हमारी सभ्यता और संस्कृति के विरुद्ध ही हैं। काश हम विदेशों की अच्छी बातें जिनमें ईमानदारी, सेवा, समय पर कार्य करना, एक-दूसरे की सहायता करना, दान देना तथा ऊँच-नीच की भावना से ऊपर उठकर सबके साथ समान व्यवहार करना आदि को अपना पाते तो शायद बहुत सुंदर भारत बना पाते।

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