ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
होना शुरू होना
CATEGORY : शब्द चित्र 01-Feb-2017 12:28 AM 1297
होना शुरू होना

सागर शहर की झील के किनारे नजरबाग की सीढ़ियों पर बैठा निर्मल वर्मा के निबन्धों की किताब -- शब्द और स्मृति -- पढ़ रहा हूँ। जैसे कोई जलस्रोत किसी नदी में मिल जाने के लिए आकुल हो। दूर ठहरी हुई शब्दों की कोई नौका स्मृति की पतवारों से धीरे-धीरे चलने लगी है। मैं पानी में बहती हुई निर्मल वर्मा की आवाज सुन रहा हूँ -- हमारे बीच दो चीजें ऐसी हैं, जिनके सामने जिन्हें छूकर हम अपने साधारण क्षणों में भी इतिहास की चिरन्तनता और प्रकृति -- जो शाश्वत है -- उसकी ऐतिहासिकता -- दोनों को एक समय में एक साथ अनुभव कर सकते हैं। अजीब बात यह है, ये दोनों चीजें अपने स्वभाव में एक-दूसरे से बिलकुल उल्टी हैं -- एक ठोस और स्थायी, दूसरी सतत प्रवहमान, हमेशा बहने वाली -- पत्थर और पानी। दोनों के सम्मुख यह अनुभव होता है कि हम उनके गवाह नहीं, वे हमारे गवाह हैं। हम उनके अस्तित्व को नहीं देख रहे, वे हमारे बीतने को देख रहे हैं। यह अनुभव हमारे उस आधुनिक बोध को कितना धक्का देता है, जहाँ हम संसार के साक्षी होने का दम भरते हैं, जबकि हम स्वयं इतिहास से त्रस्त हैं। एक त्रस्त गवाह की गवाही कैसी? वह न इतिहास रच सकता है, न इतिहास का अतिक्रमण कर सकता है, जिससे कविता जन्म लेती है। निर्मल वर्मा एक युवा कवि को रिल्के की सलाह की याद दिलाते हैं -- आपको प्रकृति की तरफ जाना होगा। दुनिया के आदिपुरुष के समान आपको वह सब कहने की कोशिश करनी होगी, जो आप देखते हैं, अनुभव करते हैं, प्रेम करते हैं, खो देते हैं।
एक दिन मेरी नौका भोपाल की बड़ी झील के किनारे आकर लगी। 1982 की शुरुआत में ही इसी झील के किनारे कलाओं का घर बनकर तैयार हो रहा था, जो देश और दूर दुनिया में भारत भवन के नाम से जाना गया। देश के हर राज्य में कलाओं के घर बनें जो कविता और कला के ऐसे बसेरे की तरह हों जिनमें एक बड़ा रसिक समाज समा सके -- आजादी की पच्चीसवीं सालगिरह के मौके पर यह बात इंदिरा गांधी के मन में आयी और फिर सपना बुनने वाले लोगों ने उसे बुना जो सबसे पहले भारत के हृदयप्रदेश में साकार हो रहा था। चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन लोक-आदिवासी और आधुनिक चित्रकला के दो बड़े संग्रहालय और रंगकर्मी ब.व. कारन्त रंगमण्डल रच रहे थे और अशोक वाजपेयी शुभारम्भ की प्रतीक्षा में व्यस्त थे ।
उन्हीं दिनों निराला सृजनपीठ पर आसीन कथाकार निर्मल वर्मा से पहली बार मिलते हुए लगा कि जैसे शान्त दुपहर में कोई चौड़े पाट वाली नदी हो, जो ऊपर से ठहरी-सी दीखती है पर भीतर ही भीतर बहती रहती है, उसके शान्त जल में आकाश धीरे-धीरे डोलता है, सहसा कोई मछली गहरायी से ऊपर आकर सूर्य को हिला देती है। उनमें दूसरों को सुनने और उन्हें समझने का अपार धीरज था जैसे किसी गहरायी में डूबा साधे हुए हों। जब वे कुछ कहने को होते तो गहरी साँस लेते जैसे किसी गहराई से अपने आपको ऊपर उठा रहे हों। उन्हें सुनते हुए हमारे चेहरे पर कोई धूप झिलमिलाने लगती जिसे हम उनके शब्दों के आईने में अपने चेहरे पर चमकता हुआ देख लेते।
हम कई दोस्त हो गये। मदन सोनी तो पहले से ही कलापरिषद् में कलावार्ता पत्रिका निकाल रहे थे, उदयन वाजपेयी, शिरीष ढोबले और राजेन्द्र धोड़पकर, डॉक्टर बन रहे थे, संजीव क्षितिज साक्षात्कार पत्रिका में सह-सम्पादक थे। मदन को आलोचना भा गयी, बाकी सब कविताएँ लिख रहे थे। कभी कहानी पर भी हाथ आजमाया करते। मुझे उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत अकादमी में होने वाले प्रकाशनों का काम करना था। उन दिनों कथाकार-कवि उदयप्रकाश भी भोपाल में थे, मुझे उनके साथ पूर्वग्रह पत्रिका से भी जोड़ दिया गया। काम बहुत था, लोग कम थे और अशोक वाजपेयी हर काम को समय पर और सुरुचिपूर्वक पूरा करने की निष्ठा से भरे रहते। आप कहीं भी हों वे आपको और कहीं का काम भी सौंप देते थे। वे खुद भी बहुत सारे काम एक साथ सँभाले हुए थे। उनसे यह कहने की हिम्मत किसी में नहीं थी कि यह काम हमारा नहीं। उनसे कोई कहे कि यह काम तो हमें आता नहीं तो वे तुरन्त कहते कि जिन्हें आता है उनसे सीख लो। वे कलाओं का घर बना लेने के सपने में डूबे रहते और यह सपना हमें उनकी आँखों में भरा दिखायी देते ही हमारी आँखों में भी भर गया। हम उनके सपने में सम्मोहित होकर चल रहे थे। हम अक्सर भूल जाते कि अपना घर छोड़कर आये हैं, उस बनते हुए नये घर में हमारे लिए अपने घर से भी ज्यादा जगह थी। इस जगह पर कोई हक नहीं जता रहा था, यह तो बस दी जा रही थी ।
हम किसी दूसरे घर में ही नहीं, किसी दूसरे समय में भी आया हुआ अनुभव करने लगे। हमें लगने लगा कि केवल साहित्य ही नहीं सारी कलाएँ मिलकर जीवन को रचती रहती हैं और उनके रचयिता एक-दूसरे के आसपास रहकर ही अपने आपको रचना करने योग्य बनाये रख सकते हैं। देखते ही देखते वह कलाओं का घर किसी बड़े कला-कुटुम्ब की तरह रचने-बसने लगा। वह हमारी भी रचना करने लगा और हम भी कुछ रचने लगे।
सारी सृष्टि रूप-रस-गंध-स्पर्श-शब्द में बसी हुई है। रूप में आग, रस में जल, गंध में धरती, स्पर्श में चेतना और शब्द में आकाश बसा हुआ है। कविता और कला की दुनिया भी ऐसे ही बसायी जाती है। सृष्टि की कला और कला की सृष्टि किसी विचार से नहीं, राग से होती है। बिना राग के संसार और उसकी कला गहरी नींद में सोये रहते हैं। राग ही है जिससे रँगाकार, स्वर, मुद्राएँ और काव्य का जन्म सम्भव है। राग एक उत्प्रेरक है जो अनुरक्ति और विरक्ति के बीच रचने के लिए उत्सुक करता है। विचार में केवल आसक्ति है उसकी कामनाएँ ही उसे बाँध लेती हैं जो कभी पूरी नहीं होतीं और यही विचार की विफलता है। कविता और कलाएँ तो कामनाहीन हैं, वे अपना नहीं सबका होना दिखाती हैं, कुछ और होने के लिए किसी को उत्सुक नहीं करतीं। वे सतत् वर्तमान को साधती हैं, भविष्य उनका साध्य नहीं। मेरे लिए भारत भवन राग के घर की तरह लगने लगा जिसकी अँगनाई रचने को उत्सुक करती है, कुछ होकर दिखाने के लिए नहीं, अपने होने को देखने के लिए अपने प्रांगण में बुलाती है।
भोपाल की प्रोफेसर्स कॅालोनी में निर्मल वर्मा का आवास राग के घर की तरह ही तो था जो हमें लगातार अपनी ओर खींचता रहता। दिन डूबते ही हम उस घर की ओर खिंचते चले आते। निर्मल वर्मा की तरफ जब भी देखो तो लगता कि उनके चेहरे पर गहरी शान्ति झलकती है जिसकी जड़़ उनके भीतर गहरायी तक जमी हुई हैं पर जीवन के प्रति अवसाद और शोक की रेखाएँ भी उस शान्त चेहरे पर अक्सर झलक आतीं। यह शान्ति, अवसाद और शोक मिलकर ही शायद उनकी कहानियों और चिन्तन को जीवन के प्रति करुणा से भरते रहे। जब भी उनसे मिलो तो उनकी आँखों से करुणा झरती रहती और हर बार लगता कि वे लगातार दुख के मन को परखते रहते हैं। हमेशा उनकी आँखें वेदना में डूबी दिखायी देतीं जो किसी के सामने आते ही आत्मीयता से भर जातीं और उसे वे अपने पास बिठा लेने को आतुर हो उठते।
वे हमारे घर भी कई बार आये। मेरी बेटी कहती है कि मेरे नमस्कार के जवाब में निर्मल अंकल ने जिस आत्मीयता से मुझे नमस्ते किया, उसमें मुझे अपने प्रति जो सम्मान का अनुभव हुआ और उनके चेहरे पर जो बच्चों जैसे उज्ज्वल और निश्छल स्नेह की झलक देखी वैसी तो किसी के चेहरे पर आज तक नहीं देखी। वह उनके उपन्यास और कहानियों के अँग्रेजी अनुवाद पढ़ चुकी थी और यही मान बैठी कि वे अँग्रेजी में ही लिखते होंगे। जब उसने यह बात निर्मल जी को बतायी तो उनकी हँसी फूट पड़ी। निर्मल वर्मा के देह वृक्ष पर अवसाद और शोक की शाखाओं के बीच कोई घोंसला जरूर था जहाँ से चहचहाती हुई उनकी हँसी हमारे पास उड़ती हुई चली आती। कभी-कभी जब बुक्का फाड़कर हँसते हुए उनका दम फूलने लगता तो हम अशोक जी की डाँट भी खाते कि तुम लोग निर्मल जी को हँसा-हँसाकर उनकी तबीयत बिगाड़ दोगे। मन ही मन लगता कि कोई किसी को कैसे हँसा सकता है, हँसी तो अपने आप फूट पड़ती है जैसे कोई छिपा हुआ निर्झर अपने आप बहने लगता है -- निर्मल वर्मा की हँसी बिलकुल ऐसी ही थी।
निर्मल वर्मा और जगदीश स्वामीनाथन की मित्रता जगजाहिर है। एक दोपहर दोनों साथ थे। हम भी वहीं एक कोने में अपना आसन जमाकर बैठे थे। स्वामी जी प्रकृति के रचना विधान और कलाकर्म के अन्तर के बारे में बात करते हुए कह रहे थे कि प्रकृति की रचनाएँ कला नहीं हैं, मनुष्य का कलाकर्म ही कला कहलायेगा। यह सुनकर निर्मल जी ने श्रीमद्भगवद्गीता की याद करते हुए कर्म जिज्ञासा का प्रसंग छेड़ दिया और पूछा कि हम किस तरह प्रकृति से मनुष्य को अलगाकर मनुष्य के कृतिकर्म को कला कहें। क्या इसे अलगाये बिना मनुष्य के कलाकर्म को बिलकुल परिभाषित नहीं किया जा सकता। तत्काल मैंने भी यह जोड़ दिया कि स्वामी जी ने आधुनिक कला संग्रहालय के पड़ौस में लोक-आदिवासी कला संग्रहालय रचकर खुद ही यह प्रमाणित किया है कि प्रकृति-जीवन और कला एक-दूसरे से दूर नहीं, आपस में गुँथे हुए हैं और उन्हें अलगाया नहीं जा सकता। स्वामी जी अपनी चुप्पी तोड़ ही रहे थे कि सड़क से केले बेचने वाले ने आवाज दी जिसे सुनते ही स्वामी जी के मन में केले खाने की इच्छा जागी, वे जैसे ही केले खरीदने के लिए उठने लगे तो निर्मल जी ने उनके साथ एक मजेदार छेड़खानी करते हुए तुरन्त कहा, अरे क्या करते हो स्वामी, तुम्हें मालूम नहीं श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि -- कर्मण्येवाधिकारस्ते कदली फलं कदाचन। यह सुनकर और न जाने क्या सोचकर स्वामी जी बोले कि ठीक है और तुरन्त बैठ गये। उनके बैठते ही निर्मल जी की हँसी के घोंसले से चिड़िया बाहर आ गयी। फिर हँसते-हँसते बात ही बदल गयी। हम चारों मित्र जब भी नयी कविताएँ लिखते, आपस में सुना लेने के बाद निर्मल जी को भी सुनाते। हम अनुभव करते कि वे हमारी कविताएँ पसन्द करते हैं। एक दिन उन्होंने सुझाव दिया कि तुम चारों अपनी कुछ कविताएँ चुनकर एक कविता चयन प्रकाशित करो। उसकी भूमिका लिखने के लिए तुम्हारे पास युवा आलोचक मदन सोनी हैं। निर्मल वर्मा ने इस पुस्तक को छापने के लिए अपनी एक महीने की तनख्वाह भी हमें दे दी। हमें बहुत संकोच हुआ पर वे नहीं मानें। नये कवियों के होने और शुरु होने के प्रति निर्मल जी की इस पहल में जगदीश स्वामीनाथन, ब.व. करन्त, अशोक वाजपेयी, पण्डित कार्तिकराम, हरिनारायण व्यास, सत्येन कुमार, प्रभात त्रिपाठी, डॉक्टर प्रेमशंकर, ओमप्रकाश चौरसिया, मनोहर वर्मा और अनिल वाजपेयी भी शामिल हुए।
बीसवीं सदी के नौवें दशक की शुरुआत में ही अपनी बीस-बीस कविताओं को प्रकाशित कर ध्रुव शुक्ल, राजेन्द्र घोड़पकर, संजीव क्षितिज और उदयन वाजपेयी का होना शुरु हुआ। मदन सोनी ने हिन्दी में महाकाव्य की संक्षिप्त पतनगाथा का बखान करते हुए आठवें दशक से मुक्ति के घोषणा-पत्र के रूप में भूमिका लिखी। बंजर महाकाव्य के एक-एक शब्द में रोज खपते हुए कवियों के बीच हम भी आ गये। हमें साहित्य के भोपाल स्कूल का कवि कहा गया जबकि हमारी दिलचस्पी शुरू से ही डी-स्कूलिंग में रही। मदन सोनी ने अपनी भूमिका का समापन करते हुए यह रेखांकित किया कि ये कवि अपने आगमन का उत्सव नहीं मना रहे हैं। वे तो बस इतना चाहते हैं कि उन्हें अपनी परम्परा के बीच से शुरू होता हुआ देखा जाये। यह बात अशोक जी ने भी कही कि इन्होंने अपनी एक परम्परा डिफाइन करने की कोशिश की है जो कि अक्सर लोग नहीं करते रहे हैं।
उत्सव तो नहीं, दो दिनों तक -- इधर की दुनिया-इधर की कविता विषय पर एक परिसम्वाद हुआ जिसमें नेमिचन्द्र जैन, रघुवीर सहाय, नामवर सिंह, कुँवरनारायण, कमलेश, अशोक वाजपेयी और मदन सोनी ने बातचीत की। पहले दिन शुरुआत करते हुए अशोक वाजपेयी ने यह रेखांकित किया कि आमतौर पर यह धारणा बनी रहती है कि हमारे वरिष्ठ कवि और आलोचक युवतम लोगों पर बहुत देर तक ध्यान नहीं देते हैं, अपनी ही पीढ़ी सबको प्रिय लगती है। पूरे परिसम्वाद में कवि कमलेश ने जो कुछ प्रश्न उठाये और बातचीत की वही स्मृति में टँकी रह गयी। हम अपनी आगन्तुक पीढ़ी को क्या दें -- कमलेश ने कहा कि आत्मज्ञान और विश्वज्ञान के बिना कोई महत्वपूर्ण सृजन नहीं हो सकता। हम लोग एक साम्राज्यवादी और सांस्कृतिक दबाव में इस रूप में रह रहे हैं कि वह हमें हमारे आत्मज्ञान से विचलित-विपथगामी बना रहा है, हमारे विश्वज्ञान को दिग्भ्रमित कर रहा है। जब तक हम इसे अस्वीकार कर अपनी विशिष्ट स्थितियों के सन्दर्भ में इन विशिष्ट पदों को परिभाषित नहीं करते तब तक हम अकाल मृत्यु की ओर बढ़ते रहेंगे। यथार्थ तो हमेशा बिना हमारे बनाये हुए है लेकिन जिन दो पदों -- रोमेंटिसिज्म और रिएलिज्म या क्लेसिसिज्म और मॉर्डनिज्म -- से हम यथार्थ को पकड़ने की कोशिश करते हैं तो वह हमारी पकड़ में नहीं आ सकता। उसे एक मैथेमेटिकल मॅाडल की तरह नहीं समझा जा सकता। प्रकृति में ही वो सातत्य है जो हमारे विच्छिन्न जगत को कुछ अर्थ प्रदान कर सकता है, उसमें उस शून्य की गरिमा को ला सकता है जिसके माध्यम से हम अपने को समझ सकते हैं कि क्या है यह जीवन और यह विश्व क्या है।
निर्मल वर्मा ने जो सपना हमारे लिए सँजोया वह जल्दी ही चरितार्थ हो गया पर संयोगवश इस अवसर पर वे न आ सके। कमलेश जी को सुनते हुए उनके ये शब्द जरूर याद आते रहे -- संकट की घड़ी में अपनी परम्परा का मूल्यांकन करना एक तरह से खुद अपना मूल्यांकन करना है, अपनी अस्मिता की जड़ों को खोजना है। हम कौन हैं -- यह एक दार्शनिक प्रश्न न रहकर खुद अपनी नियति से मुठभेड़ करने का तात्कालिक प्रश्न बन जाता है। निर्मल वर्मा को पढ़ते हुए हमेशा यह अनुभव बना रहता है कि धरती घूम रही है, उस पर अनेक दिशाओं से जल बह रहे हैं और उन पर धूप खिली हुई है, जिसे हवाएँ हिला रही हैं, इनके बिना हमारी स्मृति के आकाश में शब्दों का होना सम्भव नहीं। हम जो भी कह रहे हैं, इनके बिना नहीं कह सकते।

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