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हिन्दू, हिन्द, हिन्दी और नदी संस्कृति
01-Jun-2019 12:35 AM 852     

तमिल से लेकर संथाली, खासी तक, मणिपुरी से लेकर मलयालम तक
सब विशाल हिंदी जाति में समाहित हों और हम व्यवहार के स्तर पर
स्थापित करें कि हिन्दी इन सभी भाषाओं को गले लगा रही है।

किसी भी भाषा का विकास उसके क्षेत्र और परिवेश विशेष से गहरे रूप में जुड़ा होता है। खासतौर से संज्ञा शब्दोंे की परंपरा काफी हद तक अविच्छिन्न रूप में चलती रहती है। गुज्जूर, गुर्जर, गुजरात, गुजरांवाला जैसे अनेक शब्द मिल जाते हैं जिनके माध्यम से इतिहास को देखने-समझने की नयी दृष्टि मिलती है। इसीलिए आज भी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में भाषा खासतौर से संज्ञा शब्दों को विशेष मान्यता प्राप्त है।
ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण और दुर्लभ शब्द है- हिन्दी। एक ही मूल शब्द से निर्मित हिन्दू, हिन्द और हिन्दी पद भारत और यहां की संस्कृति से अभिन्न रूप में जुड़े हुए हैं। शब्दों की यात्रा यूं तो हमेशा ही मजेदार होती है परंतु यह शब्द विशेष है। चूंकि राजनीतिक, धार्मिक आदि अनेक कारणों से हिन्दी की तुलना में हिन्दू की चर्चा अधिक हुई इसलिए यहां पहले "हिन्दूू" शब्द, पर ही बात करते हैं। इस शब्द पर बहस के अनेक कारण हैं, सबसे बड़ा कारण तो यही है कि यह शब्द दुनिया के तीसरे सबसे बड़े धर्म और तीसरी सबसे बड़ी भाषा की पहचान निर्मित करता है।
इस शब्द की व्युत्पित्ति को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं। कोई इसे "हिन्" (नष्ट करना) अ"दु" (दुष्ट) से यानी "दुष्टों का नाश करनेवाले" अर्थ से जोड़ता है तो कोई "हीनअदुष्अडु" यानी "हीनों को दूषित करने वाला" मानते हुए "मेरुतंत्र" के 23वें प्रकाश में शंकर-पार्वती से संबंधित इस श्लोक का उद्धरण देता है- "हिन्दुधर्मप्रलोप्तारो जायन्ते चक्रवर्तिन:। हीनंच दूषयत्येव हिन्दु रित्यु चयते प्रिये।।"
कुछ लोग इसका अर्थ बताते हुए कहते हैं कि "हीनों या म्लेच्छ आदि विदेशी लोगों को दूषित करनेवाले को हिन्दु कहते हैं।" परंतु भाषाविद् भोलानाथ तिवारी ने स्पष्ट लिखा है कि "मेरुतंत्र" कोई प्राचीन पुस्तक नहीं, बल्कि बहुत बाद का ग्रंथ है और यूरोपीयों के भारत आने के बाद लिखा गया है। इसमें "फिरंगी" शब्द का प्रयोग भी मिलता है।
हिन्दू शब्द की एक व्युत्पत्ति अन्य रूप में भी मिलती है- "यो हिसाया: दूयते, स: हिन्दु" अर्थात जो हिंसा से दुखी होते हैं, वे हिन्दू हैं। कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह के अनेक श्लोक निर्मित किये जा सकते हैं परंतु बौद्धिक लोग भाषा के द्वारा जितना बातों को छुपाते हैं, भाषा के नियम कुछ बातों को उतना ही उद्घाटित भी कर देते हैं। प्रत्येक भाषा में शब्द निर्माण के कुछ खास ढंग होते हैं, भिन्न संस्कृति का शब्द उस ढंग से विचलन प्रस्तुत करता है।
हमें यह स्वीकारने में दुविधा नहीं होनी चाहिए कि हिन्दू मूलत: संस्कृत का शब्द नहीं है। आचार्य वामन शिवराम आप्टे के चर्चित "संस्कृत-हिन्दी कोश" में हिन्दू, हिन्दी या हिन्द शब्द नहीं मिलता है। लेकिन जैसा कि लोग बताते हैं, यह शब्द मूलत: फारसी का भी नहीं है। बल्कि, संस्कृत में प्रचलित (इसकी व्याख्या आगे की जाएगी) "सिन्धु" शब्द का यह फारसी रूपांतरण है। जैसे कि हफ्ता आदि हैं। इसीलिए इस पर नियम कानून संस्कृत के नहीं फारसी के चलते हैं और इससे हिन्दुस्तान, हिंदवी जैसे अनेक शब्द बनते हैं। आचार्य आप्टे के शब्दकोश में सिन्धु की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- "स्यन्द्अउद् संप्रसारणं दस्य ध:" और इसका अर्थ है- समुद्र, सागर, सिंधु नदी के चारों ओर का देश, हाथी के सूंड से निकला हुआ पानी, हाथी के गण्ड स्थल से बहनेवाला मद, बड़ा दरिया या नदी आदि। इसका संबंध चंद्रमा (सिंधुज) और नमक (सिंधुजम्) से भी जुड़ता है। लेकिन जब सिंधु से संबंधित वस्तुओं की बात आती है तो उसके लिए संस्कृत की चाल पर नियमत: सैन्धव शब्द का प्रयोग किया जाता है। इस शब्द से सिंधु के क्षेत्र में उत्पन्न चीजों यानी सिन्धु देश का घोड़ा, सेंधा नमक, एक ऋषि का नाम, सिंधु प्रदेश के रहनेवाले आदि का अर्थ बोध होता है। ठीक वैसे ही जैसे कुरु से कौरव, गुरु से गौरव आदि शब्द बनते हैं।
हिन्दू और हिन्दी इस दृष्टि से दुर्लभ शब्द हैं कि ये अपने भीतर फारसी और भारतीय दोनों परंपराओं का समावेश कर लेते हैं। उदाहरण के लिए सिन्धु, सिन्ध, सिन्धी की तुलना अगर हम हिन्दू, हिन्द और हिन्दी से करें तो यह अंतर स्पष्ट हो जाएगा। "सिन्धु" एक नदी का वाचक है, "सिन्ध" एक देश का सूचक है और "सिन्धी" से उस देश के निवासी, उस देश के प्रत्येक चीज भोजन, संस्कृति, भाषा आदि का बोध होता है। जबकि "हिन्दू" शब्द से एक जाति का या एक धर्म का या उस जाति या धर्म को माननेवाले व्यक्ति का बोध होता है। "हिन्द" से किसी विशेष क्षेत्र का नहीं बल्कि पूरे भारतवर्ष का अर्थ लिया जाता है। और "हिन्दी" अपने अन्य अर्थों को छोड़कर एक भाषा तक सीमित हो जाती है।
लेकिन मामला यहीं समाप्त नहीं हो जाता। ऊपर इन शब्दों को दुर्लभ इसलिए कहा गया कि सिन्धु शब्द के संस्कृत के होने में भी एक पेंच है। इस संदर्भ में डॉ. भोलानाथ तिवारी का मत उल्लेखनीय है- ""मेरी निजी राय यह है कि इस नदी विशेष का "सिन्धु" नाम मूलत: संस्कृत का शब्द नहीं है। आर्य भारत में आए उस समय पश्चिमोत्तर भारत में आर्येतर लोग रहते थे और ये लोग पर्याप्त सुसंस्कृत थे। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक है कि सिन्धु नदी का कोई न कोई नाम इन आर्येतर लोगों द्वारा प्रयुक्त होता रहा होगा।"" इस प्रसंग का समाहार करते हुए आगे डॉ. तिवारी कहते हैं कि ""कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि यह शब्द मूलत: द्रविड़ भाषा का है। यों, यह भी असंभव नहीं है कि द्रविड़ लोग जब भारत में आए हों तो उन्हें भी यह नाम आस्ट्रिक आदि किसी अन्य पुरानी जाति से मिला हो। साथ ही यह भी संभव है कि आर्यों के आने के समय इस नदी का जो नाम प्रचलित रहा हो, आर्यों ने "सिन्धु" रूप में उसका संस्कृत रूप बना लिया हो।"" (पृ.48, हिन्दी भाषा का इतिहास, डॉ. भोलानाथ तिवारी, वाणी प्रकाशन दिल्ली)
सिन्धु शब्द का अत्यंत प्राचीन होना इस दृष्टि से भी अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता कि जिन लोगों ने अत्यंत विस्तृत क्षेत्र में हड़प्पा, मुअनजोदड़ो, लोथल, धौलावीरा जैसे विशाल शहर बसाए क्या वे लोग अपनी नदी का कोई नाम नहीं रखे होंगे? बल्कि उनकी तुलना में बाद की सभ्यता हीन साबित होती है क्योंकि शहरी सभ्यता का विकास झोपड़ी और ग्रामीण सभ्यता में नहीं होता जैसा कि बाद में दिखता है। यह अवांतर प्रसंग होगा जिसकी चर्चा फिर कभी की जाएगी।
"हिन्दू" शब्द चाहे जिस ओर से आया हो आज की हकीकत यह है कि यह शब्द इस देश की संस्कृति का अभिन्न अंग बन चुका है और इसकी विशेषताओं को आत्मसात कर चुका है। हिन्दुस्तान दुनिया का सबसे ज्यादा विविधता वाला देश है। ऋतु, क्षेत्र, भाषा, संस्कृति, पहाड़, समंदर से लेकर खान-पान, वेशभूषा तक में व्याप्त यह विविधता हिन्दू शब्द में समाहित है। यह तरलता और लोच नदी की विशेषता है। दुनिया की ज्यादातर संस्कृतियां नदियों के तट पर विकसित हुईं किंतु "हिंदू" संस्कृति ने सिन्धु-गंगा-गोदावरी-जमुना-कावेरी आदि को जिस तरह से आत्मसात किया वह इस संस्कृति को विशेष बनाता है।
हिन्दू और हिन्दी के संदर्भ में इससे बेहतर और क्या होगा कि किसी जाति और धर्म की पहचान प्रकृति और नदी से हो। नदी तरल और सतत् प्रवाहशील होती है। स्थिर होना नदी की प्रकृति नहीं है। दुनिया के बड़े धर्मों में संभवत: हिन्दू अकेला धर्म है जो लगभग पानी जैसा तरल है। जिसमें अनेक मत हैं, अनेक व्याख्याएं हैं, अनेक संप्रदाय हैं परंतु अपने पूर्ण रूप में यह स्थिर नहीं है (हालांकि स्थिर बनाने की कोशिशें बीच-बीच में होती रही हैं, परंतु बड़ी नदी की तरह यह सबको बहाए चली जाती है।)
जब अल्लामा इकबाल यह कहते हैं कि :
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से।
अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा।।
हिन्दी हैं हम वतन हैं, हिन्दोस्ताँ हमारा।।
तो वे हिन्दी की उस विशेषता का जिक्र कर रहे होते हैं जो सबकुछ को समाहित कर के अपने में ढाल लेती है। जिस प्रकार बड़ी नदी में तमाम धाराएं मिलती हैं, सबकी अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं, पर आपस में उनका कोई विरोध नहीं होता बल्कि सब मिलकर उस नदी के अस्तित्व को पूर्णता देती हैं। ठीक उसी प्रकार "हिन्दी" भाषा से अधिक संस्कृति है। इसे केवल क्षेत्र विशेष तक सीमित करना या हिंदी पट्टी में बांधना एक तरह का अन्याय है। जब हम ऐसा कर रहे होते हैं तो हैदराबाद, दक्कन से लेकर सुदूर पश्चिम के कच्छ, भुज में चलने वाले ब्रजभाषा कविता विद्यालयों की अवहेलना कर रहे होते हैं। जब हम हिन्दी को केवल संस्कृत या खास जाति से जोड़ते हैं तो मूलत: सिन्धु और गंगा की धारा को बांधने का प्रयास कर रहे होते हैं जो एक तरह से नदी के अस्तित्व को समाप्त करने जैसा है।
दुनिया की सभी भाषाएं जोड़ने का काम करती हैं परंतु हिन्दी इन सबमें खास है। एक तरह से देखें तो हिन्दी देश में कहीं की भाषा नहीं है और इसीलिए हर कहीं की भाषा है, पूरे देश की भाषा है। अपने जन्म से लेकर आज तक हिन्दी सामासिक संस्कृति का प्रतीक रही है। इसका नाम ही प्राचीनतम संस्कृतियों के समुच्चय का प्रतीक है जिसमें आस्ट्रिक, द्रविड़, आर्य, ईरानी आदि अनेक संस्कृतियों के तत्व विद्यमान हैं। आचार्य डॉ. रामविलास शर्मा ने एक क्षेत्र विशेष से जोड़कर "हिंदी जाति" की परिकल्पना की थी। मुझे लगता है कि हमें केवल सिद्धांत ही नहीं बल्कि व्यवहार के स्तर पर हिन्दी को हिन्द से जोड़ते हुए इसके अखिल भारतीय स्वरूप को अंगीकार करना चाहिए। तमिल से लेकर संथाली, खासी तक, मणिपुरी से लेकर मलयालम तक सब विशाल हिंदी जाति में समाहित हों और हम व्यवहार के स्तर पर यह स्थापित करें कि हिन्दी इन सभी भाषाओं को गले लगा रही है और इनके शब्दों के स्वीकार से लेकर हिन्दी पाठ्यक्रमों तक में इन संस्कृतियों के समावेश का प्रयत्न होना चाहिए। शायद तभी हम गर्व के साथ कह पाएंगे- "हिन्दी हैं हम।"

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