ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
उर्दू ज़ुबान का हिन्दी लेखक
CATEGORY : डायरी 01-Sep-2018 08:23 PM 171
उर्दू ज़ुबान का हिन्दी लेखक

शानी, जिनका असली नाम गुलशेर खां शानी था, उन कुछ चुनिंदा मुस्लिम लेखकों में से एक थे, जिन्होंने उर्दू की बजाय हिन्दी भाषा को अपने लेखन का माध्यम बनाया। वे अपने समकालीन साहित्यकारों में आदर के साथ जाने जाते थे। वे कई वर्ष मध्यप्रदेश साहित्य परिषद, भोपाल के सचिव पद पर रहे, जहाँ वे "साक्षात्कार" जैसी उच्च कोटि की साहित्यिक पत्रिका के संस्थापक/सम्पादक थे। "साक्षात्कार" में मैं खूब छपी थी। बाद में वे दिल्ली में "नवभारत टाइम्स" के सहायक सम्पादक बने। तत्पश्चात साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से जुड़े। उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं : साँप और सीढ़ी, फूल तोड़ना मना है, एक लड़की की डायरी, काला जल (उपन्यास), बाबुल की छाँव, डाली नहीं फूलती, छोटे घेरे का विद्रोह, एक से मकानों का नगर, युद्ध, शर्त का क्या हुआ?, बिरादरी, सड़क पार करते हुए (कहानी संग्रह) तथा शालवनों का द्वीप (संस्मरण)। उनका उपन्यास "काला जल" हिन्दी के बेहतरीन उपन्यासों में से एक है। यह उपन्यास एक पिछड़े इलाके में रहने वाले दो भारतीय मुस्लिम परिवारों की कहानी है। इस उपन्यास के द्वारा हमारे सामने उस समाज के ऐसे चित्र प्रस्तुत किए गए हैं जिसे हम बहुत कम जानते हैं। शानी ने अपनी नायाब शब्द-शैली में तीन पीढ़ियों की पीड़ा को उभारा है।
उनका जन्म 16 मई, 1933 को जगदलपुर में हुआ था तथा मृत्यु मात्र 61 वर्ष की आयु में 10 फरवरी, 1995 में हुई। उनकी मृत्यु गले के कैंसर से हुई थी। जब वे मध्यप्रदेश राजकीय सेवा में थे, तब उन्होंने किसी साहित्यिक कार्यक्रम में जबलपुर बुलाया था। कार्यक्रम के बाद जबलपुर के भेड़ाघाट घूमने गए थे, नाव में पानी के बीच, दोनों ओर सफ़ेद रंग की पहाड़ियाँ, मानो पानी को संयमित कर रही हों, बिखरने से बचा रही हों। अद्भुत दृश्य था। भेड़ाघाट जैसा खूबसूरत नज़ारा मुझे देश की अन्य किसी नदी/नहर में नज़र नहीं आया। और उसके आजू-बाजू बने पहाड़ों का रंग इतना सफ़ेद कैसे था, यह भी आश्चर्य में डालने वाली बात थी। नाव की सैर, नाव में लेखक-समूह, लेखकों की चुहलबाजियाँ। अच्छा सफ़र रहा था।
उनके दिल्ली आने के बाद दिल्ली में एक विवाह-समारोह में उनसे मिलना हुआ। उनमें गज़ब की नफ़ासत थी। हिन्दी भाषा के प्रति उनका प्रेम बेमिसाल था। यदि वे और जीते तो हिन्दी साहित्य को कुछ और बेहतरीन किताबों से नवाजते।
अंतिम बार वे मुझे मिले शंकर मार्केट, कनॉट प्लेस में। मैं शॉपिंग कर रही थी, उन्होंने पीछे से पुकारा, "मणिका।"
मैं उन्हें पहचान नहीं पाई। हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति की जगह एक कंकाल खड़ा था। "आप कौन?" मैंने पूछा।
"अरे पहचाना नहीं? शानी" वे बोले।
"ओह, शानी जी आप? इतने दुबले, इतने कमज़ोर कैसे? पहचान में ही नहीं आ रहे।" मैंने कहा।
उन्होंने अपने गले के कैंसर की दुखद गाथा सुनाई। गले का वह हिस्सा दिखाया, जहाँ फोड़ा होने के बाद ऑपरेशन हुआ था। सचमुच, कैंसर भयानक बीमारी है। कैंसर का पता लगने बाद आदमी बस जितने दिन जी ले, जी ले। जितने दिन जीवित रहता है, वे दिन भी भय में गुज़रते हैं, अपने सामने घटित होती हुई मौत को देखता है वह। शानी जी भी मुझे उस भय से गुज़रते हुए महसूस हुए।
उनकी एक पुस्तक का शीर्षक "फूल तोड़ना मना है" मैंने अपनी एक कविता में लिखा था। उनसे पूछा कि उन्हें कोई ऐतराज़ तो नहीं, तो बोले थे, "ऐतराज़ कैसा? ये शब्द हम सब के साँझे हैं, बेफ़िक्र हो कर लिखो।"
अपनी वह छोटी सी कविता आपको पढ़वा रही हूँ :
चारों ओर फूल ही फूल थे / पर साथ ही लगी थी
"फूल तोड़ना मना है" की तख्ती / आओ, हम दोनों
फूलों को खिलते और मुरझाते देखें।
खिलना और मुरझाना / फूलों के साथ-साथ।

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