ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ऑस्ट्रेलिया में हिंदी का "दिनेश" अस्त
CATEGORY : श्रद्धांजली 01-Aug-2018 03:49 PM 380
ऑस्ट्रेलिया में हिंदी का

ऑस्ट्रेलिया को प्रवासियों का देश कहा जाता है क्योंकि वहां की आबादी में प्रमुखता विश्व के तमाम देशों से आए प्रवासियों की ही है। इनमें सर्वाधिक संख्या यूरोपीय देशों से आए लोगों में ब्रिटेनवासियों की है, वहीं एशियाई देशों से आए लोगों में चीनी और भारतीयों की है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि वहां उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों का राष्ट्रीय प्रतिशत तो 17.2 है, पर स्नातक/परा-स्नातक प्रवासी भारतीय इससे तीन गुने अधिक (54.6 प्र.श.) हैं। अनेक भारतीय वहां परस्पर संपर्क बनाए रखने और वहां के समाज में अपनी पहचान बनाए रखने की दृष्टि से पत्रिकाएं भी प्रकाशित करते हैं जो ई-रूप में भी उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ तो 15-20 हज़ार से भी अधिक संख्या में छापी जाती हैं। मुद्रित पत्रिकाएं बेची नहीं जातीं, मुफ्त बांटी जाती हैं। अतः इन्हें विभिन्न संपर्क स्थलों (जैसे, धार्मिक स्थल, इंडियन स्टोर आदि) पर रख देते हैं।
दस वर्ष पूर्व जब मैं मेलबर्न (ऑस्ट्रेलिया) गया तो इंडियन स्टोरों में मुझे पन्द्रह पत्रिकाएँ मिलीं। जब मैंने इनका भाषावार विश्लेषण किया तो पाया कि पंजाबी, गुजराती, तेलुगु, तमिल, मलयालम जैसी लगभग छह-सात पत्रिकाओं को छोड़ सभी अंग्रेजी में हैं। एक पत्रिका तो ऐसी भी मिली जिसके दो भाषाओं में अलग-अलग संस्करण थे, पर भाषाएँ थीं - गुजराती और अंग्रेजी। हिंदी में कोई पत्रिका नहीं थी; हाँ, एक मासिक पत्रिका "साउथ एशिया टाइम्स" ऐसी अवश्य मिली जो थी तो अंग्रेजी में ही, पर उसमें छोटा-सा खंड (चालीस पृष्ठों की पत्रिका में दो पृष्ठ) "हिंदी पुष्प" नाम से हिंदी में थे। मैंने अनुमान लगाया कि संभवत यहाँ हिंदी प्रदेशों से आए प्रवासी भारतीय बहुत कम होंगे, पर जब पता चला कि कुल प्रवासी भारतीयों में सबसे अधिक (लगभग आधे) हिंदीभाषी क्षेत्रों से ही हैं, तो हिंदी की यह स्थिति देखकर मन पीड़ा से भर गया। जब "हिंदी पुष्प" को पढ़ा तो उसकी सामग्री का वैविध्य देख कर प्रसन्नता हुई क्योंकि उसमें कविता, कहानी, लेख आदि के साथ महीने में पड़ने वाले तीज-त्योहार, महापुरुषों के जन्मदिन आदि भी दिए थे और चुटकुले भी। अतः मैंने अंधकार में प्रकाश की किरण बिखेरने वाले "हिंदी पुष्प" के संपादक से सम्पर्क करने का निश्चय किया। पत्रिका में दी ई-मेल आईडी पर मैंने एक मेल हिंदी में भेजी। ऑस्ट्रेलिया में मैं कतिपय अन्य लोगों को भी हिंदी में मेल भेज चुका था, पर उनके उत्तर मुझे या तो अंग्रेजी में मिले या फिर रोमन लिपि में लिखी हिंदी में; पर "हिंदी पुष्प" को भेजी मेल का जब उत्तर आया तो मन प्रसन्न हो गया क्योंकि वह हिंदी में था। नीचे प्रेषक का नाम लिखा था - डॉ. दिनेश श्रीवास्तव।
कुछ मित्रों से पता चला कि डॉ. श्रीवास्तव वहां के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उन्हें कई बार विक्टोरिया राज्य के गवर्नर समाज-सेवा के लिए सम्मानित कर चुके हैं। मैंने उन्हें पुनः मेल भेजी और मिलने के लिए उनसे समय माँगा, साथ ही अपनी सुविधा के दिन भी बता दिए। उन्होंने मेरे प्रस्तावित सबसे पहले दिन के लिए सहमति देते हुए एक अस्पताल में मिलने को लिखा। मैंने अनुमान लगाया कि या तो वे मेडिकल डॉक्टर होंगे या फिर सामाजिक कार्य से अस्पताल जाते होंगे। मैं यथासमय वहां पहुंचा और उनके बारे में पता किया तो मुझे जहाँ भेजा गया वह डायलिसिस से संबंधित एक बड़ा कक्ष था, पर वहां कोई पुरुष नहीं, तीन नर्सें ही दिखाई दीं। हाँ, रोगियों वाली (आराम) कुर्सी पर अनेक व्यक्ति लेटे हुए थे, जिनमें से एक व्यक्ति लेटे-लेटे ही लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। जब एक नर्स से श्रीवास्तव जी के बारे में पूछा तो उसने उसी कुर्सी की ओर संकेत किया। मैं तो स्तब्ध रह गया। पता चला कि श्रीवास्तव जी की दोनों किडनी खराब हैं, इसके लिए उन्हें पिछले पांच वर्ष से सप्ताह में तीन बार डायलिसिस कराना पड़ता है और उस दौरान भी उन्हें लैपटॉप पर काम करते देख आश्चर्य होने लगा।
मुझे तो ऐसी स्थिति में बात करने में संकोच होने लगा, पर जब पता चला कि अनेक वर्षों से उच्च रक्तचाप, मधुमेह जैसे दूसरे कई रोगों ने भी उनके शरीर को अपना अड्डा बना लिया है, तो रोगों से जर्जरित काया के बावजूद रोग को परास्त कर देने वाला उत्साह, प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करने की लालसा, कर्मठता और आत्मविश्वास देखकर मैं दंग रह गया। उनके बारे में जितना भी जानता गया हिंदी के प्रति उनका समर्पण एवं निष्ठा देख मन श्रद्धा से अभिभूत होता गया।
दिनेश जी का जन्म लखनऊ में हुआ, शिक्षा भी वहीं हुई। उनकी रुचि विज्ञान और गणित में थी। अतः उन्हीं विषयों का विशेष अध्ययन किया, पीएचडी अमरीका से की, गणित के शिक्षक बने, फिर भी हिंदी प्रेम उनमें कूट-कूट कर भरा था। इसी प्रेम के कारण जब वे दिल्ली में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण में कार्य कर रहे थे, तो स्वेच्छा से हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की विशारद परीक्षा उत्तीर्ण कर ली और साहित्यरत्न का पहला भाग भी पास कर लिया, पर दूसरे भाग की परीक्षा से पहले ही उन्हें एक योजना के अंतर्गत गणित का शिक्षक बनकर इथियोपिया जाना पड़ा, जहाँ कुछ वर्ष रहने के बाद वे ऑस्ट्रेलिया आ गए और वहीं बस गए। प्रारम्भ में उन्होंने अनेक वैज्ञानिक लेख लिखकर, अनेक वैज्ञानिक लेखों का हिंदी में अनुवाद करके और वैज्ञानिक विषयों पर पुस्तकें लिखकर हिंदी का भण्डार भरा। ऑस्ट्रेलिया के सामाजिक जीवन में हिंदी का स्थान बनाने के लिए "देवनागरी" पत्रिका शुरू की, रेडियो पर हिंदी सेवा शुरू करवाई और वहां की प्राथमिक-माध्यमिक शिक्षा के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में हिंदी को स्थापित करने के संघर्ष की शुरुआत की। जब पता चला कि यह संघर्ष अभी भी जारी है, तो इस संबंध में विस्तार से जानने की उत्सुकता बढ़ गई ।
दिनेश जी विदेश में बस तो गए, पर यह चिन्ता उन्हें बराबर सताती रही कि वहां पलने-बढ़ने वाली भारतीय सन्तति हिंदी से और इस प्रकार अपनी संस्कृति से अनभिज्ञ रहेगी। यह चिंता तब और उग्र हो गई जब उनके पुत्र पीयूष और फिर बेटी दीप्ति का जन्म हुआ। उन्होंने अपनी पत्नी श्रीमती प्रतिमा श्रीवास्तव के सहयोग से यह निश्चय किया कि अंग्रेजी के माहौल में रहने के बावजूद अपने बच्चों को हिंदी अवश्य सिखाएंगे; पर इसमें सबसे बड़ी बाधा यह थी कि तब वहां हिंदी सिखाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। अतः उन्होंने अपने दोनों बच्चों को ऑस्ट्रेलिया की औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने के साथ ही भारत से पत्राचार माध्यम से हिंदी पढ़ाने की व्यवस्था की। केवल इतना ही नहीं, इस कार्य को पूरी निष्ठा से संपन्न करने के लिए बच्चों को प्रेरित किया। जो पाठ्य सामग्री और अभ्यास सामग्री आती थी, उसे ठीक से पढ़ने और उसका मौखिक एवं लिखित अभ्यास करने में उन्होंने नियमित रूप से मार्गदर्शन किया। इसका परिणाम यह निकला कि इन बच्चों का हिंदी पर वैसा ही अधिकार हो गया जैसा शिक्षित व्यक्ति का मातृभाषा पर होता है। ऑस्ट्रेलिया में पले-बढ़े बच्चों को ऐसी हिंदी सिखाने का यह संभवतः एकमात्र उदाहरण होगा।
अब उन्होंने अन्य भारतीयों के बच्चों की ओर ध्यान दिया। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की प्राथमिक-माध्यमिक शिक्षा में हिंदी को एक विषय के रूप में शामिल कराने का अभियान छेड़ दिया जिसे सफल बनाने के लिए बहुत प्रयास करने पड़े। इस संघर्ष-यात्रा को समझने के लिए ऑस्ट्रेलिया की शिक्षा व्यवस्था की कतिपय विशेषताओं पर ध्यान देना होगा।
ऑस्ट्रेलिया में हाईस्कूल तक की शिक्षा अनिवार्य है और पाठ्यक्रम पूरे राज्य में एक-समान है जिसे "अकारा" (ॠद्वद्मद्यद्धठ्ठथ्त्ठ्ठद क्द्वद्धद्धत्ड़द्वथ्द्वथ्र् ॠद्मद्मड्ढद्मद्मथ्र्ड्ढदद्य ठ्ठदड्ड ङड्ढद्रदृद्धद्यत्दढ़ ॠद्वद्यण्दृद्धत्द्यन्र्) निर्धारित करती है। इसे राष्ट्रीय पाठ्यक्रम कहते हैं। इसमें अंग्रेजी एवं कुछ अन्य विषय तो अनिवार्य हैं; साथ ही प्रवासियों की मांग के अनुरूप कुछ भाषाओं को भी अतिरिक्त विषय के रूप में मान्यता दी है जिन्हें "लोटे" (ख्र्ग्र्च्र्क / ख्र्ठ्ठदढ़द्वठ्ठढ़ड्ढद्म दृद्यण्ड्ढद्ध द्यण्ठ्ठद कदढ़थ्त्द्मण्) कहते हैं। जो बच्चे इनमें से कोई भाषा पढ़ते हैं, उन्हें अंग्रेजी की तरह इनकी भी लिखित और मौखिक परीक्षा देनी होती है। अनिवार्य विषयों में पास होना तो आवश्यक है, पर श्रेणी निर्धारण के लिए सबसे अधिक प्राप्तांक वाले केवल चार विषय लिए जाते हैं, भले ही उसमें "लोटे" वाली भाषा भी हो। सामान्यत: इनका अध्ययन विद्यालय के नियमित कालांश में होता है, पर विद्यार्थियों की कमी या किसी अन्य कारण से यदि इनके अध्ययन की व्यवस्था विद्यालय में नहीं हो पाती तो विद्यार्थी ॠक्तकच् (ॠढद्यड्ढद्ध ण्दृद्वद्धद्म ड्ढद्यण्दत्ड़ द्मड़ण्दृदृथ्त्दढ़) के अंतर्गत विद्यालय के बाद या सप्ताहांत में निर्धारित केन्द्रों पर जाकर अध्ययन करते हैं। ऐसे केन्द्र प्रायः बड़े नगरों में ही होते हैं। अतः छोटे शहरों के बच्चों को अपने संरक्षकों के साथ वहां जाना पड़ता है, और वहां रहने-खाने की व्यवस्था भी करनी पड़ती है।
उस समय "लोटे" के अंतर्गत 11 भाषाएं "राष्ट्रीय पाठ्यक्रम" में थीं, जिनमें यूरोप की पांच भाषाएँ (इतालवी, फ्रांसीसी, जर्मन, स्पैनिश तथा आधुनिक ग्रीक) और एशिया की भी छह भाषाएँ (मंदारिन, कोरियाई, वियतनामी, जापानी, अरबी एवं इण्डोनेशियाई) थीं, पर हिंदी नहीं थी। अतः दिनेश जी ने यह प्रयास किया कि प्रवासी भारतीयों की संख्या को देखते हुए हिंदी को भी "लोटे" में शामिल किया जाए जो भारत की प्रमुख भाषा है। काफी संघर्ष के बाद हिंदी को "लोटे" में तो शामिल कर लिया गया, पर "राष्ट्रीय पाठ्यक्रम" में नहीं, अतः उसके अध्ययन/अध्यापन की व्यवस्था विद्यालय के नियमित कालांश में नहीं हो सकी। इतना ही नहीं, उसकी पाठ्यपुस्तकें तैयार करने, शिक्षकों की खोज करने और अध्यापन की व्यवस्था करने का दायित्व भी पूरी तरह हिन्दीप्रेमियों पर आ गया। तब ऑस्ट्रेलिया में अर्हताप्राप्त हिंदी शिक्षक खोजना भी मानों एक चुनौती थी।
दिनेश जी ने सारी चुनौतियाँ स्वीकार कीं। उनकी हिंदी साहित्य सम्मेलन की उपाधियां उनकी ढाल बन गईं। उन्होंने स्वयं पाठ्यपुस्तकें तैयार कीं, उन्हें सरकार से स्वीकृत कराया, हिंदी शिक्षक खोजे, और विशेष प्रयास करके "मान्यता प्राप्त विभिन्न सामाजिक संगठनों" के सहयोग से विक्टोरिया राज्य में विभिन्न स्थानों पर सप्ताहांत में (शनिवार-रविवार को) हिंदी का अध्ययन करने की व्यवस्था ॠक्तकच् (ॠढद्यड्ढद्ध ण्दृद्वद्धद्म ड्ढद्यण्दत्ड़ द्मड़ण्दृदृथ्त्दढ़) के अंतर्गत कराई। ॠक्तकच् की असुविधाओं को देखते हुए दिनेश जी ने हिंदी को "राष्ट्रीय पाठ्यक्रम" में शामिल करने की मांग पर ज़ोर देना जारी रखा ताकि उसके अध्ययन की व्यवस्था विद्यालयों में ही नियमित कालांश में की जा सके। जब 2011 में "अकारा" ने राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का पुनरीक्षण करने का निश्चय किया, तब दिनेश जी ने भी अपना अभियान तेज कर दिया। तमाम प्रवासी भारतीयों को समस्या की गंभीरता से अवगत कराया और ई-मेल भेज-भेज कर अनुरोध किया कि "अकारा" को अपेक्षित मेल भेजें। प्रारम्भ में "अकारा" ने इस ओर ध्यान नहीं दिया, तब उन्होंने सरकार से निवेदन किया। विक्टोरिया राज्य की सरकार ने "अकारा" से इस मांग पर ध्यान देने के लिए कहा, तब जाकर उन्हें सफलता मिली और अंत में "अकारा" ने हिंदी को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल करने का निश्चय करके दिसंबर 2015 में हिंदी का "फ्रेमवर्क" बनाकर जनता के विचारार्थ प्रस्तुत कर दिया जिसे बाद में स्वीकार कर लिया गया।
पर अब ऐसी व्यावहारिक समस्या सामने आई जिसका संबंध हम भारतीयों की मानसिकता से है। अंग्रेजी-प्रेम के कारण हम अपनी भाषाओं से प्रेम करना ही भूल गए हैं और अगर किसी में कुछ प्रेम बचा है तो वह स्थानीय या प्रादेशिक भाषाओं तक सिमटकर रह गया है (हिंदी जिनकी मातृभाषा है, उनमें तो यह भी नहीं बचा है)। "राष्ट्रभाषा" की संकल्पना कहीं खो गई है। प्रवासी भारतीय तो अंग्रेजी के बल पर ही विदेश जा सके हैं, अतः उनमें स्वभाषा प्रेम और भी कम है। अतः हिंदी शिक्षण की व्यवस्था हो जाने के बाद भी वहां स्कूलों में हिंदी पढ़ने के इच्छुक विद्यार्थियों का अभाव नहीं, अकाल है। मेलबर्न से सुश्री मृदुला कक्कड जी ने बताया कि यह व्यवस्था अभी 2018 तक केवल विक्टोरिया राज्य में ही शुरू हो पाई है और वहां भी केवल दो स्कूलों में। इस संदर्भ में मेलबर्न के उपनगर क्रेनबर्न स्थित "रेंजबैंक प्राइमरी स्कूल" का योगदान उल्लेखनीय है। यही वह स्कूल है जिसने 2012 में कक्षा एक से छह तक बच्चों को अनिवार्य रूप से दूसरी भाषा के रूप में हिंदी पढ़ाना शुरू किया था और ऑस्ट्रेलिया में हिंदी पढ़ाने वाले सबसे पहले स्कूल का गौरव प्राप्त किया। आज भी यहाँ 400 से अधिक बच्चे प्राथमिक कक्षा से छठी कक्षा तक हिंदी पढ़ रहे हैं। इस विद्यालय की जो बात सबसे अधिक आकर्षित करती है, वह यह है कि इनमें अधिकांश बच्चे भारतीय पृष्ठभूमि से नहीं हैं। लोगों को हिंदी पढ़ने के लिए प्रेरित करने में इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक श्री कॉलीन एवरी की भूमिका अत्यंत सराहनीय है।
दिनेश जी आस्ट्रेलिया के गगन पर "दिनेश" बनकर चमके, सबको आलोक दिखाया, स्वयं मार्ग बनाया और मानों "अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो" कहकर चले गए। ऑस्ट्रेलिया के प्रवासी भारतीय हिंदी के महत्व को समझें, उनके दिखाए मार्ग पर चलकर नई पीढ़ी को हिंदी पढ़ाएं, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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