ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदीप्रेमी क्या करे?
01-Sep-2017 10:14 AM 2950     

हिंदी की देश में राजभाषा या राष्ट्रभाषा के रूप में जो भी स्थिति है, उसके लिए भले ही राजनीति जिम्मेदार हो, पर मातृभाषा के रूप में हिंदी प्रदेशों में उसकी जैसी स्थिति है, उसके लिए हमें अपनी सांस्कृतिक दुर्बलताओं पर ध्यान देना होगा। हिंदी प्रदेशों की यह कटु वास्तविकता है कि महाराष्ट्र, बंगाल, तमिलनाडु आदि के लोग अपनी भाषा और साहित्य का जैसा सम्मान करते हैं, हिंदी वाले अपनी भाषा और अपने साहित्य का वैसा सम्मान नहीं करते और न भाषा की शुद्धता की चिन्ता करते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम पहले अपने घर को ठीक करें। कहा भी है, "घर का दिया जलाकर मंदिर का फिर जलाना।"
पिछले दिनों टीवी पर एक समाचार देखा। एक राजनीतिक दल की दिल्ली निवासी, शुरू से अंत तक दिल्ली में ही शिक्षित महिला नेता ने एक कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए बोर्ड पर सन्देश लिखा, "सवच्छ भारत, सवस्थ भारत"। उधर सहारनपुर के दंगे में अपने को पीड़ित बताने वाले पक्ष के हाथों में एक पोस्टर देखा, "जै गुरुदेव, जै भीम, / जै भीम आर्मी के चीफ एडवोकेट चंदर शेककर आजाद की उ.प्र. सरकार और उ.प्र. पुलिस को चेतावनी "बाज आ जाओ /अगर हम बिगड़ गए तो आप से सम्बले न सम्बलेगे / हमारी माता हमारी भहनों को परेशान करना बंद करो...।"
जैसे बहू की अकुशलता के लिए उसकी माँ को दोषी कहा जाता है, वैसे ही वर्तनी की इस स्थिति के लिए लोग हिंदी शिक्षक को दोषी बताएंगे। उसे दोषमुक्त किया भी नहीं जा सकता, पर क्या अकेला वही दोषी है? वस्तुतः शुद्ध उच्चारण और शुद्ध वर्तनी का संबंध केवल हिंदी शिक्षक से नहीं, हर उस शिक्षक से है जो हिंदी का प्रयोग करता है। हिंदी प्रदेश में हम दो भूलें करते आ रहे हैं। एक का संबंध स्थानीय बोलियों से है, तो दूसरी का हिंदी की पाठ्य पुस्तकों से। हिंदी प्रदेश में स्थानीय बोलियों के उच्चारण और वर्तनी का कुछ ऐसा आकर्षण है कि हम मानक हिंदी के उच्चारण एवं वर्तनी पर अपेक्षित बल नहीं देते। जैसे, अवधी भाषी "क्ष" (कक्षा) को "छ" (कच्छा) बोलता है, तो मारवाड़ी और हाड़ौती भाषी "न" (पानी) को "ण" (पाणी)। शिक्षा का आयोजन जिन उद्देश्यों से किया जाता है, उनमें एक है भाषा का मानक रूप सीखना। बोलियाँ तो हर भाषा में होती हैं फिर चाहे वह भारत की तमिल, तेलुगु, मलयालम, बांग्ला आदि भाषाएँ हों या यूरोप की अंग्रेजी, जर्मन, फ्रांसीसी आदि। बोली वस्तुतः मातृभाषा का वह संदर्भ है जिसे "पालने या झूले की भाषा" कहते हैं, यह व्यक्ति को उसके परिवार से और लघु समाज से जोड़ता है, पर मातृभाषा का दूसरा सन्दर्भ उसका वह मानक रूप होता है जिसके सहारे व्यक्ति अपने बृहत्तर समाज से जुड़ता है। इसीलिए इसे "समाजीकरण की भाषा" कहते हैं। इसी को कुछ लोग साहित्यिक भाषा भी कहते हैं। भाषा के इसी मानक रूप का प्रयोग सभी देशों में प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक न केवल उस भाषा की शिक्षा में, बल्कि उसके माध्यम से पढ़ाए जाने वाले हर विषय में किया जाता है। मातृभाषा का यह रूप सीखने के लिए शब्दों के शुद्ध उच्चारण और शुद्ध वर्तनी का विशेष अभ्यास करना होता है। इस ओर सबसे अधिक ध्यान देने की आवश्यकता प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर होती है, पर हिंदी का यह दुर्भाग्य है कि प्राथमिक स्तर पर ऐसे शिक्षक बहुत कम मिलते हैं जिनका उच्चारण शुद्ध हो और जिन्हें शुद्ध वर्तनी का ज्ञान हो ताकि वे अपने विद्यार्थियों के सामने "आदर्श" उपस्थित कर सकें। प्राथमिक स्तर से विद्यार्थी जितना आगे बढ़ता जाता है, अशुद्ध उच्चारण और अशुद्ध वर्तनी के कारण उसे सामाजिक अपमान सहना पड़ता है, पर बाद में इनसे पिंड छुड़ाना आसान भी नहीं होता।
हिंदी हो या अन्य भारतीय भाषाएँ, सभी में पुराना साहित्य भी है और आधुनिक भी। इनमें अनेक शब्द ऐसे हैं जिनकी वर्तनी पुराने साहित्य में कुछ और थी, मानकीकरण करने के बाद आधुनिक साहित्य में उनका रूप कुछ और निर्धारित किया गया है। पाठ्यपुस्तक में जब बच्चों के सामने पुराना साहित्य भी रख दिया जाता है, तो भिन्न वर्तनी देखकर प्रायः बच्चा या तो यह मान लेता है कि दोनों वर्तनी ठीक हैं, या फिर यह सोचता है कि वर्तनी कोई महत्वपूर्ण विषय नहीं, खुली छूट है, जैसे चाहो वैसे लिखो। हिन्दी में हमारे बच्चों के सामने पुराना साहित्य भी प्रस्तुत कर दिया जाता है जो ब्रज, अवधी, मैथिली, राजस्थानी आदि में होता है और उनकी वर्तनी भी भिन्न होती है। हम यह भूल जाते हैं कि भाषा शिक्षक के रूप में हमारा उद्देश्य बच्चे को भाषा का मानक रूप सिखाना है। इस दृष्टि से हमें कम से कम प्राथमिक कक्षाओं की पुस्तकों में पुराने कवियों की रचनाएँ शामिल करनी ही नहीं चाहिए। यह कार्य तो वस्तुतः पाठ्यपुस्तक तैयार करने वालों का है, फिर भी इतना काम तो शिक्षक भी कर सकता है कि आधुनिक साहित्य को पहले और पुराने साहित्य को बाद में पढ़ाए ताकि मानक हिंदी का स्वरूप बच्चों के सामने पहले आए।
हमारी सांस्कृतिक दुर्बलता का एक दुष्परिणाम यह भी है कि हमारे समाज में, विशेष रूप से हिंदीभाषी समाज में पढ़ने की संस्कृति नष्ट होती जा रही है। जिस साहित्य पर भारतीय ज्ञानपीठ, साहित्य अकेडेमी जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार दिए जाते हैं, उसे पढ़ना तो दूर, उसकी कोई परिचयात्मक चर्चा तक विद्यालय या विश्वविद्यालय में कहीं सुनाई नहीं देती। शिक्षा के मंदिर में सरस्वती का यह निरादर क्यों? देश में 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शुरू हुए सांस्कृतिक आंदोलनों के समाज पर जो प्रभाव पड़े उनमें एक यह भी था कि विभिन्न अवसरों पर, विशेष रूप से विवाह के अवसर पर लोग उपहार में अन्य चीज़ों के बजाय वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, आदि धार्मिक/साहित्यिक पुस्तकें देने लगे। प्रसिद्ध साहित्यकार कृष्णा सोबती ने एक साक्षात्कार में बताया था, "मेरी माँ अपने दहेज में कपड़ों के साथ 7-8 किताबें लाई थीं", सत्यार्थप्रकाश, स्त्री सुबोधिनी, रमणी रहस्य, रामायण, महाभारत आदि।" तब प्रकाशक भी "सप्रेम भेंट" शीर्षक से एक मुद्रित पृष्ठ इसी काम के लिए पुस्तकों में देते थे। पुस्तकों के विज्ञापनों में यह लिखा जाता था कि यह पुस्तक अमुक अवसर पर उपहार में देने योग्य है। कविराज हरनाम दास बी.ए. की एक पुस्तक "विवाहित जीवन" के विज्ञापन पुराने लोगों को याद होंगे जिनकी पहली पंक्ति कुछ इस प्रकार होती थी "विवाह में देने का सर्वोत्तम उपहार।" स्कूलों में वार्षिक परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होने वाले बच्चों को तथा अन्त्याक्षरी, वाद-विवाद जैसी विभिन्न प्रतियोगिताओं में विजेताओं को पुरस्कार में पुस्तकें ही दी जाती थीं। शील्ड, कप आदि का प्रचलन बाद में खेलों में शुरू हुआ और काफी समय तक खेलों तक ही सीमित रहा।
जन्मदिन मनाने का तब रिवाज़ नहीं था, पर जब यह प्रथा शुरू हुई तब भी शुरू में बच्चों को पुस्तकें ही उपहार में दी जाती थीं। जिसे ये पुस्तकें मिलती थीं, वह इन्हें संभाल कर रखता था। विभिन्न अवसरों पर बड़े गर्व से कहता था कि अमुक अवसर पर अमुक व्यक्ति ने मुझे यह उपहार में दी थी। घर में पुस्तकें होती थीं तो अन्य लोग भी इन्हें पढ़ते थे। सांस्कृतिक आन्दोलनों का ऐसा ही एक प्रभाव यह भी पड़ा कि मोहल्ले में सार्वजनिक पुस्तकालय बनने लगे। आर्य-समाज, सेवा-मंडल आदि विभिन्न धार्मिक-सामाजिक संगठनों के भी पुस्तकालय/वाचनालय होते थे। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद यह परम्परा शिथिल होती चली गई।
प्रायः लोग टीवी/इंटरनेट, मोबाइल  आदि के माध्यम से विकसित हुई अपसंस्कृति को पठन-पाठन की संस्कृति के नाश का कारण मानते हैं, पर शायद महाराष्ट्र के दो उदाहरण हमारी आँखें खोलने के लिए पर्याप्त हों। वहां पुणे और महाबलेश्वर के बीच सड़क किनारे बसे भिलार गाँव का मुख्य व्यवसाय तो स्ट्राबेरी का कारोबार है, पर गांव की एक विशेषता यह है कि इसके हर घर में (कृपया ध्यान दें, हर घर में) पुस्तकालय है जिसमें धार्मिक, आध्यात्मिक, साहित्यिक, सुधार आंदोलन, खेलकूद, यात्रा वृत्तान्त, स्त्रीकेंद्रित/ बालकेंद्रित साहित्य आदि विभिन्न विषयों से संबंधित पुस्तकें हैं, संगृहीत पुस्तकों के रचनाकारों के चित्र भी हैं। जिस कक्ष में पुस्तकें रखी हैं, वहां बैठकर पढ़ने की व्यवस्था भी है। कुछ लोग इसी प्रयोजन से वहां आते हैं तो कुछ रास्ते में रुककर इसका आनंद लेते हैं। मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने अभी हाल ही में इसे "पुस्तकाचे गाव" कहा है और सरकार अब इस गाँव को यूनेस्को से "बुक कैपिटल" का दर्जा दिलाने की तैयारी कर रही है।
ऐसा ही एक उदाहरण है पुणे में आयोजित "कोथरुड साहित्य सम्मेलन" का जिसमें भाग लेने का मुझे भी लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व अवसर मिला था। कोथरुड को पुणे का एक मोहल्ला कह सकते हैं, अतः यह एक नगर का नहीं, एक मोहल्ले का साहित्य सम्मेलन था। पता चला कि इस मोहल्ले में ऐसे कई साहित्यकार रहते हैं जिन्हें राज्य और राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार मिले हैं। सम्मेलन में युवा-प्रौढ़-वृद्ध अर्थात सभी आयुवर्ग के लगभग डेढ हज़ार स्त्री-पुरुष थे।
इस सम्मेलन में कई बातें देखकर मेरा ध्यान साहित्य प्रेमी मराठीभाषी और हिंदीभाषी समाज के अंतर पर गया। एक युवा कवि को जब मंच पर आमंत्रित किया गया तो उनका परिचय देते हुए बताया कि पिछले तीन वर्ष में उनके एक कविता संग्रह की लगभग दस हज़ार प्रतियाँ बिक चुकी हैं। मुझे अपने कानों पर सहसा विश्वास नहीं हुआ, अतः मैंने पास बैठे मित्र से पुष्टि की। इस लोकप्रियता का एक कारण यह भी बताया कि पुस्तक का मूल्य दस रुपये है और यह मुंबई में तो लोकल ट्रेन के प्लेटफार्मों पर भी मिलती है। उधर मैंने देखा कि जब मंच पर चर्चा होती थी तो हाल में एकदम शांत वातावरण होता था। ऐसा लगता था जैसे श्रोता मन्त्र-मुग्ध से बैठे हों। और जब मंच से घोषणा होती थी कि श्रोताओं को यदि कुछ पूछना हो तो कृपया एक कागज़ पर अपना प्रश्न लिखकर दे दें, तो ज़रा-सी देर में मंच पर प्रश्नों का अम्बार लग जाता था। जब प्रश्न का उत्तर देने के लिए उसे पढ़ा जाता था तब विश्वास होता था कि श्रोता मंच पर की जा रही चर्चा को केवल "सुन" नहीं रहे थे, "गुन" भी रहे थे। सम्मेलन में चर्चा के लिए समय की अपनी सीमा थी। अतः दो-चार प्रश्नों के उत्तर देने के बाद मंच से कहा जाता था कि सम्मेलन का जो विवरण स्मारिका के रूप में छापा जाएगा, उसमें सभी प्रश्नों के उत्तर दिए जाएंगे। अतः यदि और भी कोई प्रश्न आप देना चाहें तो अमुक सज्जन को दे दें। मैं सोचने लगा कि क्या हिन्दी प्रदेश में ऐसे किसी सम्मेलन की कल्पना की जा सकती है?
महाराष्ट्र की इस "साहित्यिक संस्कृति" से प्रेरणा लेकर हमें पुरानी उपयोगी परम्पराओं को पुनर्जीवित करना चाहिए और स्वस्थ नई परम्पराएं शुरू करनी चाहिए। समाज में यदि इस प्रकार के आयोजन सफलतापूर्वक करने हैं तो हमें विद्यालयों पर विशेष ध्यान देना होगा और विद्यालय परिसर में ही या अन्यत्र बच्चों के लिए विशेष रूप से विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रम (गोष्ठियां, चर्चाएं, पत्रवाचन आदि) आयोजित करने होंगे। बच्चों के कोर्स की पुस्तकों की सामग्री को भी इस रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। कहानियों का नाट्य रूपांतर और नाटकों का कहानी रूपांतर किया जा सकता है। साहित्य की ही नहीं, इतिहास, भूगोल, विज्ञान आदि की सामग्री को भी विभिन्न रूपों में प्रस्तुत करके बच्चों में साहित्यिक रुचि विकसित की जा सकती है। कोशिश यह होनी चाहिए कि उनमें अपनी भाषा के प्रति प्रेम विकसित हो, वे हिंदी के शुद्ध मानक रूप का अभ्यास करें और उनकी साहित्यिक रुचियों का परिष्कार हो। ये काम कठिन नहीं, बात केवल जागरूकता की है, निष्ठा की है, संकल्प की है, समर्पण की है, अपने साहित्य प्रेम को समाज के धरातल पर स्थापित करने की है।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^