ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिन्दुस्तान से बाहर हिन्दी
01-Sep-2019 03:03 PM 560     

जब कहीं राष्ट्रभाषा हिन्दी की बात चलती है, अखबारों में कुछ छपता है तो मेरे मन में यही बात उठती है कि कब हम हमारे देश में ही हिन्दी को महत्व देंगे? कब हमारी भाषा को और हमें इंग्लैंड या अमेरिका में हेय दृष्टि से नहीं देखा जाएगा। हिन्दुस्तान में जो अंग्रेजी बोलने में दक्ष नहीं हैं, कब हीनभावना से बाहर आयेंगे?
जैसे स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, शिक्षक दिवस, माता दिवस, पिता दिवस आदि मनाए जाते हैं, वैसे ही वर्ष में एक दिन हिन्दी दिवस भी मनाकर आपूर्ति कर ली जाती है। इस एक दिन हिन्दी के विषय में चर्चा सुनने में भी स्कूल कॉलेजों के विद्यार्थी उत्सुकता नहीं दिखाते हैं। शिक्षक ही इसमें भाग लेते हैं और विद्यार्थी बहुत कम। इससे उनके अन्दर राष्ट्रीय भावना का भी पता चलता है।
हिन्दी भाषा विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की राजभाषा है। चीनी भाषा के बाद विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। प्रवासी भारतीयों की सांस्कृतिक भाषा भी हिन्दी है। दुनियाभर के देशों में आज हिन्दी को बढ़ावा मिल रहा है। देश की कुल जनसंख्या मे आज 65 प्रतिशत लोग हिन्दी भाषा को जानने व समझने वाले हैं, मात्र 5 प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी भाषा को बोलते, जानते व समझते हैं। बाकी 30 प्रतिशत गैर हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषी लोग तमिल, तेलुगु और बांग्ला आदि भाषाओं को जानते हैं।
पिछले पांच सालों में पांच बार मेरा अमेरिका प्रवास रहा। इस पांच बार में कभी दो, कभी तीन माह करके लगभग एक वर्ष मेरा अमेरिकी प्रवास रहा। अंग्रेजी बोलते हुए लोगों को देखकर पता नहीं क्यों? हम प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। क्या हम उस गुलामी से अभी तक उबर नहीं पाए। क्या ये उनका प्रकृति प्रदत्त ग्लैमर है? जो हमें और समूचे विश्व को उनकी ओर आकर्षित करता है, उनके गोरे रंग, परिधान और भाषाई सभ्यता के लिये।
मैंने अमेरिका प्रस्थान के पहले दिन से ही, लन्दन के हीथ्रो एयरपोर्ट से लेकर अमेरिका के बोस्टन शहर तक उनकी भाषाई सभ्यता पर गौर करना आरम्भ कर दिया था। यद्यपि मैं, जो अंग्रेजी के समक्ष किसी हीनभावना से ग्रस्त नहीं हूँ तथा हिन्दी के सुन्दर भविष्य की कामना करती हूँ, प्रतीक्षा करती हूँ। मेरे मन में भी कहीं न कहीं यह कसक अवश्य थी कि इस भाषा पर भी मेरा अधिकार हो, मैं भी इनकी बात का जवाब इन्हीं की तरह मॉडर्न बन कर दूँ, किन्तु गच्चा खा रही थी। पहली बार न तो मुझे उनका एक्सेंट समझ में आ रहा था न उनको मेरा। दो तीन बार पार्डन-पार्डन करके बात को पूछते हुए समझते हुए अमेरिका पहुँची।
बोस्टन में घर पर पहुँचकर बेटी-दामाद तथा उनके यहाँ आने-जाने वाले प्रवासी भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली अंग्रेजी तो समझ में आ जाती थी, किन्तु उनकी तरह बोलने का फ्लो नहीं आता था। मैं वहाँ रहकर उन लोगों के द्वारा बोली जाने वाली अंग्रेजी बड़े ध्यान से सुनती थी और साथ ही साथ अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति गहरा लगाव होने के कारण हिन्दी की तुलना अंग्रेजी शब्दों तथा व्याकरण से करती रहती थी।
दूसरी बार के अमेरिकी प्रवास में मुझे दक्षिण भारतीय नैनी से वार्तालाप का अवसर मिला, जो हिन्दी न तो समझ सकती थी न बोल सकती थी। अंग्रेजी बोलने का अभ्यास मुझे भी नहीं था, समझ तो लेती थी। घर पर भी हम लोग हिन्दी में ही बातचीत अधिक करते थे। घर से बाहर काम करने वालों अथवा बाजार में जैसी भी गलत-सलत अंग्रेजी बोल सकें, बोलना ही पड़ता था और कोई गलत भी नहीं मानता था, क्योंकि वो लोग तो हमारी टूटी-फूटी हिन्दी भी नहीं बोल सकते।
दो-चार महीनों के प्रवास में मैंने जाना कि कुछ प्रीपोजिशन और आर्टिकल्स का प्रयोग करके और उन्हें घुमा फिराकर साधारण बोल-चाल की अंग्रेजी बोली जाती है। मैंने नैनी से अंग्रेजी में बातचीत करना आरम्भ किया। वो मेरा मजाक भी नहीं बना सकती थी, क्योंकि ग्रामर उसकी भी गलत थी और मेरी भी, किन्तु दोनों बेझिझक। और इस प्रकार मैं थोड़ी देर अंग्रेजी में बोल लेती थी। मैं भीतर से खुश थी कि मैं भी बोल सकती हूँ। वाकेबुलरी मैं इकट्ठा कर ही रही थी। प्रवासी भारतीयों को ऐसी ही अंग्रेजी बोलते सुना।
अमेरिकन्स को भी ध्यान से सुनती थी और शब्दों को समझने का प्रयास करती थी। उन सबके बोलने में लहजे के साथ उतार-चढ़ाव और एक प्रवाह रहता था और यही प्रवाह ग्लैमर उत्पन्न कर रहा था, वह भी मुझ जैसे अंग्रेजी का अभ्यास न होने वाले के लिये। घर में नैनी से जब मैं अंग्रेजी में बात करती थी तो शुरू में अंदर से खुश होती और थोड़ी शान भी महसूस करती। किन्तु बाद में लगभग एक महीने बाद घर में भी और बाहर के प्रवासी भारतीयों से अंग्रेजी सुन-सुन कर साधारण सी भाषा लगने लगी। ऐसा लगा इसमें कौन सी ऐसी विशेष बात है, अधिक आकर्षण की या अधिक शान की। ढाई साल का बच्चा भी टूटी-फूटी अंग्रेजी बोल रहा था, हम भी बोल रहे थे - मेक हिम स्लीप, गेट हिम सिट। फिर वही मेरा तुलनात्मक अध्ययन चल रहा था, सोच रही थी - क्या अंग्रेजी अधिक व्यवस्थित भाषा है? किन्तु लग रहा था - अंग्रेजी हिन्दी से कम व्यवस्थित है।
हिन्दी में जो बोला जाता है वही लिखा जाता है। अंग्रेजी में नहीं। पुट और बट का अन्तर कैसे बच्चों को समझ में आए आसानी से। हर शब्द की स्पेलिंग अलग, हिन्दी जैसी व्यवस्थित ग्रामर भी नहीं। मैं उस नैनी से अंग्रेजी बोलने लगी थी फिर वहाँ जो भी अंग्रेजी प्रवासी भारतीयों द्वारा बोली जाती है, उसकी चमक मेरे जेहन में खत्म होने लगी थी। अंग्रेजी मुझे हिन्दी से कम स्तरीय लगने लगी। कम स्तरीय न भी कहें, किन्तु उस हीनभावना से तो मैं मुक्त थी। घर में बच्चा होने के कारण दिनभर नर्सरी राइम सुनाई देते रहते तरह-तरह के। उनका म्यूजिक शब्दावली फिर वही आधुनिक आकर्षण पैदा करते, किन्तु हिन्दी से तुलना करें तो कहाँ हिन्दी के बाल गीतों की शब्दावली एवं स्वर और कहाँ अंग्रेजी के शब्द एवं गायन शैली का स्तर?
मेरा एक चचेरा भाई है, जो 40 वर्ष पहले अमेरिका पढ़ने आया था और वहीं बस गया। जब वह भारत आता था, पूरा परिवार दम्भयुक्त शान से रिश्तेदारों से मिलता था और रिश्तेदार उनसे झुककर। वह भाई स्वयं हिन्दी नहीं हिंगलिश बोलता था और वह भी अंग्रेजी लहजे में जैसे हिन्दी बोलना भूल चुका हो। उसके माता-पिता सबसे बनावटी दुःखी होकर कह रहे थे - और तो सब ठीक है, वहाँ पैसा तो बहुत है पर हमने पोते-पोतियों को खो दिया, न वो हिन्दी में बात समझते हैं न हिन्दी बोल सकते हैं।
वह बोस्टन में ही बस गया है। चालीस साल बाद अभी जब मैं उससे और उसके परिवार से मिली तो वह बड़ी घरेलू हिन्दी बोल रहा था। उसके बच्चों ने मेरे पाँव छुए, वे हिन्दी समझ रहे थे और बोल भी रहे थे। इस बदलाव से मैंने महसूस किया कि अपनी मातृभाषा के प्रति प्रवासी भारतीयों में प्रेम और सम्मान बढ़ा है। उसे जानना आवश्यक समझा जा रहा है। हिन्दी भाषा के प्रति हीनभावना से ग्रस्त भी नहीं हैं। अन्य कई प्रवासी भारतीयों के परिवारों से बातचीत करने का मौका मिला, सभी ने चरण स्पर्श भी किये, हिन्दी में अभिवादन किया और बातचीत भी इंग्लिश-हिंग्लिश में नहीं साधारण हिन्दी में ही की। इससे लगा कि प्रवासी भारतीयों में अंग्रेजी का ग्लैमर कम तथा अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान का भाव बढ़ा है।
एक बार जब मैं पैन्सिलवेनिया बेटी के घर गई थी तब एक नेपाली नैनी वहां थी। बेटी पूरे दिन ऑफिस में रहती थी, घर में नैनी और बच्चा तथा मैं। मैंने सोचा नैनी हिन्दी नहीं जानती होगी, मैंने अंग्रेजी में बात आरम्भ की, उसने हिन्दी में उत्तर दिया। वो जब बच्चे जो सुलाती थी तब एक सुन्दर हिन्दी लोरी गाती थी। एक दिन बच्चे को सुन्दर भजन - "भजो गोविन्द, गोविन्द गोपाला" गाकर सुना रही थी। उसकी धुन भी बहुत ही सुन्दर सुगम शास्त्रीय थी। वह कभी-कभी हिन्दी फिल्मी गाने भी गुनगुनाती थी। मैंने उससे पूछा - क्या नेपाल में हिन्दी बोली जाती है? या स्कूल में पढ़ाई जाती है? उसने कहा - नहीं! मैंने पूछा तो फिर अच्छी हिन्दी बोलना, भजन और गाने कैसे सीखे? बोली - नेपाल में हिन्दी फिल्में और पुराने गाने बहुत पंसद किये जाते हैं। तो फिल्में देख-देख कर हम हिन्दी बोल लेते हैं। वो अंग्रेजी भी अच्छी बोलती और समझती थी, क्योंकि वह पिछले सात वर्षों से अमेरिका में रह रही थी और नेपाली तो उसकी मातृभाषा थी ही।
मेरी संवेदना पुनः झंकृत हो उठी, इन्होंने नेपाल में हिन्दी फिल्मों को ही क्यों पसंद किया? अंग्रेजी की ग्लैमरस फिल्मों को क्यों नहीं? कुछ नर्सरी राइम्स के अतिरिक्त अंग्रेजी फिल्मी गाने गाते उसे नहीं सुना। हिन्दी संगीत की स्वर ध्वनि में कुछ तो ऐसा विशेष आकर्षण है जो हृदय को छूता है। इससे पता चलता है कि हिन्दी का अन्य देशों में क्या स्थान है तथा हिन्दी का प्रसार विश्व में किस तरह हो रहा है। नेपाल के लोगों के लिये अमेरिका के वीसा के नियम अलग हैं, उन्हें ग्रीन कार्ड शीघ्र मिल जाता है क्योंकि उनका वीसा रिफ्यूजी स्टेटस वीसा है।
अमेरिका में पूरे विश्व के देशों के लोगों की बहुतायत है। चीन, जापान, भारत, कोरिया, मलेशिया, स्पेन, यूरोप, अफ्रीका आदि देशों के लोग इतने हो गऐ हैं कि अमेरिकन्स कम दिखाई देते हैं। इन प्रवासी देशों के लोगों में से अधिकांश को अंग्रेजी नहीं आती, ये सब अपनी मातृभाषा में ही आपस में बोलते दिखाई देते हैं, किन्तु सब वहाँ पर कार्यरत हैं।
एक बार मैं बेटी के साथ Ïक्वसी मारकेट बोस्टन में घूम रही थी। यह बाजार वहां खुले में लगा होता है, हॉकर्स भी होते हैं। मैं साड़ी में भारतीय दिखाई दे रही थी। एक हॉकर ने अचानक मुझसे मुस्कुरा कर कहा नमस्ते! एक दस साल की अमेरिकन बालिका ने मुझसे हैलो किया, बोली - हाऊ प्रीटी यू आर, योर ड्रेस इज लुकिंग लाइक बॉलीवुड हीरोइन्स। उन्हें मेरी भारतीय वेशभूषा अवश्य अच्छी लगी होगी, न कि छोटे लेवल की। पश्चिमी देशों की सभ्यता को देखकर लगता है कि वो सभ्यता का इजहार हमसे अधिक अच्छे तरीके से करते हैं, मुस्कुराकर और बोलकर। हमारे दस साल के बच्चे बड़ों से बोलने में झिझकते हैं। कुल मिलाकर मुझे लगा भारत का अन्य देशों में सम्मान है, यहाँ के परिवेश और भाषा का भी। अपनी मातृभाषा में सभ्यता का इजहार करने से हम स्वयं ही झिझकते हैं। हम भी हिन्दी में मुक्त हृदय से अपनी बात का इजहार क्यों नहीं करते? चाहे वे समझें या न समझें। इसी तरह मैंने एयरपोर्ट पर एक दुकान से अंग्रेजी में बोलकर पानी खरीदना चाहा - वुड यू प्लीज गेट मी ड्रिकिंग वाटर? सेल्समेन ने कहा - हाँ मैम आप एक डॉलर डालकर यहाँ से उठा लीजिये। मैं हिन्दी समझता हूँ। मैं शर्म से खिसिया कर पानी उठाकर चल दी। वह गौरवर्ण व्यक्ति शायद प्रवासी इण्डियन ही होगा।
पिछले वर्ष अक्टूबर में मैं ह्यूस्टन शहर में थी दूसरी बेटी के पास। वहाँ ह्यूस्टन के प्रवासी भारतीयों द्वारा बनाई गई एक संस्था है "सुमंडली", वह उसकी सदस्य है। यह संस्था भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में संलग्न है।
बोस्टर शहर में एक प्रवासी भारतीय संगठन है, जिसका नाम "हिन्दी-मंच" है। प्रतिवर्ष 15 अगस्त पर वहाँ के हेच-शैल पार्क में एक मंचीय कार्यक्रम का आयोजन होता है। कार्यक्रम में जो भी नृत्य, गीत, नाटिका आदि की प्रस्तुति दी जाती है, हिन्दी में ही होती है।
अमेरिका में कथक नृत्य को एवं कथक भारतीय गुरुओं को लम्बे समय से महत्व एवं सम्मान दिया जाता रहा है। वहाँ पर कथक प्रशिक्षिकाएँ अमरीकन अधिक हैं - वो भारतीय गुरुओं की तरह प्रवीण हैं। आज अमेरिका में इण्डियन फूड बहुत प्रसन्द किया जा रहा है। दक्षिण भारतीय डोसा-इडली तथा उत्तर भारतीय छोला, कुलचा, नान, भटूरा आदि प्रवासी भारतीयों में ही नहीं वरन् अमेरिकन्स तथा वहाँ आए कोरियन, जापानी, स्पेनिश द्वारा भी पसन्द किये जाते हैं।
समूचे प्रवासी भारतीय अपने बच्चों को पहले हिन्दी बोलना सिखाते हैं। वे कहते हैं, हिन्दी बाद में नहीं सीख पाएंगे। अंग्रेजी तो डे केयर और स्कूल में जाकर भी सीख जाएंगे। मैं वहाँ पर एक उच्च पदस्थ बंगाली महिला से मिली, उसके तीन बच्चे हिन्दी, बंगला और अंग्रेजी तीनों भाषाएँ बोल रहे थे। उन्होंने कहा - हम घर पर बच्चों से बंगला और हिन्दी बोलते रहे, बाद में स्कूल जाकर अंग्रेजी बच्चे स्वयं सीख गए।
इन वर्षों में मुझे अमरीका जाकर प्रसन्नता और गर्व का अनुभव हुआ कि हमारी भाषाई गुलामी लगभग दूर होती जा रही है। हिन्दी भाषा के प्रति प्रेम और सम्मान है प्रवासी भारतीयों के दिल में। और जब हम स्वयं हमारे राष्ट्र और भाषा के गौरव एवं सम्मान से आश्वस्त होंगें, हिन्दी को अंग्रेजी से श्रेष्ठ समझेंगे तभी हम विदेशियों के मन में भी भारत, भारतीयों तथा हिन्दी के प्रति समानता, आदर तथा सम्मान का भाव पैदा कर सकेंगे। फिल्म इंग्लिश-विंग्लिश में अमिताभ बच्चन का वह सम्वाद याद आ रहा है - बेशक, बेझिझक और बिंदास हिन्दी बोलिये।

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