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नवाचारों की राह पर हिंदी
01-Mar-2019 03:07 PM 1849     

आज प्रसार माध्यमों का महासंगम मोबाइल और इंटरनेट के जरिए हो रहा है।
पत्रकारिता, साहित्य, कविता, ज्ञान-विज्ञान, शोध, दर्शन के क्षेत्रों में पत्र-पत्रिकाएँ और
पुस्तकें पिं्रट और डिजिटल रूप में साथ-साथ बढ़ रही हैं। टेलीविज़न, फिल्म और संगीत
उद्योग भी हिंदी भाषा की व्यापक क्षमता के साथ दुनियाभर में फैल रहा है।

हिंदी की अनहद यात्रा अनवरत जारी है। आज जब हिंदी विश्व की सबसे ज्यादा बोली जानेवाली भाषा बनने जा रही है तब हिंदी भाषा के जरिए सामाजिक माध्यम, प्रसार माध्यम, अंतरजाल, जाल चिठ्ठों और मोबाइल पर सक्रियता के विविध नवाचारों की जरूरत है। विचारों से ऊर्जा लेकर क्रियान्वयन बहुत जरूरी है, समाज, माध्यम और विश्व समुदाय के बीच।
कई विचारवान हिंदी को समर्पित पीढ़ियाँ भाषा के मुद्दों को लेकर लंबी लड़ाई लड़कर जा चुकी हैं, कई हिंदी को समर्पित पीढ़ियाँ भाषा संक्रमण के दौर से जूझते-जूझते पस्त-सी हो चुकी हैं। आज नई पीढ़ियों को समकालीन यथार्थ पल-पल चुनौती दे रहा है। हिंदी भाषा का रचनात्मक समर जारी है। हम सब अपने-अपने स्तर पर भाषा का महाभारत लड़ रहे हैं। आज भी दस फीसदी लोग केवल अंग्रेजी के बूते पर 90 फीसदी भारतीय जनमानस को रौंद रहे हैं, अंग्रेजी विचारों, आचारों, नीतियों और कृतियों से।
आज प्रसार माध्यमों का महासंगम मोबाइल और इंटरनेट के जरिए हो रहा है। पत्रकारिता, साहित्य, कविता, ज्ञान-विज्ञान, शोध, दर्शन के क्षेत्रों में पत्र-पत्रिकाएँ और पुस्तकें पिं्रट और डिजिटल रूप में साथ-साथ बढ़ रही हैं। टेलीविज़न, फिल्म और संगीत उद्योग भी हिंदी भाषा की व्यापक क्षमता के साथ दुनियाभर में फैल रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था दुनियाभर में सबसे तेज़ गति से विकसित हो रही है। जिसके करीब डेढ़ अरब लोग देश विदेश में हिंदी अपने दिल में संजोए संचार, संपर्क और नवाचार से जुड़ रहे हैं। इंटरनेट और मोबाइल से यह भाषा का जयघोष दुनिया में लगातार विस्तारित हो रहा है। ऐसे समय में भारत-वंशियों के डीएनए में बसी साहित्य और संस्कार के गर्भनाल जैसी भाषा है हमारी हिंदी।
लोग सामाजिक माध्यमों (सोशल मीडिया) फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर लगे पड़े हैं। लाइक्स और ट्विट करने के लिए, प्रतिक्रिया देने के लिए हिंदी भाषा में खबरों को लिख-पढ़-देख रहे हैं। हिन्दी पत्रकारिता आज इतने सालों बाद अपने उभार पर है। और इसका श्रेय काफ़ी हद तक सोशल मीडिया और इन्टरनेट पर हिंदी की सक्रियता को जाता है। आज मोबाइल और एप क्रांति ने हिंदी के उपयोग को बेहद सरल और सुलभ बना दिया है। यही समय है सभी माध्यमों पर हिंदी की सक्रियता बनाए रखने का।
प्रसार माध्यमों के बाज़ार ने हिन्दी को इंटरनेट पर विशेष महत्व दिया है। साठ प्रतिशत से ज्यादा लोग इंटरनेट पर अपनी क्षेत्रीय भाषा में लिख-पढ़ रहे हैं। खबरों को जानने के लिये आज किसी अखबार या टीवी की निर्भरता खत्म हो रही है।
एक समय था जब सामाजिक माध्यमों पर ज्यादातर अंग्रेजी का ही दबदबा था और यह हिन्दीभाषियों के लिए सामाजिक माध्यमों की राह में एक बाधा की तरह देखा जाता था। आज हिंदी दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जानेवाली प्रसार माध्यमों की भाषा बनने की दिशा में अग्रसर है। अब बदलते वक्त के साथ-साथ हिंदी भाषा ने सामाजिक माध्यमों के मंच पर बहुमत के जनमत के साथ अपने अस्तित्व को स्थापित किया है।
हिंदी की मुख्यधारा के लगभग सभी हिन्दी समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं का जमावड़ा सामाजिक माध्यम पर हैं, वे वीडियो, टेक्स्ट, तस्वीर, ऑडियो के विविध नवाचारों को कर रहे हैं। सामाजिक माध्यम पारस्परिक संबंध के लिए अंतरजाल या अन्य माध्यमों द्वारा निर्मित आभासी समूहों को संदर्भित करता है। यह व्यक्तियों और समुदायों के साझा, सहभागी बनाने का माध्यम है। इसका उपयोग सामाजिक संबंध के अलावा उपयोगकर्ता सामग्री के संशोधन के लिए उच्च पारस्परिक मंच बनाने के लिए मोबाइल और वेब आधारित प्रौद्योगिकियों के प्रयोग के रूप में भी देखा जा सकता है।
पहले कोई खबर अखबार में आती थी, फिर वहां से टीवी तक पहुंचती थी और फिर उस पर सामाजिक माध्यम में बहस का सिलसिला चलता था। फिर अखबार की जगह टीवी ने ले ली और आज हिंदी सामाजिक माध्यम मुख्यधारा के माध्यमों में एक नया चलन शुरु करने की हैसियत में है। मुख्यधारा के लगभग सभी हिन्दी माध्यम समूह सामाजिक माध्यमों पर सक्रियता बनाए हैं, वे हिंदी में वीडियो, टेक्स्ट, तस्वीर, ऑडियो सब प्रयोग कर रहे हैं।
हिन्दी पत्रकारिता के इस दौर के इतिहास को जब भी लिखा जायेगा तो सामाजिक माध्यमों की भूमिका को भी दर्ज किया जाएगा। पेपर, रेडियो, टीवी से होते हुए आज हम सब सामाजिक माध्यमों की भूमिका को देख रहे हैं। हज़ारों-लाखों लोग पहली बार अपनी बात कह पा रहे हैं, अपनी खबर दुनिया तक पहुंचा पा रहे हैं। लेकिन इसके कुछ खतरे भी हैं, जिन्हें दर्ज किया जाना ज़रूरी है। व्हॉट्सएप, फेसबुक जैसे सामाजिक माध्यम आज फर्ज़ी खबरों का अखाड़ा बन गया है। ये फर्ज़ी खबरें लोगों को उकसा रही हैं, भीड़ को हत्यारा बना रही हैं, कोई रोक टोक नहीं है जहां से इन खबरों को रोका जा सके। एक सभ्य समाज के बतौर हमें सामाजिक माध्यम के हिंसक भीड़तंत्र वाली पत्रकारिता से भी बचना होगा। उसके खतरे से अपने आसपास लोगों को आगाह करना होगा, फर्ज़ी, अफवाह फैलाने वाली खबरों को रोकना होगा। सामाजिक माध्यम मुख्यधारा का माध्यम बन चुकी है, अब इसका किस ज़िम्मेदारी से हम इस्तेमाल करते हैं तय हमें ही करना है। हमें ही हिन्दी को ज़िन्दा रखना है, सजग रहना है, सतर्क करना है, खूब लिखना-पढ़ना है, हिंदी के नवजागरण के लिए।
फेसबुक, ट्विटर और वाट्सएप पर टेक्स्ट मैसेज की ओर उपभोक्ता का ध्यान आकर्षित करने के लिए विभिन्न अग्रणी कंपनियां तक विपणन और विज्ञापन में हिन्दी भाषा का सहारा ले रही हैं। वे जानती हैं कि हिन्दी भाषा का विस्तार काफी अधिक है और अगर उन्हें भी खुद को दूर तक स्थापित करना है तो वही भाषा चुननी होगी जिसके प्रति पाठक या ग्राहक सहज और पारिवारिक महसूस करता हो। इसके लिए हिन्दी से अच्छा विकल्प और कोई हो ही नहीं सकता। मोबाइल, वेबसाइट (अंतरजाल), जाल चिठ्ठों, सामाजिक माध्यमों में सक्रियता, एंड्राइड, गूगल शब्द खोज, साफ्टवेयर, हार्डवेयर और आईपीआर (बौद्धिक संपदा अधिकार) में हिंदी की सजग सक्रियता के लिए युवाओं को आगे आना होगा। हिंदी के खिलाफ सबसे बड़ी दलील वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों की कमी की दी जाती रही है। यह सीएसटीटी एप है हिदी भाषा के वैज्ञानिक व प्रशासन संबंधी शब्दों के प्रयोग के लिए। यह गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है। खोजें सीएसटीटी, एप डाऊनलोड करें और इस्तेमाल करना शरू करें। यह संस्थान के छह दशकों की मेहनत का फल है जिसमें असंख्य भाषा वैज्ञानिकों और हिंदी सेवियों का समर्पण दिखता है।
यह सब करें, स्वप्रेरणा से करें, स्वतःस्फूर्त होकर करें, यह सीएसटीटी ऐप हिंदी के उत्तर आधुनिक नवाचारों के लिए संजीवनी बूटी है, इसे मित्रों, सहकर्मियों, समूहों, समुदायों और देश विदेश के हिंदी प्रेमियों तक विस्तार दें। ऐसे सैकड़ों एप और चाहिए। बच्चों के हिंदी नामकरण के एप, व्रत उत्सव और त्यौहारों के एप, हिंदी लोक कथाओं के एप, हिंदी भाषी लोकगीतों के एप, हिंदी शब्दकोष और व्याकरण के एप, हिंदी के विश्वकोष का ऐप, हिंदी के मुहावरों और कहावतों के एप, हिंदी की कथाओं के एप, हिंदी गीतों के एप, हिंदी कविताओं और शायरी के एप, ऐसा बहुत कुछ किया जा सकता है, यह सब कृषि और उद्योग के क्षेत्रों में भी किया जाए तो बहुत सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। मोबाइल पर ओटीटी माध्यम के जरिए दृश्य-श्रव्य कार्यक्रम बनाने और प्रसारित करने का अवसर भी आज उपलब्ध है। ऐसी ही एक और महत्वपूर्ण पहल भारतवाणी ज्ञान पोर्टल है। जो ऐप और अंतरजाल के जरिए 128 से भी ज्यादा भारतीय भाषाओं के जरिए ज्ञान प्रदान करता है।
भाषा की विकास यात्रा में आज हिंदी एक युगप्रवर्तक मोड़ पर है, विश्व के कोने-कोने में भारतवंशियों के साथ विस्तार पाती हिंदी अब सूचना प्रसार माध्यमों और मनोरंजन उद्योग के चलते दुनियाभर में सबसे ज़्यादा प्रचलन और बोलचाल में आनेवाली भाषा बन गई है। हिंदी की दुनिया का भूमंडलीकरण हो रहा है, हिंदी की चुनौतियों में अब स्थानीय भाषा, व्याकरण, शुद्धता, उत्तर-दक्षिण के पुराने विवादों के साथ-साथ नये वैश्विक आयाम जुड़ गए हैं।
हिंदी का भूमंडलीकरण किसी सोची समझी रणनीति का परिणाम नहीं है वरन् यह भारतवंशियों की प्रतिभा, बुध्दि, कुशलता, संस्कार और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीतियों का फल है। नित बदलती दुनिया में समकालीन बने रहने की चुनौतियों का सामना जिस तरह अप्रवासी भारतीय कर रहे हैं उसी तरह हिंदी के भाषाविदों, रचनाकारों और हिंदी के प्रति अनुराग रखनेवाले करोड़ों भारतवासियों और भारतवंशियों को भी अपनी भाषा के विकास के लिए विश्व स्तर पर प्रयास करने होंगे।
नए शब्दकोष, नए समांतरकोष, नए साहित्य और नए माध्यम में हिंदी का अवतरण करने के लिए युवा पीढ़ियों को अनवरत प्रयास करने होंगे वरना हजारों वर्षों की साधना, तपस्या और बलिदान से विकसित हुई हिंदी भाषा कभी भी भाषाओं के नवउपनिवेशवाद के चंगुल से नहीं छूट पायेगी। यही सही समय है हिंदी को देश, समाज और विश्व स्तर पर उसकी पूरी गरिमा, गौरव और वैभव के साथ प्रतिष्ठित किया जाय। हिंदी केवल समृद्ध भाषा नहीं है वरन् विश्व भाषा परिवार की एक अग्रणी भाषा है, अपनी समृद्ध साहित्य और सांस्कृतिक धरोहर के साथ। देवनागरी लिपि के साथ विकसित होती हिंदी भारत की वाचिक, लिखित और श्रुत परंपराओं का अनमोल ख़जाना है।
स्वतंत्रता के पहले समर में 1857 में हिंदी बनी समूचे देश के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए बनी क्रांति, स्वदेश और स्वदेशी की संपर्क भाषा। जिसे बाद में गुजराती कवि नर्मद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महामना मदनमोहन मालवीय रविन्द्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, विनोबा भावे, काका कालेलकर, डॉ. राममनोहर लोहिया जैसी महान हस्तियों ने भारत की राष्ट्र भाषा बनाने की मांग की। भारत की आजादी के बाद हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाए जाने की कई कोशिशें हिंदी प्रेमी लोक प्रतिनिधियों ने कीं पर हिंदी को केवल राजभाषा का सीमित दर्जा मिला।
हिंदी अपनी विकास यात्रा में कई चुनौतियों से जूझते कैसे आजादी, प्रगति और जनतंत्र की भाषा बनी उसकी साक्षी हिंदी प्रेमी पीढ़ियों के प्रतिनिधि हैं, उनके अनमोल योगदान से हिंदी नये भारत के युवा मन की भाषा बनी, नए भावों और नई उमंगों को पंख मिले, सपनों को नई उड़ान मिली। हिंदी बदलाव की नई बयार लेकर आई और सभी राजनीतिक और सामाजिक सुधार के आंदोलनों का मुखर आवाज़ बनी। हिंदी शिक्षा और पेशेवर इल्मों की भाषा बनी पर उस पर हमेशा अंग्रेजी का दबाव बना रहा।
हिंदी के नागरी आंदोलन को भारतेंदु जी ने चलाया तो हिंदी भाषा और समाज का नवजागरण हुआ, लोहिया जी ने अंगरेजी हटाओ आंदोलन किया तो राष्ट्र भाषा को लेकर सभी राजनेताओं के चेहरे बेनकाब हो गए। हिंदी को राजभाषा का दर्जा बड़ी मजबूरी के साथ देना पड़ा पर अभी भी दस फीसदी अंग्रेजी जानने वाला प्रभु वर्ग भाषा का उपनिवेशवाद नब्बे फीसदी लोगों पर थोप रहा है। अब देश को हिंदी के उत्तर आधुनिक नवजागरण और नवाचारों से भरे तीसरे आंदोलन की जरूरत है। रचनात्मक, शांति पूर्ण, सर्वसमावेशक सर्वसम्मत और भविष्यदर्शी दृष्टिकोण से देश में भाषाक्रांति का सूत्रपात हो सकता है और सदियों की मानसिक गुलामी से मुक्ति मिल सकती है। वर्ष 2000 से यूनिकोड हमारे कंप्यूटरों में उपलब्ध था, लेकिन 2007 तक किसी को इसका पता नहीं था। हिंदी में काम करने वाले हर कंप्यूटर के लिए एक बारह हजार की लीप आफिस की सीडी सीडैक से खरीदते रहे। सीडैक को जितनी भी कमाई हुई हो, अन्य निजी विक्रेताओं को अरबों-खबरों का मुनाफा कमाने का मौका मिलता रहा। हिंदी और हिंदी में काम करने वाले कितने साल पिछड़ गए। इन सबके लिए किसको जिम्मेदार समझा जाए? यह सब आपराधिक लापरवाही है, हमारी पांच पीढ़ियों को सहजता से हिंदी में लेखन और क्रियान्वयन से वंचित रखा गया, यह सब सुनियोजित साजिश ही लगती है, हमारे नौकरशाहों को तो भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने के बाद न तो हिंदी की याद रहती है न जन सेवा के कर्तव्य की, अपवाद होंगे पर हिंदी के प्रशासन स्तर पर क्रियान्वय का मसला सत्तर वर्षों से लंबित पड़ा है। शुरूआती तौर पर हमें हमारे कंप्यूटरों में पहले से ही लोड इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड को एक्टिव करने, अपनाने और इस बारे में जागरूकता पैदा करने की पहल प्रारंभ करनी चाहिये।
हमें भविष्य के लिये बच्चों को इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड को सीखने की प्रेरणा देना चाहिये। हिंदी इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड से सरल, सहज, वैज्ञानिक और सीखने में आसान की-बोर्ड दूसरा कोई नहीं है। इसके अक्षरों का संयोजन हिंदी की बारहखड़ी (कखगघ, तथगध, पफवभ, टठडढ) को ध्यान में रखकर किया गया है। दूसरी उल्लेखनीय बात यह भी है कि यह अक्षरों का संयोजन 18 भारतीय भाषाओं पर यथावत लागू होता है यानि हिंदी का "क" अक्षर जहाँ है, वहीं मलयालम का "क" अक्षर है।
इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड अस्सी के दशक में भारतीय वैज्ञानिकों ने सभी भारतीय भाषाओं के लिये तैयार कर दिया था। अनेक कंपनियों ने अपने निजी स्वार्थ के लिये इसे अपने साफ्टवेयरों में स्वीकार नहीं किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि इंस्क्रिप्ट की-बोर्ड कम्प्यूटर में मौजूद रहकर भी विस्मृत हो गया। सौभाग्य से यूनिकोड कंसोर्टियम ने इंस्क्रिप्ट के की-बोर्ड लेआउट को स्वीकार कर लिया, जिसका परिणाम है कि विगत दो दशकों से इंटरनेट पर देवनागरी में लिखा जाना संभव हुआ है। इंस्क्रिप्ट की ताकत के जरिये सभी भारतीय भाषाओं को पुनर्जीवन प्राप्त होगा। हर पल हिंदी, स्वभाषा और स्वदेश प्रेम का अलख जगाना होगा।
जो जहाँ है वहाँ बिना कोई बड़ा कदम उठाये, एक छोटी सी पहल अगर हर कोई कर ले तो सहज ही क्रांति घटित हो सकती है। मिसाल के तौर पर हिंदी अखबार पढ़ें, हिंदी किताबें पढ़ें-खरीदें, साझा करें, उपहार में दें। हिंदी फिल्म देखें, हिंदी गीत-संगीत सुनें, जहां तक संभव हो घर-बाहर हिंदी का प्रयोग करें। अंतरजाल, चिठ्ठा आदि सामाजिक माध्यमों पर हिंदी के नवाचारों को प्रोत्साहन दें। अगर आप हिंदी भाषा, स्वभाषा और स्वदेश के प्रति आस्था और प्रेम का भाव रखते हैं तो ऐसे अनेक कदम उठाये जा सकते हैं।
हिंदी नवजागरण अभियान जारी है, अभी तो हिंदी का अलख देश विदेश और हर दिल में जग रहा है, यह शुभ संकेत है पर हमारा देश, नई पीढ़ी, समाज और संस्कृति, जिस तरह अंग्रेजी और मानसिक गुलामी का शिकार होती जा रही है, इस खतरे का समय रहते निदान जरूरी है, इसलिए यह समय हिंदी के नवजागरण के तीसरे आंदोलन का शंखनाद करने का है। सब साथ आकर समवेत प्रयास करें।
हिंदी को देश की सभी भाषाओं से जोड़े रखना तभी संभव है जब हम सब हिंदी के साथ एक नई भारतीय भाषा सीखें, पढ़ें और बोलें। भारतीय भाषाओं के साहित्य का हिंदी अनुवाद और हिंदी साहित्य का भारतीय भाषाओं में अनुवाद एक महत्वपूर्ण कदम है।
हिंदी के नवजागरण के लिए नवाचारों की झड़ी लगा दें। हिंदी बचेगी तो देश बचेगा, समाज जगेगा, देश का युवा रचेगा हिंदी का नवयुग। हम छोटे-छोटे उपायों से असीम पा सकते हैं, रास्ते अलग हो सकते हैं उद्देश्य तो एक है, हिंदी का नवजागरण, वह होकर रहेगा। भारतीय जनमानस बहुत अद्भुत है, वह जागेगा तो हिंदी की नई दुनिया रच देगा।
हिंदी के गौरवशाली अतीत, समसामयिक मुद्दों और भविष्य की संभावनाओं का जीवंत दस्तावेज़ है नई पीढियाँ, यह आशा है, हिंदी भाषा, हिंदी साहित्य और हिंदी संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन की। हमें यह विश्वास है कि हिंदी जागरण का अभियान देश-विदेश में पूरे गौरव के साथ भारतवंशियों के बीच फैलेगा और शीघ्र ही हिंदी को विश्व की अग्रणी भाषा, भारत की राष्ट्र भाषा और संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का मान प्राप्त होगा।

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