ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी में पाठ का संकट
01-Sep-2017 03:39 PM 1492     

सर क्या आपको नहीं लगता कि बरसों से एक ही तरह का पाठ पढ़ाया जा रहा है, जिसमें कुछ संसोधन कर दिया जाय तो बेहतर हो जाता?
एक यक्ष प्रश्न का जवाब चाह रही थीं वो। "वो" यानि कुछ बरसों का संचित शिक्षकीय अनुभव समेटे, हिंदी साहित्य और भाषा की प्रगति के प्रति प्रतिबद्ध एक संवेदनशील मन वाली मैम।
"क्या आपको कुछ असुविधा हो रही है पढ़ाने में?" प्रतिप्रश्न करते गुरु मुस्कराये।
"नहीं ऐसा कुछ खास नहीं है सर।" सर की आँखों में तिरती कुटिल मुस्कान से आहत मैम ने कहा।
"आप बिहारी पढ़ा रही हैं न, उसमें क्या संशोधन की आवश्यकता?" सर ने मुग्धा नायिका का भाव धर कहा।
"जी वो... वो बात दरअसल यह है कि हमारे स्टूडेंट जिस परिवेश से आते हैं उसमें प्रेम और सौंदर्य की उस उदात्तता तक वे नहीं पहुँच सकते जो हमारे कवियों ने कही है। हमारा समाज अभी भी इतना आधुनिक और उदार नहीं है जहाँ बिहारी, विद्यापति के भाव सौंदर्य और दृष्टि को स्वीकारे।" मैम ने हकलाते हुए अपना पक्ष रखा।
"हरि हैं राजनीति पढ़ आये।" गुरु मद्धम-मद्धम बुदबुदाये। साथ में बैठे चारण टाइप चाटुकारों को प्रोत्साहन मिला, वे मैम से वारे-न्यारे पूरे करने की अकुलाहट साथ लिए भिड़ बैठे।
"आपको बिहारी पढ़ाने में समस्या आ रही है और हम विद्यापति पढ़ा रहे हैं। पाठ की गंभीरता को समझ लेंगी तो आप तो कोई दिक्कत, अड़चन नहीं आएगी। अरे एमए को पढ़ा रही हैं आप कि नर्सरी को। आप प्रेम और अंतरंग सम्बन्धों के सौंदर्यबोध को पढ़ा रही हैं।  इसमें इतना झिझकने की क्या जरूरत है भला।" मैम को ज्ञान बांटकर चारणों ने तृषित नेत्रों से गुरु को निरखा। गुरु विहँसे, बरसे स्वाति बूँद बन।
"लेकिन क्या आपको लगता है कि जिस तरह का रूढ़िवादी और क्रूर समाज है उसमें प्रेम की और अंतरंग संबंधों की व्याख्या ग्रहण कर पाएंगे हमारे विद्यार्थी? आखिर हम यह सब उन्हें समझा रहे हैं जिनकी जुबान पर यदि प्रेम जैसा कोई शब्द भी आ जाये तो परिजनों समेत पूरा का पूरा समाज उन्हें दण्डित करने के सौ-सौ तरीके ढूंढ निकलता है। ऐसे में गहन प्रेम के पाठ की क्या सार्थकता है? क्या परिणाम होगा इसका।"
मैम की चिंतक मुद्रा को देख गुरु विहँसे, भंगुआई ललाई लिए अँखियों से घूरते हुए हुडबुड़ाये- "क्या करेंगे ससुरे भीतिचित्र उकेरेंगे और क्या?"
इससे पहले कि मैम भीत्तिचित्रों की व्याख्या में निमग्न हों, चारण भाव विह्वल हो उठे - "हरि अनंत हरि कथा अनन्ता" कहकर गुरु की वाक्चातुरी पर मुग्ध हो उठे। मैम खिसियाते हुए कक्षा में बिहारी पढ़ाने चल दी हैं।
वह पढ़ा रही हैं -
तोहीं, निरमोही, लग्यो मो ही इहै सुभाउ।
अन आये आवै नहीं, आए आवतु आउ।
अर्थात् हे निर्मोही! मेरा हृदय तुझी से लगा है अब वह मेरे पास नहीं आता। तुम जब नहीं आते तो यह भी मेरे पास नहीं आता और जब आते हो तो यह भी आ जाता है। अर्थात हे प्रिय आ जाओ।"
ऐसे ही प्रेमपरक दोहों को पढ़ाते हुए मैम बीच मे आए भक्ति के दोहे को पढ़ाना शुरू करती हैं -
जगतु जनयो जिहीं सकलु, सो हरि जाने नाही
ज्यों आँखिनु सबु देखिये, आँखि न देखी जाँहि।
अर्थात् जिस ईश्वर के द्वारा सम्पूर्ण जगत को तुमने जाना उसी ईश्वर को तुम नहीं जान पाये। यह वैसे ही है जैसे आँखें सब कुछ देखती हैं किन्तु खुद को नहीं देख पातीं।
ऐसे ही प्रेमपरक दोहों से छलांग लगा कर भक्ति फिर प्रेम फिर भक्ति की संगति चलती रहती है जो बालकों को मतिभ्रम की स्थिति में ले जाती है। लेकिन इस छलांग में यकायक एक ऐसा गतिअवरोधक आता है कि विद्यार्थियों की भोली आत्मा स्तब्ध रह जाती है। कुछ दोहे छोड़ दिए जाते हैं यह कहकर कि आप लोग घर पर पढ़ लीजियेगा। जैसे -
कुच गिरि चढ़ि, अति थकित ह्वे, चली डीठि मुँह चाड।
फिरि न टरी, रही गिरी चिबुक की गाड़।
ऐसे ही अनगिनत घोर श्रृंगारिक दोहे सिद्धहस्त गुरुजन छोड़ देते हैं। लेकिन यह नहीं बताते कि क्यों? और यदि इनकी व्याख्या इतनी ही जटिल और लज्जित करने वाली होती है तो यह पाठ्यक्रम में शामिल क्यों है?
इसी के साथ ही हिंदी की पाठशाला में पिछली बेंच के महातम्य पर भी गौर करें तो एक अलग ही तस्वीर उभरती है। इस बाबत हिंदी प्रदेशों के लगभग सभी विश्वविद्यालयों की तस्वीर कमोबेश एक-सी दिखाई देगी। बानगी पर गौर करें।
प्रवेश लेने के बाद गुरु-शिष्य संबंधों को गति प्रदान करने का पहला दिन है। वैसे थोड़ा-मोड़ा परिचय प्रवेश-काल में ही हो चुका है, जिसमे गुरुजनों ने मान लिया है कि "ससुरे इसी लायक होते तो हिंदी पढ़ने आते" और चेलों ने सहर्ष उनकी इस मान्यता को अपनी उदास मुस्कान से बल प्रदान कर दिया है। हिंदी पढ़ने वाले नालायक की इस पदवी को तभी से प्राप्त हो जाते हैं जब उन्हें प्राथमिक विद्यालय अक्षर ज्ञान कराना शुरू करते हैं। सरकारी स्कूल मानते हैं कि हिंदी मातृभाषा है जिसे सीखने के लिए ज्यादा मेहनत की कतई जरूरत  नहीं। जबकि अंग्रेजी माध्यम मानता है कि हिंदी पढ़ाने की कोई उपयोगिता ही नहीं। बस कुछ काल के लिए इस अनिवार्यता को ढोना है। नतीज़तन भारतीय शिक्षण की दोनों ही पद्धातियाँ एक ऐसा हिंदी का विद्यार्थी तैयार करती हैं जो बेमन से पढ़ाये-रटाये गए होते हैं। जिन्हें मास्टर डिग्री तक आकर भी शुद्ध वर्तनी का प्रयोग करना नहीं आता। यह गुरु लोग भी जानते हैं और आशीर्वाद, पुरुषार्थ आदि अनेक शब्दों को लिखवा-लिखवा कर परीक्षा लिया करते हैं, जिनमें से आधे से अधिक कक्षा असफल हो जाती है। इस असफलता को गुरु इतना कोसते हैं कि डाँट खाकर अपमानित विद्यार्थी दुबारा अपना मुँह नहीं दिखाता। इनमें से कई एक तो एकलव्य की तरह स्वाध्याय साधना में लग जाते हैं तो कई हिंदी से बैर साध लेते हैं और हिंदी बहुत टफ़ है  कहते हुए कॉलेज-कैम्पस, पार्क या सिनेमाघरों की शरण लेते हैं। हिंदी का अध्यापक प्रेम, नीति, अध्यात्म पढ़ाता है। लेकिन उसको समझाता नहीं। उसको कैसे व्यवहार में लाया जाया यह नहीं बता पाता। पूर्वाग्रहों से ग्रस्त वह अपने चेलों को मूरख हृदय मान लेता है। मसलन हिन्दी की कक्षा में कुछ घाघ टाइप के और कुछ अबोध, अबोले विद्यार्थी ही टिक पाते हैं।
ये घाघ पिछली बेंच को अपना ठिकाना बना लेते हैं। यह ऐसा ठिकाना है जहाँ से भरपूर मनमानी की जा सकती है। निर्भीक होकर गुरुओं के हर वार का मूक ही सही मगर जवाब दिया जा सकता है। जैसे गुरु और शिष्य परिचय का पहला दिन है। गुरु उपदेशक की भूमिका में हैं। कह रहे हैं - "आपका सौभाग्य है कि  इस शिक्षण में आपको पढ़ने का मौका  मिला है।" पिछली बेंच अपनी कॉपी में लिखेगी - "हम आये हमारा दुर्भाग्य, हमें पाकर तुम जरूर सौभाग्यशाली हो गए गुरु।"
गुरु महिमा बखानते कहते हैं -"आपको सुनकर गर्व होगा कि इस शिक्षा के मंदिर से हर साल दर्जनों नेट, पीएचडी निकलते हैं।
पिछली बेंच कॉपी पर घसीटेगी -"यह उनकी अपनी मेहनत है ससुर, तुम काहें बन्दर बाँट कर रहे हो।"
गुरु कहेंगे गर्व से अभिभूत होकर कि "आप नेट, जेआरएफ निकालिये, मैं आपको शोध करवाऊँगा।"
पिछली बेंच पन्ने पर उकेरेगी "पागल कुत्ता काटा है का।"
गुरु उपदेश देकर जैसे ही कक्षा से बाहर आयेंगे। कुछ शोधार्थी कक्षा में "क्या ज्ञान बाँट कर गया सरवा" का कौतुहल लिए नव प्रवेशियों के पास आ जायेंगे। और शोधार्थी बनने के कितने खतरे हैं गिनाने लगेंगे जैसे - बालकों झांसे में न आओ अपनी अकल लगाओ। परजीवी है ससुरा खून पी जायेगा। झोला ढोआएगा, घर के काम लेगा और तो और मोबाइल का रिचार्ज करवाएगा और यदि इन सबके बाद यदि थोड़ा-बहुत पढ़ने बैठोगे तो क्रिकेट खेलने बुला लेगा। बड़े भैया के इतने भयानक शोध अनुभव को सुनकर बेचारे नवप्रवेशी बुत बन जाएंगे और तब तक इस दुर्गत को प्राप्त रहेंगे जब तक पास कर के पलायन न कर जाएँ।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^