ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी की चिंदी
01-Oct-2016 12:00 AM 3880     

काले बालों वाली के आते ही तू मुझे भूल जायेगा, हिंदुस्तानी मायें अक्सर यह विलाप करती हैं। सही करती हैं। बहू के आते ही माँ पिछली सीट (डठ्ठड़त्त् डद्वद्धदड्ढद्ध) पर भेज दी जाती है। हमेशा ऐसा नहीं होता है लेकिन जब होता है बहुत दुखदायी होता है। औरत की तरह भाषा के भी कई रूप होते हैं। चलिए - माँ के रूप से शुरू करते हैं। भारत में काले --- ओह ओह - काले नहीं भूरे बालों वाली (अंग्रेजी) बहू के आते ही देसी बाबू तो बन गए जोरू के ग़ुलाम। बेचारी (हिंदी) माँ, जिसने धूप में बाल सफ़ेद नहीं किये बल्कि बेटे को पालने में और शिक्षा देने में रंगहीन किये थे, आज तिरस्कृत हो रही है। अहिन्दी भाषी इलाकों में कोई हिंदी को ना पूछे यह समझ में आता है, मगर हिंदी के गढ़ यानि उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार में हिंदी की दुर्गति हो, यह बात नाक़ाबिले बर्दाश्त है। इन्हीं प्रदेशों में सबसे ज़्यादा खाट खड़ी की जाती है हिंदी की। यहीं के लोग टूटी-फूटी हास्यास्पद अंग्रेजी बोलकर खुद को अफलातून समझते हैं। अंग्रेजी की पत्रिकायें ख़रीदकर ड्राइंग रूम में सजा कर रखते हैं। पढ़ते-वड़ते थोड़े ही हैं, केवल लोगों पर रौब जमाने के लिए ऐसा करते हैं। अरे माँ के रिश्ते की बात छोड़िये, इस मामले में तो हिंदी को साधारण सम्मान भी नहीं मिलता। लोग-बाग शर्म महसूस करते हैं हिंदी बोलने में। बोलना या ना बोलना भी अपनी जगह है, परन्तु जब तक हिंदी को पढ़ा नहीं जायेगा उसकी दुर्दशा में कमी नहीं आयेगी।
दरअसल हिंदी के साथ-साथ हिंदी में लिखने वालों की हालत भी कुछ-कुछ दलितों जैसी है। उसकी ज़रूरत से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन उसका सम्मान करने में लज्जा आती है। जब तक जूता बनाने वाला बाटा ना बन जाये तब तक वह चर्मकार ही कहलाता है। संघर्ष करके या फिर भगवान की दया से जिन लोगों ने नाम कमा लिया अथवा पुरस्कार हासिल कर लिया, उनकी तो पौ बारह हो गयी, लेकिन बाकी बचे लेखक महज़ "लिक्खाड़" हो कर रह गये। यह बात हम अपने खुद के अनुभव से कह रहे हैं। हमने भी आलेख और कविताएं कुछ नामीगरामी पत्रिकाओं में भेजीं। बावजूद इसके कि रचनाएँ अच्छे स्तर की थीं (हम अपने मुँह मियाँमिट्ठू नहीं बन रहे हैं) वे रचनाएँ नहीं छपीं। यह बात, कुछ समयांतर के स्वयं सिद्ध हो गयी जब उन्ही पत्रिकाओं ने हमसे हमारी रचनाओं की मांग की। दरअसल वहाँ केवल कुछ "ड़ण्दृद्मड्ढद ढड्ढध्र्" ही छपते हैं। हमने भी कुछ खर्चा पानी दिया होता (नाम होने से पहले) तो हम भी पहले ही छप जाते। ऐसा है भैया-
हर सूँ मय के पियाले बोलते हैं
जिधर देखो घोटाले बोलते हैं
ये मुर्गा भी ज़िबह होकर रहेगा
ये रिश्वत के निवाले बोलते हैं
दलितों की तरफदारी करने वाले बशर अपनी ज़ाती ज़िन्दगी में (आजकल भी) दलितों के हाथ काहैं छुआ पानी नहीं पीते। मायावती अपवाद हैं -- क़ुदरत का करिश्मा है, भगवान की माया है। इसी प्रकार हिंदी के हिमायती भी वहीं तक हिंदी की (और हिंदी में) बात करते हैं जहां तक उससे फ़ायदा उठाया सकता है; वरना उनके बच्चे तो अंग्रेजी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई करते हैं। ज़रूरत पड़ने पर अंगरेजी का ट्यूशन भी लगाना पड़े तो कोई बात नहीं।
बात केवल साहित्य तक ही सीमित नहीं है। हमारी फिल्म इंडस्ट्री को ही देखिये- खाते हैं हिन्दी की और बजाते हैं अंग्रेजी की। नेहरू जी ने देश के साथ सबसे बड़ा अन्याय किया, भारत में भाषा के आधार पर राज्य बना कर। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान छोड़िये साहब, सबसे बड़ा विभाजन देश का भाषा के माध्यम से हुआ है। ग़ैर हिंदी भाषी अपनी फ़िल्में हिंदी में डब करके पैसा तो कमा लेते हैं लेकिन अपने राज्य में हिंदी के विकास के लिये कुछ करना तो दूर, हिंदी बोलने वालों से भी सौतेला व्यव्हार करते हैं।
हमारे तथाकथित हिंदीप्रेमी भी हिंदी के लिये क्या कर रहे हैं - यह एक बहुत बड़ा सवाल है। पिछले महीने ही बड़े ज़ोर-शोर से हिंदी दिवस मनाया गया। विशेष हिंदी प्रेमियों ने सरकार से अनुदान लिये, जलसे किये, पार्टियां मनाई और नारेबाज़ी करके हिंदी के प्रचार और प्रसार का वादा भी तथा दावा भी (उल्टा-सीधा एक समान) किया। इन बाबुओं की बाछें इस प्रकार खिली हुई थीं जैसे -
चारु चन्द्र की चंचल किरने खेल रही हैं जल-थल में
चपल चांदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बर तल में
हुज़ूरेवाला यह उस पैसे की चमक है जो इन महानुभावों ने सरकार से अनुदान के नाम पर लिया है। साल भर इससे काम चलायेंगे फिर अगले साल दोबारा कमायेंगे।
जिस तरह महिलायें करवा चौथ का व्रत रख कर, वर्ष में एक दिन पति को राजा बना देती हैं (बनाने में वे भी माहिर हैं), और जिस प्रकार हम पश्चिमी देशों से उधार लेकर पिता दिवस, माँ दिवस, दोस्ती दिवस आदि-इत्यादि मनाकर बाकी पूरे साल का कर्जा निपटा देते हैं, उसी प्रकार हिंदी दिवस मना कर हिंदी वाले हिंदी से पल्ला झाड़ लेते हैं। आयोजन के नाम पर (आखिर अनुदान को जस्टिफाई भी तो करना है) दो-चार दो कौड़ी की तुकबन्दी करने वाले पालतू कवियों को "महान कवि" की पदवी देकर - उनका सम्मान करके गंगा नहा लेते हैं। बस मन गया हिंदी दिवस! मज़े की बात तो यह है कि इसका खर्चा पानी भी वही पिछलग्गू कवि देते हैं (ना दें तो तू नहीं और सही) यानि आयोजन मुफ्त और फंड राशि धर-गुल्लक। क्या कहें ऐसे लोगों को -
दिल ने सदमों के बोझ उठाये हैं,
अक़्ल ने तो हराम की खायी
चमचागीरी में उम्र गुज़री है,
ज़िन्दगीभर सलाम की खायी
बात खाली पैसे की नहीं है। पैसे तो चुनाव के वक़्त नेता लोग अपनी जेब से भी खर्चकर देते हैं, बदले में वोट लेकर। लेकिन जनता में सभी बिकाऊ नहीं होते। ऐसे लोगों के लिए झूठे वादों का भंडार खोल दिया जाता है। हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने के नाम पर खूब वोट बटोरे जाते हैं और चुनाव के बाद मुँह में मानो दही जम जाता है -
सुना ये था बदल जायेगा सब कुछ तेरे आने से
किसी का कुछ नहीं बदला, तेरे हालात बदले हैं
हिंदी का सबसे ज़्यादा नुकसान उन लोगों ने किया जो हिदी के लिये सचमुच कुछ अच्छा कर सकते थे। अरे भैया अगर अच्छा नहीं करना चाहते तो बुरा तो न करो। भारत जैसे अनेक भाषाओं वाले देश के लिये एक संपर्क भाषा अति आवश्यक है। अंग्रेजों ने भारत में अंग्रेजी थोपी थी। सही है कि उसके कुछ लाभ भी हैं। अंग्रेजी के माध्यम से नये आवाम शिक्षा के क्षेत्र में खुलते हैं। तो ठीक है। बना दो इंग्लिश को सम्पर्क भाषा लेकिन साथ ही हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्ज़ा क्यों नहीं दिया सकता?
सब जानते हैं कि नेहरूजी अंग्रेजी भक्त थे परंतु वे स्वप्नदृष्टा होने का दावा भी करते थे। उन्होंने सपने देखे और हमारी नींदें उड़ा दीं। भाषा के नाम पर भारत की अखण्डता पर चोट की और अहिन्दी भाषी राज्यों को पूर्णतया हिंदी के ख़िलाफ़ कर दिया। असली हिंदी प्रेमी बेचारों की ये हालत हो गयी है कि -
भरोसा तूने तोड़ा था मगर खुद को सज़ा यूँ दी
कि जो भी मिल गया उस पे भरोसा कर लिया मैंने
नतीजा ये कि हम धोखे पे धोखा कहते रहे और हिंदी की चिन्दी होती रही।
हिंदी के संरक्षण के लिए कुछ लोगों ने बीड़ा उठाया; उसकी सुरक्षा का ज़िम्मा लिया, गोया उसे संगिनी बनाया। कुछ वक़्त तक सब ठीक-ठाक चला। प्रेमचंद्र, वृन्दवनलाल वर्मा, चतुरसेन, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, निराला... (एक लम्बी लिस्ट है) जैसे साहित्यकारों ने हिंदी को समृद्ध और मज़बूत बनाया। हमने तो बंगाल के शरतचन्द्र, बंकिम बाबू, रवीन्द्रनाथ, पंजाब की अमृता प्रीतम, भीष्म साहनी, उर्दू की इस्मत चुगताई, सआदत हसन मंटो, कुर्तुल-एन-हैदर इत्यादि को हिंदी में ही पढ़ा है। हिंदी और बाकी हिंदुस्तानी भाषाओं में एक भाईचारापन है। सब में कहीं न कहीं, कुछ न कुछ साम्य है। इसलिए अनुवाद पढ़ते समय ऐसा नहीं लगता कि हम किसी और भाषा से अनुवादित पुस्तक पढ़ रहे हैं। उन्हीं पुस्तकों को आप इंग्लिश में अनुवादित करके पढ़ें तो मज़ा आधा रह जाता है; क्योंकि कुछ प्रांतीय तथा सांस्कृतिक भावों का सही अनुवाद मुश्किल होता है। उसमें मौलिक रचना की आत्मा-रूह नहीं उतर पाती। इसीलिए हिंदी का राष्ट्रभाषा बनना आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है।
लेकिन, मगर, किन्तु, परन्तु साहबान क्या कहें! मन्ज़रे हालात कुछ यूँ है कि शादी ज़रुरी है लेकिन शादी के बाद सब गुले गुलज़ार हो यह ज़रूरी नहीं है। अक्सर बीबियों को घर की मुर्गी दाल बराबर समझा जाता है। हम सिर्फ़ दो लाइनों में इस गर्दिशे हालात को बयान कर देते हैं -
जिसकी आँखों में शरारत थी वो महबूबा है
ये जो मजबूर सी औरत है वो घरवाली है

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