ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चीन के विश्वविद्यालयों में हिंदी
01-Jun-2019 12:38 AM 488     

जब दो मित्र एक साथ बैठते हैं, तो वे क्या चाहते हैं? वे एक-दूसरे से अपने हृदय की बात कहना चाहते हैं, जो महसूस करते हैं उसे साझा करते हैं। और इसके लिए हमें एक भाषा की आवश्यकता होती है। जब आप बोलते हैं, तो मुझे चीनी में समझने में सक्षम होना चाहिए, और आपको चाहिए कि जब मैं बात करूँ तो आप हिंदी में समझने में सक्षम हो।
उक्त कथन वर्ष 2018 में चीन के बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित कार्यक्रम "भारत-चीन सम्बन्ध में हिंदी का योगदान" में चीनी विदेश मंत्री की उपस्थिति में तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री के हैं। इससे स्पष्ट है वर्तमान समय में भारत-चीन सम्बन्ध में हिंदी की उपयोगिता एवं महत्ता कितनी महत्वपूर्ण है। भारत-चीन दो सबसे पुरानी मानव सभ्यता वाले देश हैं जिनके मध्य हजारों वर्षों का सांस्कृतिक आदान-प्रदान का इतिहास है। सांस्कृतिक आदान-प्रदान में भाषा की महता अधिक है। भारत सदियों से चीनी संस्कृति को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला देश रहा है, चीनी विद्वानों के लिए भारत हमेशा से अध्ययन के योग्य रहा है। प्राचीन काल में भारत की भाषा संस्कृत एवं पाली रही थी, अतः प्राचीन चीनी विद्वान् संस्कृत एवं पाली भाषा के माध्यम से भारत का अध्ययन करते थे। वर्तमान भारत में संस्कृत को "मृत भाषा" की संज्ञा दे दी गयी है, फलतः चीन में भी संस्कृत की पुरानी गौरवशाली स्थिति नहीं रही है, लेकिन चीन के बीजिंग विश्वविद्यालय में आज भी संस्कृत भाषा पर शोध होता है क्योंकि चीनी विद्वानों का मानना है कि यदि चीन की नई पीढ़ी प्राचीन भारत को समझना चाहती है तो उन्हें संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है।
जैसे संस्कृत प्राचीन भारत को समझने के लिए अनिवार्य है वैसे ही वर्तमान भारत को समझने के लिए हिंदी का ज्ञान आवश्यक है। इसका भान चीनी विद्वानों को भी है। फलतः 20वीं सदी में जहाँ चीन के केवल एक विश्वविद्यालय (बीजिंग विश्वविद्यालय) में हिंदी भाषा का पाठ्यक्रम था वहीं 21वीं सदी में यह संख्या 11 तक पहुंच गई है। इन 11 विश्वविद्यालयों के अलावा लगभग 10 चीनी विश्व विद्यालयों में "भारत अध्ययन केंद्र" स्थापित किया गया है जहाँ हिंदी भाषा पाठ्यक्रम तो नहीं है, लेकिन वहां चीनी एवं अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति का अध्ययन किया जाता हैं, जिनमें शनचन विश्वविद्यालय की उपलब्धि ज्यादा प्रसंशनीय है। वहां के प्रसिद्ध चीनी शिक्षक प्रोफेसर यू लोंग यू को वर्ष 2018 में भारत के माननीय राष्ट्रपति द्वारा भारत अध्ययन के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए "भारत विद पुरस्कार" प्रदान किया गया। बीजिंग विश्वविद्यालय के हिंदी के प्रोफेसर च्यांग चिंग ख्वेई जिनका सूरदास पर विशेष शोध कार्य हैं, को हिंदी में विशेष योगदान के लिए वर्ष 2018 में भारत सरकार द्वारा "डॉ जार्ज गियर्सन पुरस्कार" प्रदान किया गया। चीनी विद्वानों को प्राप्त भारत सरकार के पुरस्कार चीन में हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता एवं चीन में हिंदी के उज्जवल भविष्य का परिचायक है।
प्रश्न है कि चीनी विश्वविद्यालयों में हिंदी की लोकप्रियता का मुख्य कारण क्या है? चीन का मुख्य उद्देश्य भारत को समझना है जो भारतीय भाषाओं को जाने बिना संभव नहीं है, चूंकि भारत एक बहुभाषी देश हैं, जहाँ केवल अधिकारिक भाषाएँ ही 22 हैं। अतः चीन ने विश्वविद्यालय स्तर पर विभिन्न भारतीय भाषाओं में पाठ्यक्रम शुरू किया है, जिसमें प्राचीन भारत की भाषाएँ संस्कृत एवं पाली के अलावा हिंदी, गुजराती, बंगाली, तेलगु एवं पंजाबी भाषा में पाठ्यक्रम शुरू किये गए हैं, चूंकि हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोली एवं समझी जाने वाली भाषा है अतः हिंदी में स्नातक, स्नातकोत्तर तथा पीएचडी पाठ्यक्रम शुरू किये गए हैं, बाकी भारतीय भाषाएँ केवल 1-2 विश्वविद्यालयों तक ही सीमित हैं एवं उनमें 1-2 वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम चालू किये गये हैं। चीन के 11 विश्वविद्यालय जिनमें हिंदी भाषा पाठ्यक्रम हैं, उनमें केवल तीन विश्वविद्यालय बीजिंग विश्वविद्यालय, बीजिंग विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, शीआन अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन विश्वविद्यालय में ही हिंदी में बीए, एमए का पाठ्यक्रम है, क्वान्ग्तोंग विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में अगले सत्र से हिंदी में एमए पाठ्यक्रम शुरू होने वाला है और केवल एक बीजिंग विश्वविद्यालय में हिंदी में पीएचडी का पाठ्यक्रम है।
चीनी विश्वविद्यालयों में हिंदी की लोकप्रियता का कारण हिंदी भाषा के माध्यम से अच्छी नौकरी की उपलब्धता भी है। महात्मा विदुर जी ने भी कहा है कि "अर्थकरी च विद्या" अर्थात विद्या को अर्थ प्रदान करने वाली होनी चाहिए और हिंदी अभी अर्थ प्रदान करने में सक्षम है। वर्तमान समय में चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, भारत के मोबाइल बाज़ार में चीनी मोबाइल की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से ज्यादा है। हिंदी में स्नातक होने के बाद चीनी विद्यार्थियों के पास भारत स्थित चीनी कंपनियों में अच्छे वेतन एवं उच्च पद पर कार्य करने का अवसर मिलता है, चीन में भी बहुत सी कम्पनियाँ हैं जहाँ हिंदी सम्बंधित नौकरियां हैं जहाँ अच्छा वेतन भी है। इन सब कारणों से चीन में हिंदी पढ़ने वालों की संख्या में बहुत वृद्धि हुई है।
राजकीय सहयोग के बिना कोई भी भाषा विकसित नहीं हो सकती है। चीन में विश्वविद्यालय स्तर पर हिंदी के विकास के योगदान में भारत एवं चीन दोनों देशों की सरकारों का विशेष योगदान है। चीन सरकार ने विगत दो दशकों में न केवल दस विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा में स्नातक पाठ्यक्रम शुरू किये हैं बल्कि भारत में हिंदी पढ़ने जाने के लिए छात्रवृत्ति भी प्रदान करती है। साथ ही चीनी सरकार हर उस विश्वविद्यालय में जहाँ हिंदी भाषा का पाठ्यक्रम है वहां एक भारतीय मूल के शिक्षक को हिंदी पाठन के लिए एक अच्छे वेतन के साथ आमन्त्रित करती है जिससे चीनी विद्यार्थी हिंदी में विशेष पारंगता प्राप्त कर सकें। भारत सरकार भी भारत सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् के माध्यम से चीन के तीन विश्वविद्यालयों में हिंदी पीठ की स्थापना की है जहाँ भारत से हिंदी भाषा के विद्वान् दो वर्षों के लिए हिंदी अध्यापन के लिए जाते हैं। उन शिक्षकों का वेतन भारत सरकार वहन करती है। साथ ही भारत सरकार चीन में स्थित अपने दूतावास एवं वाणिज्य दूतावास के माध्यम से हिंदी के विकास में अपना सहयोग करती है। भारतीय दूतावास चीनी विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर हिंदी दिवस का आयोजन करती है, हिंदी संभाषण, हिंदी लेखन प्रतियोगिता आदि का आयोजन करती है, पुरस्कार स्वरूप छोटा पारितोषिक भी दिया जाता है जिससे विद्यार्थियों को हिंदी सीखने की प्रेरणा भी मिलती है। चीन के कुछ विश्वविद्यालयों में भारतीय दूतावास द्वारा "हिंदी प्रकोष्ठ" की स्थापना की गई है जिसका उद्देश्य चीनी विद्यार्थियों को भारत सम्बन्धी विस्तृत जानकारी प्राप्त कराना है। भारत सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् चीनी विद्यार्थियों को भारत स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान में हिंदी में उच्च अध्ययन के लिए छात्रवृति प्रदान करती है। चीन में स्नातक चार वर्षों का होता हैं, हिंदी भाषा पढ़ने वाले विद्यार्थी द्वितीय या तृतीय वर्ष में एक वर्ष के लिए भारत उच्च अध्ययन के लिए जाते हैं। युवा किसी भी देश के भविष्य होते हैं और चीनी युवा जो हिंदी पढ़ रहे हैं। भारत में अध्ययन पर्यन्त भारतीय संस्कृति, सामाजिक स्थिति को विशेष रूप से जानते-समझते हैं और भारत- चीन सम्बन्ध को एक नई दिशा देने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। युवाओं के इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान से दोनों देशों के संबंधों का भविष्य निश्चित रूप से उज्जवल होगा।
चीनी विश्वविद्यालयों में हिंदी पाठ्यक्रम में विभिन्न विषयों को शामिल किया गया है, जिसमें प्रमुख है; हिंदी वार्तालाप, श्रवण हिंदी, हिंदी लेखन, हिंदी साहित्य, हिंदी साहित्य का इतिहास, व्यावसायिक हिंदी, चीनी-हिंदी अनुवाद, हिंदी-चीनी अनुवाद, भारत-चीन सांस्कृतिक सम्बन्ध का इतिहास, भारतीय संस्कृति की रूप रेखा आदि। इन विभिन्न विषयों के अध्ययन का मुख्य उद्देश्य चीनी विद्यार्थियों को भारत के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देना, जैसे भारतीय संस्कृति की रूपरेखा की कक्षा में भारतीय समाज, भारतीय दर्शन, भारतीय धर्म, भारतीय अर्थव्यवस्था, त्योहार, महिला आदि विषयों पर विस्तृत जानकारी दी जाती है। हिंदी साहित्य में आदिकाल, भक्तिकाल से लेकर समकालीन साहित्य के विभिन्न पक्षों यथा नाटक, काव्य, उपन्यास, कहानी आदि का परिचय दिया जाता है। साहित्य के क्षेत्र में चीनी विद्यार्थियों की रुचि अत्यधिक है। बहुत से विद्यार्थी चीन से हिंदी में स्नातक करने के बाद भारतीय विश्वविद्यालयों में हिंदी तथा संस्कृत में एमए, पीएचडी कर रहे हैं, जो चीन में हिंदी के भविष्य के लिए बहुत सुखद है। व्यावसायिक हिंदी एक नवीन पाठ्यक्रम है जो चीन में आने वाले भारतीय व्यापारियों को देखते हुए तैयार किया गया है। पूर्व में चीन में ज्यादातर बड़े भारतीय व्यापारी ही आते थे, उनकी संख्या भी कम थी और वे ज्यादातर अंग्रेजी अनुवादक ही मांगते थे। परन्तु अब चीन में भारत के छोटे एवं मझोले वर्ग के व्यापारी भी बड़ी संख्या में आ रहे हैं, जो हिंदी अनुवादक की मांग करते हैं। विगत कुछ वर्षों से बहुत-सी चीनी कम्पनियाँ भारत में अच्छा निवेश कर रही हैं। व्यापारिक हिंदी में मुख्यतः यह पढ़ाया जाता है कि भारतीय व्यापारियों से व्यापार संबंधी बातचीत कैसे करें, भारत में निवेश करने के लिए चीनी कंपनियों को क्या-क्या आवश्यक कदम उठाना चाहिए। शोध कार्य किसी भी शिक्षा संस्थान की आत्मा होती है। चीन के विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा एवं भारतीय संस्कृति पर व्यापक शोध हो रहे हैं। पूर्व में चीनी भाषा के माध्यम से भारत पर अधिकतर शोध होते थे परन्तु अब हिंदी भाषा में भी स्तर पर शोध हो रहे हैं। चीन के विश्वविद्यालयों में बीए चार वर्ष का एवं एमए तीन वर्ष का होता है। स्नातक चतुर्थ वर्ष में 5-10 हज़ार शब्दों में तथा स्नातकोत्तर तृतीय वर्ष में 20-30 हज़ार शब्दों में एक लघु शोध पत्र लिखना पड़ता है। चीनी विश्वविद्यालयों में प्रतिवर्ष लगभग सौ से ज्यादा शोध पत्र लिखे जा रहे हैं। साथ ही चीन के हिंदी विद्वान भारतीय शोध पत्रिकाओं में अपने शोध कार्य प्रकाशित करा रहे हैं। चीनी विद्यार्थी भारतीय समाज, धर्म, महिला, सिनेमा आदि विभिन्न विषयों पर तथ्यपरक शोध पत्र लिख रहे हैं। चीनी विश्वविद्यालयों में हिंदी की यह उपलब्धि बहुत ही सराहनीय है।
चीन में अनुवाद कार्य हमेशा से लोकप्रिय रहा है। चीनी विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा के अध्ययन के साथ-साथ संस्कृत-हिंदी साहित्य के चीनी अनुवाद पर भी बहुत कार्य हुए हैं और वर्तमान में हो भी रहे हैं। रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, प्रेमचंद की रचनायें, फणीश्वरनाथ की रेणु का "मैला आँचल" आदि का चीनी अनुवाद बहुत पहले हो चुका है। वर्तमान में भी भारत-चीन सरकार द्वारा 2016 में संयुक्त अनुवाद कार्यक्रम शुरू किया है जिसके अंतर्गत चीनी पक्ष 25 भारतीय साहित्यिक कृतियों का चीनी में अनुवाद किया जायेगा, साथ ही भारतीय पक्ष (राष्ट्रीय पुस्तक न्यास) द्वारा 25 चीनी साहित्यिक कृतियों का हिंदी अनुवाद किया जायेगा। निश्चित रूप से यह अनुवाद कार्यक्रम भारतीय साहित्य को चीन के विद्वत समाज तक पहुंचाएगा जो हिंदी नहीं जानते, साथ ही चीनी साहित्य हिंदी अनुवाद के माध्यम से भारतीय पाठकों तक पहुंचाएगा।
चीनी विश्वविद्यालयों में विभिन्न देशों की संस्कृति को समझने के लिए विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं जिनमें नाटक प्रतियोगिता, खाद्य महोत्सव आदि प्रमुख हैं। विश्वविद्यालय स्तर पर नाटकों का आयोजन किया जाता है जिसमें विदेशी भाषा पढ़ने वाले चीनी विद्यार्थी उस देश विशेष के नाटक का मंचन करते हैं। उद्देश्य देश विशेष की संस्कृति को जानना होता है। खाद्य महोत्सव में विद्यार्थी जिस देश की भाषा पढ़ते हैं उस देश का भोजन बनाते हैं और उनकी एक प्रदर्शनी लगाते हैं। जहाँ अन्य विद्यार्थी देश विशेष के व्यंजन का लुफ्त कुछ पैसे देकर उठा सकते हैं। इन कार्यक्रमों से चीनी विद्यार्थी जिस देश की भाषा सीखते हैं उसकी खाद्य संस्कृति के विभिन्न पक्षों को गहराई से समझते हैं। वहां की भोजन परम्परा के बारे में जानते तो हैं ही साथ ही साथ विश्वविद्यालय स्तर पर उसका प्रचार-प्रसार भी करते हैं।
निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि चीनी विश्वविद्यालयों में हिंदी की उपस्थिति अत्यंत संतोषजनक है। हम आशा कर सकते हैं कि आगामी वर्षों में चीन के और विश्वविद्यालयों में हिंदी कक्षा बढ़ेगी, हिंदी में स्नातकोत्तर की कक्षाओं में वृद्धि होगी, विश्वविद्यालय स्तर पर हिंदी के प्रसार के माध्यम से दोनों देशों के मध्य साहित्यिक आदान-प्रदान और समृद्ध होंगें तथा निश्चित रूप से भारत-चीन के मध्य सांस्कृतिक एवं व्यापारिक संबंध भी प्रगाढ़ होंगे।

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