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हिंदी के पास न लोक है न शास्त्र
02-Jul-2019 10:40 AM 989     

जितने बड़े क्षेत्र की भाषा हिंदी है उसे दो चार सौ ग्रियर्सनों, रामचंद्र शुक्लों और
रामविलास शर्माओं की आवश्यकता थी परंतु हम किए क्या? रामविलास शर्मा के "भाषा
और समाज" को प्रकाशित हुए 60 साल हो चुके हैं, हम उससे कितना आगे बढ़े?

हिंदी दुनिया की सबसे बड़ी भाषाओं में से एक है। इसके बोलनेवाले करीब 50 करोड़ और समझने वाले लगभग 80 करोड़ से अधिक हैं। इतने बड़े क्षेत्र और जनसंख्या की भाषा होने के बावजूद अपने वजूद के लिए संघर्ष करनेवाली और सरकारी अनुदानों की राह देखनेवाली दुनिया की अकेली भाषा हिंदी है। पर ऐसा क्यों है?
मेरी समझ से हिंदी की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हिंदी के पास न लोक है न शास्त्र। लोक तत्व किसी भी भाषा के लिए जड़ का कार्य करता है। वह जड़ की तरह पूरे पेड़ में नये रस का संचार करता है और शास्त्र पेड़ की फुनगी की तरह होता है जो उस भाषा को दूर-दूर तक पहुंचाने का उसे नयी ऊंचाई देने का काम करता है, परंतु हिन्दी के साथ सबसे बड़ी समस्या यह हुई कि इसके पास न तो कायदे की जड़ है न फुनगी। इन दोनों के अभाव में हिंदी एक ठहरी हुई भाषा बन जाती है साथ ही जड़ से मिलनेवाले रस के अभाव में शुष्क हो जाती है। हिंदी के पास अपना कोई गीत नहीं है, धुन नहीं है, हिंदी में स्त्रियां गा नहीं सकतीं। और तो और हिंदी में किसी को गाली तक नहीं दे सकते। हिंदी में ढंग के फिल्मी गाने नहीं बन पाते। "खईके पान बनारस वाला" या "जसुमती मइया से बोले नंदलाला", "सजन रे झूठ मत बोलो", "निबूडा निबूडा" से लेकर "मँहगाई डायन खाये जात है", "मोरा पिया मतलब के यार तक" जैसे अनेक गाने लोक से रस लेते हैं। जब भी हिंदी को नए रस की जरूरत होती है, वह लोक भाषाओं के पास जाती है या फिर उर्दू शायरी की ओर। पर उन्हीं लोकभाषाओं को, उनके रचनाकारों को या उर्दू शायरों को अपने करीब नहीं आने देती।
दूसरी ओर हिंदी के पास शास्त्र भी नहीं है। हम जानते हैं कि हिंदी ज्ञान की भाषा नहीं है, जब भी ज्ञान की बात आती है तो यह या तो संस्कृत का दामन पकड़ती है या अंग्रेजी की। जब भी उत्कृष्ट शोध की बात आती है हिंदी हकलाने लगती है। इसका एक बड़ा कारण यह रहा कि बड़े क्षेत्र की भाषा होने के बावजूद हिंदी रचना के स्तर पर एक छोटे इलाके की भाषा बन कर रह गयी। शुरू से ही इसके लेखक बनारस, बलिया, इलाहाबाद जैसे चंद शहरों के आसपास के इलाकों तक सिमटकर रह गए। अगर यकीन न हो तो खुद ही सोच कर देख लें कि राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड से हिन्दी के कितने बड़े नाम आपको याद आते हैं।
इसके समानांतर 1850 से पहले के रचनाकारों के भौगोलिक विस्तार पर गौर करें। बहुत प्रयास के साथ 1850 के बाद हिंदी को इसकी जड़ों से काटकर एक कृत्रिम भाषा बनाने की कोशिश की गई और इसका स्वाभाविक प्रवाह रोका गया। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी न तो आमजन की भाषा बन पायी और न ही खास जन की। ले देकर यह संपर्क की कामचलाऊ भाषा बनी साथ ही एक हद तक मीडिया और मनोरंजन की भाषा बन सकी।
लोक और शास्त्र दोनों छोरों से कटने का परिणाम यह हुआ कि हिंदी एक हद तक ठहर गयी, इसमें कुछ चमक पैदा करने वाले अपवाद पैदा हुए जिन्हें आप रामचंद्र शुक्ल, प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी, अज्ञेय, मुक्तिबोध, परसाई हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि के रूप में देख सकते हैं पर 50 करोड़ लोगों की जनसंख्या की दृष्टि से इन्हें अपवाद कह लें या ऊंट के मुंह में जीरा। हो सकता है बहुत लोगों को यह बात पसंद न आए पर हिंदी के सबसे बड़े रचनाकार प्रेमचंद आधी हिंदी के हैं।
इसीलिए हिंदी को संघर्ष करना पड़ रहा है। हिंदी की एक बड़ी त्रासदी यह है कि यह अपने अस्तित्व की लड़ाई उन योद्धाओं के बल पर नहीं लड़ रही है जिनकी आत्मा में हिंदी रची बसी हुई हो और जिनमें हिंदी के लिए जीने मरने का जज्बा हिलोर मारता हो बल्कि वह अपनी लड़ाई भाड़े के सैनिकों के भरोसे लड़ रही है जिन्हें राजभाषा अधिकारी, हिंदी अधिकारी आदि कहा जाता है जो हिंदी से अधिक अपनी आजीविका की रक्षा करते हैं। रही सही कसर हिंदी की अकादमिक दुनिया, इसके प्राध्यापक और हिंदी शोध ने पूरी कर दी।
परिणाम यह हुआ कि आज भी जब अंग्रेजी-हिंदी के शब्दकोष की बात आती है तो हमें एक विदेशी विद्वान याद आते हैं फादर कामिल बुल्के, जिन्होंने रामायण पर शोध करके यह दिखाया था कि शोध करते कैसे हैं। इससे शर्मनाक बात क्या होगी कि 2019 में भी हिंदी भाषा पर विस्तृत विवेचन के लिए हमें 19वीं सदी के ग्रियर्सन का मुंह देखना पड़ता है। ग्रियर्सन ने करीब 20 ग्रंथ रचकर हमें दिखाया था कि भाषा पर काम कैसे किया जाए जाता है। ग्रियर्सन के बाद दूसरा भाषा सर्वेक्षण लगभग 100 साल बाद होता है वह भी मूलतः मराठी-अंग्रेजी भाषी गणेश देवी द्वारा। हिंदी में ऐसा कोई माई का लाल या लाली पैदा नहीं हो सकी जो वैज्ञानिक ढंग से संपूर्ण हिन्दी भाषा के सामाजिक, सांस्कृतिक अध्ययन का नेतृत्व कर सके, जबकि हिंदी में ऐसी दर्जनों स्वनामधन्य संस्थाएं चलती हैं, जिनका बजट भी ठीक-ठाक होता है पर इनमें से अधिकांश के पास अपनी वेबसाइट तक नहीं है तो अधिक की उम्मीद क्या करें। यकीन न हो तो नागरी प्रचारिणी सभा आदि का उदाहरण ले सकते हैं जो यूं तो 120 साल पुरानी है पर हड़प्पा कालीन नजर आती है।
जितने बड़े क्षेत्र की भाषा हिंदी है उसे दो चार सौ ग्रियर्सनों, रामचंद्र शुक्लों और रामविलास शर्माओं की आवश्यकता थी परंतु हम किए क्या? रामविलास शर्मा के "भाषा और समाज" को प्रकाशित हुए 60 साल हो चुके हैं, हम उससे कितना आगे बढ़े? या क्या उसके टक्कर की भी कोई रचना दे पाए। हर वर्ष लगभग 5000 शोध ग्रंथ हिंदी में जमा होते होंगे। हमें तो यह भी नहीं पता कि एक ही विषय पर कितने शोध कार्य हो चुके हैं, कैसे हुए हैं इसकी तो बात ही न करें। अगर शोध कार्य के रूप में हर वर्ष 50 बेहतरीन रचनाओं के उत्कृष्ट अनुवाद भी हुए होते तो हिंदी की हालत कुछ बेहतर हो चुकी होती। पर कैसे होती? अनुवाद को हमारे देश में दोयम दर्जे का काम माना जाता है। यकीन ना हो तो किसी सरकारी संस्थान में अनुवाद की दर का पता लगा लीजिए और बड़े-बड़े संस्थानों से छपी अनुदित पुस्तकों में अनुवादक के नाम के फॉन्ट का आकार और स्थान देख लीजिए, हकीकत सामने आ जाएगी।
हमारे पूर्वजों ने हिंदी को उसकी जड़ से काट दिया। इसका परिमार्जन और संस्कार करने के नाम पर हिंदी को कृत्रिम बना दिया गया और नया जड़ पनपाने के लिए जिस खाद, मिट्टी, पानी और प्रकाश की आवश्यकता थी वह भी इस उपलब्ध नहीं करा पाए। परिणाम यह हुआ कि चंद चमकती प्रतिभाओं ने जो शुरुआत की थी लौ जलाने की वह लौ मशाल तक न बन सकी, जबकि इतने बड़े क्षेत्र के लिए "हैलोजेन बल्ब" की आवश्यकता थी।
80 करोड़ लोगों की भाषा के महान लेखक की किताब की एक हजार प्रतियां छपें और एक भी लेखक सिर्फ लेखन के बल पर ढंग की आजीविका न चला सके तो ऐसी हिंदी का क्या करे कोई। जिस हिंदी के सबसे प्रतिष्ठित (ज्ञानपीठ सम्मानित) लेखक केदारनाथ सिंह अपने चरमोत्कर्ष के अवसर पर यह समर्पण लिखने को मजबूर होते हैं कि "अपने गांव के लोगों को/ जिन तक यह किताब/ कभी नहीं पहुंचेगी" तो इसे संपूर्ण हिंदी पर टिप्पणी के रूप में क्यों नहीं देखना चाहिए?
जड़-फुनगी विहीन हिंदी को सिनेमा और मीडिया ने एक माध्यम भाषा के रूप में बचाए रखा, इसे ही उपलब्धि मान कर खुश हो लीजिए। हिन्दी की वर्तमान स्थिति का एक बड़ा कारण भाषा का राजनीतिकरण और राजनीतिक अनदेखी भी रही। राजनेताओं की प्राथमिकता में भाषा और साहित्य नहीं रहा। पुराने राजनेता तो थोड़ा बहुत पढ़-लिख भी लेते थे। बाद के लोगों के लिए तो यह किसी दूसरे लोक की चीज बनती चली गई।
आखिर 45 भारत रत्नों में एक भी सीधे साहित्य और भाषा से न होना केवल संयोग तो नहीं हो सकता। यह इस देश के साहित्य वालों की औकात का प्रमाण है जिसे जितनी जल्दी हो उन्हें समझ लेना चाहिए।
सरकार ने हिंदी दिवस और पखवाड़ा की घोषणा कर दी जिससे भाषा का भला नहीं हो सकता था क्योंकि भाषाएँ आम जनता बनाती है। भाषा कोई यंत्र नहीं है जिसे प्रयोगशाला में विकसित कर लिया जाय या पैसे से खरीद लिया जाय। देश की बहुसंख्यक आबादी हिंदी से ममत्व के स्तर पर नहीं जुड़ सकी।
स्पष्ट है कि अगर करोड़ों लोगों की भाषा में केवल मुट्ठी भर लोग ही हिंदी की तरफ देखेंगे तो उसका विकास भी वैसा ही होगा जैसा कि हुआ। अगर सब कुछ सरकार भरोसे ही रहेगा तो काम भी सरकारी ढंग का ही होगा। कोई भी भाषा सरकार के भरोसे नहीं जनता और अपने समाज के भरोसे आगे बढ़ती है। हिन्दी आज भी अपने समाज का इंतजार कर रही है, ऐसे प्रेमियों का इंतजार कर रही है जो बांग्ला या मलयालम जैसी भाषाओं में कदम-कदम पर नजर आते हैं।

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