ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लिस्बन में हिंदी विमर्श
02-Jul-2019 10:38 AM 780     

संगोष्ठी में दुनिया के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आये सौ से भी अधिक
हिंदी भाषा एवं साहित्य के विशेषज्ञों एवं भाषा-वैज्ञानिकों, अनुवादकों,
साहित्यकारों एवं भारत-विद्या के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।

इसे विरोधाभाष नहीं तो क्या कहा जाय कि जहाँ एक तरफ़ भारत में, विशेषतः तमिलनाडु में हिंदी भाषा को लेकर दशकों से राजनैतिक गतिरोध जारी है, वहीं पश्चिमी देशों में भारत-विद्या और हिंदी भाषा एवं साहित्य के विशेषज्ञ, भाषा-वैज्ञानिक, साहित्यकार, अनुवादक, शोधार्थी तथा अन्य हिंदी प्रेमी समय-समय पर पश्चिमी देशों में हिंदी की उपस्थिति दर्ज़ करवाने, हिंदी शिक्षण एवं अनुवाद की समस्याओं पर सामूहिक विचार करने के लिए संगोष्ठियों और सम्मेलनों का आयोजन करता आ रहा है। पाँच जून से सात जून 2019 तक पुर्तगाल के लिस्बन विश्वविद्यालय में भारत के विदेश मंत्रालय, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद एवं लिस्बन विश्वविद्यालय द्वारा अंतरराष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें दुनिया के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आये सौ से भी अधिक हिंदी भाषा एवं साहित्य के विशेषज्ञों एवं भाषा-वैज्ञानिकों, अनुवादकों, साहित्यकारों एवं भारत-विद्या के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। 2012 में वायदलेद, स्पेन और 2016 में पेरिस, फ्राँस में हुई संगोष्ठियों के बाद यूरोप में यह अपनी तरह की तीसरी संगोष्ठी थी, जिसमें यूरोपियन भाषाओं के साथ ही हिंदी भी माध्यम भाषा के रूप में थी। लिस्बन विश्वविद्यालय में हुई इस संगोष्ठी का आयोजन वास्तव में तीन भाषाओं - हिंदी, अँग्रेज़ी और पुर्तगाली - में किया गया। आमतौर पर यूरोप में हिंदी की संगोष्ठियाँ मुख्यतः यूरोपियन भाषाओं में ही आयोजित की जाती रही हैं। अतः यूरोप में विश्व हिंदी सम्मेलनों के सिवाय ऐसे कम ही अवसर आते हैं, जहाँ हिंदी के बारे में हिंदी में ही विमर्श किया जाता हो। भारत से बाहर इस स्तर की हिंदी संगोष्ठी का आयोजन करना वित्तीय और जनबल की दृष्टि से इतना आसान नहीं है। अतः पुर्तगाल में भारतीय राजदूत श्रीमती नंदिनी सिंगला, लिस्बन विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक शिव कुमार सिंह, उनके सहपाठी और उनके विद्यार्थी बधाई के पात्र हैं।
तीन दिनों की इस संगोष्ठी का प्रारंभ पाँच जून को प्रोफ़ेसर शिव कुमार सिंह के परिचयात्मक अभिभाषण, पुर्तगाल में भारत की राजदूत श्रीमती नंदिनी सिंगला और लिस्बन विश्वविद्यालय के कला संकाय के डीन प्रोफ़ेसर मिगेल तामेन के स्वागत भाषणों एवं प्रोफ़ेसर कारुमूरि वी सुब्बाराव के उद्घाटन भाषण के साथ हुआ। संगोष्ठी को सुविधा के लिए विषयानुसार नौ भागों में विभाजित किया गया था - शिक्षण युक्ति एवं इंटरनेट संसाधन, द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण, विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण, विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण में संस्कृति की भूमिका, क्षेत्र विशेष के संदर्भ में हिंदी शिक्षण, हिंदी शिक्षण में साहित्य की भूमिका, व्याकरण विधि से हिंदी शिक्षण, बोलचाल की हिंदी, अनुवाद एवं हिंदी शिक्षण - जिन पर विश्व भर से आये हुए सौ से भी अधिक विशेषज्ञों ने उन्नीस सत्रों में अपने प्रपत्र पढ़े और परिचर्चा में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
आम सत्रों से हटकर चार मुख्य भाषाओं का भी आयोजन किया गया था, जिसमें "दूसरी भाषा के रूप में हिंदी सीखने एवं सिखाने संबंधी कुछ समस्याएँ", "हिंदी का "ही" एवं अँग्रेज़ी का "ऑनली", "हिंदी-उर्दू में कर्ता कारक का विस्तार", "हिंदी में साइकोलिंग्विस्टिक्स" जैसे विषयों पर गहनता से विचार किया गया। इसके साथ ही छात्र-छात्राओं एवं प्राध्यापकों का एक सामूहिक सत्र भी था, जिसमें मुख्यतः विभिन्न देशों में हिंदी सीखने में आने वाली समस्याओं और उनके समाधान पर परिचर्चा की गयी। संगोष्ठी में प्रस्तुत अधिकतर प्रपत्र विषयसंगत थे और व्यवस्थित ढंग से तैयार किये गये लगते थे। कुछ प्रपत्र ऐसे भी थे जिनका सत्र के विषय से संबंध नहीं था, लेकिन ऐसे प्रपत्रों की संख्या बहुत ही कम थी। कुछ लोगों ने विषय से हटकर राजनैतिक बहस शुरू करने की कोशिश भी की किंतु ऐसी बहसें कुछ ही मिनटों में बंद हो गयीं। एक सामूहिक सत्र ऐसा भी था, जिसमें हिंदी सीखनेवाले विद्यार्थियों ने हिंदी सीखने में आनेवाली अपनी-अपनी समस्याएँ बतायीं और विशेषज्ञों ने सवालों के उत्तर दिये। इस सत्र की संकल्पना अगर थोड़ा बेहतर ढंग से की जाती, तो संभवतः अनेकों प्रश्नों पर और अधिक गंभीरता से विचार किया जा सकता था, विशेषतः धारणात्मक एवं वैचारिक समस्याओं पर।
पूरी संगोष्ठी में अधिकतर चर्चा कुछ ही प्रश्नों के इर्दगिर्द हुई, जैसे - विदेशी भाषा एवं द्वितीय भाषा के रूप में उपयुक्त हिंदी पाठ्यक्रमों की कमी, विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण की समस्याएँ, हिंदी शिक्षण की युक्तियाँ एवं वेब संसाधन और हिंदी में यूरोपियन भाषाओं के जैसे मानक परीक्षा सामग्री एवं प्रणाली की कमी। हिंदी के मानकीकरण का भी प्रश्न उठाया गया किंतु इस पर कोई चर्चा नहीं हो पायी। अमराराम गुर्जर ने भारतीय विदेश नीति में हिंदी की भूमिका पर विस्तृत प्रकाश डाला। दिलचस्प यह था कि लिस्बन में भारतीय दूतावास में प्रथम सचिव के पद पर कार्यरत श्री अमराराम गुर्जर ने 2014 से पहले और 2014 के बाद की भारतीय विदेशी नीति में हिंदी की स्थिति पर विस्तार से बताया। इस बात को सभी ने स्वीकार किया कि विश्व में हिंदी का प्रसार निश्चित रूप से बढ़ रहा है, जिसका अनुभव दुनिया के अनेकों बड़े शहरों में किया जा सकता है। हिंदी सीखने वाले छात्रों ने यह भी जानना चाहा कि जब भी वे भारतीय लोगों से मिलते हैं और उनसे हिंदी में बात करते हैं तो भारतीय लोग क्यों अँग्रेज़ी में बोलने लगते हैं। इस तरह के प्रश्नों पर वास्तव में गंभीरता एवं विस्तार से विचार किया जाना चाहिए क्योंकि यह प्रश्न सिर्फ़ भाषा से ही नहीं जुड़ा हुआ है परंतु पूर्वाग्रह, उपनिवेशवाद एवं एक विशेष धारणा से जुड़ा हुआ है। यह निश्चित है कि जब तक हिंदी रोज़ी-रोटी की भाषा नहीं बनती, तब तक हिंदी को अँग्रेज़ी जैसा सम्मान मिलना मुश्किल ही लगता है। संगोष्ठी में हिंदी भाषा एवं साहित्य पर न सिर्फ़ बौद्धिक किया गया बल्कि हिंदी के प्रसार में बॉलीवुड एवं भारतीय संगीत की भूमिका को भी बॉलीवुड के गीत एवं संगीत और भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य के माध्यम से भी रेखांकित किया गया। पुर्तगाल में भारतीय राजदूत श्रीमती के. नंदनी सिंगला ने सुंदर ढंग से इस बात पर जोर दिया कि हिंदी अब भारत में संपर्क भाषा का काम कर रही है। उन्होंने अपना स्वयं का उदाहरण देकर कहा कि वे कन्नड़ भाषी हैं लेकिन फिर भी हिंदी अच्छे से बोलती और समझती हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी का प्रसार भारत में और विदशों में तेज़ी से बढ़ रहा है।
2012 के बाद से यूरोप में यह अपनी तरह की तीसरी संगोष्ठी थी, जिसमें विदेशी भाषा एवं द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के अनेकों पहलुओं पर पर्चे पढ़े गये और सफलतापूर्वक गुणात्मक परिचर्चा की गयी। पेरिस में 2012 हुई अंतरराष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी के साथ ही लिस्बन में हुई यह संगोष्ठी भी गुणवत्ता की दृष्टि से बेहतरीन थीं। हिंदी के कई विद्वान एवं लेखक इस तरह की संगोष्ठियों के उद्देश्यों पर प्रश्न खड़े करते हैं लेकिन वास्तव में अगर संगोष्ठी की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाय, तो इस तरह की हिंदी गोष्ठियाँ अलग-अलग देशों में हिंदी पढ़ा रहे प्राध्यापकों को मिलकर शिक्षण संबंधी समस्याओं पर विचार करने, नयी शैक्षणिक सामग्री, शोध कार्य और निजी शैक्षिक अनुभव का आदान-प्रदान करने, सूचना प्रौद्योगिकी एवं अन्य युक्तियों को साझा करने का अवसर प्रदान करती हैं। इसलिए विभिन्न स्तरों पर इस तरह की गुणात्मक एवं समीक्षात्मक संगोष्ठियों का आयोजना किया जाना चाहिए ताकि हिंदी शिक्षण की पद्धतियों की समस्याओं पर समय-समय पर विचार करके सुधार किया जा सके। जर्मन, अँग्रेज़ी, फ़्रेंच, स्पेनिश, इतालवी एवं रूसी जैसी भाषाओं के अनुभवों से स्पष्ट है कि ऐसी संगोष्ठियाँ हिंदी साहत्यि से अन्य भाषाओं में और अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुवाद की समस्याओं, विभिन्न स्तर के हिंदी पाठ्यक्रमों एवं मानक परीक्षाओं की समस्याओं तथा हिंदी के भाषिक विकास सहित अन्य भाषिक एवं शैक्षणिक मुद्दों पर गुणात्मक विचार करने लिए उत्तम सिद्ध होती हैं।

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