ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिन्दी भाषा
01-Sep-2018 07:54 PM 1395     

भा षा वह है, जो सुनाई भी दे और दिखाई भी दे। वह
सुनाती हुई दिखाये और दिखाती हुई सुनाये।
किसी भी भाषा का यही जीवन है और किसी भी जीवन की यही भाषा है। मनुष्य की कोशिश अपने आधार और लक्ष्य को एकने की रही है। इससे आधार और लक्ष्य एक होकर भी दो ही बने रहे। हुआ यह कि अपने आधार से जैसे ही उसने लक्ष्य को जोड़ा, कि दूसरा आधार बन गया, जहाँ से देखने पर लक्ष्य भी दूसरा हो गया। इसी से आधारित और लक्षित मानव का भेद मिट-मिट कर भी अमिट रहा। इस तरह एक ही शब्द के दो अर्थ हो गयेे। पहला आधारित और दूसरा लक्षित। आधारित मानव लक्षित मानव को बहते हुए कब-कैसे मानव-पुंज को बहने लगा, कहना मुश्किल है। प्राचीन भाषा इसीलिए चित्रात्मक भी थी और चरित्रात्मक भी। यही है मानव द्वारा मानव-पुंज का वहन, जो एक को विचित्र लगता है, तो दूसरे को चरित्र। पहले को वहता मानव शोषित और मानव-पुंज शोषक लगता है, तो दूसरे को मानवीय चरित्र। पहले को तो आधार और लक्ष्य की एकता दिखी ही नहीं, जबकि दूसरे को न सिर्फ़ दिखी, बल्कि सुनायी भी दी। ध्यातव्य है कि व्यंजना दृश्य भी है और श्रव्य भी। इस तरह पहले के लिए आधारित मनुष्य लाज हुआ और लक्षित मानव-पुंज राज। सो, वह आधार से निरंतर दूर होता हुआ राजेगा। परंतु दूसरा तो आधारित मनुष्य से लक्षित मानव-पुंज को एकेगा। इस तरह वह लाज से राज और राज से लाज को एकता है। इससे स्पष्ट हुआ कि साहित्यिक भाषा चित्रात्मक नहीं, चरित्रात्मक होती है। दोष द्रष्टा का है, जो चित्र से आगे बढ़ता ही नहीं। अगर बढ़ता, तो चरित्र को भी देखता-सुनता। इससे कह सकते हैं कि साहित्यिक भाषा अपनी लाज में जीवन का राज छिपाये होती है। वह मानव जीवन के राज को लाजती हुई बहती थी। इस तरह राज और लाज के अलगाव ने जीवन के साथ-साथ भाषा को भी अलगा दिया। पकाकर खाना मानवता का आधार है, परंतु यही लाज हो गया और पका-पकाया खाना राज। राजन इसीलिए कभी पकाता नहीं, परंतु पका-पकाया ही खाता है। इससे स्पष्ट हुआ कि वह पकाना क्रिया को लाज मानता है, और पकाये हुए को खाना राज। पका-पकाया दो ही तरह से मिलेगा या तो छीनो, या फुसलाओ। पहले में शारीरिक बल साधन होगा, तो दूसरे में भाषा। इससे श्रम और श्रमिक न सिर्फ़ लज्जित होते हैं, बल्कि बिंधते भी हैं। इसी से लाज को त्यागने और राज को पाने की लालसा बढ़ी और हम श्रम से दूर होते हुए मशीन के आधार पर राजने लगे। तभी तो हमारी भाषा चित्रात्मक होकर भी चरित्रात्मक नहीं बन पा रही। साहित्य में इसे देखा जा सकता है। जीवन का आधार जब तक श्रम रहा, तब तक साहित्यिक भाषा भी चरित्रात्मक रही। नारद, दुर्वासा, सरस्वती आदि शब्दचित्र न होकर चरित्र हैं, क्योंकि प्रवृत्तिसूचक हैं। चरित्र प्रवृत्ति की सूचना देते हैं। जब श्रम ही लाज हो जाय, तो उस पर आधारित जीवन कैसे न लाज होगा। सो, उससे दूर होकर राजभाषा राजने लगी। प्रयोग का स्थान उपयोग ने ले लिया। श्रमहीन प्रयोग कैसा! खोखले शब्द रह गये। एक, तो हम हिन्दी का उपयोग कर रहे हैं, प्रयोग नहीं। दूसरे, वह राजभाषा है जिसका जीवन से कोई सरोकार नहीं। राज क्षेत्रात्मक होता है और लाज घनात्मक। पुराकाल में लक्षित राज को श्रमाधार ही एकता था, परंतु हमने श्रम को त्यागते ही आधार को भी त्याग दिया। सच यह है कि मशीन ही हमारा आधार भी है और लक्ष्य भी। इस तरह जो मानव-पुंज कभी लक्ष्य हुआ करता था, मानव के विस्थापन ने उस पुंज को पूँजी में रोप दिया। इस तरह हमारा जीवन पूँजी पर आधारित होकर पूँजी को लक्षने लगा। मशीनी आधार ने पूँजी को हवाई बनाया, तो हम भी हवाई हो गये। ऐसे में, हमारी भाषा कैसे न हवाई होती। इस तरह लाजभाषा ज़मीनी और राजभाषा हवाई हुई। पहले वह जीवन को साधने में ख़ुद भी सधती जाती थी, परंतु अब तो सिर्फ़ साधन हो गयी है। राजन तो साधन के उपयोगी ठहरे। प्रयोग तो लाजकर्म हुआ, सो त्याग दिया। पूँजी का राज और राज की पूँजी। पूँजी की भाषा कहें कि राज की भाषा! अब उसने प्राचीन मानव-पुंज की भाषा को साधन बनाया है, जो प्राचीन मिथकों और चित्रों से भरी है। निर्जीव। पेड़ के सिर और शाखों को यदि काटें, तो उसके कई सिर और शाखें निकल आएँगी। इससे यही सूत्र मिला कि सिर और भुजाओं को यदि बढ़ाना है, तो उन्हें काटो। रावण का चित्र और चरित्र इसी को लक्षित करता है। दस सिर और बीस भुजाओं से निर्मित चरित्र के सम्मुख अनगिन एक सिर और दो भुजाएँ लज्जित हुईं। उनका जीवन बाधित हुआ। ध्यातव्य है कि पहले तो एक सिर और दो भुजाओं ने उसके सिर और भुजाओं को ही काटने की कोशिश की, जिससे सिर और भुजाएँ घटने की बजाय बढ़ीं। ऐसा कई बार करने के उपरांत ही मूल काटने की सूझी। मतलब कि लक्ष्य ऊपर से उतरकर आधार से जुड़ा। इस तरह मूल के कटते ही रावण का उच्छेद हो गया। इससे कहा जा सकता है कि रावण पेड़रूप में आधारित था, मनुष्यरूप में नहीं। सो, पेड़ को ख़त्म करना है तो उसके मूल को उच्छेदो। आज हर ओर यही हो रहा है। मनुष्य हो या पेड़, दोनों के दो सिरे होते हैं। एक सिरे को सिर, तो दूसरे को पैर कहते हैं। सिर कटने से मनुष्य और पैर कटने से पेड़ ख़त्म होता है। ऐसा, मनुष्य को गतिशील और पेड़ को स्थिर मानने के कारण हुआ। पेड़ अगर स्थिर होता, तो इतना ऊँचा और विस्तृत कैसे होता! हमने तो अपने ही सिर-पैर को पेड़ पर रोप दिया। हम तो पेड़ का फल खाते हैं और पेड़ हमारा मल। पेड़ अगर हमारी भाषा बोलता और हम उसकी भाषा समझते, तो वह यही बोलता और हम यही सुनते कि हम भी आपका फल ही खाते हैं। अगर हम आपका मल खाते हैं, तो आप भी हमारा मल ही खाते हैं। कार्बन डाई ऑक्साइड अगर आपका मल है, तो ऑक्सीज़न भी हमारा मल है। इस तरह पेड़ मनुष्य का उलट होकर भी सहयोगी है। उसका उच्छेदन, मनुष्य का उच्छेदन है। उसका मूल कटना मनुष्य का सिर कटना है। हमारी हिन्दी भाषा इसे चरित्रात्मक क्यों नहीं बना पा रही। सच तो यह है कि पूँजी ने निराधार करके हमें पंगु और अंधा बना दिया है। ऐसे में, हम न चल पा रहे हैं, न देख ही पा रहे। हमारी भाषा अधिक से अधिक इसी बेबसी को वह रही है।
पैशाची पर आधारित संस्कृत ऐसी भाषा थी, जो तीनों प्राकृतों को वहती थी। आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं में हिन्दी ही वह भाषा है, जो खड़ी बोली के आधार से तीन अपभ्रंशों- "शौरसेनी, अद्र्ध मागधी और मागधी" को वहती है। इससे हिन्दी के सामथ्र्य का पता चलता है। मतलब कि इतने बड़े विस्तार को गहनती हुई वह सकती है। इतना ही नहीं, अरबी-फ़ारसी को भी वहने में समर्थ है। उर्दू तभी तो संभव हुई, जो हिन्दी की एक शैली है। ऐसा किसी अन्य भाषा में तो नहीं हुआ। हिन्दी का बँटवारा राजनीतिक था, जिसकी पीड़ा प्रेमचंद ने झेली। सोचिये तो, उनका लिखा देवनागरी में छपने पर हिन्दी और फ़ारसी में छपने पर उर्दू हो जाता था। एक प्रेमचंद दो में बँटे होंगे, तो कितने पीड़ित हुए होंगे! यह प्रेमचंद की ही नहीं, हिन्दी क्षेत्र के जीवन की भी विडंबना है, जिसे राजनीति ने अंजाम दिया। शायद इसी कारण मुझे विडंबित प्रेमचंद मिलते हैं, हिन्दी अथवा उर्दू प्रेमचंद नहीं। उनके पहले कबीर भी विडंबित ही थे। "अरे, इन दोउन राह न पाई" में उभयनिष्ठ पीड़ा है। दोनों से लगे की पीड़ा। ऐसी समझ केंद्र को वेधने से उपजती है। व्यास केंद्र को वेधते हुए परिधि के दूरतम छोरों को मिलाता हुआ दो अद्र्धवृत्तों का निर्माता होने पर भी उभयनिष्ठ होता है। उसकी निष्ठा दोनों वृत्तों के जीवन में है। यही विडंबित जीवन की पहचान है। प्रेमचंद की इस पीड़ा से बेख़बर हम उनकी अन्य पीड़ाओं को हिन्दी-उर्दू अनुवादों में पढ़ते हैं। भाषा के विकास में राजनीतिक सत्ता के योगदान की मान्यता भ्रम है। जीवन और भाषा परस्पर निर्भर हैं। भाषा जीवन को वहती है और जीवन भाषा को। अपने राज्य-विस्तार के लिए राजनीतिक सत्ता को साधन के रूप में शस्त्र के अलावा शास्त्र की भी ज़रूरत पड़ती है। भाषा से वह शास्त्र का ही काम लेती है। इस तरह राजभाषा शस्त्र की शास्त्रभाषा हुई। भारत में आज इसी हिन्दी का राज है और यही हिन्दी राज रही है। इसका एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा। विकलांग और दिव्यांग। जो जिस अंग से हीन है, वही अंग उसे विकल किये रहता है। विकलता गतिशील होने के कारण संचरती है और विकलांग से अन्यों को जोड़ती है, जबकि दिव्यांग तो अमूर्त और अलौकिक है। अमूर्त और अलौकिक भयकारक होने के कारण दूर करते हैं। इस तरह दिव्यांग लगाव के बदले अलगाव पैदा करता है। भाषा की गहराई जीवन की गहराई के सापेक्ष होती है। मनुष्य का जीवन पेड़ की तरह ऊद्ध्र्व होता है। वह ज़मीन कम और आकाश अधिक छेंकता है। हिन्दी का विकास तो हिन्दी जन ही करेगा, राजनीतिक सत्ता नहीं।
तो हिन्दी जन-जीवन की विशेषता क्या है। हर जन-जीवन किसी न किसी भू-भाग में रहता है। हिन्दी का भू-भाग अन्य किसी न किसी भू-भाग से जुड़ा है। जीवन प्रश्नों से भरा है, सारी दुनिया जिनका उत्तर खोजती है। सो, उत्तर ही सर्वोपरि हुआ। और देखिये न, हमारा उत्तर तो हिमालय है, जो सम्मुख खड़ा है। दुनिया का सर्वोपरि उत्तर हमारे पास होने के बावजूद हम दुनिया में सबसे पिछड़े हैं। जीवन का स्रोत, नदियों का उद्गम, जो बारहों मास बहती हैं। इसी भूगोल ने एक ओर तो यहाँ के लोगों को अन्यत्र जाने से रोका, तो दूसरी ओर अन्य भू-भाग के लोगों को आकर्षित किया। अपनी सामथ्र्य से यह आगंतुकों का जीवन भी सुखद बना देती थी। "अतिथि देवो भव", इसी भू-भाग का उच्चार है। यहाँ की उपज जहाँ भी गयी, साथ में अपनी भाषा भी लेती गयी। इसलिए वहाँ के भू-भागों में पहले से इसकी पहुँच रही है। हिन्दी सर्व समावेशी संस्कृति को रचती हुई राचती है। यह श्रम से सँवरती है, जिससे गउ-रउ निकलती है। इसमें गाय की आवाज़ भी ध्वनित होती है और श्रम की आवाज़ भी। इस तरह यहाँ गउ-रउ आधार हुआ, लक्ष्य नहीं। गौरवलक्षी तो गुजराती है। "गरवी गुजरात" तो कहते ही हैं। गुजराती में एक कहावत है, "बावा (साधू) बने हैं, तो हिन्दी बोलनी पड़ेगी।" इससे स्पष्ट होता है कि हिन्दी भाषा प्रवाही है। प्र (पर ही श्रेष्ठ है और श्रेष्ठ ही पर) को वहने में समर्थ। इसमें नीर-क्षीर विवेक है। तभी तो कहीं भी जाएँ, काम को साधते हुए यह ख़ुद सध जाएगी। इस तरह हिन्दी साध्य की भाषा ठहरी। यही है हिन्दी और हिन्दी संस्कृति की ख़ूबी। ध्यातव्य है कि साध्य की भाषा प्रयोगी होती है, उपयोगी नहीं।
कहा जाता है कि मीडिया और मनोरंजन के साधनों ने हिन्दी के विकास में बहुत योग दिया है। ऐसा कहते समय इसके दूसरे पक्ष को लुप्त कर दिया जाता है। मीडिया और मनोरंजन के साधनों के प्रचार-प्रसार से यह जितना विस्तरी है, उतनी ही उथली भी हुई है। इससे उसकी भावार्थ की वहन-क्षमता कम हुई है। भाषा में गहराई जीवन की गहनता से आती है। गहरी भाषा उड़ती नहीं, पाँवों-पाँव चलती है। वह भाषा ही क्या, जिसे हवा उड़ा ले जाय। वर्तमान राजनीतिक सत्ता उस पूँजी पर आधारित है, जिसका कोई ज़मीनी आधार नहीं। जबकि जीवन तो आज भी ज़मीन पर ही आधारित है। पूँजी जब ज़मीन और मनुष्य के श्रम पर आधारित थी, तब मनुष्य द्वारा नियंत्रित थी, परंतु जब से आसमानी (ग्लोबल) हुई, तब से मनुष्य को ही नियंत्रित करने लगी। इसके लिए उसे ज़मीनी भाषा की शरण में जाना पड़ा। वह जितनी आसमानी हुई उतनी ही दूर की ज़मीनी भाषा का उपयोग करने लगी। यानी, मनुष्य की वर्तन-भाषा के बदले अत्यंत दूर की भाषा को साधन बनाई। जिससे कि मानव-पुंज को पूँजी में बदलकर बेखटके राज्य का विस्तार किया जा सके। इसके लिए उसने भिन्न-भिन्न भाषाओं के मिथकों के चरित्र और संवाद को नहीं, बल्कि चित्रों और अनुवाद को तरजीह दी। जिससे अपने वर्तन से मानव-पुंज का ध्यान हटाकर दूर अतीत (जो तीत नहीं है, इसलिए मीठ है) में ले जा सके। वर्तमान राजनीतिक सत्ता का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हवाई पूँजी के घोड़े पर सवार मिथकीय और अनुवादित भाषा के हवाई फ़ायर से अपने राज्य के विस्तार में लगा है। इसका प्रतिकार लाजभाषा के अलावा कोई भाषा नहीं कर सकती। मतलब कि लज्जित श्रम का संधान करके उसे फिर से साधना होगा, जिससे राजनीतिक सत्ता का विस्तार लाजेगा और श्रम सत्ता के राज का विस्तार होगा।
मूल रूप से तो मनुष्य दो ही तरह के हैं। एक खाता है तथा दूसरा बनाता है और खाता है। सचमुच का मनुष्य तो दूसरा ही है। खाने का काम तो दोनों करते हैं। परंतु दूसरे का जितना समय बनाने में खर्च होता है, पहला उतने समय का उपयोग बोलने में करता है। इस तरह वह भाषा का महत्तम उपयोग करके अपने राज्य का विस्तार करता है। हम वात के आवरण में रहते हुए वात को साँस के रूप ग्रहण करते हैं। परंतु उसकी अनगिन बातें वात के आवरण को बात का आवरण बना देती हैं। जिससे एक तो हमारी हवा प्रदूषित होती है, दूसरे उसकी हल्की बातें हमारा जीना दूभर कर देती हैं। यही है राजनीति और राज की भाषा। खाना राजनीति है और बनाना लाजनीति। बनाने से सब दूर भाग रहे हैं। बनाना लाज है और खाना राज। हमें लाज नहीं, राज चाहिए था। सो, लाज का काम मशीनें करने लगीं। परंतु मशीनों का निर्माण भी तो लाज ही ठहरा। विडंबना तो देखिये कि अपने ही निर्माता को लजाती हुई मशीनें राज रही हैं। आज हम उसी राजभाषा, अर्थात मशीनी भाषा के उपयोगी हो गये हैं।
गाँव में दो भाइयों के अलगाव को अलग-बिलग कहते थे। परंतु अब तो सिर्फ़ अलग कहते हैं। बिलग को मानो हिन्दी भाषा से निकाल दिया। विलग ही बिलग है। दो भाइयों का परिवार जैसे-जैसे अपने-अपने परिवार से विलगता है, वैसे-वैसे परस्पर अलगने भी लगता है। राजन को यह दिखता ही नहीं, और अगर दिखता भी है, तो आँख आड़ा कान कर देता है। इस तरह राजभाषा विलगाये बिना ही अलगाती है। वह सिर्फ़ वादती है, शीलती नहीं। वह न वादशील है, न शीलवादी। सिर्फ़ वादवादी है, जिसके वदन-वादन से दिशाएँ गूँजती हैं। शील तो लाज हुआ, सो, त्याज्य है। हिन्दी साहित्य में भी यही राजभाषा गूँज रही है। पुंज शब्द पंज से बना है और पंज का मतलब पाँच भी होता है और पंजा भी। संख्यावाची को अलगाने के लिए ज का ध्वनि-परिवर्तन करके पंच बना दिया गया। पाँच अँगुलियों का पुंज ही पंजा है। पंजे की दीर्घता अँगुलियों पर निर्भर है। मशीनें जिन अँगुलियों से दीर्घ हुईं उन्हीं को खा गयीं। फिर भी हम निर्पंज होकर राज रहे हैं और खोजी लाज रहा है। यही है हमारी प्रचरती-प्रसरती हिन्दी का यथार्थ।

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