ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदीसेवा का "सीजन" आया और गया
CATEGORY : व्यंग्य 01-Oct-2018 08:16 PM 100
हिंदीसेवा का

यूं तो पूरे विश्व में दो या तीन ही मौसम पाए जाते हैं, लेकिन भारत ही ऐसा देश है जहां पर छह ऋतुयें पाई जाती हैं। अर्थात छह सीजन होते हैं। वर्तमान में एक नया सीजन भी जुड़ गया है, वह है हिंदी सेवा का सीजन। जैसे देवी की आराधना के लिए नवरात्र माह होता है, शिवजी के लिए सावन मास होता है, मुस्लिम भाई रमजान मनाते हैं और क्रिश्चियन भाई क्रिसमस मनाते हैं। वैसे ही प्रत्येक साल हिंदी सेवा के लिए सितम्बर में हिंदी पखवाडा भी मनाया जाता है। यह सरकारी कार्यालयों में सालाना पर्व का स्थान रखता है। विश्व में हिंदी ही शायद एकमात्र भाषा है, जिसके प्रयोग करने वाले उसकी सेवा करते हैं, ऐसी मान्यता है। इस बार हिंदी सेवा का मामला कुछ और जोरदार रहा। क्योंकि विश्व हिंदी सम्मेलन अगस्त में ही था, वो भी विदेश मॉरीशस में। इसलिए हिंदी सेवा का सीजन कुछ लम्बा हो गया है और मौसम के प्रभावानुसार पर आम के पेड़ों की भांति हिंदीसेवी भी अधिक बौरा गये। अनेक कोयल व सुग्गा टाइप के हिंदीसेवी फल पकने का इंतजार किये बिना का चोंच मारकर अमिया को कुतरने के प्रयास में अपनी चोंच घायल किये जा रहे थे। जबकि पुराने घाघों ने पहले से ही सारे हिंदी सम्मेलन के बागबाँ को अपने कब्जे में ले लिया था। फिर भी कुछ भोले पंछी मड़रा रहे थे कि हमें हिंदीसेवा का मौका दीजिए। लेकिन उनकी कोई सेवा लेना नहीं चाहता था, क्योंकि खतरा सेवा के बाद मेवा का था।
विदेश में हिंदीसेवा का महत्व भी अलग है, जैसे सारे बड़े देवी-देवता ऊंचे पहाड़ों पर रहते हैं और वहाँ जाकर दर्शन करने का पुण्य अधिक होता है। ऐसे ही हिंदी की विदेश में जा कर सेवा करने का पुण्य भी विशेष होता है।
लन्दन, अमेरिका, कनाडा आदि में तो अलग-अलग मठ हैं, उनके अलग-अलग पुरोहित भी हैं। हर मठ में सेवा का अलग पुण्य है। सभी मठों की हिंदी सेवा भी अलग-अलग कोटि की है। जिसे प्रायः एक मठ वाले दूसरे मठ की हिंदी सेवा को खारिज करते रहते हैं। सरकार द्वारा जबसे विदेशों में दूतावासों के माध्यम से हिंदी की कथित सेवा के प्रसाद के स्वरूप धन और सम्मान उपलब्ध कराना आरम्भ हुआ है। तब से स्वदेशी हिंदी सेवी तो बिना सेवा के सूख के कांटा हुए जा रहे हैं। हिंदी भी अपने श्रवण कुमारों को कह रही है, बस करो पगलो, अब जान ही दोगे क्या? कोई स्तरीय साहित्य सृजन करो। लेकिन हिंदीसेवी मानने को तैयार ही नहीं हैं।
मॉरीशस में शिवरात्रि का पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। श्रद्धालु गंगा तालाब से जल लेकर अपने गांव के शिवालयों में चढ़ाते हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर अनेक हिंदीसेवी भी हिंदी की कांवड़ को मॉरीशस ले जाकर जीवनभर का पुण्य वसूलना चाहते थे और कुछ वसूल भी लाये। विश्व हिंदी सम्मेलन भी प्रयागराज की भांति कुम्भ स्थान ही है। जहां दुनियाभर के साधु-संत अपने-अपने टेंट- पंडाल लगाते हैं और ईश्वर प्राप्ति की राह दिखाते हैं। वैसे ही अनेक यांत्रिक बाबा विगत से वर्तमान तक के विश्व हिंदी सम्मेलनों से लगातार पाए जाते हैं। कोई कहता है, यूनिकोड से हिंदी आयेगी, कोई कहता है देवनागरी को बचाओ, कोई कहता है रोमन लिपि अपनाओ, कोई कहता है हिंदी को सरल बनाओ। कोई कवि सम्मेलन का टोटका बताता है, जैसे ही मेरी टीम के कवियों को ठेका दोगे, हिंदी अपने आप बढ़ जाएगी। हिंदी माता स्वयं कन्फ्यूज है, कि मैं तो प्रकट हूँ। अरे भक्तो मैं प्रयोग से बढूंगी, न कि इन आडम्बरों से। मेरी सेवा करना चाहते तो मुझे समाज के सशक्त वर्ग में स्थापित करो। मुझे शासन की भाषा बनाओ। मुझे रिक्शे की ही नही, रॉकेट की भाषा बनाओ। अंतरराष्ट्रीय मंचो पर विमर्श की भाषा बनाओ। मुझ पर गर्व करो, फिर देखना मैं कैसे विश्वव्यापी हो जाती हूँ।
हिंदी की ये आवाज़ दिवसों और सम्मेलनों के शोर में हर बार खो जाती हैं और फिर नया एक सीजन आता है और चला जाता है।

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