ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी वालों को कैसे जगाएं
01-Sep-2016 12:00 AM 3460     

हम अपनी मातृभाषा बोलने में ठीक वैसे ही शर्माते हैं जैसे कि एक मजदूर औरत के खून पसीने कि कमाई से पढ़ लिखकर बाबू बना बेटा अपनी उसी मजदूर माँ को, माँ कहते हुए शर्माता है। हिंदी उस रानी की तरह है जिसे बाहर के राष्ट्र अपनी पटरानी बनाना चाहते हैं और उसका अपना राज्य और जनता उसे नौकरानी का तमगा दे चुकी है। आज हिंदी के घर में ही हिंदी की दुर्गति हो रही है। क्योंकि हम अपनी मातृभाषा की उपेक्षा कर फिरंगी बोलियों को बोलना ज्यादा श्रेष्ठ और गौरवान्वित करने वाला कार्य समझते हैं। और तो और आज भारत में साठ प्रतिशत व्यक्तियों को पूरी वर्णमाला सुनाने को कहा जाए तो वह निश्चित ही कहीं न कहीं जरूर अटकेंगे। क्योंकि हममें से अधिकांश ने न तो इसका व्याकरण कभी पढ़ने और समझने की कोशिश की और न ही इसकी पूरी शब्दावली से हम परिचित हैं। और जैसे-तैसे लिखने की कोशिश भी करते हैं तो लेखन में त्रुटियाँ ही त्रुटियाँ दिखाई देती हैं। भाषा की इसी अज्ञानता और अल्पज्ञान ने हमें हमारी संस्कृति और दुनिया की इस वैज्ञानिक भाषा से भी दूर कर दिया है। जिसके कारण हमारी पहचान नष्ट हो रही है।
हिंदी की दुर्दशा का एक कारण खुद इसके प्रचारक भी हैं। यह प्रचारक हिंदी का प्रचार करने के बहाने से कुकुरमत्तों की तरह से हिंदी-हितैषी संस्थाएं खोलकर बैठ गए हैं। इनका ध्येय सरकार से अनुदान हड़पना, अपना चेहरा चमकाना और बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन कर प्रायोजकों से और प्रचार के भूखे साहित्यकार एवं लेखकों से लाभान्वित होना है। स्थिति कुछ ऐसी है कि जब हिंदी का कोई लेखक या प्रचारक किसी से मिलता है तो सामने वाले को लगता है कि कहीं हिंदी के प्रचार के नाम पर पैसे ऐंठने तो नहीं आया। और लोग उससे दूर भागने लगते हैं।
बड़े शहरों में हिन्दी से जुड़े साहित्यिक आयोजन दर्शकों के अभाव में दम तोड़ रहे हैं जबकि वहीं अंग्रेज़ी से जुड़े आयोजनों में बेतरतीब भीड़ उमड़ जाती है। आगरा में होने वाला ताज महोत्सव हो या प्रसिद्ध जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल हर जगह हिंदी को उपेक्षित कर अंग्रेजी को ताज पहनाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता की स्तम्भ कही जाने वाली कई पत्रिकाएँ पाठकों की उपेक्षा के कारण दम तोड़ चुकी हैं जबकि अंग्रेज़ी की हर स्तरहीन और संस्कार विहीन पत्रिका भी फलफूल रही है क्योंकि अंग्रेज़ी कि दासता हमारी मानसिक कमजोरी बन चुकी है। हम किसी प्रकार से अंग्रेज़ी के विरोधी नहीं हैं, बल्कि हम तो सभी भाषाओं के हिमायती हैं लेकिन हमारा आग्रह सिर्फ़ इतना है कि राष्ट्र भाषा का यथोचित सम्मान करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि यह हमारी अस्मत और पहचान से जुड़ी हुई है।
किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए और उसकी अपनी विशिष्ट पहचान के लिए, उसकी राष्ट्र भाषा का सार्वजनिक प्रयोग बहुत ज़रूरी है पर अफ़सोस कि हम आज भी दूसरों के मापदण्डों से अपने को तौलते हैं और आज़ाद होते हुए भी गुलामों की तरह जीते हैं। जब तक हम अपनी मातृभाषा को हृदय से नहीं अपनाएंगे उसकी इज्जत नहीं करेंगे, उससे सामंजस्य नहीं बिठायेंगे, तब तक इस देश में अंग्रेजों की पूँछ अंग्रेजी आग लगाती रहेगी और भस्म कर देगी हमारे साहित्य को, हमारी भाषा के नामोनिशान को, हमारी गरिमा को और विश्व कि उस एकमात्र वैज्ञानिक, सहज-सरल भाषा को जो जैसे पढ़ी जाती है वैसी ही लिखी जाती है और ठीक वैसे ही बोली भी जाती है। हिंदी को बोलने वालों की संख्या के आधार पर विश्व की प्रथम भाषा होने का दर्जा दिया जाता है। डॉ. जयन्ती प्रसाद नौटियाल ने हिंदी को उसका हक़ दिलवाने के क्रम में काफी मेहनत मशक्कत भी की है। लेकिन अधिकारिक तौर पर हिंदी को यह दर्जा नहीं दिया जा सका है। यद्यपि विभिन्न सर्वेक्षणों में हिंदी विश्व की पाँच सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में स्थान पाती रही है। आज हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं। कुछ इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं। जबकि कुछ का मानना है कि हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है। हिन्दी का क्षेत्र विस्तृत है। हिन्दी सिर्फ इसीलिए ही विस्तृत नहीं है कि वह ज्यादा लोगों के द्वारा बोली जाती है बल्कि हिन्दी का साहित्य ज्यादा व्यापक है। उसकी जड़ें गहरी हैं। इसके मूल में हिन्दी की बोलियाँ और उन बोलियों की उपबोलियाँ हैं जो अपने में एक बड़ी परंपरा, इतिहास, सभ्यता को समेटे हुए हैं वरन स्वतंत्रता संग्राम, जनसंघर्ष, वर्तमान के बाजारवाद के खिलाफ भी उसका रचना संसार सचेत है।
राजभाषा शब्द सरकारी कामकाज की भाषा के लिए प्रयुक्त होता है। भारतीय संविधान में इसे परिभाषित किया गया है। अनुच्छेद 343 के अनुसार भारतीय संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी होगी और अंकों का स्वरूप भारतीय अंकों का अंतरराष्टीय स्वरूप होगा। ध्यान रहे देवनागरी अन्य भारतीय भाषाओं यथा मराठी, नेपाली आदि की भी लिपि है। इस प्रकार केंद्र सरकार के कार्यालयों, उपक्रमों, निकायों व संस्थाओं की कार्यालयीन भाषा हिंदी है। जो राजभाषा के रूप में परिभाषित है। लेकिन राजभाषा होने के वावजूद भी हिंदी अब तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं पा सकी है। राष्ट्रभाषा से अभिप्राय: है किसी राष्ट्र की सर्वमान्य भाषा। क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है? यद्यपि हिंदी का व्यवहार संपूर्ण भारतवर्ष में होता है, लेकिन हिंदी भाषा को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है। चूँकि भारतवर्ष सांस्कृतिक, भौगोलिक और भाषाई दृष्टि से विविधताओं का देश है। इस राष्ट्र में किसी एक भाषा का बहुमत से सर्वमान्य होना निश्चित नहीं है। इसलिए भारतीय संविधान में देश की चुनिंदा भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा है। शुरू में इनकी संख्या 16 थी, जो आज बढ़ कर 22 हो गई हैं। ये सब भाषाएँ भारत की अधिकृत भाषाएँ हैं, जिनमें भारत देश की सरकारों का काम होता है। भारतीय मुद्रा नोट पर 16 भाषाओं में नोट का मूल्य अंकित रहता है और भारत सरकार इन सभी भाषाओं के विकास के लिए संविधान अनुसार प्रतिबद्ध है। आज हिन्दी का परचम पूरे विश्व में फैलाने की जरूरत है। हमारे युवा संचार क्रांति के माध्यम से इसका बीड़ा उठा चुके हैं बस अब बारी सरकारी महकमों और क़ानून की है जो हिंदी में राजकीय कार्य करवाकर और आधिकारिक रूप में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देकर उसे वो सम्मान दें जिसकी वो हकदार है।
जब विश्व के अन्य देश अपनी मातृभाषा में पढ़कर उन्नति कर सकते हैं, तब हमें राष्ट्र भाषा अपनाने में झिझक क्यों होनी चाहिए? हिंदी सिर्फ तभी राष्ट्रभाषा का दर्जा पा सकती है जब हम और हमारी सरकार ऐसा चाहेगी, बस जरूरत ऐसा चाहने भर की है। इसके लियी सर्वप्रथम तो हमारा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-व्यवहार हिन्दी में ही होना चाहिए। दूसरा आजकल सभी स्कूलों में बच्चों को अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने को कहा जाता है और न पढ़ने पर या गलत पढ़ने पर जुर्माना लगाया जाता है। अगर ऐसी सख्ती हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं के सन्दर्भ में लगाई जाए तो आज के हमारे टूटी-फूटी अशुद्ध हिंदी पढ़ने बोलने वाले आधुनिक बालक जैसे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं वैसी ही शुद्ध हिंदी भी लिखने-बोलने लगेंगे। जब हमारे विद्यार्थी हिन्दी प्रेमी बन जायेंगे तभी हिन्दी का धारावाह प्रसार होगा।

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