ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी साहित्य में प्रवासीपन का फतवा
CATEGORY : मन की बात 01-Jan-2017 12:14 AM 1270
हिंदी साहित्य में प्रवासीपन का फतवा

अंडा जब बाहर से फोड़ा जाता है तो एक हत्या बन जाता है, परन्तु जब वह अन्दर से फोड़ा जाता है तो एक सृजन! साहित्य सृजन भी ऐसी ही एक प्रक्रिया है। जो आतंरिक ऊर्जा पककर प्रस्फुटित होती है वह नव रचना है। विदेशों में बसे भारत से आये अनेकों प्रबुद्ध, संवेदनशील, जागरूक व्यक्तियों की मानसिक ऊर्जा कब तक ढंकी मुंदी बैठी रहती? यहाँ के जीवन की नई विषमताओं से जूझते, जीते, जीतते-हारते, हम में से कईयों ने कलम को सखी बना लिया। जो कहना था -- चाहे अपना वर्तमान या सुनहरी यादें, या छाती पर बैठे दुःख या भावी दिवा स्वप्न --- सब कलम के कन्धों पर डाल दिया। कलम चलने लगी तो सृजन का अम्बार लग गया।
पिछले तीस वर्षों से अनेकों सशक्त लेखक व लेखिकाएं भारत के बाहर से हिंदी साहित्य को अपना योगदान दे रहे हैं। सबको एकत्र किया जाए तो एक अच्छा खासा वज़नदार संग्रह बनता है। इसी लेखन के समानांतर, सभी तरह की साहित्यिक गतिविधियाँ भी अनेक देशों में नियमित रूप से आयोजित की जाने लगीं। निजी आवासों में मित्रों की महफ़िल से लगा कर अंतर्राष्ट्रीय मेलों तक, रचना संसार विकसित होता गया है। समितियां बनी तो सभी अलग-अलग प्रमुख शहरों ने अपनी-अपनी ध्वजा वाहिनी की सैन्य-क्षमता का उद्घोष किया। कुछ लेखकों ने कम उम्र से ही, नौकरी व गृहस्थी की अनवरत मांगों के साथ-साथ कलम उठाई जबकि कुछ ने अवकाश प्राप्ति के बाद।
यदि वैश्विक लेखन के पांच दशकों का इतिहास देखें तो यह लेखकों की दूसरी पीढ़ी है क्योंकि हममें से कुछ अब नहीं रहे। पहली पीढ़ी के लेखक उम्र का अधिकाँश हिस्सा भारत में बिता कर आये थे। वर्तमान सक्रिय लेखकों की जमात में वह लेखक हैं जो स्कूल कॉलिज छोड़ते ही या यूं कहिये अपने उत्तरदायित्व काल के पहले दशक में ही यहाँ आ गए थे और जिनका जीवन यहीं पल्लवित हुआ। इसमें स्त्रियाँ प्रमुख हैं। भारत में उनकी प्रतिपक्षी बहनें घरों में बैठी रहीं जबकि इस देश में प्रत्येक ने यथायोग्य आर्थिक योगदान दिया। बिना नौकर या परिवार की सहायता के पति व बच्चों का पालन-पोषण किया।
मेरी एक साठ वर्षीय महिला को केवल सैंडविच में मक्खन पोतने का काम मिला था पर दिन भर बाद सात पौंड हाथ में लेकर वह नाचती थीं। कमाई करके हम क्या भारत से जुदा हो गए थे? भारत में स्वजनों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनेकों त्याग किये। मेरी एक मित्र शादी के बाद यहाँ आईं तो पूरे अठारह साल के बाद भारत जा सकीं क्योंकि उनकी टिकट के पैसे भारत में उनकी ससुराल वाले मांगते थे। जब गईं तो किसी ने उन्हें पहचाना तक नहीं। माँ मर चुकी थीं। पिता लगभग अंधे हो चले थे। भाई का बच्चा बाप को बुला कर लाया तो उन्होंने गले से लगाया। ऐसे निजी त्रास का ज्वालामुखी क्या फूटेगा नहीं? और जब ज्वालामुखी फूटता है तो धरती में छुपे रत्न दूर-दूर तक बिखर जाते हैं। यही है हमारा लेखन जिसे आज यही भारत "प्रवासी साहित्य" कहकर अपने से पृथक कर रहा है। हिन्दू धर्म में विदेश जाने वालों को "म्लेच्छ" मान लिया जाता था। बहिष्कृत किया जाता था। ठीक वैसे ही हमें बहिष्कृत किया जा रहा है। दलित बनाने की प्रक्रिया।
फतवे जारी किये जा रहे हैं। यह आधुनिक सोच नहीं है। यह सरासर अकृतज्ञता है। जो विद्वान हिंदुत्ववाद के पीछे डंडा लेकर पड़े हैं वही इस तरह से हमें निष्कासित कर रहे हैं। मेरी उनसे इल्तिजा है कि वह अपनी मानसिकता का पुनरावलोकन करें। अपने श्रेष्ठिवाद से बरी हों व हमें "खंडित व्यक्तित्व" या "खाए अघाए लोग" कहकर हमारी अवमानना न करें। हमने खिला कर खाया है। हमें बदले में क्या मिला? भारत जाने पर वहां के काक कस्टम अधिकारी किस-किस तरह से हमें लूटते रहे हैं, यदि इसी विषय के किस्से लिखे जायं तो कई भागों में छपेंगे।
परन्तु हम भारत को आईना दिखाने के लिए नहीं लिख रहे हैं। हम भारत को एक भिन्न परिवेश से जोड़ना चाहते हैं जो बॉलीवुड कि फिल्मों की कृत्रिम विदेशी पृष्ठभूमि से कतई अलग, एक जीवंत यथार्थ है। यह जुड़ान हमसे है। हम वह बीच का सेतु हैं जो निरंतर बना रहा है पिछले चालीस सालों से। हम समन्वय की आवाज़ हैं और हम समन्वित व्यक्तित्व हैं न कि उजड़े हुए, बेघर खंडित व्यक्तित्व! हमारा दृष्टिकोण विकासात्मक एवं वैज्ञानिक है।
हिंदी में लिख कर हम देश के उन अस्सी प्रतिशत लोगों तक अपने एंटिना फैलाना चाहते हैं जो अंग्रेजी भाषा के गुलाम बनकर अपनी टोपियों में उत्तमता की कलगी लगाए नहीं घूम रहे। वह दलित हों या सवर्ण, हिन्दू हों या मुसलमान। हिंदी के लेखक -- भारत के हों या यहाँ के, अभी भी, जनसाधारण के दिलों पर दस्तक देते हैं। यह एक शर्म का विषय है कि भारत के विकासशील लेखक अंग्रेजी को अपना माध्यम बना कर जन मानस से कटे रहते हैं। उससे भी बड़ा दुःख यह है कि सरकार अंग्रेजी के लेखकों, गतिविधियों पर अधिक व्यय कर रही है। प्रवासी दिवस पर हिंदी के लेखक अलग थलग नज़र आते हैं व भारत के इलीट को उनसे कोई सरोकार नहीं। भारत का इतिहास दुबारा लिखा जा रहा है मगर अंग्रेजी में। भारत की सुप्त आत्मा को जगाने का प्रयास किया जा रहा है, मगर अंग्रेजी में। हम अपना इतिहास यादों के झरोखों में से समेट लाते हैं तो कोई बिना बात उसे "नॉस्टाल्जिक" कहकर उसकी अवहेलना कर देता है। रचना चाहे कितनी भी मनोहारी क्यूं न हो, गयी फाईलों में। और भारत में फाईलें कब्रों से कम नहीं। पंजाब के विभाजन की विभीषिका का दर्द हजारों की कलम से प्रवाहित हुआ परन्तु साठ वर्ष बाद लिखी गयी गौतम सचदेव की कहानी "अनुष्ठान" अपना सानी नहीं रखती। भारत में कितने प्रबुद्ध आलोचकों ने पढ़ा है इसे? कितने पाठकों तक पहुंची है? आलोचक अपनी कुंठाओं व पूर्वाग्रहों के वश होकर आलोचनाएँ न लिखें। किसी भी लेखक को कलम से गोदने के पहले उसे पूरी तरह पढ़ लें। उसके व्यक्तित्व को परख लें, उसकी सामाजिक स्थिति की जानकारी लें। तभी वह उसके साथ न्याय कर पायेंगे। भारत के बाहर लेखन किसी भी दशा में भारत के लेखन से इतर नहीं है।
पाठकों की पसंद तय करने के लिए जरूरी है कि हमारी रचनाओं को नियमित रूप से सभी पत्रिकाओं में जगह दी जाए। न कि गाहे-बा-गाहे कोई स्पेशल अंक छापकर। रचना अपना उद्घोष स्वयं करती है। जो लोग गंभीर रूप रचनात्मक हैं उनके पास सस्ती मशहूरी के लिए समय नहीं होता। रेलगाड़ी में बैठे किसी पाठक को आप चार कहानियां बाहर की और चार कहानियां भारत की दे दीजिये और उसकी राय मांगिये वह बता भी नहीं पायेगा कि कौन-सी किसने लिखी। अनेकों हिंदी के भारत के लेखकों ने अपनी विदेश यात्राओं के बाद वहां के लोगों पर लिखा है पर उन्हें कोई प्रवासी साहित्य नहीं कहता। बड़ी बात यह है कि भारत के लोग हमें पढ़ें। हम जो लिख रहे हैं वह समय का दस्तावेज है। यदि हमारे अनुभव लिपिबद्ध नहीं होंगे तो भारत अपने अमूल्य इतिहास का एक और अध्याय, एक और युग खो देगा, जैसे गिरमिटियों का इतिहास खो गया। हिंदी इस्तेमाल करने से हिंदी बचेगी। हम विदेशों में रहकर इसके लिए ज्यादा चिंतित हैं। जबकि मातृभाषा का बचाव भारतीयों की जिम्मेदारी है। हमें यहाँ अंग्रेजी बोलने पर बाध्य किया गया। कुछ आगंतुकों के कारण क्यों सारे भारत में अंग्रेजी प्रथम भाषा रखी गयी है? और सो और रेल स्टेशनों पर तमाम नामपट अंग्रेजी झंडे के रंगों में लाल नीले व सफ़ेद नज़र आये।
भारत सरकार को चाहिए हमारी पुस्तकें खरीदे और देश भर की संस्थाओं को भेजे ताकि उनका नज़रिया बदल सके। हमें पाठकों की आवश्यकता है। बाहर के लोगों को अनेक प्रकाशकों ने तिगुने चौगुने दामों में छापा है। भारत सरकार को इस तरह की कुरीतियों की ओर भी ध्यान देना चाहिए। अनुदानों व पुरस्कारों की भी कोई तय रूपरेखा नहीं है। उनके निर्णय कब क्यों व कौन लेता है यह खुल कर तय किया जाना चाहिए। मैं तुझे चन्दन लगाऊँ तू मुझे! यह नहीं होना चाहिए। एक आग्रह और संपादकों से! रचना प्राप्ति की सूचना तुरंत दे दिया करें। पसंद या नापसंद तो एक बार पढ़कर ही तय की जा सकती है फिर उसमें इतना विलम्ब क्यों? आपने नहीं छापनी बता दीजिये। दुःख यह है कि हम यहाँ से छह गुना डाक टिकट पर खर्चते हैं। आप चुप मार कर बैठे रहे। तीन या चार फोन हमने मारे तो पता चला कि आपको रचना मिली ही नहीं। या खो गयी। बड़े इत्मीनान से कह देते हैं कि फिर से भेज दीजिये। माँगते समय आप चाहते हैं कि नई रचना होनी चाहिए। जब तक आपके राज में उसकी बारी आती है वह एक साल पुरानी हो जाती है। कई दफा तो याद भी नहीं रहता कि कहाँ भेजी थी। दुःख तब होता जब बिलकुल इन्सिपिड सा कोई आलेख या कहानी आपकी पत्रिका में छप जाता है। आखिर अच्छे बुरे की समझ भी तो हम रखते हैं। भारत में शिष्टाचार के सभी तीर एक ओर इंगित करते हैं, छोटे व्यक्ति से बड़े की ओर। कृपया इस पुरानी सोच से ऊपर उठिए।

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