ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी प्रवासी साहित्य से अपेक्षाएँ
CATEGORY : मन की बात 01-Jan-2017 12:17 AM 1380
हिंदी प्रवासी साहित्य से अपेक्षाएँ

भारत से प्रवास पर जाने का कार्य सदैव होता रहा है। आवागमन के साधनों ने इस प्रक्रिया में और तेजी ला दी है। भारतीय प्रवासी दुनिया के कोने-कोने में बसे हुए हैं। असगर वजाहत वर्तमान साहित्य के प्रवासी महाविशेषांक के अपने संपादकीय में कहते हैं, "बीसवीं शताब्दी में भारतीय मूल के लोगों ने एक देश में नहीं बल्कि लगभग संसार के हर कोने में जिस अस्मिता को जगाया है और जो पहचान स्थापित की है, वह इससे पहले संभव न थी। आज का प्रवासी भारतीय पहले के प्रवासी से भिन्न है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि प्रवास के इस युग में तकनीक और विज्ञान ने दूरियों के साथ-साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान के रास्ते को प्रशस्त भी किया है।"
विश्व भर में बसे इन प्रवासियों में से कुछ लिखने-पढ़ने में भी लगे हुए हैं। प्रतिनिधि आप्रवासी हिन्दी कहानियाँँ के संपादक हिमांशु जोशी के अनुसार इसका एक वैश्विक स्वरूप उभर रहा है। वे भूमिका में लिखते हैं, "हिन्दी लेखन आज भारत तक ही सीमित नहीं, उसका एक वैश्विक स्वरूप उभर रहा है।" हिमांशु जोशी प्रवासी लेखन पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं, "जो उन्होंने लिखा है उसमें उनकी समस्याएँ अलग हैं और जो हम यहाँ देख रहे हैं, या जी रहें हैं वो उनसे बिल्कुल अलग है। लेकिन वह साहित्य जब प्रकाश में आएगा तब हमें लगेगा कि आज तक जो हिन्दी साहित्य हम पढ़ रहे थे वो अधूरा है एक बड़ी क्रांति होगी, परिवर्तन होगा।"
भारतीय प्रवासी सारी दुनिया में फ़ैले हुए हैं। लगभग तीन करोड़ आप्रवासी तथा भारतवंशी आज विश्व के लगभग चालीस देशों में रहते हैं। आमतौर पर प्रवासी सभाएँ या महोत्सव या सम्मेलन केवल आर्थिक मुद्दों तक जाकर समाप्त हो जाते हैं, उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया जाता। सरकार प्रवासी दिवस मनाती है, प्रधानमंत्री विदेश जाकर प्रवासियों को देश में निवेश करने का आमंत्रण देते हैं। सरकार को प्रवासियों से बहुत अपेक्षाएँ हैं। बात अक्सर यहीं समाप्त हो जाती है। प्रवास में साहित्यकार है यह बात शायद ही कभी उठती है। असगर वजाहत कहते हैं, "प्रवासियों को उनकी जड़ों और अंचलों के निकट लाने का कार्य साहित्य और संस्कृति ही कर सकती है। भाषा के आधार पर गहरा और सार्थक रिश्ता भी अंचलों से बनता है।" जब उनके साहित्यिक अवदान पर काम होगा तो यह साहित्य और संस्कृति दोनों को समृद्ध करेगा। साहित्य और संस्कृति का मूल्यांकन इस अवदान को स्थायित्व प्रदान करेगा। उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक मूल्यगत अवदान को यदि ध्यान में न रखा गया तो यह उनकी अवमानना होगी और हमारी अपूर्णीय क्षति। प्रवासी से अपेक्षाएँ रखना अच्छी बात है लेकिन प्रवासी साहित्यकार से भी हमारी अपेक्षाएँ होनी चाहिए हैं।
यदि हम आधुनिक प्रवासी हिन्दी कथा-साहित्य पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि भारत के बाहर दुनिया के कई देशों में हिन्दी कथा साहित्य रचा जा रहा है। मॉरीशस, सूरीनाम, फ़ीजी में तो यह था ही अब यह अमेरिका, कैनेडा, न्यूजीलैंड, डेनमार्क, अर्जेण्टीना, नॉर्वे, जापान, अबूधाबी में भी खूब फ़ल-फ़ूल रहा है। आज यह मात्र भारत के भीतर ही सीमित न होकर पूरे विश्व में फ़ैला हुआ है।
जब हिन्दी प्रवासी साहित्य और साहित्यकार से अपेक्षा की बात उठती है तो सबसे पहले मुझे लगता है कि प्रवासी साहित्यकार के लिए पठन की आदत होना आवश्यक है। लिखने से पहले पढ़ना आवश्यक है। बहुत कम प्रवासी साहित्यकार पढ़ते हैं। इसका एक कारण शायद विदेशों में हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का उपलब्ध न होना है। हालाँकि आजकल इंटरनेट की सुविधा के चलते यह कमी काफ़ी हद तक दूर हो गई है। अधिकाँश हिन्दी पत्रिकाएँ नेट पर उपलब्ध हैं। किताबें भी ऑनलाइन मिलती हैं। वे खरीद कर पढ़ पाने की स्थिति में भी होते हैं। किसी ने कहा भी है एक अच्छी कहानी लिखने से पहले पचास अच्छी कहानियाँ पढ़नी आवश्यक हैं।
प्रवास व्यक्ति के ज्ञान का विस्तार करता है, उसके अनुभवों में बढ़ोतरी करता है। अधिकाँश हिन्दी प्रवासी लेखक नॉस्टॉल्जिया में अटके रहते हैं। उन्हें अपने देश की सारी बातें अच्छी लगती हैं। अपने लेखन में भी वे भारतीय रीति-रिवाज, मूल्यों का गुणगान करते रहते हैं। अपनी सभ्यता-संस्कृति से जुड़े रहना अच्छी बात है मगर प्रवास देश के रहन-सहन की आलोचना करते रहने कहाँ तक उचित है। अगर प्रवास देश इतना गिरा हुआ है तब आप वहाँ क्यों है? प्रवास देश की भी अपनी सभ्यता-संस्कृति है। उससे जुड़ना अवश्य ही होना चाहिए। प्रवास समाज का जीवन हिन्दी साहित्य में आना चाहिए। इस दृष्टि से रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने एक रिश्तेदार को जो सलाह दी थी वह ध्यातव्य है।
रवींद्रनाथ टैगोर का एक रिश्तेदार युवक पढ़ने विदेश गया। उन्होंने उसे एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने उसे सलाह दी थी कि वह जहाँ गया है वहाँ के लोगों से भी घुले-मिले, उन्हें जानने-समझने का प्रयास करे। स्थानीय लोगों से मिलना-जुलना शिक्षा का हिस्सा है। उन्होंने अमेरिका में एग्रीकल्चर की शिक्षा लेने गए अपने दामाद नगेंद्रनाथ गांगुली को लिखा, "मात्र एग्रीकल्चर जानना काफ़ी नहीं है तुम्हें अमेरिका को भी जानना चाहिए।"
जाहिर सी बात है जब प्रवासी केवल अपने ही लोगों से न मिल कर प्रवास देश के लोगों को भी जानने-समझने का प्रयास करेगा तो प्रवास देश का समाज, वहाँ के लोग, वहाँ के लोगों का जीवन-संघर्ष भी उसके लेखन का हिस्सा बनेगा और उसे यह पूर्वाग्रह मुक्त हो कर करना होगा। जब ऐसा होगा तो हिन्दी को नई बयार मिलेगी। हिन्दी साहित्य का विस्तार होगा। प्रवास से काव्य साहित्य तो खूब आ रहा है, (यहाँ मैं उनकी गुणवत्ता की जाँच नहीं कर रही हूँ।) कहानियाँ भी आ रही हैं, एकाध उपन्यास भी आए हैं, मगर साहित्य की और भी बहुत-सी विधाएँ हैं, उन पर भी काम होना चाहिए। नाटक, रेडियो नाटक, पत्र-लेखन, व्यंग्य, यात्रा वृतांत, जीवनी, आत्मकथा, डायरी, आलेख, रिपोर्ताज, रेखाचित्र आदि भी रचा जाना चाहिए। प्रवासी साहित्यकार से एक अपेक्षा यह भी है कि वह प्रवास देश के चुने हुए उत्कृष्ट साहित्य को हिन्दी में अनुवाद कर इसे हिन्दी साहित्य का अंग बना कर हिन्दी साहित्य को समृद्ध करेगा। इससे हिन्दी साहित्य में विविधता भी आएगी।
गुणवत्ता का अन्य स्थानों के साथ-साथ साहित्य में भी महत्वपूर्ण स्थान है। सुषम बेदी लिखती हैं, "लोग यहाँ धड़ाके से लिख तो रहे हैं। दाएँ-बाएँ किताबें भी खूब निकल रही हैं। पैसे की गर्मी हैं न..." साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष गोपीचंद नारंग का कहना है, "मान्यता साहित्य में एक्सीलेंस के आधार पर होती है, इस पर नहीं कि मैं किस देश में रहता हूँ, या कितना कामयाब हूँ, या मैं कितना बड़ा बिजनेसमैन हूँ। साहित्य में मान्यता, चाहे वो काव्य हो चाहे कथा साहित्य, एक्सीलेंस की बिना पर ही होगी।"
मैंने एक प्रवासी लेखक का लेख पढ़ा, उनका कहना है कि प्रवासी लेखक को भाषा और व्याकरण में छूट मिलनी चाहिए। मैं पूछती हूँ, भला क्यों? जब आप साहित्य रच रहे हैं, साहित्य जगत में सम्मानित होना चाहते हैं तो भाषा और व्याकरण में छूट की माँग क्यों? साहित्यकार और साहित्य का सम्मान उसकी गुणवत्ता के आधार पर होता है, किसी छूट के आधार पर नहीं होता है, कभी नहीं होना चाहिए। प्रवासी साहित्यकार से अपेक्षा है कि वे गुणवत्तापूर्ण रचनाएँ देंगे ताकि हिन्दी साहित्य का स्तर ऊँचा हो सके। प्रवासी साहित्य और साहित्यकार का सम्मान हो सके।

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