ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी के सूत्र और संदर्भ
01-May-2016 12:00 AM 3461     

हिंदी के संदर्भ में गाँधी जी ने 1918 में इंदौर में हुए हिंदी साहित्य सम्मेलन के दौरान कहा था कि हिंदी वह भाषा है, जिसको हिंदू व मुसलमान बोलते हैं और जो नागरी अथवा फारसी लिपि में लिखी जाती है। सच है कि वही भाषा श्रेष्ठ है, जिसको जनसमूह सहज में समझ ले। और इस बात को भारतीय संदर्भों में हिंदी ने पिछली सदी से लेकर अब तक साबित भी किया है।
यह सर्वज्ञात है कि उन्नीस सौ पचास (1950) में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकृत होने के पहले हिंदी ने लंबी दूरी भारत में तय की है। इस संदर्भ में सदी के स्तर पर पीछे मुड़कर देखने पर साफ दीख पड़ता है कि अठारहवीं (18वीं) सदी के और उन्नीसवीं (19वीं) सदी के आरंभिक काल आते-आते भारतीय नेताओं के समक्ष यह बात साफ हो गई थी कि जनता के बीच अपने विचारों के प्रसार एवं स्वतंत्रता आंदोलन के लिए उस भाषा का प्रश्रय लेना जरूरी है जिसे अधिकां¶ा जनता समझ सकें और ऐसे में अभिव्यक्ति की वह भाषा हिंदी ही अपनी संपूर्णता में उभर आई थी, जो जन-आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सके। इतिहास गवाह है कि हिंदी ने यह भूमिका बखूबी निभाई और आज भी यह भारत-मॉरि¶ास, अमेरिका-कनाडा आदि दे¶ाों में लगातार जुड़ती ही जा रही है।
हिंदी की तरफ एक निगाह डालें तो हम पाते हैं कि पिछली सदी में राजा राममोहन राय, महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती, नवीनचंद्र राय आदि ने समय-समय पर हिंदी को अलग-अलग तरह से बल दिया -- जैसे कि 1826 में बंगदूत को हिंदी में प्रका¶िात करके रूढ़ियों को परे हटाकर ब्राहृ समाज की स्थापना करके, 1868 में "ज्ञान-प्रदायिनी' पत्रिका एवं महिलाओं के लिए "सुग्रहणी' नामक पत्रिका निकाल करके और हिंदी का व्याकरण प्रका¶िात करके एवं इसी तरह के अनेकों कार्य हिंदी के पक्ष में करके माध्यम के रूप में हिंदी को ही अपनाया गया। कई पत्रिकाएँ हिंदी में प्रका¶िात की गर्इं -- सुद¶ाा प्रर्वत्तक (1878), आर्य समाचार (1878), धर्मोपदे¶ा (1882), आर्यप्रका¶ा (1886), आर्य भार्तण्ड (1894), आर्यपत्र (1895), आर्यमित्र (1898) वगैरह-वगैरह।
आज की हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी के सूत्र पिछली सदियों से इस संदर्भ में भी जुड़े हुए दीख पड़ते हैं कि कलकत्ते में स्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना के कारण खड़ी बोली ने अपना ¶ाुरुआती जामा पहना था। एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य यहाँ इंगित करना चाहूँगी कि अंग्रेजों के ¶ाासन की स्थापना के बाद ईसाई मत के प्रचार के लिए बाइबल आदि ग्रंथों के हिंदी अनुवाद एवं प्रका¶ान की जो ¶ाुरुआत हुई थी उस प्रवृत्ति के कारण हिंदी गद्य-प्रका¶ान को सही बल मिला था और इस तरह एक महत्त्वपूर्ण कार्य की ¶ाुरुआत अपने आप हो गई थी -- हिंदी में पुस्तक प्रका¶ान की। आगे के वर्षों में 1902 में हरिद्वार के निकट कांगड़ी गाँव में स्वामी श्रद्धानंद ने गुरुकुल की स्थापना की थी, जहाँ हिंदी को प्रमुख स्थान दिया गया था और जिसे आज हम "राष्ट्रीय ¶िाक्षा के पहले प्रयोग' के रूप में याद कर सकते हैं। उस गुरुकुल में आयुर्वेद, अर्थ¶ाास्त्र, इतिहास, गणित, फिजिक्स, केमेस्ट्री -- सभी विषय हिंदी माध्यम द्वारा सिखाए जाते थे, जिनकी पुस्तकें हिंदी में कड़े परिश्रम द्वारा तैयार की गई थी। कहा जा सकता है कि हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने की प्रक्रिया उन दिनों सतह के नीचे न दीख पड़ने वाली हलचल की तर्ज पर चल रही थी और हिंदी अपने वृहत् आकार को स्वयं ही गढ़ने के क्रम में आगे बढ़ रही थी।
यहाँ इस बिन्दु पर पहुँचकर मैं उस महत्त्वपूर्ण पत्र का उल्लेख करना चाहूँगी, जिसे महात्मा गाँधी ने स्वामी श्रद्धानंद को लिखा था, जिसका उत्तर स्वामी श्रद्धानंद ने इन ¶ाब्दों में दिया था - "उस व्यक्ति को, जो हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहता है, उसे अपने दे¶ावासियों से अंग्रेजी में पत्र-व्यवहार करने का कोई अधिकार नहीं है।'
महात्मा गाँधी ने इस महत्त्वपूर्ण तत्व को व्यवहार में उतार लिया और आगे के समय में आर्य भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष पद से भाषण देते हुए उन्होंने तीन प्रतिज्ञाएँ दुहरार्इं --
- हम अपना सारा पत्र-व्यवहार हिंदी करेंगे।
- कार्डों और लिफाफों पर पता देवनागरी में लिखेंगे।
- हम सदा रेलवे के तीसरे दर्जे में यात्रा करेंगे।
हिंदी से संबंधित अन्य घटनाओं पर अगर हम नजर डालें तो हम पाते हैं कि सन् उन्नीस सौ पाँच (1905) में का¶ाी नागरी प्रचारणी सभा के तत्त्वाधान में आयोजित सम्मेलन में लोकमान्य तिलक ने देवनागरी को राष्ट्र लिपि और हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करते हुए कहा था--
"सर्वप्रथम और सर्वाधिक महत्त्व की यह बात ध्यान में रखने की है कि एक लिपि निर्धारित करने का यह आंदोलन केवल उत्तर भारत के लिए ही नहीं है। यह एक बृहत्तर आंदोलन का समष्टि रूप है; मैं कह सकता हूँ कि समग्र भारत के लिए एक भाषा मान लेने का यह एक राष्ट्रीय आंदोलन है। क्योंकि किसी जाति को निकट लाने के लिए एक भाषा होना एक महत्त्वपूर्ण तत्व है।'
इसी क्रम में आगे बढ़ने पर हम पाते हैं कि 1709 में गाँधी जी ने "हिंद-स्वराज' नामक छोटी-सी पुस्तक लिखी और भाषा के बारे में स्पष्ट इंगित किया कि हर एक पढ़े-लिखे हिन्दुस्तानी (भारतीय) को अपनी भाषा का ज्ञान होना चाहिए और सबको हिंदी का ज्ञान होना ही चाहिए। अन्ततोगत्वा गाँधी जी की दूरदर्¶िाता के परिणाम स्वरूप हिंदी का प्रचार भारत के स्वातंत्र्य आंदोलन के अभिन्न अंग के रूप में उभरकर आया और सन् उन्नीस सौ अट्ठारह (1918) में मद्रास से यह हिंदी प्रचार का जो बृहत और सिलसिलेवार कार्य ¶ाुरू हुआ उसका विस्तृत विवरण बहुत कुछ इंगित करता है। इस प्रचार कार्य की सीमा हिंदीतर प्रदे¶ाों की ओर बढ़ती गई थी, लोग जुड़ते गए थे, हिंदी के पक्ष में पूर्ण जनमत तैयार हुआ था और निस्वार्थ स्वतंत्रता सेनानियों एवं हिंदी प्रचारकों की अनथक मेहनत के परिणामस्वरूप सन् उन्नीस सौ पचास (1950) में संविधान परिषद् द्वारा हिंदी "संघ की राजभाषा' के लिए स्वीकृत हो गई थी।
भारत के संविधान में राजभाषा से संबंधित खंड में बहुभाँति हिंदी के प्रसार, प्रयोग, कार्यान्वन आदि की बातें दी गई हैं जैसे कि धारा तीन सौ तैंतालिस की प्रथम पंक्ति है कि संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।
धारा तीन सौ इक्यावन (351) में हिंदी भाषा के प्रसार-वृद्धि एवं विकास करने को इंगित किया गया है, ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके।
अन्य धाराओं के बीच से दो महत्त्वपूर्ण तथ्यों को इंगित करना चाहूँगी जो इन ¶ाब्दों में है -- "जनता से हिंदी में जो भी पत्रादि मिलें, उनके उत्तर भरसक हिंदी में ही दिए जाने चाहिए। ये उत्तर सरल हिंदी में दिए जाने चाहिए।'
"सरकारी कार्यालयों के नियमित प्र¶ाासनिक काम में हिंदी ¶ाुरू करने के लिए फार्मों, रजिस्टरों आदि के ¶ाीर्षक अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी दिए जाएँ ताकि कर्मचारी हिंदी के ¶ाब्दों के बारे में जानकारी हासिल कर लें।'
संविधान की अन्य धाराओं, उपधाराओं में भी तरह-तरह से राष्ट्रभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा प्रतिष्ठित करने के संदर्भ में पन्ने-दर-पन्ने भरे हुए हैं, लेकिन वास्तविक धरातल का सच कड़वा है कि संविधान ने राजभाषा पर हिंदी को आसीन रखने के बावजूद आजादी के बाद के वर्षों में हिंदी व्यावहारिक स्तर पर लगातार पिछड़ रही है। राजकाज के काम की भाषा हिंदी पूर्णत: बन नहीं पाई है।
सत्य है कि स्वतंत्र भारत में स्वतंत्र ¶ाब्द तो आ गया है, लेकिन भाषाई स्तर पर स्वतंत्रता राष्ट्रभाषा को मिल नहीं पाई है, खासकर प्र¶ाासनिक स्तर पर। हमारे ब्यूरोक्रैटिक ढांचे के बीच वह अजीबोगरीब बहाव लगातार बना रहा है जिसे "एडमिनिस्ट्रेटिव सैडिज्म' के नाम से जाना जाता है। --
"पावर विदाउट रिस्पांसिबिलिटी एण्ड रिस्पांसिबलिटी विदाउट पावर!'  
और इसी परपीडन-सुख धार में डूबा भारतीय ¶ाासन-तंत्र अंग्रेजी की जगह अपनी राष्ट्रभाषा को आज तक पूर्णत: स्वीकार नहीं कर पाया है, न ही उसे उपार्जन की भाषा बना पाया है, न ही हिंदी के सम्मान से स्वयं के सम्मान को जोड़ पाया है। हमारे नेता-मंत्रिगण महत्त्वपूर्ण सभाओं में पूरी तरह हिंदी बोलकर राष्ट्र को, राष्ट्रभाषा को गौरव प्रदान नहीं कर पाते, खास कर विदे¶ा जाने पर।
दूसरी ओर केवल हिंदी के जानकार विद्यार्थी तकनीकी ¶िाक्षा के ऊँचे मानदंडों को पाने में स्वयं को अक्षम पाते हैं, जबकि केवल अंग्रेजी के जानकार विद्यार्थी को ज्ञान, नौकरी और पैसा आसानी से हासिल हो जाता है। यह सत्य एक बड़ी विडंबना के रूप में पूरे राष्ट्र पर तना दीखता है।
सन् 1975 में नागपुर में हुए प्रथम वि¶व हिंदी सम्मेलन के दौरान यह प्रस्ताव पास हुआ था कि भारत सरकार यूएनओ की स्वीकृत भाषाओं की सूची में हिंदी से जुड़वा दे। लेकिन 1975 के बाद न जाने कितनी बार वि¶व हिंदी सम्मेलन में सम्मिलित होने वाले अफसरों कर्मचारियों वगैरह की विदे¶ा यात्राओं पर भारत की जनता से इकट्ठा किया गया करोड़ों रुपया खर्च हो चुका है लेकिन स्थिति बदली नहीं है।
यह हुई हिंदी के संदर्भ में कुछ कहे अनकहे तत्व एवं विचार। इन सभी बातों पर ध्यान देते हुए मैं यह गुजारि¶ा करना चाहूँगी कि वि¶व भर में फैले तमाम सह्मदय, आत्मसम्मानी, राष्ट्रसम्मानी भारतीय बंधुओं को इस मसले पर एकजुट होकर यह अव¶य सोचना चाहिए कि  हिंदी को उसका असली गौरव कैसे प्राप्त हो, साथ ही वह उपार्जन की भाषा कैसे किस भाँति बने।
इसमें संदेह नहीं कि यह एक बेहद मु¶िकल कार्य है असंभव-सा दीखने वाला, फिर भी यदि दे¶ा-विदे¶ा में फैले तमाम भारतीय  हिंदी के संदर्भ में एक मंच पर जुड़ जाएँ, नेट पर संपर्क साध लें, आईटी साफ्टवेयर वाले ज्ञानी कर्मठ प्रमथ्यु वाली भंगिमा अपना लें। और जैसे प्रमथ्यु ने जंजीरों में जकड़ी "अग्नि' को स्वर्ग से छुड़ाया था, पृथ्वीवासियों के बीच उसे पहुँचा दिया था और बदले में गिद्ध के द्वारा ह्मदय के मांस को खाते जाने की सजा भी भुगती थी--
मेरे कंधों पर बैठा
यह बूढ़ा गिद्ध
नोंच-नोंच कर ह्मदय मेरा खाता है
चुप हूँ, नत हूँ, क्योंकि
यह गुणी है, ज्ञाता है।
खैर, यह तो एक कहने की बात हुई लेकिन वास्तव में हिंदी के संदर्भ में महा जीवट वाले हिंदी सेवकों की बड़ी जरूरत है। समस्त भारतीयों को आगे बढ़कर अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रतिष्ठा की बात संजीदगी से सोचनी चाहिए।
पूरे वि¶व में होने वाली हर हलचल को, हर ज्ञान-विज्ञान और नई तकनीक को हिंदी भाषा में पलट देने की क्षमता हमें स्वयं में उपार्जित करनी पड़ेगी और इस तरह किए गए अनुवाद को फेसबुक, गूगल आदि के जरिए जन-जन के मानस तक पहुँचाना होगा। कण-कण को आलोकित करना होगा।
सवाल यह उठता है कि हिंदी के प्रति जिम्मेवारी निभाने के क्रम में क्या हम इस तरह की गगनाकार राष्ट्र सेवा करने के लिए तैयार हैं?
बेहतर हो हम आज इस समय खंड कुछ प्रतिज्ञा स्वयं के प्रति, राष्ट्रभाषा के प्रति करें --
- हम सभी भारतीय मूल के लोग एक दूसरे से हमे¶ाा हिंदी में ही बात करें, चाहे कई बार सामने वाले के कारण कहे गए को अंग्रेजी में दुहराना क्यों न पडे।
- हम जब भी पत्र लिखें, कागज पर या कम्प्यूटर पर, अपना पता एवं नाम हिंदी में दें, जरूरी हो तो अंग्रेजी में भी।
सवाल यह उठता है कि क्या राष्ट्रपिता गाँधी द्वारा दिखाए गए रास्ते पर क्या हम अभी के समय में चलना चाहेंगे? भारतीयता की लौ को जलाए रखना चाहेंगे?
ऐसे समय में हमें भारतीयता के मूलतत्व को ई¶ाावारयोपनिषद् के इस ¶लोक द्वारा याद रखना चाहिए --
ई¶ाावास्यमिदं सर्वं, यÏत्कच जगत्यां जगत्
तेन त्यक्तेन भुञजीथा, मा गृध: कस्य स्विद्धनम्।
यह जो भी चलायमान इस जगत् में दीखता है, वह ई·ार का ही है। अत:पूर्णत: त्यागभाव को मन में रखकर इस जगत् का भोग करो। किसी के धन पर दृष्टि मत डालो।

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