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हिंदी बीमार चल रही है
01-Jan-2018 03:05 PM 1541     

हिंदी बीमार है। उसे एक सरल रोग नहीं बल्कि कई जटिल रोग हैं, और उसके तीमारदार हर तरह से बेकार हैं। इससे भी बड़ी समस्या यह है कि उन तीमारदारों की दृष्टि इतनी सीमित है कि वे किसी सक्षम सेवक को पहचानते भी नहीं कि बुला सकें और यदि कोई स्वतः चला ही आये तो उसे घुसने नहीं देते हैं। हिंदी को अक्षमता ने जकड़ा हुआ है। शक्तिशाली पाँव होते हुए भी इसे बैसाखी का नाम देकर बेड़ियाँ पहनाई गई हैं। और ये बेड़ियाँ हैं तथाकथित हिंदी-सेवक, हिंदी अधिकारी, वे लोग जो हिंदी के नाम की रोटी खा रहे हैं और वे भी जो हिंदी के नाम के माल-पुए खा रहे हैं।
हिंदी के जटिल रोगों को समूहबद्ध करके अगर एक नाम देना हो तो मैं कहूँगा- सहनशीलता, बर्दाश्त। हिंदी का एक ही रोग है, वह यह कि उसने गुणहीनता को बर्दाश्त किया है।
मैंने यूरोप, अमेरिका और अफ़्रीका में हिंदी के सूचनापट्ट देखे हैं। जब भारत में हिंदी पर कालिख पोते जाने की खबरें सुनता हूँ तो मन में पहला प्रश्न यही उठता है कि इस घृणा को रोकने के लिये उन लोगों ने क्या किया जिन पर हिंदी की ज़िम्मेदारी है। क्या कोई हिंदी अकादमी, हिंदी सचिवालय, हिंदी निदेशालय या किसी विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग शान से खड़ा होकर यह कह सकता है कि हमने ऐसा अपराध करने वालों के खिलाफ़ रिपोर्ट लिखवाई, प्रशासन पर दवाब बनाकर उन्हें अपराध की सज़ा दिलाई और उन पोते गये चिह्नों को फिर से स्थाई रूप दिया? हमने तब तक इस मामले को नहीं बख्शा जब तक अपराधियों को उपयुक्त सज़ा नहीं मिल गई। नहीं, इनके बस का नहीं। यह इनकी इच्छाशक्ति और क्षमता दोनों के बाहर की बात है।
जब हिंदी का एक प्राध्यापक फ़ेसबुक पर बड़ी शान से अपने बच्चों के अंग्रेज़ी स्कूल की भारी फ़ीस का रोना रोता है तब वह हिंदी के प्रति अपना अविश्वास प्रकट कर रहा होता है। वह यह भी बता रहा होता है कि अगर उसे अंग्रेज़ी आ जाती तो वह हिंदी में न होता। वह कह रहा है कि यदि वह डॉक्टर, इंजीनियर आदि कुछ बन जाता तो उसे मजबूरन हिंदी को न ढोना पड़ता। उसे पता है कि हिंदी उसकी रुचि नहीं उसकी मजबूरी है। हिंदी उसके नाकारेपन का कवच है। यह सच है कि हिंदी ने ऐसे नाकारों को थोक में अपनाकर उनके ऊपर कृपा की है, लेकिन साथ ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी भी मारी है। ये लोग "श" और "ष" के अंतर से अधिक रुचि अंग्रेज़ी के "ज्" और "ज़्" के अंतर को जानने में दिखलाते हैं। अंग्रेज़ी की बारीकियों में रुचि दर्शाना भी इनके लिये स्टेटस सिम्बल है और बच्चों के अंग्रेज़ी स्कूल की भारी फ़ीस भी।
हिंदी की समस्या उसके मानकीकरण करने वाले अधिकारियों की भी है। यदि बाल गंगाधर "टिळक" को "तिलक", "मिर्ज़ापुर" को "मिरजापुर" लिखना पड़े; "आह्वान" और "आवाहन" में अंतर न रह जाये; पहले से ही सीमित शब्दावली को सरलीकरण के नाम पर कमज़ोर किया जाता रहे; स, श, और ष का अंतर न जानने वाले को प्रथम श्रेणी का पत्रकार, साहित्यकार या भाषाविद् समझा जाये, तो किसी भी भाषा का वही हाल होगा जो हिंदी का हो रहा है। जब देवनागरी में "ळ" उपलब्ध है तो उसे हिंदी से बाहर क्यों किया गया? "ळ" को "ल" से प्रतिस्थापित करने की आवश्यकता क्या है? यदि हिंदी के तथाकथित विद्वान को "श" और "ष" का अंतर नहीं पता, "ऋ" और "ज्ञ" का प्रामाणिक उच्चारण नहीं मालूम, तो उसे वर्णमाला के निर्धारण का अधिकार ही क्यों दिया जाये?
कविताकोश हिंदी के सबसे बड़े स्वयंसेवक प्रकल्पों में से एक है। इसमें हिंदी के ख्यातनामों से लेकर गली मुहल्ले के शायर-गीतकार भी मौजूद हैं, लेकिन यदि आप प्रसिद्ध गीतकार और हिंदी की कालजयी कहानी "हार की जीत" के लेखक सुदर्शन को वहाँ ढूँढना चाहें तो निराशा हाथ लगेगी। क्योंकि "तेरी गठरी में लागा चोर" या "मन की आँखें खोल बाबा" के गीतकार से किसी मुहल्ला-कवि का कोई स्वार्थ सधने वाला नहीं है। हिंदी की अधिकांश चर्चायें आत्ममुग्ध समूह की पारस्परिक प्रशंसा तक ही सीमित रह जाती हैं। पारस्परिक उत्थान का यही लेन-देन सम्मान-पुरस्कार वितरण कार्यक्रमों में भी देखने को मिलता है जहाँ राजनीतिक कृपापात्र अपनी स्वार्थसिद्धि के पात्रों को अनुगृहीत करते हैं। मरे हुए लतीफ़ों को वीभत्स ढंग से मंचित करने वालों को कपि, कभी और कवि का भेद न कह सकने वाले भाषण के लिये सम्मानित किया जाता है और ब्लॉग, एग्रीगेटर तथा ट्रोल जैसे अंग्रेज़ी शब्द जानने भर पर से हिंदी में पीएचडी हो जाती है।
हिंदी एक बाभुक भासा है, इसमें कवि और कपि एक ही भाव बिकते हैं, बल्कि कवि-कवि तो कभी ज़्यादा अच्छी कपीता कर लेता है।
जब हिंदी के किसी अंतर्जाल समूह में कोई संपादक जी तुलसी, मीरा, या कबीर का वह दोहा जानना चाह रहे हों जिस पर उनकी डेढ़ दशक की संपादकी वाली पत्रिका का नाम उन्हीं के द्वारा रखा गया है तब हिन्दी की उदारता पर गर्व और भाजी-खाजा-समभाव पर निराशा एक साथ होना स्वाभाविक है। देशभर की हिंदी अकादमियों, केंद्रों व संस्थानों द्वारा ऐसे विद्वान रोज़ सम्मानित होते रहे हैं, जबकि वास्तविक हिंदी कार्यकर्ता पहुँच के राजपथ से दूर गुमनाम गलियों में जूझ रहे हैं। विश्वविद्यालयों के लिये एकरूप हिंदी पाठ्यक्रम के निर्माण का दावा करने वाले सरकारी संस्थान की वेब-साइट पर इस विषय की एक-पत्रीय घोषणा व्याकरण और वर्तनी की त्रुटियों से भरी हुई थी। जिन्हें खुद हिंदी पढ़ने की ज़रूरत है वे दुनियाभर को पढ़ाने के काम पर लगाये जायें तो और क्या आशा की जा सकती है? हिंदी की जड़ में मट्ठा डालने के लिये इतना काफ़ी न हो तो आपको यह जानना ज़रूरी है कि अंतरराष्ट्रीय महत्व की कुछ संस्थाएँ ऐसी भी हैं जिनके द्वारा हिंदी के प्रसार-प्रचार की कल्पना तो दूर की बात है, उनके अन्यथा-तकनीकी-सक्षम पदाधिकारियों को हिंदी में ईमेल लिखना नहीं आता। ऐसी कई संस्थाओं के पंजीकृत नाम तक अंग्रेज़ी में है। न हिंदी जानने की ज़रूरत है और न ही किसी हिंदी जानने वाले को जानने की, क्योंकि ऐसी दुकानों का उद्देश्य हिंदी का उत्थान कभी था ही नहीं। हिंदी के नाम पर चलने वाली संस्थाओं के अक्षम कर्ता-धर्ताओं को हटाकर सक्षम लोगों को ज़िम्मेदारी दी जानी चाहिये और उनके कार्यकलापों की कड़ी निगरानी की जानी चाहिये।
भोजपुरी, मैथिली को भाषा का दर्ज़ा देने का विरोध करने वाले कभी यह नहीं सोचते कि फिर उर्दू को किस आधार पर अलग भाषा कहा जा सकता है? यदि लिपि मात्र से भाषा बदलती होती तो पाकिस्तान और भारत की पंजाबी भी अलग-अलग भाषाएँ होनी चाहिये थीं। बल्कि हिंदी खुद ही नागरी के अलावा, मोड़ी, कायथी और रोमन तक में लिखी जाती रही है, वह तो वही रही। तमिळों के एक संकुचित वर्ग के हिंदी विरोध पर क्रुद्ध होने वाले हिंदी भाषियों को यह भी अवश्य सोचना चाहिये कि हममें से कितनों ने तमिळ, तुलु या मणिपुरी सीखने का प्रयास किया या अपने बच्चों को उनकी कक्षा में भेजा? बात यहीं नहीं ठहरती। दूसरी भारतीय भाषा सीखना तो दूर, कितने ही हिंदीभाषियों ने कभी अपनी हिंदी सुधारने तक की कोशिश नहीं की।
कई हिंदीसेवक सर्वस्वीकृति के लिये हिंदी को सरल करने की बात कहते हैं। यह बात एकदम निरर्थक है क्योंकि भाषा की सरलता का कोई निश्चित पैमाना नहीं है। जितना आपको पता है वह सरल है, जिसके लिये प्रयास करना है वह कठिन है। अंग्रेज़ी-उर्दू के कठिन शब्दों को जानने के लिये भरसक प्रयत्न करने वाले जब हिंदी की शुद्धता पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं तो यह हिंदी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का अभाव ही दर्शाता है। आप भाषा को जितना कमज़ोर करते रहेंगे, वह उतना ही जनाधार खोती जायेगी। अंग्रेज़ी कमज़ोर होती तो संसार पर राज नहीं करती। उसकी शक्ति से हमें सबक लेना चाहिये कि वह कविता-लघुकथा तक सीमित न रहकर किसी भी विशिष्ट वैज्ञानिक वाङ्मय लिखने की क्षमता रखती है। हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ानी है तो उसे सक्षम बनाना ही होगा।
हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को विवश करने में एक ऐसी विशिष्ट भारतीय परिस्थिति की प्रमुख भूमिका रही है जिस पर शर्म करने के बजाय हम सामान्यतः गर्व करते दिखते हैं क्योंकि हम उसे सतही रूप से देख रहे होते हैं। और वह है भारतीय शिक्षा व्यवस्था का असंतुलन। संसार भर के विकसित देशों में 10-12 वर्ष की मूलभूत शिक्षा प्रशासन का कर्तव्य और जनता का अधिकार है, निशुल्क है, और शत-प्रतिशत है। ऐसे बहुत से देशों में विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा सामान्यतः मँहगी है। भारत जैसे देश में जहाँ उच्च शिक्षा को इतनी सब्सिडी दी जाती है कि कई लोग समय बिताने के लिये भी विश्वविद्यालय में नज़र आते हैं (इसे कटाक्ष की तरह ही लें), वहीं प्राथमिक से लेकर उच्चतर-माध्यमिक शिक्षा को उसकी जायज़ प्राथमिकता नहीं मिलती। इस कारण एक बड़ा वर्ग शिक्षा के मूलाधिकार से वंचित रह जाता है। हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं का दुर्भाग्य यह है कि शिक्षा के अधिकार से वंचित यह वर्ग अंग्रेज़ी का नहीं बल्कि भारतीय भाषाओं का वक्ता और प्रवक्ता है, जबकि उच्च-शिक्षा की भीड़ के जीवन में हिंदी के लिये अपेक्षा कम उपेक्षा अधिक है। यदि आज तक आप भारत द्वारा एमबीबीएस-एमटैक-एमबीए-पीएचडी के थोक-उत्पादन करने पर गर्व करते रहे हैं तो अब एक बार तनिक रुककर इस असंतुलन पर ध्यान दीजिये। यदि वंचित वर्ग को शिक्षा मिलती तो हिंदी सक्षम होती क्योंकि उच्च-शिक्षा में उनकी उपस्थिति, वहाँ हिंदी की कमी की समस्या को उजागर करने में सहायक सिद्ध होती और अंततः हिंदी को व्यापक बनाती।
अंत में सम्पर्क भाषा की बात। वर्तमान काल में हिंदी भारत की ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप की सम्पर्क भाषा है। अमेरिका में न केवल भारतीय बल्कि नेपाली, भूटानी, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी और अफ़गान नागरिक भी हिंदी में वार्तालाप करते हैं। हिंदी को सम्पर्क भाषा की सीमा से आगे बढ़कर अपना अधिकार और अपनी शक्ति पहचानने और पाने की आवश्यकता है। और इसे सम्भव बनाने के लिये हम हिंदीभाषियों को अभी बहुत काम करना है।

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