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हिन्दी और आंचलिक भाषाओं की सच्चाइ
01-Mar-2016 12:00 AM 4819     

भाषा वस्तुतः किसी भूभाग के जन की भावनाओं, जन की मनोदशा, जन के मूलभूत आचरण, जन की उच्चारण क्षमता तथा उच्चारण ग्राह्रता के सापेक्ष संप्रेषण की कुल शाब्दिक सुव्यवस्था का परिपालन हुआ करती है। इस परिप्रेक्ष्य में हिन्दी की वर्तमान दशा को समझना आवश्यक है। इसी समझ के आधार पर हिन्दी के इतिहास के साथ-साथ इसके भूभाग की अन्यान्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी समझना होगा, जिनके संस्कार इस भूभाग के आमजन की संप्रेषणीयता के क्रम में महती भूमिका निभाते हैं। इनके संस्कारों से हिन्दी भी प्राणवान होती रही है। परन्तु, इस निर्विवाद सत्य को झुठलाने की कुचेष्टाएँ हुई हैं। या, इस तथ्य को तोड़ते-मरोड़ते हुए मनमने ढंग से स्वीकारने और नकारने का प्रयास होता रहा है। उस हिसाब से देखा जाय तो श्याम सखा श्याम की उपर्युक्त उक्ति उन सभी क्षेत्रीय अथवा आंचलिक भाषाओं के लिए भी उतना ही सत्य है, जितना कि हिन्दी के लिए। यदि हिन्दी भूभाग की अन्यान्य आंचलिक भाषायें सबल न हुर्इं, तो इसका सीधा असर हिन्दी और इसके स्वरूप पर ही पड़ेगा। स्पष्ट कर दूँ कि जो विद्वान हिन्दी को देश के विशिष्ट भूभाग की समृद्ध भाषा के रूप में देखना चाहते हैं, किन्तु आंचलिक भाषाओं के प्रति उनके मन में अन्यमनस्कता व्याप्त है, तो यह उनकी संकुचित दृष्टि का ही द्योतक है। ऐसे हिन्दी-हितैषी विद्वान हिन्दी के होने का अर्थ ही नहीं जानते हैं। या, भले ही नासमझी में, किन्तु इसकी अस्मिता को समझ पाने में भारी भूल कर रहे हैं।
अंग्रेज़ी का प्रशासनिक महत्त्व ही भारत में उसके विस्तार का कारण बना था। अंग्रेज़ी भारतीय आंचलिक भाषाओं से रस नहीं पाती थी, अपितु यह उनके कन्धों पर बलात लदी हुई थी या लादी गयी थी। अंग्रेज़ी की कृत्रिम अनिवार्यता (आज के संदर्भ में भी यह उतना ही सत्य है) को महत्त्व दिया गया था और इस कारण आमजन द्वारा जो-जो आरोप अंग्रेज़ी पर लगाये जाते थे, जाने-अनजाने कमोबेश वही आरोप आज हिन्दी पर भी लगने लगे हैं। यह सारा कुछ भले ही किसी षडयंत्र का हिस्सा हो न हो, लेकिन हिन्दी भाषा के हितैषियों की अतिवादी सोच ही हिन्दी पर ऐसे दोषारोपणों का कारण बनी है। इनका लाभ उठा कर, आज स्थिति यह है, कि हिन्दी के सामान्य प्रयोगकर्ता एक वर्ग द्वारा साम्राज्यवाद के पक्षधर घोषित किये जाने लगे हैं। या, कई बिन्दुओं पर आमजन जो हिन्दी-हितैषी है, उसे ऐसा मतावलम्बी साबित किया जा रहा है, जिसकी सोच संकुचित हुआ करती है। अथवा साम्प्रदायिक है! स्थिति यह है कि केवल अ-हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही नहीं, अब मान्य हिन्दी-भाषी क्षेत्रों में भी हिन्दी के विरोध की सुगबुगाहट बढ़ने लगी है। इस विरोध के कारणों पर यदि संतुलित ढंग से मनन-मंथन न किया गया, तो भारतीय भूभाग में मुख्यभाषा के तौर पर सर्वमान्य हुई हिन्दी का महती नुकसान होना तय है। इन सबके पीछे के कारण जाने ही जाने चाहिये। कि, हिन्दी की यह स्थिति वस्तुतः हुई क्यों है? हिन्दी को क्यों उसके भूभाग की अन्यान्य आंचलिक भाषाओं का हंता माना जा रहा है? जबकि सच्चाई यह है कि कोई भाषा यदि काल-कलवित होती है, तो कोई अन्य भाषा उसके लिए उतना बड़ा कारण नहीं हुआ करती, जितना कि कलवित भाषा की अपनी विसंगतियाँ हुआ करती हैं। ऐसी विसंगतियों में, आज के माहौल में उक्त भाषा के बने रहने की नाकाबलियत और अर्थोपार्जन हेतु प्रयोगकर्ताओं के लिए सार्थक अवसर मुहैया करा पाने में अक्षमता प्रमुख हुआ करती हैं। अन्यथा, किसी भाषा पर अन्य भाषाओं को खा जानेे का दोषारोपण अक्सर राजनीतिक ही हुआ करता है। हिन्दी को वर्चस्ववादी बताकर उसके प्रति आंचलिक भाषा-भाषियों के मन में यदि सन्देह पैदा किया जा रहा है, तो हिन्दी-हितैषियों को सचेत होना ही होगा कि वस्तुतः वो कौन सी शक्तियाँ हैं जो भारतीय भूभाग की पैदाइश हिन्दी को अंग्रेज़ी के समकक्ष रखने या मनवाने पर आमादा है? भारतीय परिवेश के एक बड़े भाग में हिन्दी को अपने समानान्तर बैठा हुआ देखने को बाध्य हुई अंग्रेज़ी कहीं पिछले दरवाज़े से तो हिन्दी पर आक्रमण का वातावरण नहीं बनवा रही है? इस वातावरण के तारी हो जाने में जाने-अनजाने सहयोगी होते हैं वो हठी हिन्दी-हितैषी जो भाषा इकाइयों की अस्मिता और प्रयोग के नाम पर अतिवादी रूप अख़्तियार किये बैठे रहते हैं।
वस्तुतः, हिन्दी की मुख्यभाषा के रूप में स्थापना के प्रारम्भिक दौर से, यानि संविधान सभा में भाषायी बहस के समय से ही, ऐसे-ऐसे हठी और क्लिष्ट मानसिकता के घोर सैद्धांतिक लोग सामने आते रहे हैं, जो हिन्दी को तथाकथित राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिस्थापित करने के नाम पर हिन्दी-क्षेत्र की आंचलिक किन्तु प्राचीन और कई अर्थों में समृद्ध भाषाओं की कृत्रिम दरिद्रता का ढिंढोरा पीटने में अधिक रुचि लेते रहे हैं। उनकी रुचि न तो इन आंचलिक भाषाओं के वज़ूद और इतिहास का पता करने में रही है, न ही ढंग से उन्होंने इन क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य को खँगाला ही है। जो कुछ काम ग्रियर्सन जैसे विद्वान कर भी गये हैं, उसके आगे इस क्षेत्र में किसी ने कोई महती योगदान किया हो, ऐसा कम ही हुआ है। यही नहीं, ऐसे हठी और अहंवादी हिन्दी-हितैषियों ने, आश्चर्य है, कि अपने प्रयासों में कायदे से संविधान में राजभाषा से सम्बन्धित परिचर्चाओं के रेकॉर्डों को भी उलटने-पलटने की कोशिश नहीं की है। या जान-बूझ कर सत्य को आमजन से छुपाये रखा है। वस्तुतः, संविधान सभा की किसी कार्रवाई में हिन्दी को "राष्ट्रभाषा' के तौर पर प्रस्तावित किया ही नहीं गया है। अलबत्ता, पुरुषोत्तमदास टण्डन या राजाजी जैसे कुछ वरिष्ठजन अवश्य हिन्दी के लिए "राष्ट्रभाषा' शब्द पर आपत्ति प्रकट करने वालों के प्रति असहज रहे थे। जब तक गाँधीजी रहे, व्यावहारिक बोलचाल में उनका हिन्दी के प्रति आग्रह बना रहा। अन्यथा, संविधान सभा के सदस्यों ने हिन्दी के लिए "राष्ट्रभाषा' शब्द को "ेविशेषण' की तरह अपनाने के बावज़ूद इस शब्द को संविधान के अनुच्छेद 343 में जुड़वाने में कोई तत्परता नहीं दिखायी। यह एक ऐसा सत्य है, जो "हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है' की घोषणा को मात्र छलावा साबित करने के लिए पर्याप्त है। यह एक सूत्री वाक्य अपने आप में बहुत बड़ा भ्रम है। साथ ही साथ, हिन्दी को भारत की मुख्यभाषा के तौर मनवाने वालों की अतिवादी सोच ने भावनात्मक ही नहीं, कई भयंकर तथ्यात्मक भूलें भी की हैं। कहा जाये तो, इस हम्माम में बहुत सारे नामधारी हिन्दीवादी नंगे नज़र आते हैं।
फिर, हिन्दी प्रदेश की कई समृद्ध आंचलिक भाषाओं को हिन्दी की सहयोगी बोलियों के रूप में परिभाषित कर एक ऐसा कृत्रिम वातावरण बनाया गया, जिसके कारण हिन्दी भाषा हेतु बनने वाली सर्वमान्यता का मार्ग स्वयमेव अवरुद्ध होने लगा है। इस संदर्भ में किसी मुख्यभाषा को लेकर "रक्षा में हत्या' का इससे बढ़िया उदाहरण और किसी देश में नहीं मिलता। आश्चर्य तो तब होता है, जब कुछ मुख्य तथ्य सामने आते हैं। देश में भाषा को लेकर ही दुविधा नहीं है। बल्कि देश के "पुकार नाम', देश के "गान या गीत', देश में "प्रशासनिक संचालन-व्यवस्था' तक में दुविधा की स्थिति दिखती है। संविधान सभा में भाषा सम्बन्धी अन्यान्य चर्चाओं में जिस अंग्रेज़ी के हटाने की बात होती रही, जिस अंग्रेज़ी के विरोध में उस समय के कई-कई अ-हिन्दी भाषा-भाषी नेतागण भी उत्साहित दिखते थे, वह अंग्रेज़ी तो संपर्क भाषा के रूप में बनायी रखी गयी, हिन्दी के वज़ूद को ही हास्यास्पद बना दिया गया! राजभाषा अधिनियम यानी ग्र्ढढत्ड़त्ठ्ठथ् ख्र्ठ्ठदढ़द्वठ्ठढ़ड्ढद्म ॠड़द्य 1963, किसी "राष्ट्रभाषा' की बात ही नहीं करता, बल्कि कार्यालयीन अन्य कई भाषाओं की चर्चा करता है। उन सभी भाषाओं में से एक हिन्दी भी है। यानी संविधान सभा की कुल चर्चाओं का परिणाम यही हुआ कि हिन्दी अन्य मान्य भाषाओं के साथ-साथ "राज-काज की भाषा' मात्र हो कर रह गयी। इसी "राज-काज की भाषा' को बोलचाल में "राजभाषा' की संज्ञा दे दी गयी। कहने का तात्पर्य है, कि वह अधिनियम मात्र हिन्दी को ही "राजभाषा' के रूप में स्थापित कराने का अधिनियम था ही नहीं, बल्कि उस अधिनियम का शीर्षक ग्र्ढढत्ड़त्ठ्ठथ् ख्र्ठ्ठदढ़द्वठ्ठढ़ड्ढद्म, अर्थात कार्यालयीन भाषाएँँ, प्रयुक्त हुआ था। हिन्दी प्रेमी जनता की भावनाओं के साथ इससे बड़ा खिलवाड़ और ऐसा घृणित धोखा और कुछ हो सकता है क्या? बहुसंख्य जनता आज तक इस भावनात्मक भ्रम में जी रही है कि हिन्दी उसकी राष्ट्रभाषा या राजभाषा है। उस पर तुर्रा ये कि, हिन्दी की समृद्धि तथा इसके विकास के नाम पर एक लम्बे समय तक राजभाषा परिषद की ओर से अंग्रेज़ी के मानक शब्दों की जगह हिन्दी के मानक शब्दों को गढ़ने की क़वायद चली है। उस क़वायद की परिणति यह हुई है कि अंग्रेजी शब्दों के असंवेदनशील कृत्रिम अनुवाद बनाये और थोपे गये हैं! इन सबसे किसका भला हुआ है? हिन्दी का तो कत्तई नहीं हुआ है।
जहाँ तक हिन्दी के भाषायी विकास के विभिन्न चरणों को जानने का प्रश्न है, तो यह इस परिप्रेक्ष्य में जानना उचित होगा कि क्या वे चरण ठीक वही हैं, जो हिन्दी क्षेत्र में पहले से विद्यमान विभिन्न आंचलिक भाषाओं के रहे हैं? क्या हिन्दी तथा पूर्वांचल की आंचलिक भाषाओं की पृष्ठभूमि समान है? आश्चर्य होगा कि इन दोनों प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं। जहाँ हिन्दी का उद्भव शौरसेनी और आगे कौरवी भाषाओं से हुआ मान्य है, वहीं पूर्वांचल की सभी भाषाओं यथा, अवधी, भोजपुरी, भोजपुरी की विभिन्न उपत्यकाएँ, मगही या मैथिली आदि भाषाओं का विकास प्राच्य भाषा से प्रसूत मागधी तथा अद्र्धमागधी से माना जाता है। अर्थात अवधी या भोजपुरी या मगही या मैथिली आदि को जिस तरह से हिन्दी की सहयोगी बोलियाँ कहकर प्रचारित किया गया, वह अपने आप में एक और शातिराना भ्रम है, जिसमें इस क्षेत्र के लोगों को वर्षों बलात उलझाये रखा गया है।
पूर्वांचल की प्राचीन क्षेत्रीय भाषाओं और भाषा के तौर हिन्दी के बीच शब्दों का आदान-प्रदान एक बात है और भाषागत मूल विन्यास में साम्य होना या न होना एकदम से दूसरी बात है। हिन्दी द्वारा भोजपुरी या अवधी या मैथिली या बुन्देली भाषा के शब्दों का अपनाया जाना बहुत बाद की घटनाएँ हैं और इसके अपने कारण हैं। हिन्दीभाषा के आधुनिक काल में भाषागत पुरज़ोर विकास संभव ही नहीं होता, यदि अवधी या भोजपुरी बोलने वाले विद्वान इस यज्ञ सरीखे कार्य के लिए स्वयं को उत्सर्ग न करते। ये विद्वान, जैसा कि समझ में आने वाली बात है, सायास या अनायास अपने साथ आंचलिक भाषाओं से शब्द ले कर आये। हिन्दी चूँकि एक जीवंत भाषा है, अतः वे आयातित शब्द हिन्दी के शब्दकोश में बग़ैर किसी हुज्जत के स्थान पाते गये। हिन्दी का विकास हो, इससे किसी को क्या ऐतराज़ हो सकता है? ऐतराज़ है भी नहीं। किन्तु, एक बड़े भूभाग की समृद्ध आंचलिक भाषाओं को बलात हिन्दी की बोलियाँ घोषित कर उनके वज़ूद को ही ओछा प्रमाणित कर उनसे नज़रें फेर ली जाय, तो यह किस श्रेणी की सोच है? अवश्य ही, विद्वानों ने अपने इस तरह के व्यवहार की बदौलत आने वाले दिनों के दुष्परिणामों पर सोचा ही नहीं था। यही कारण है कि आज तथाकथित हिन्दीभाषी भूभाग में ही आंचलिक भाषाओं की मान्यताओं को लेकर आंदोलन प्रारम्भ हो गये हैं। इन ज़मीनी आंदोलनों के प्रति उत्साह एवं उत्कट भाव की हालत यह है, कि इन क्षेत्रों के भाषा-भाषियों को भावनात्मक स्तर पर सरलता से बहकाया जा सकता है। इस क्रम में ज्वलंत उदाहरण भी परिलक्षित हैं, अवधी या भोजपुरी या अन्य आंचलिक भाषाओं में धर्म विशेष के साहित्य अचानक उपलब्ध होने लगते हैं। वैसे यह आज उठाया गया कोई कदम नहीं है। "हिन्दी, उर्दू और खड़ी बोली की ज़मीन' में हिन्दुस्तानी अकादमी, इलाहाबाद के रविनन्दन सिंह लिखते हैं- "फोर्ट विलियम कॉलेज ने हिन्दी गद्य लेखन के क्षेत्र में जो काम किया उसका लाभ इसाई मिशनरियों ने उठाया। उन्होंने महसूस किया कि उत्तर भारत में ब्राजभाषा से काम न चलेगा, न ही उर्दू से। उन्होंने सरल खड़ी बोली को अपना माध्यम बनाया।' यही धार्मिक संस्थाएँ अब अवधी, भोजपुरी या बुन्देली जैसी भाषाओं का प्रयोग कर रही हैं। क्या हिन्दी के समानान्तर आंचलिक भाषा-भाषियों की भावनाओं की तुष्टि ऐसे ही प्रयासों से होगी? भाषा-शुभचिंतक क्या ये सोच कर आ?ास्त होते रहेंगे कि, चलो ज़मीनी स्तर पर इसी बहाने भाषा का प्रचार तो हो रहा है!
इस भाषायी प्रकरण में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि हिन्दी अपने मूल क्षेत्र (दिल्ली से सटा पश्चिमी उत्तरप्रदेश) से बाहर आज तक किसी क्षेत्र की मूलभाषा नहीं बन पायी है। कुछ शहरी पॉकेट को छोड़ दें तो यह बन भी नहीं सकती। इन अर्थों में, "हिन्दी हमारी मातृभाषा है' जैसा सूत्रवाक्य भी ज़मीनी सच्चाई को झुठलाता हुआ है। भोजपुरी, भोजपुरी की उपत्यकाएँ, अवधी, मगही, मैथिली, बुन्देली, राजस्थानी, भाटी आदि भाषाएँ ही नैसर्गिक मातृभाषा हैं। हिन्दी एकभाषा के तौर पर किसी के जीवन में अमूमन उसके कैशोर्यावस्था में प्रवेश करती है। मातृभाषा और व्यवहार भाषा में जब अंतर ही पता न हो, तो हम बनावटी भावनाओं की अतिरेकी नौका पर सवार संप्रेषणीयता के सागर में हम कितनी लम्बी दूरी तय कर सकते हैं?
हिन्दी भूभाग में विद्यमान आंचलिक भाषाएँ हिन्दी को सामथ्र्य देती हैंं जैसे वाक्य आंचलिक भाषाओं की विवशता का प्रमाण बन कर समक्ष न आयें, कि उनका अपना कोई व्याकरण व्यवहार ही नहीं है। निस्संदेह, हिन्दी भारत की सहज स्वीकार्य व्यवहार भाषा हो चली है। परन्तु, इसकी पहचान, तदनुरूप मान्यता किसी भ्रम की नींव पर आधारित न हो। अन्यथा ऐसे असहज एवं कमज़ोर नीव से ख़ामियाज़ा हर हाल में हिन्दी को ही उठाना होगा। आंचलिक भाषाओं का न केवल शब्द-भण्डार हिन्दी के शब्द-भण्डार से अलग एवं विपुल है, बल्कि कई अर्थों में चमत्कारी भी है! इसका लाभ यदि हिन्दी को मिलता है तो यह भाषा के तौर पर हिन्दी के लचीलेपन का ही द्योतक है। बिना उदार शब्द-संचरण के हिन्दी ही कमज़ोर होगी। यही हाल साहित्य का है। मैथिली, भोजपुरी और अवधी जैसी भाषाओं का साहित्य हिन्दी-साहित्य की आधारभूमि है। फिर, आंचलिक भाषाओं का व्याकरण भी हिन्दी के व्याकरण, जो कि कौरवी भाषा के व्याकरण पर आधारित है, से भिन्न है। होना ही है क्योंकि दोनों तरह की भाषाओं की पृष्ठभूमि भिन्न है। इस तथ्य का उचित सम्मान हिन्दी विचारक अवश्य करें। सर्वोपरि, इस तथ्य को स्वीकार कर लेने में क्या उज्ऱ कि हिन्दी किसी राज्य की भाषा है ही नहीं, जो कि वास्तविकता भी है। हिन्दी दिल्ली के आसपास सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा में ही मूल रूप से बोली जाती है। हिन्दी इसी क्षेत्र की मूलभाषा है भी। अन्य भूभाग के लिए तो यह अपनायी गयी भाषा है। यदि हिन्दी राज्य-निर्पेक्ष भाषा घोषित हो गयी तो, अ-हिन्दी भाषी राज्यों द्वारा हर समय मचाया जाता शोर कि "हिन्दी उन पर लादी जा रही है' का शमन होगा। अ-हिन्दी भाषी राज्यों की चिन्ता उनकी मूलभाषा की अस्मिता एवं उसकी अक्षुण्ण प्रतीत पहचान है। इसके प्रति वे अत्यंत संवेदनशील हैं। फिर भी, उन्हें अंग्रेज़ी से चिढ़ नहीं है, किन्तु हिन्दी से है। कारण कि उनकी दृष्टि में हिन्दी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, बिहार आदि जैसे उत्तर भारतीय राज्यों की भाषा है, जिसको उनके राज्य की भाषा को गौण कर उन पर लादी जाती है। यदि समृद्ध आंचलिक भाषाओं को राज्यों की भाषा का दर्ज़ा मिल जाय, तो यह समस्या ही समाप्त हो जाय कि हिन्दी के नाम पर किसी अन्य राज्य की भाषा लादी जा रही है। फिर तो, जैसे अंग्रेज़ी, वैसे हिन्दी! हिन्दी का विरोध करता कोई न दिखेगा। हिन्दी को "संपर्क भाषा' के रूप में मान्यता मिलना तथा समूचे देश में उसका सहज रूप से व्यवह्मत होना, हिन्दी की तार्किक प्रतिष्ठा का भी कारण होगा। जिस हिन्दी को आजतक "राष्ट्रभाषा' और "राजभाषा' जैसी संज्ञाओं से "चिढ़ाया' जाता रहा है, उसकी ताकत आज भी प्रशासन प्रदत्त सहुलियतें नहीं है।
आंचलिक भाषाओं से हिन्दी का सहयोग बना ही तब रहेगा, जब हिन्दी उनसे बराबरी का व्यवहार करे। हिन्दी क्षेत्र की आंचलिक भाषाएँ और हिन्दी परस्पर शत्रु नहीं हैं। परन्तु, यह भी सच है, कि उन्हें एक दूसरे के विरुद्ध बलात खड़ा किया गया है, ताकि अंग्रेज़ी का वर्चस्व प्रासंगिक बना रहे। यह एक महाभारी षडयंत्र है। किन्तु यह भी सच है, कि ग्रामीण अंचलों और शहरी क्षेत्रों में पुख़्ता जड़ों वाली अखिल भारतीय सम्पर्क भाषा के रूप में हिंदी की ग्राह्रता में आशातीत सुधार हुआ है। एक-दो आग्रही अ-हिन्दी भाषी राज्यों को छोड़ दिया जाय तो आज हिन्दी अंग्रेज़ी को हर राज्य में सार्थक चुनौती देने की स्थिति में है। हिन्दी की आज की स्थिति को देखें, तो एक भाषा के तौर पर इसका सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक और वैचारिक विन्यास पिछले पाँच दशकों में बहुत बदला है। आज की हिंदी विविध उद्देश्यों को पूरा कर सकने वाली और समाज के विभिन्न तबकों की बौद्धिक व रचनात्मक आवश्यकताओं को अभिव्यक्त कर सकने वाली एक संभावनाशील भाषा मात्र नहीं रह गयी है, बल्कि यह एक स्थापित भाषा हो चुकी है। अब आवश्यकता है कि और तार्किक ढंग से हिन्दी में वैज्ञानिक तथा कानूनी शब्दावलियाँ विकसित की जायें। शिक्षण-संस्थानों में हिन्दी माध्यम से विज्ञान तथा समाज शास्त्र को पढ़ने-पढ़ाने वालों की संख्या बढ़े। तात्पर्य यह है कि हिन्दी के कन्धों पर मात्र साहित्य का भार न हो, बल्कि तकनीक और विज्ञान के विषयों को भी हिन्दी में सहजता से पढ़ा और पढ़ाया जा सके। बिना अँग्रेजी बोले जब चीन, जापान, ब्रिाटेन को छोड़ पूरा यूरोप और रूस आधुनिक हो सकते हैं, तो फिर, भारत क्यों पिछड़ने लगता है? बुद्धिजीवी केवल अँग्रेजी के माध्यम से ही श्रेष्ठ विचार शाब्दिक और साझा कर सकते हैं, जैसी भाषायी मक्कारी अवश्य बन्द हो।
परन्तु, यह जानना आवश्यक है, कि क्या ऐसी कोई स्वीकार्यता हिन्दी के अपने प्रभामण्डल के कारण है, या पारिस्थिक उपयोगिता के कारण है? क्योंकि हिन्दी को अचानक राज्य या प्रशासन से कोई सहयोग मिला हो ऐसा नहीं हुआ है। वस्तुतः हिन्दी की दशा में इस सकारात्मक परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण "बाज़ार' है। आज का बाज़ार यह जानता है कि इस देश में अपनी पैठ बनाने के लिए भारतीय भाषाओं का महत्त्व अंग्रेज़ी से कहीं अधिक है। ग्रामीण बाज़ार जो कि नयी संभावनाओं और पूरी धमक के साथ अपनी उपस्थिति बना रहा है, विगत दो दशकों में इसने "बाज़ार' के सारे पुराने मानक तथा समीकरण ध्वस्त कर दिये हैं। इस नये वातावरण में आमजन की एक क्रेता के तौर पर महत्ता बढ़ी है। इन परिस्थितियों में बिना आमजन को शामिल किये "बाज़ार' विस्तार नहीं कर सकता। यहीं वह कारण है, कि बाज़ार ही आंचलिक भाषाओं की अस्मिता को सचेष्ट होने के लिए खाद-पानी दे रहा है। अच्छा या बुरा, परन्तु, आज की सच्चाई यही है। इस संदर्भ में यह स्वीकारना ही होगा कि हिन्दी को ठोस धरातल पर अपने पाँव मज़बूत बनाये हुए बढ़ने की आवश्यकता है। समस्त वायवीय एवं अन्यथा तथ्यों से हिन्दी के अतिवादी चिन्तक छुटकारा पा लें, उतना ही अच्छा। इसके बाद यदि हिन्दी को नया परिचय और नयी पहचान मिल रही है, तो इसका हर तरह से स्वागत होना चाहिये। हिन्दी को "व्यवहार भाषा' अथवा "संपर्क भाषा' के तौर स्वीकारा जाय, जो अभी तक अंग्रेज़ी समझी-जानी जाती रही है। क्यों न हिन्दी तथा अ-हिन्दी भाषी राज्य के लोग अंग्रेज़ी छोड़ आपस में हिन्दी में संवाद करें? यदि हिन्दी को "संपर्क भाषा' के रूप में अपना लिया गया, तो सारी समस्याएँ ही समाप्त हो जायेंगी

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