ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिमाचल में बरसात का रोमांच
01-Jul-2016 12:00 AM 5452     

देश के मैदानी इलाकों में भले ही बरसात का मौसम आफत लेकर आता हो लेकिन ऊँचे पहाड़ों पर यही बरसात कुदरत की खूबसूरत नैमतें लेकर आती है। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाये तो बरसात पहाड़ों को इस तरह सजाती संवारती है की सदैव पहाड़ों पर रहने वाले लोग भी इस सौन्दर्य पर फ़िदा हो जाते हैं। बच्चे, बूढ़े, नवयुवक, नवयुवतियां सब के सब झूम उठते हैं। नाचते गाते आनंदित होते सभी जवां बूढ़े दिल गुनगुनाते गाते नजर आते हैं जो ह्मदय के आनंदित होने का प्रमाण होता है। पहाड़ी ह्मदयों का यूँ आनंदित हो कर झूम उठना अनायास नहीं है, बरसात का मौसम ही ऐसा होता है पहाड़ों में कि इंसान के क्या पशाु-पक्षी, जीव-जंतु सब के सब हँसते गाते झूमते नजर आते हैं। नदियों में उमड़ता यौवन पेड़-पौधों के तन पर हरिताम्बर उस पर लाल-पीले फूलों के आभूषण मानो नवयुवक-नवयुवतियां किसी उत्सव में सज धज कर झूम-झूम कर नाच गा रहे हों। ऐसा नयनाभिराम दृशय भला किसे आनंदित नहीं करेगा।
हिमाचल में बरसात के मौसम में पग-पग पर मनोहारी दृशय दृष्टिगोचर होते हैं। दरअसल बरसात के दिनों में हिमाचल के ग्रामीण इलाकों में फसल को बिजने, निराई-गुड़ाई करने के बाद पर्याप्त फुर्सत के क्षण होते हैं। इन्हीं फुर्सत के क्षणों में जवां दिलों में दबी प्रेम की चिंगारी को मिल जाती है थोड़ी मौसम की हवा। बस फिर क्या सभी जवान दिल बाग़ बाग़ हो उठते हैं। ऐसे जवां दिलों के मचलने, बहलने और बहकने के लिए पर्याप्त स्पेस मिल जाता है फसलों की रखवाली के समय। मकई की आदमकद झूमती फसल के छोरों पर बने होड़ों (फसल की रखवाली के लिए बनाये गए अस्थाई शोड) में बतियाते, खिलखिलाते, मस्ती करते कई-कई दिल फसलों संग झूम उठते हैं। रोमांस के इन तरंगित कर देने वाले पलों को केवल अनुभव किया जा सकता है, क्योंकि आहट पाते ही वे भाग खड़े होते हैं अपनी अपनी ड्यूटी पर। आप कुदरती रंग में रंगे इन दुर्लभ पलों को इसमें स्वयं शाामिल हो कर ही देख सकते हैं। घास फूस की छत वाले लकड़ी से बने बंकर नुमा इन होड़ों में धरती से पर्याप्त ऊंचाई पर होते हैं अस्थाई शायन आसन जिन में थकान होने पर कमर सीधी की जा सके या फिर रात के समय जानवरों का डर हो तो सुरक्षित खुली आँख रख कर सोया या लेटा जा सके।
बरसात के ही दिनों का एक और मनोहारी दृशय होता है चरागाहों में पशाु चराते निशछल, निष्कपट और खूबसूरत चरवाहे। चरागाहों में मुहब्बत परवान चढ़ने के किस्से भगवान् कृष्ण से समय से चले आ रहे हैं। पहाड़ी प्रदेशाों के ग्रामीण आंचल में पढाई-लिखाई पूरी करने के बाद नौकरी लगने से पहले और शाादी-विवाह के बीच के अंतराल में युवक युवतियों के पास एक मस्त स्पेस होता है, जिसका सदुपयोग वे करते हैं घर के कार्य में हाथ बंटाना और घर में सबसे जरूरी और कठिन कार्य होता है पशाुओं की देखभाल। इस कार्य को कोई बड़ा-बूढ़ा मजबूरी में ही करता है। इस कार्य को ख़ुशाी ख़ुशाी करते हैं ये युवक-युवतियां। ये सुबह का नाशता बगैरह करने के बाद अपने पशाुओं को लेकर निकल जाते हैं घर से दूर सामूहिक या शाामलात (सरकारी) चरागाहों में जहाँ पशाु घास चरते हैं और युवक-युवतियां अपने मित्रों के संग खेलते, बतियाते, हँसते-गाते मस्ती करते हैं। ये हँसना खेलना, गुनगुनाना कब गीतों में बदल जाता है पता ही नहीं चलता।
युवक बांसुरी पर मधुर, मनमोहक तान छेड़ते हैं जो लड़की के ह्मदय को तरंगित कर देती है। घर से दूर प्रकृति की हरी-भरी गोद में नदी, नालों के शाोर के बीच से उठती बांसुरी की स्वर लहरियां पर्वतों से टकरा कर गूंजती हैं तो एक दो नहीं कई-कई गोपियाँ कान्हा की दीवानी हो जाती हैं। मधुर धुन का पीछा करती हुई हिम्मत वाली लड़कियां धुन का जवाब अपनी मधुर आवाज में किसी लोकगीत या फिर प्रेम गीत गंगी से देती हैं।
हाँ दूरियां मिटाने में या यूँ कहें एकाकार होने में शाहरों के अपेक्षा बहुत अधिक समय लगता है। कृष्ण-गोपियों की ये लीला महीनों और कई बार तो सालों चलती है। कई बार इतनी देर हो जाती है कि हाथ खाली के खाली रह जाते हैं। दोनों में से किसी एक या फिर दोनों का ही विवाह माँ-बाप की मर्जी पर हो जाता है, लेकिन मुहब्बत को भला कौन मार पाया है। वह तो शाा·ात है और रहेगी। ऐसे प्रसंगों में फिर साल भर से प्रतीक्षा रहती है बरसात-चौमासे की।
पहाड़ों में आज भी पहली बरसात यानि चौमासे में सास-बहुएं एक स्थान पर नहीं रहती हैं। पूरे देशा में भी सावन को इसीलिए काला महिना कहा जाता है। ये काला होता है उन नव विवाहितों के लिए जो अपनी मर्जी से विवाह करते हैं या जिनका कोई प्रेम प्रसंग न हो या हो भी तो वे उसे भूल कर अपने नए जीवन की शाुरुआत कर चुके हों। लेकिन यही काला महिना उन प्रेमियों के लिए सुनहरा महिना हो जाता है जो एक दूजे को देखने, सुनने, बतियाने के लिए साल भर से प्रतीक्षा रह रहे होते हैं। प्रसंग कितने भी गहरे हों लेकिन समय ऐसा मरहम है कि बड़े-बड़े जख्मों को भर देता है, लेकिन थोड़े दिन तो जख्म हरे रहते हैं। फिर धीरे-धीरे घर गृहस्थी के चक्कर में सब भूल भाल जाते हैं।
पहाड़ी जीवन में लोकगीतों का विशोष महत्व है या यूँ कहें की लोक में लोकगीतों का बहुत अधिक महत्व है वो फिर पहाड़ी लोक हो या फिर देसी। हिमाचल के मेलों, उत्सवों, विवाह-शाादियों और त्योहारों के अवसर पर नाटी, मुजरा, रासा, गंगी, साके और पुड्वा आदि अनेक लोकगीत गाने का प्रचलन है। लेकिन गंगी एक ऐसा लोकगीत है जिसे प्रेम गीत ही कहा जा सकता है। गंगी यानि माहिया जो न केवल लोक में रचा बसा है बल्कि हिंदी साहित्य में भी पद्य विधा के अन्त्रगत स्वतंत्र उपविधा के रूप में स्थापित है। माहिया पंजाब में भी बहुत लोकप्रिय है। इसमें नायक-नायिका गीतों के माध्यम से एक-दूसरे से सवाल-जवाब करते हैं। पहाड़ों में गंगी यानि माहिया को यूँ तो विवाह आदि में भी मनोरंजन के लिए गाया जाता है लेकिन बरसात के मौसम में रिमझिम फुहारों के बीच जंगल में या घसनियों में घास काटते हुए जब गंगी की स्वर लहरियां पंचम स्वर में गूंजती हैं तो चलते मुसाफिरों के पाँव थम जाते हैं।
पहाड़ी के एक ढलान पर घास काटता या पशाु चराता नायक दूसरी पहाड़ी पर या फिर छोर पर कार्य करती नायिका को सुनाते हुए यूँ गाता है और फिर दूसरे छोर से नायिका जवाब देती है। इस प्रकार ये सिलसिला कई-कई दिनों तक चलता है।
आज के भागदौड़ वाले समय में किसी के पास समय कहाँ है इन बातों के लिए लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी ये रोमांस, चुहल, छेड़छाड़ ज़िंदा है

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