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"हिडन" अमेरिका
02-Jun-2017 01:47 AM 2305     

अमेरिका का नाम सुनते ही हाई लुक्सुरिअस लाइफ स्टाइल, एडवांस मॉडर्न लोग जिनको कोई काम नहीं करना पड़ता क्योंकि सब काम मशीनों से होता है, कोई यहाँ गरीब नहीं, सब बर्गर पिज़्ज़ा जैसा मँहगा फ़ूड रोज़ खाते हैं, पार्टी मूड में ही रहते हैं, भविष्य की इनको कोई टेंशन नहीं। टेलीविजन पर अमेरिकी जीवन जिस तरह दिखाया जाता है उसमें हर कोई समृद्ध है और सुंदर घरों में रहता है। इसी वजह से लोग अमेरिकन ड्रीम बना लेते हैं। अमेरिकन ड्रीम याने दोनों पेरेंट्स कामकाजी, अच्छी अर्निंग करने वाले, एक अच्छा मॉडेस्ट हाउस, कम से कम दो कार, हर वीकेंड घूमने का प्लान - फॅमिली और फ्रेंड्स के साथ, बच्चों के बड़े प्राइवेट स्कूल में एजुकेशन, बहुत अच्छे जॉब अवसर... अधिकांश दूसरे देश के लोगों की आँखों में यही सपने तैर जाते हैं अमेरिका का नाम आते ही। पर सच्चाई का एक पहलू यह भी है कि यह ड्रीम बहुत कम लोगों के पूरे हो पाते हैं।
अमेरिका की तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि यहाँ भी गरीबी, अशिक्षा, लूट, चोरी-चकारी और भुखमरी है, जो यदा-कदा ही सामने आती है। एक तरह से दो दुनिया हैं अमेरिका में। लेकिन दूर से बस यहाँ की चकाचौंध और रंगीन दुनिया ही दिखाई देती है, बाकी वास्तविकता छुपी हुई ही रहती है। यहाँ की गरीब गांव जीवन शैली की तरफ किसी की नज़र इतनी आसानी से नहीं जाती। मीडिया का भी इसमें बड़ा हाथ है। इस तरह की खबरें दिखाई ही नहीं जाती या फिर बहुत कम ही सुनने और दिखने में आती हैं। किसी ने शायद ही कभी सोचा या देखा हो कि अमेरिका में भी ऐसे गाँव या छोटे कस्बे हैं, जिसके आसपास भी लोग रहना या जाना नहीं चाहते।
इस देश की ग़रीबी न आसानी से दिखती है और न समझ आती है। यहाँ के बड़े-बड़े विकसित शहरों का रौद-दाब इतना अधिक है कि देश का दूसरा चेहरा दिखाई नहीं देता जो इससे बिलकुल अलग है। जिसमें कितने ही अमेरिकन्स दैनिक बुनियादी जरूरतों के लिए हाथ पैर मारते रहते हैं। यहां कि 72 प्रतिशत ज़मीन ग्रामीण क्षेत्र से संबंधित है। कई छोटे कस्बे वास्तव में बहुत छोटे हैं, जहाँ बहुत कम समुदाय हैं और कुछ घरों के समूह हैं और एकमात्र दुकान, दैनिक दिनचर्या की चीज़ों के लिए। यहाँ कितने ही ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ लोग बिना घरों (होमलेस) के हैं। कितने ही लोग छोटी बड़ी बीमारियों का इलाज़ नहीं करा सकते, बच्चों की पढ़ाई-परवरिश नहीं कर पाते। कई-कई दिनों तक खाना नहीं जुटा पाते। इसी वजह से यहाँ छोटे-छोटे से लेकर बड़े अपराध भी बढ़े हुए होते हैं। इनमें से कई काउंटियों में निवासियों का कम शैक्षिक प्राप्ति और सीमित नौकरी के अवसरों के साथ संघर्ष करना पड़ता है।
वाशिंगटन और वायोमिंग की सबसे खराब काउंटी में लगभग आधे वयस्क निवासियों में एक ने ही स्नातक की डिग्री हासिल की थी। बचपन की गरीबी और अस्थिर जीवन का एक बड़ा कारण इन बच्चों के माता-पिता द्वारा प्राप्त शैक्षिक स्तर भी है, क्योंकि उच्च विद्यालय डिप्लोमा के बिना वयस्कों को सीमित नौकरी के अवसर ही मिल पाते हैं जो न के बराबर ही होते हैं और इनके जीवन संघर्ष की अधिक संभावना बना देते हैं।
ग्रामीण अमेरिका में शिक्षा की उन्नति के साथ ही, न्यूनतम मजदूरी के लिए बेरोजगारी, कम कमाई और अन्य कारकों ने बचपन की गरीबी दर को उच्च रखा है। अपने वित्तीय और रोजगार के साथ संघर्ष कर रहे लोग खुद को अपनी स्थिति से बाहर खींचने के लिए वास्तविक अवसर नहीं ढूढ़ पाते और उन्हें तथा उनके बच्चों को नियमित भोजन संबंधी चिंता तक का सामना हर दिन करना पड़ता है।
बहुत छोटे कस्बों, गाँवों की बात करें तो यहां बहुत-सी  समस्याएं जैसे ओपिओइड महामारी, सामाजिक सेवाओं की कमी, आसान परिवहन, उप-या नॉन-स्पेसिअल ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवा, उच्च-भुगतान वाली नौकरियों का अभाव - चुनौतीपूर्ण हैं। छोटे शहरों के निम्न मध्यम वर्ग की बात करें तो माता-पिता तीन-तीन नौकरियाँ शिफ्ट में करते हैं। फिर भी वहीं रुके पड़े हुए जूझ रहे हैं। 50 साल के लिए घर लोन पर रखा है तो टूथपेस्ट और रेजर तक कूपन से खरीद रहे हैं या फिर डोनेशन दुकानों से पुराना सामान खरीद कर ही काम चला रहे हैं। तूफान, बाढ़ होने पर जो खर्चे घर के लिए अचानक आ जाते हैं उनकी बात तो अलग ही है और स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के नाम पर कुछ भी नहीं।
कुछ समय पहले यहाँ के एक गैर सरकारी संगठन में वालंटियर के तौर पर काम करने का अवसर मिला। यहाँ का अनुभव बिलकुल ही अलग था। तब जाना कि कितने ही लोग गाँव और छोटे कस्बों में ग़रीबी रेखा के अंदर रहते हैं, जिनको मूलभूत सुबिधाओं के लिए भी  मोहताज़ होना पड़ता है। लोग कुछ रोज़ का खाना लेने की एप्लीकेशन देने आ रहे हैं जिससे उनको एक सीमा के अंदर कुछ दिन का खाना मिल सके। कुछ रहने के लिए ठिकाना तलाश रहे हैं।
बहुत ही आश्चर्य और दुख भी हुआ अमेरिका जैसे देश का दूसरा रूप देखकर! सच में आधुनिक चमक-दमक और तरक्की के पीछे एक छुपा अमेरिका भी है, जिसे देखकर स्वीकार पाना आसान नहीं है। "दूर के ढोल सुहावने" वाले खांटी भारतीय मुहावरे का मर्म अमेरिका के इस दूसरे चेहरे को देखकर समझ आया। हमारे बुजुर्गों ने इसीलिये सीख दी है कि दूर से देखने पर कुछ अच्छा लगे तो दो बार जरूर पास जाकर देखना और उसे समझना चाहिए, उसके बाद ही कोई निर्णय करना चाहिए।

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