ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हरियाला सावन ढोल बजाता आया
01-Jul-2016 12:00 AM 2748     

इस साल की भयानक गर्मी के बाद -- "सावन आया – धिन तक तक मन के मोर नचाता आया।' वर्षा और मोर का चोली दामन का साथ है। दोनों ही का संबंध नृत्य से भी है और नृत्य तो हर भारतीय की रग-रग में बसा है। मयूर यूँ ही तो नहीं राष्ट्रीय पक्षी घोषित कर दिया गया है।
"मन मोर मचावे शाोर, घटा घनघोर आई घिर-घिर के', "मन मोर हुआ मतवाला, ये किसने जादू डाला रे, ये किसने जादू डाला', "घटा गहन घोर-घोर मोर मचावे शाोर, मोरे सजन आजा।' अरे साहब, भरे पड़े हैं बादल, बारिशा, मोर, पपीहे के साथ हंसी-ख़ुशाी से सराबोर गाने भारतीय संगीत की दुनिया में।
सर्दी की ठिठुरन और गर्मी के ताप से निजात दिलाती बारिशा तथा बारिशा लाने वाले बादलों का अपना ही महत्व है हम भारतीयों के जीवन में। कालिदास के मेघदूत को कौन भूल सकता है? इस क्षितिज से उस क्षितिज तक आसमान की दूरी तय करने बादल को, वियोगी कवि अपना संदेशावाहक बना कर, परदेस में रहने वाली प्रेयसी के पास भेजता है। कवि को छोड़ें, अपने गाँव की अनपढ़ प्रेमिका भी, "जा रे बदरा बैरी जा रे, जा रे, पिया का सन्देसवा ला रे' ला रे गा कर बादल को अपना नामाबर बना लेती है। नन्हें बच्चे को लोरी सुनाती माँ भी गर्जना करते बादल की मनुहार करती है- "धीरे-धीरे आ रे बादल, धीरे-धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शाोर-गुल ना मचा।'
ये मनभावन सावन जहाँ सारे हिंदुस्तान को भाव-विभोर कर देता है वहाँ हम बैंगलोर वासी कैसे इसके जादू से अछूते रह सकते हैं? लेकिन बचपन तो उत्तर प्रदेशा में बीता है; अतः बैठे-ठाले हमें वही बरसात याद आ जाती है। वो बारिशा का पानी, वो कागज़ की नाव - वाह क्या समाँ था। इधर बरसात की बूंदें बरसीं  उधर हम बच्चे कपड़े उतार कर दौड़े बारिशा में नहाने के लिए। बालक वृंदों का एक झुण्ड चिल्लाता आया "बरसो राम धड़ाके से, बुढ़िया मर गई फाके से', तो दूसरा झुण्ड गाता आया "बरखा रानी पानी दे, पानी दे गुड़धानी दे।'
बरसात के बिना हमारे कृषि प्रधान देशा में बुढ़िया फाँके से मर जाती है और कर्नाटक में किसान आत्महत्या कर लेते हैं। यह एक बड़ा ही दर्दनाक सत्य है लेकिन बरखा रानी सभी के दिल को ठंडक पहुंचाये ये ज़रूरी तो नहीं।  
हम मुग़ालते में ही रह जाते हैं और बरसात दुखी कर जाती है। सदरोए (सदा दुखी) शाायर के उदगार सुनिये -
हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शाराब
आयी बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया
शाराब वाला मज़ाक दरकिनार, हक़ीक़त यह है कि बैंगलोर के बादल कभी-कभी -
तपते हुये दिल के ज़ख्मों पर
बरसे भी तो अंगारों की तरह
आप पूछेंगे कि भाई ऐसा भी क्या हो गया।  हम बताते हैं। लेकिन, बंगलोरी बादल क्यों पागल कर देते हैं, यह बताने से पहले हम एक हरियाणवी चुटकुला सुनना चाहेंगे।
हरियाणा में एक मियाँ-बीबी की जोड़ी तलाक़ लेने अदालत पहुँची। जैसा कि नियम है, जज साहिबा भरसक कोशिाशा कर रही थीं कि उनमें सुलह हो जाये। उन्होंने पति से कहा कि वह बेचारी पत्नी को तलाक़ ना दे। पति बोला कि वह नहीं बल्कि पत्नी अलग होना चाहती है। मैडम पत्नी की ओर मुख़ातिब हुर्इं, बोलीं  "देखो तुम्हारा पति कितना अच्छा है, तुम क्यों इसके साथ नहीं रहना चाहतीं ?' पत्नी टिपिकल (विशोष) हरियाणवी अंदाज़ में बोली "ऐ जजनी, तू थोड़े दिन इसके साथ रहके देख ले पता चल जावेगो, मैंने क्यूँ ना इसके साथ रहना मंजूर।' तो साहब यही जवाब हम उन लोगों को देना चाहेंगे जिन्हें आशचर्य होता है कि हम बैंगलोर वासी क्यों बरसात से डरते हैं। सावन की पहली फुहार, शाादी के मधुचंद्र (ण्दृदड्ढन्र्थ्र्दृदृद) की तरह, बड़ी अच्छी लगती है। लेकिन, अगर यही मनभावन बौछार दो घंटे तक होती रहे तो सर्वप्रथम सड़कों पर जाम लग जाता है। थोड़ी देर और यह नज़ारा जारी रहे तो घरों में पानी भर जाता है। अब आप मानसून का मज़ा लेंगे या बाल्टी भर-भर कर घर आँगन से पानी उलीचेंगे? दो-तीन घंटे यातायात में फँसे बच्चे-बूढ़े-जवान सभी क्या ख़ाक़ बारिशा को मनभावन कहेंगे।
सारा किया धरा हमारे राजनेताओं का है। शाहर को सिलिकॉन वैली तो बना दिया और ले-देकर चारों
ओर गगनचुम्बी इमारतें बनाने का ठेका दे दिया लेकिन शाहर के विकास के लिये मूलभूत ढाँचा नहीं बनाया। बारिशा के अनमोल पानी को उपयोग में लाने का (द्धठ्ठत्दध्र्ठ्ठद्यड्ढद्ध ण्ठ्ठद्धध्ड्ढद्मद्य) कोई जतन नहीं किया। इन्हीं कारणों से वर्षा ना होने की स्थिति में किसान आत्महत्या कर लेते हैं।
यह कैसी विडंबना है कि लोगों को सुख-सुविधा मयस्सर करने वाले व्यापारी -- कार बनने वाले (मारुति, एम्बेसेडर, आदि), जूते बनने वाले (बाटा, रीबॉक, वगैहरा), वस्त्र-निर्माता (बहुत हैं) और फ़िल्में बनाने वाले इत्यादि लखपति, करोड़पति बन जाते हैं। किन्तु सबका पेट भरने वाला, अन्न उगाने वाला किसान अपने लिये दो जून की रोटी तक का जुगाड़ नहीं कर पाता। लेकिन सोचिये जिस दिन किसानों के बच्चों ने खेती करना छोड़ दिया, उस दिन सबकी अक़्ल ठिकाने लग जाएगी।
हम भी बरसाती नदी की तरह जाने किस तरफ बह गये। क्या करें त्दढद्धठ्ठद्मद्यद्धद्वड़द्यद्वद्धड्ढ जो खराब है। ख़ैर, आते हैं वापस पटरी पर। हाँ तो बात हो रही थी बंगलौर में बारिशा की। फिर याद आ गये हैं गुज़रे हुये ज़माने। सन् अस्सी में, जब हम बंगलौर आये तो लगा कि स्वर्ग में आ गये। ना शाोर-शाराबा, ना यातायात की समस्या। पूरे साल आसमान में बादल मंडराते रहते थे। मन सचमुच गए उठता था "रिमिझिम्मि बरसे पानी हो आज मोरे अंगना।' नई नवेली दुल्हनें वर्षा को अपना द्रठ्ठद्धद्यदड्ढद्ध-त्द ड़द्धत्थ्र्ड्ढ बना लेती थीं --
बरखा रानी ज़रा जम के बरसो
मेरा साजन जा ना पाये
झूम कर बरसो
शानैः-शानैः समय बदलने लगा। वक़्त के साथ हर चीज़ बदलने लगी, ना बंगलौर  वैसा रहा, ना बंगलौर की बारिशा। जाने क्यों हमारे नेता लोग क्यों नहीं बदलते। आज भी उतने ही सड़े-गले हैं जितने पहले थे। और अगर बदले भी हैं तो पहले से बदतर हो गये हैं। सुना है इस बार मानसून बड़ा ज़बरदस्त है; तो भैया हम चाहते हैं कि गाज गिरे भ्रष्ट नेताओं पर। बुरी बात है, लेकिन हुज़ूर  --
दिल दुखेगा तो बद्दुआ देगा
ये कोई मोमिन नहीं जो
तड़पेगा और दुआ देगा

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