ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हरिहर झा
हरिहर झा
7 अक्तूबर 1946 को बांसवाड़ा (राजस्थान) में जन्म। सरिता व विभिन्न वेब-पत्रिकाओं में हिन्दी व अँगरेजी कवितायें प्रकाशित। ऑस्ट्रेलिया के बारे में आलेख व यहाँ के भारतवंशियों से साक्षात्कार के लिये कम्यूनिटी सर्विस एवार्ड (2013)। इसके अलावा परिकल्पना हिन्दी भूषण सम्मान (2013)।

कुँवर नारायण श्रद्धांजलि
कविता एक उड़ान हैै। यह प्रसिद्ध पंक्तियां मेलबोर्न की साहित्य-संध्या में न जाने कितनी बार कही होंगी। इन पंक्तियों के साथ मैं कुँवर नारायण का क्या परिचय दूँ, खुद "कविता" का परिचय उनके ही शब्दों में दे दिया इतना हर्ष मुझे होता था। विद्यार्थी जीवन में
आचरण और दिखावे का द्वंद्व
भारत के एक क्रांतिकारी साहित्यकार ने कहा था : "सभी धर्म असत्य हैं, मिथ्या हैं, आदिम दिनों के कुसंस्कार हैं; विश्व-मानवता के इतने बड़े शत्रु और कोई नहीं।" तो अवश्य इसका कारण था। कड़वे शब्द होने के बावजूद भारत में पाखंडपूर्ण धार्मिकता को देख कर बड़ी दृ
चार पुरुषार्थ - आधुनिक नजरिया
मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ माने गए हैं। ये हैं- धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष। लेकिन इन चारों का उद्देश्य क्या है? धर्म का उद्देश्य मोक्ष है, अर्थ नहीं। धर्म के अनुकूल आचरण करो तो किसके लिए? मोक्ष के लिए। अर्थ से धर्म कमाना है, धर्म से अर्थ नहीं कमा
अमेरिकन-ऑस्ट्रेलियन संस्कृति के बिम्ब
छब्बीस वर्ष पूर्व मैं भारत छोड़कर ऑस्ट्रेलिया आया था, यहाँ बस जाने के लिये। अपनी जड़ों से अलग होने के कारण यह स्वाभाविक था कि किसी भी प्रवासी की तरह यहाँ की भाषा, रहन-सहन खान-पान और संस्कृति को सीखते-सीखते स्वयं में बदलाहट हो जाय। दार्शनिक ढंग से यह

भारतीय बैंकिग और अर्थ-व्यवस्था
मुझे अपने एक चीनी मित्र से पता चला कि वे अपना बैंकिंग चीन की बैंकों से करते हैं। मैंने उनसे कौतुहलवश पूछा कि आप ऐसा क्यों करते हैं? उन्होंने अपने जवाब में कोई देश-भक्ति की बात नहीं कही, कोई डींग भी नहीं हाँकी। उनका जवाब सीधा था- "व्यवसायिक तौर पर
आजादी क्यों?
अजादी क्यों? सवाल बड़ा अजीब लगेगा क्योंकि प्रश्न तो यह होना चाहिये कि आजादी क्यों नहीं? पर अंग्रेजों ने 19वीं शताब्दी के अंत तक पूरे विश्व में यह बात सब के दिल-दिमाग में भर दी थी कि भारत सहित सभी काले देशों को गुलाम बना कर अंग्रेज उन पर एहसान कर रह
ऑस्ट्रेलिया में बरखा
लोग मुझसे मौसम के बारे में कुछ भी पूछने से कतराते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि मैं मौसम- विभाग में काम करता हूँ उन्हें आँकड़े सुना-सुना कर हलकान कर दूंगा। आँकड़े सुनाना किसी हथियार-प्रयोग में शामिल नहीं है। पत्थर से ले कर पिस्तौल या बम तक कुछ भी इस्त
कबीर का समाज
अल्बर्ट आइंस्टीन से क्षमा-याचना सहित उनके ¶ाब्दों को बदलकर मैं कहना चाहूँगा कि आने वाली पीढ़ियां कैसे वि·ाास करेंगी कि पंद्रहवीं ¶ाताब्दी में एक ऐसा इंसान हाड़-मांस युक्त जन्मा था जिसने "मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ' जैसा अन

वेश मे पदार्पण करेगा - ललित याज्ञिक
ठीक ही कहा है, भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार चिल्लाने से कुछ नहीं होगा। उसे दूर करने के उपाय ढूंढने में लग जाना चाहिये। लेकिन क्या इस क्षेत्र में तकनीकी कुछ मदद कर सकती है? इतिहास साक्षी है छोटे-मोटे तकनीकी-नवीनीकरण का श्रेय भले व्यापार-विश्लेषण को जाता ह
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