ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हँस के गले लगाऊँ चलो टहल आएं
01-Jul-2018 05:47 AM 755     

हँस के गले लगाऊँ

इक लंबी रात
दिल की पोटली खोली मैंने
मीठे-तीखे यादों के सिक्के गिरे फर्श पे
भूलते-गिनते कशमकश में ही
न बीत जाए ये उम्र सारी
ऐ जिन्दगी, तुझे हँस के ही गले लगाऊँ तो अच्छा है।

अक्सर ही नापा है मैंने
चादर छोटी पड़ जाती है उम्मीदों को मेरी
दिख ही जाते जख्म वो पुराने
उन जख्मों को फिर से ढक लूँ- यही उसूल अच्छा है
ऐ जिन्दगी, तुझे हँस के ही गले लगाऊँ तो अच्छा है।

आफताब के चमचमाते लफ्जों से शुरू
रात की काली स्याह से खत्म
क्यों पुरानी गलियों को छोड़
नए मुकाम बनाते हम?
हयाते-किताब हमदर्दों के साथ
पढ़ी जाए तो अच्छा है
ऐ जिन्दगी, तुझे हँस के ही गले लगाऊँ तो अच्छा है।

मालिक मेरे
इतने अश्क भर दे आँखों में मेरी
रो सकूँ दूसरों के आँसू भी कभी
गमगीन का हाथ पकड़ना ही
कहलाता साथ सच्चा है
ऐ जिन्दगी, तुझे हँस के ही गले लगाऊँ तो अच्छा है।


चलो टहल आएं

सितारों की झुरमुट
श्वेत श्यामल रात की चादर
देह को छूती शीतल सुहानी बयार
मेघों संग आंख-मिचौली खेल आएं
चलो सारा आसमां टहल आएं

शशि की मादकता देखो
इठलाती नृत्यांगना चाँदनी
घुँघरुओं से बहते झरने
कुछ पल सब-कुछ भूल जाएं
चलो सारा आसमां टहल आएं

गोधूली का स्वर्णिम समंदर
सूर्य की मद्धम पड़ती किरणें
बनते सेतु अंतर्मन का
इस पार से उस पार भी साथ ही जाएं
चलो सारा आसमां टहल आएं
पकड़ो हाथ मेरा, हमसफर
चलो सारा आसमां टहल आएं

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