ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हमारा पुस्तक प्रेम
01-Sep-2016 12:00 AM 4298     

पुनर्जन्म को मद्देनज़र रखते हुये रसखान बाबा की यह रचना हमें बड़ी पसन्द है। अब हम गांव में के ग्वालों के बीच में तो नहीं रह सकते, मिज़ाज से थोड़ा शहरी जो हैं; परन्तु "पंछी बनूँ, उड़ती फिरूँ मस्त गगन में" वाला आइडिया हमें भा गया। पंछी बन के यमुना किनारे कदम्ब के वृक्ष पर बसेरा -- वाह क्या बात है! सारी की सारी फिरदौस (जन्नत) और उसकी बहत्तर हूरें निसार इस पर।
सवाल यह है कि अगले जनम के लिये कौन से खग यानि पक्षी का चुनाव किया जाये? देखो भाई मुर्गा तो हम बनने से रहे। सुबह-सुबह उठ कर बाँग देना अपने बस की बात नहीं। इस मामले में हम दास मलूका के अनुयायी हैं -- "आराम बड़ी चीज़ है (प्रातःकाल में) मुँह ढंक के सोइये" और हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता अगर मुर्ग-श्रेणी के लोग हमें निशाचर कहें। यूँ भी कुछ तो लोग कहेंगे। वैसे भी हम तो स्वयं अपने आपको उलूक श्रेणी में गिनते हैं। हँसिये मत! उल्लू बहुत ज्ञानी पक्षी होता है। तभी तो देवी लक्ष्मी उसकी सवारी करती हैं। यह और बात है कि हमारा सामना अभी तक लक्ष्मी देवी से नहीं हुआ। कोई बात नहीं! जब तक देवी सरस्वती का वरदहस्त हमारे सर पर है, हमें कोई गिला नहीं।
दोस्तों हम तो वीणावादिनी के परम भक्त हैं ही, हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे भी "या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिताम्" के सिद्धांत को लेकर जीवन पथ पर अग्रसर हों।
प्रिÏन्टग प्रैस के आविष्कार के पहले साहित्य को सुरक्षित रखने के लिए उसे पद्यबद्ध करने की प्रथा थी। प्राचीनकाल में सुवचनों और सूक्तियों को भोज पत्रों पर भी लिखा जाता था, जो कि एक कठिन कार्य था। आम आदमी के लिये कुछ भी याद रखने के लिये तुकबन्दी सबसे अच्छा साधन है। आज भी हम लंबी चौड़ी गद्य की तक़रीर को याद नहीं रख पाते, परन्तु कविता आराम से स्मृति कोष में सुरक्षित रहती है। अब हर वक़्त कविता पाठ तो किया नहीं जा सकता; इसलिए छपाई मशीन की अहमियत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। बड़े-बड़े ग्रन्थ इसी की वजह से बरक़रार हैं। मगर इस सारी भाषण बाज़ी का लुब्बे लुबाव यह है कि हम कुछ भी सुरक्षित कर लें - जब तक उसे इस्तेमाल नहीं करेंगे उसका फ़ायदा क्या? लिखने और छपने का सारा आइडिया ही यह है कि हम उसे पढ़ें। पढ़ें से मतलब स्कूल-कॉलेज वाली पढ़ाई से नहीं है - वह तो पढ़ने के जज़्बे का ही क़त्ल कर देती है। कोई भी काम ज़ोर ज़बरदस्ती से नहीं किया जा सकता। एक पते की बात बतायें - आप बिल्ली के नन्हे बच्चे (म्याऊं) को भी अगर जरबन शिकार करना सिखायेंगे तो वह चूहे से डरने लगेगा। वही हश्र थोपी हुई पढ़ाई का भी होता है। इसलिए हमें न केवल रोचक पुस्तकों का इंतज़ाम करना होगा बल्कि बालकों और युवाओं में रुचि भी पैदा करनी होगी। तो चलिये ढूंढते हैं किताबों में छुपे ख़ज़ाने को। यह खज़ाना केवल ज्ञान का ही नहीं बल्कि आनंद का भी है। जब तक हम (अगले जनम में) पंछी बन कर आकाश में उड़ने नहीं लगते, तब तक किताब के पन्नों में आसमान की सीमा को पार कर सकते हैं। हिंदी की एक सूक्ति "जहाँ ना जाये रवि, वहाँ जाये कवि", केवल कवि पर ही नहीं, कविता पढ़ने वालों पर भी लागू होती है। आप हरिवंश रॉय बच्चन की मधुशाला उठा लीजिये -- मयखाने ना पहुँच जाएँ तो हमारा नाम --- जाने दीजिये नाम में क्या रखा है! बच्चन (अमिताभ नहीं भैये, उनके बाप) हों या ग़ालिब, मीर, जिगर अथवा मोमिन -- नशा कहीं भी कमतर नहीं है। कालिदास का "मेघदूत" पढ़िये या महादेवी वर्मा का आन्ध्य गीत की "यामा" और उनके लिखे "सांध्य गीत" --- आसमान भी छोटा पड़ जाता है। गद्य में लिखी पुस्तकों ने भी कम गुल नहीं खिलाये। परियों के देश में पहुँच जाते हैं लोग, किताब के पन्नों पर सवार होकर। हम भाषणबाज़ी करके बोर करने में यक़ीन नहीं करते, इसलिए भारी-भरकम शोध पुस्तकों की बात नहीं करेंगे; सिर्फ कहानियों और उपन्यासों की बात करेंगे।
हमारा तो पहला प्यार ही पुस्तक था और अभी तक क़ायम है। बचपन में चन्दामामा पढ़ते हुए हम एक तिलिस्मी दुनिया में पहुँच जाते थे। उसका एक धारावाहिक "विचित्र जुड़वे" हमें एक रहस्यमय माहौल में ले जाता था। अलीबाबा और चालीस चोर, नरसिंग महतो, जानी चोट्टा तथा महकदे रानी जैसे किस्से-कहानियों की किताबें हमें  अजीब-ओ-गरीब संसार में स्थानांतरित कर देते थे। उस संसार में रोमांच था, रोमांस था, परियां थीं, भूत-प्रेत और इंसानों जैसी हरकत करने वाले जानवर भी थे। आजकल के बच्चे मोबाइल और विडियो गेम्स में व्यस्त रहते हैं। वो तो क्रिकेट भी हाथ में रिमोट लेकर टीवी पर खेलते हैं। साहबान बच्चों और युवाओं के लिए खेल और किताबें दोनों ज़रूरी हैं। कोशिश कीजिये आज भी कोई बच्चा "एक था राजा", "एक समय की बात है" सुनकर अपनी उत्सुकता को रोक नहीं सकता (हम भी नहीं), वो अवश्य पूछेगा "फिर क्या हुआ?" बस यही फार्मूला है बालकों का किताबों से परिचय कराने का।
युवावस्था में किताबों का किरदार थोड़ा बदल जाता है। मिल्स और बून्स (ग्त्थ्थ्द्म ः एदृदृदद्म) क़िस्म की कहानियां पसन्द आने लगती हैं। धर्मवीर भारती के "गुनाहों का देवता" ने कितनी लड़कियों के तकियों के नीचे रातें गुज़ारी हैं यह बात आप पचास और साठ के दशक की स्त्रियों से पूछिये। बढ़ती उम्र के साथ ही किताबें भी वयस्क हो जाती हैं। यह सब कुछ इसी क्रम में हो ये ज़रूरी नहीं। हम खुद बचपन में सूरसागर, महाभारत और रामायण वगैहरा पढ़ा करते थे और आज हैरी पॉटर पढ़कर तिलिस्मी दुनिया में पहुँच जाते हैं। साहबान किताबें जादू होती हैं और उन्हें लिखने वाले जादूगर। तो फिर किस तरह हम अपने आपको और अपने बच्चों को इस जादू से महरूम रख सकते हैं?
साहित्य समंदर है। हम तो किनारे पर बैठ कर कुछ पानी चुल्लू में भरकर खुद को तरबतर कर सकते हैं। पूरा समंदर हथेलियों में समेटना किस के बस की बात है। मगर ये चुल्लू भर पानी हो यह भी ज़रूरी है। बच्चों में पुस्तकों के प्रति रुचि जगाना अविभावकों का काम होता है। शिक्षक तो बाद में परदे पर आते हैं। चलिए आप से अपनी बात कहते हैं। हमारे पिताश्री रात को सोने से पहले हम सब बच्चों को (बहुत सारे थे) बिस्तर पर बैठा कर कहानी सुनाते थे। तदुपरांत हम सब भगवान की प्रार्थना करते थे और अंत में शुभ रात्रि। अब्बाजान की कहानियां हिंदुस्तान की अनेक भाषाओं तथा सामाजिक पहलुओं को छूती थीं। वे धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक यहाँ तक कि जासूसी कहानियां भी वे मनोरंजक तरीके से सुनाते थे। कभी-कभी वे अंग्रेजी भाषा की पुस्तक या पत्रिका से पढ़ कर और हिंदी में अनुवाद करके भी कहानी सुनाते थे। यह उस वक़्त की बात है जब हम बच्चे सिर्फ हिंदी भाषा ही जानते थे। आंग्ल भाषा की एक कहानी "डॉ. जैकल और मिस्टर हाईड" इतनी रोचक थी कि हमें वो दो पन्ने सुन कर मन करता था न कि पूरी किताब आज ही सुन लें। लेकिन पिताजी उसे धारावाहिक की तरह अगले दिन के लिए टाल देते थे। बस हमने खुद ही उस किताब को दिन के वक़्त धीरे-धीरे पढ़ना शुरू कर दिया। अरे साहब जादू हो गया। कहानी तो हमने पढ़ ही ली, साथ ही अंग्रेजी का हौवा भी दिल-ओ-दिमाग़ से उतर गया। बस क्या था, हमारी पुस्तक-पत्रिकाओं का क़ोटा और बढ़ गया। वैसे भी हमारे अब्बाजान हमारी सभी ज़रूरतें बड़ी कंजूसी से पूरी करते थे लेकिन किताबों के मामले में भरपूर दरियादिली से काम लेते थे। तब से लेकर आजतक हमारा किताबों से इश्क़ मुसलसल क़ायम है। यही परंपरा हमने अगली पीढ़ी तक बरक़रार रखी है।
आप लाख आधुनिक उपकरण मसलन - आई पॉड, लैपटॉप आदि पढ़ने के लिए चुन लें, मगर बिस्तर में घुस कर, ऊँचे तकिये लगा कर और कैटरपिलर की तरह कर्ल अप होकर, एक रोचक पुस्तक पढ़ने में जो स्वर्गीय आनंद आता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। लीजिये खुद की एक ग़ज़ल का शेर प्रस्तुत है -
पढ़ने का शौक़ है, वो रिसाला हो या ग़ज़ल
हमदम कोई भी हो मेरा, होगा किताब सा।

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