ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हमारा अतीत एक है, हमें गले लगाएँ
01-Jan-2017 12:24 AM 2617     

नीदरलैंड के भारतवंशी व्यवसायी भगवान प्रसाद से सुषमा शर्मा की बातचीत

अपनी तरह से जीने वाले कुछ शख्स अपनी तरह के होते हैं जो दूसरों के लिये ही जीते हैं। पूंजीवाद के इस जटिल समय में जहां लोग सिर्फ अपने लिये धन कमाना चाहते हैं वहां नीदरलैंड के भारतवंशी नागरिक भगवान प्रसाद अपने व्यवसाय के द्वारा जरूरतमंदों की सहायता में परम सुख अनुभव करते हैं। उनका जन्म सूरीनाम में हुआ। इनके पुरखे 1907 ई. में अयोध्या से सूरीनाम पहुंचे थे। नीदरलैंड में शिक्षा-दीक्षा, नौकरी व्यवसाय ने इनके व्यक्तित्व को गढ़ा। जहाँ आप कई आर्थिक कम्पनियों के निदेशक रहे और यहाँ की जल-प्रबंधन समितियों में सक्रिय रहे। उनकी माँ सिर्फ इसलिए स्कूल नहीं जा सकीं क्योंकि उनके स्कूल जाने के रास्ते में अफ्रीकी दास जूका (नीग्रो समुदाय) लोग हिन्दुस्तानी लड़कियों पर कंकड़ फेंकते थे। सूरीनाम के उस इलाके की बालिकाएं पढ़ाई से वंचित न रहें इसलिये माँ की स्मृति में तीन सौ हजार यूरो लगाकर स्कूल परिसर में ही थियेटर भवन का नव निर्माण करवाया। तीस कम्प्यूटर नेट सहित विशेष कक्ष की व्यवस्था की। बुलिफिया के लापास शहर में जहां पैंतीस हजार विद्यार्थी पढ़ते थे अब उनकी संख्या सत्तर हजार हो गयी है। अपने हिन्दी प्रेम के तहत अनेक हिन्दी संस्थाओं और भारतीय संस्कृति संस्थाओं को सहायता करते रहते हैं। सूरीनाम हिन्दी परिषद के नये भवन के निर्माण में आपने आर्थिक सहायता की। भारतीय संस्कृति और अपने आजा, पिता के संस्कारों से पगे भगवान प्रसाद देश और विश्व के लिये गौरव पुरुष है जिनसे मनुष्यता के विकास में सहयोग करने की प्रेरणा मिलती है। प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर उनसे हुई विस्तृत बातचीत के सम्पादित अंश :
प्रवासी भारतीय दिवस के बारे में आप क्या कहेंगे?
प्रवासी दिवस के माध्यम से विदेशों में बसे भारतवंशियों और प्रवासियों को सरकार भारत में मिलाना चाहती है, लेकिन उसे सोचना चाहिए, सिर्फ प्रोमानेन्ट लोगों को बुलाने और प्रवासी सम्मान देने भर से यह उद्देश्य पूरा नहीं हो जायेगा। इसके लिये अधिकतम लोग भारत से जुड़ें ऐसी योजना बनानी चाहिए। जिन देशों में भारतवंशी रहते हैं उन देशों में बसे हुए भारतवंशियों की जरूरतों के बारे में सोचना चाहिए और उनकी सहायता करनी चाहिए, जिससे वे अपने को सही मायने में भारतवंशी समझ सकें। इस संदर्भ में भारत सरकार ने सिर्फ मॉरीशस के भारतवंशियों के लिये कुछ सीमा तक सहायता की है। लेकिन दूसरी ओर फीजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद, गयाना और दक्षिण अफ्रीका आदि देशों के लोग सिर्फ अपने पुरखों की जड़ों और उनके द्वारा हासिल भारतीय संस्कृति के अलावा उन्हें वर्तमान सरकार से कुछ खास सहयोग नहीं मिलता है कि वे अपने को भारतवंशी मान सकें। मुझे लगता है कि भारतवंशियों के लिये  कला, संस्कृति, विकास के स्रोत यानी  भारत-भवन जैसी विशाल संस्थाएं हर भारतवंशी बहुल देश में होनी चाहिए। साथ ही मुंबई, दिल्ली, लखनऊ, कलकत्ता, पटना, आगरा शहरों में भी भारतवंशी भवन होने चाहिए। भारतवंशियों के लिये अलग से विशेष तरह के होटल होने चाहिए ताकि उनकी भारत आने की इच्छा पैदा हो सके और वे यहां कुछ समय के लिये रुक सकेंगे। भारतीय कला, संस्कृति, भाषा से उनका लगाव होगा और वे सही अर्थों में अपने को भारतवंशी महसूस कर सकेंगे।
प्रवासी भारतीयों और भारतवंशियों में आप भारत का आकर्षण किस रूप में पाते हैं?
नीदरलैंड और सूरीनाम में मिलाकर पांच लाख भारतवंशी हैं, लेकिन अधिकांश में भारत का आकर्षण नहीं है। उसका एक बड़ा कारण यह भी कि बहुत से लोग लिपि सहित हिंदी भाषा नहीं जानते। देवनागरी नहीं सीखते हैं। हम विश्व में पुराने भारत की ग्रेविटी को देखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि भारतवंशी बहुल देशों का आम आदमी भारत के साथ अपना गहरा जुड़ाव महसूस करे और गर्व से भर उठे। आम भारतवंशी भारत से गहराई से जुड़ना चाहता है लेकिन उसे यह अवसर प्राप्त नहीं होता है। प्रवासी दिवस के इस मौके पर इस विषय में गंभीर विमर्श होना चाहिये। प्रवासी दिवस सिर्फ कामर्शियल नहीं होना चाहिए। उसे भारतवंशियों को परिवार के सदस्य की तरह जगह देना चाहिए कि उन्हें लगे कि वे आगे बढ़ेंगे तो उन्हें भारत में जगह मिलेगी।
क्या आप मानते हैं कि अधिकांश प्रवासी भारत लौटने के इच्छुक हैं।
विदेशों में रह रहे भारतवंशियों को जिस आर्थिक-सुरक्षा का आश्वासन है, वैसे माहौल की भारत में कम उम्मीद है, इस भय के कारण वे वापस लौटने की इच्छा होते हुए भी लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं। भारत में अधिकारियों और नेताओं का जिस तरह का गठजोड़ बन गया है, वैसा विदेशों में नहीं है।
कई पीढ़ियों से विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के नागरिक भारत के निरंतर सम्पर्क बनाए रखना चाहते हैं तो इसका यह आशय लगाया जाये कि वे अपनी आगे की पीढ़ी को भी भारत की अस्मिता से परिचित करवाना चाहते हैं ।
हां, जरूर, लेकिन कैसे? भारत में भारत के चिह्न नहीं हैं। यहाँ के देशवासी अपनी भाषा नहीं बोलते हैं। जो भी कुछ चमकदार है, वह वालीवुड और अंग्रेजी है। भारत में ही भारतीय संस्कृति की कोई ज्यादा कदर नहीं है। फिल्मों ने कला, संस्कृति, भाषा, संगीत को हाशिए पर कर दिया है। अपनी नयी पीढ़ी को प्रवासी पढ़ने-लिखने के लिये भारत  भेजना तो चाहते हैं पर बर्बादी और असुरक्षा के आसार देखकर उन्हें भेजने से अपने हाथ रोक लेते हैं, वरना कौन अपनी मातृभूमि, अपने घर नहीं लौटना चाहेगा।
भारतीय मूल के लोगों या प्रवासी भारतीयों की सुदृढ़ स्थिति का फायदा भारत को कैसे मिल सकता है।
आपसी ईमानदारी और सहयोग की स्थिति का वातावरण जब भारत सरकार और देश के भीतर बनेगा तभी भारतीयों, प्रवासी भारतीयों और भारतवंशियों के बीच विश्वसनीयता और आत्मीयता के रिश्ते बनेंगे।
भारतीय सभ्यता, संस्कृति और भाषा को प्रवासी भारतीय अपनी पहचान के तौर पर सचमुच देखते हैं या फिर यह सिर्फ सुविधाएँ पाने के लिये किया गया प्रपंच है।
अमूमन भारतीय जिस तरह से भारत की सभ्यता, संस्कृति और भाषा को अपना स्वार्थ सिद्ध करने का जरिया मानते हैं, वैसी ही मानसकिता और बुद्धि से अधिकांश प्रवासी भारतीय भी बरताव करते हैं। उनका भारत की व्यवस्था में जो अभ्यास और आदतें बन चुकी होती हैं उसी के अनुसार वे विदेश में चलते हैं। विदेशों में बसे दूतावासों के उच्च अधिकारियों को कुछ ऐसे ही स्वार्थी चरित्र के प्रवासी भारतीय अपने मोहपाश में उलझा लेते हैं, जिससे वे आम प्रवासी भारतीय और भारतवंशी समाज से दूर हो जाते हैं और प्रवासी भारतीय दिवस के आयोजन, वहां ठहरने, वहां के संदर्भ में सूचनाएं भी आम प्रवासी भारतीय तक नहीं पहुंचती है। जो कम से कम छह माह पहले मिलना चाहिए।
अनेक देशों में प्रवासी भारतीय वहां की अर्थव्यवस्था के लिए अभिन्न अंग बन चुके हैं। क्या ये भारतीय अर्थव्यवस्था को मददगार साबित हो सकते हैं?
विदेशों में जिस तरह की पारदर्शी आर्थिक व्यवस्था है, यदि वैसी ही भारत में भी कायम हो जाये तो प्रवासी भारतीय मददगार साबित हो सकेंगे। विदेशों की अर्थव्यवस्था का अंग बन चुके भारतीयों को जो प्रतिष्ठा और अपने धन की सुरक्षा की अनुभूति होती है, वह अवश्य ही अपनी मातृभूमि की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में अपनी पूंजी लगाना चाहेगा। लेकिन पहले पूंजी लगाने के लिये सुरक्षा तथा प्रतिष्ठा और विश्वास का वातावरण तो बने।
निवेश के लिए विभिन्न प्रदेश सरकारों द्वारा इन्वेस्टर्स समिट आयोजित किये जाते हैं। क्या कहेंगे?
सिर्फ समिट आयोजित करने से काम नहीं चलेगा। केवल "पावर प्वाइंट" आंकड़े और विभिन्न देशों में लुभावने आयोजन के प्रदर्शन से मतलब नहीं सिद्ध होगा। इसके लिये अपनी आदतें बदलनी होगी। विदेश मंत्रालय से दूसरे मंत्रालयों और कम्पनियों से लोग विदेशों में बड़ी-बड़ी योजनाएं और उनके चालू करने-करवाने की पूरी प्रणाली लेकर आते हैं लेकिन जरूरत है विश्वास पाने की, विश्वास जमाने की, कि वहां निवेश करने पर उन्हें दुख नहीं मिलेगा। परेशानी नहीं होंगी। मैं स्वयं एक योजना लेकर एक सरकार के समक्ष गया था, जिसमें एअरपोर्ट की खाली जमीन पर साइंस पार्क, बिजनेस एरिया, आवासीय क्षेत्र और उच्च स्तरीय अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों की दुनिया की रचाने की योजना थी।
नीदरलैंड के डेलफ तकनीकी विश्वविद्यालय के उच्चस्थ इंजीनियर्स के सहयोग से योजना बनायी, जिसे प्रदेश के मुखिया के समक्ष प्रस्तुत किया, लेकिन उनके निर्णय की आज तक प्रतीक्षा कर रहा हूँ। तो प्रवासियों का भरोसा जीतना होगा, नैतिकता का पालन करना होगा, कथनी और करनी के भेद को खत्म करना होगा। वरना समिट के आकर्षण में लोग इकट्ठा तो होंगे पर वह एक समारोह भर बनकर रह जायेगा। समिट के नाम पर भारत से विदेशों में एक टीम आती है। सैर-सपाटे करके चली जाती है और उपलब्धि के रूप में एक रिपोर्ट होती है। सफलता के सपनों के झूठे शब्द... भारत को जैसा होना चाहिए वैसा भारत है ही नहीं जिसने विश्व भर को समझ दी है वह आज इतना बेसमझ और लाचार हो गया है।
भारत की राजनीतिक व्यवस्था तथा नौकरशाही के चलन में कभी बदलाव आयेगा। क्या कहेंगे?
उम्मीद तो बहुत कम है। हमें ऐसा लगता है कि पीढ़ियों से भारतीयों में ऐसी आदतें पड़ गईं हैं जिन्हें बदलना असंभव नहीं तो मुश्किल ज़रूर है। भारत की विभिन्नताओं के स्तर इतने अधिक हैं कि एक राह, एक दिशा में चलना बहुत कठिन है, जबकि तरक्की के मापदण्ड छूने के लिये निश्चितता और निÏश्चतता आवश्यक है।
भारत सरकार की दोहरी नागरिकता की नीति के बारे में क्या कहेंगे?
दोहरी नागरिकता की नीति बहुत स्पष्ट नहीं है। भारत सरकारी की बहुतेरी योजनाओं और सुविधाओं की जानकारी आम प्रवासी भारतीयों तक नहीं पहुँच पाती हैं। विदेशों में बसे कुछ विशिष्ट प्रवासी भारतीयों को छोड़कर बाकी के अनभिज्ञ ही बने रहते हैं।
प्रवासी भारतीयों के बच्चों की शिक्षा और नागरिकता का अहम मुद्दा है।
भारत सरकार की ओर से उन्हें दोहरी नागरिकता का प्रावधान अवश्य होना चाहिए। जिससे यदि वे चाहें तो अपने माँ-पिता की मातृभूमि वाले देश से शिक्षा, स्वास्थ्य के संदर्भ में जब चाहे तो लाभ उठा सकें, लेकिन अपने अभिभावकों के साथ भारत जाने वाली नयी पीढ़ी, टी.वी. मीडिया, सोशल मीडिया द्वारा वहां से परिचित हो जाने पर विदेश के प्रवासी युवा, किशोर और बच्चे शिक्षा, स्वास्थ्य के लाभ उठाने के बारे में हिचकते हैं। स्थिति यह है कि वहां का यातायात, पर्यटन होटल तथा चिकित्सादि को देखते हुए वे अपने रिश्तेदारों के साथ भारत जाने से कतराते हैं। विवाहादि के अवसर पर अगर विवशता से जाते भी हैं तो जल्दी-से-जल्दी लौट आते हैं। समस्याएं विदेशों में भी हैं पर शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और यातायात, पर्यटन की ऐसी असुविधा और असुरक्षा नहीं है।
प्रवासियों के नाम पर आयोजित सरकारी आयोजनों के अनुभव बताना चाहेंगे?
ऐसा लगता है जैसे प्रवासी भारतीयों को आपस में जोड़ने के मकसद से यह आयोजन नहीं होते, बल्कि विदेशी मुद्रा बंटोरना ही प्रमुख लक्ष्य होता है। आम प्रवासी तो इन विशिष्ट मौकों पर पहुंच ही नहीं पाता। सुरक्षा के कारण कड़े नियम, आयोजन स्थलों की दूरी और आयोजकों की अदूरदर्शिता अड़चन बन जाती है।
ऐसे भारतीय जिनमें क्षमता और योग्यता थी, लेकिन समुचित वातावरण न मिलने के कारण वे देश छोड़कर विदेश चले गए। क्या कहेंगे?
कैसी अजीब बात है कि अब भारत में प्रतिभा पलायन जैसा कोई मुद्दा ही नहीं बचा। विदेशों में बसे भारतवंशी सचमुच योग्यता और क्षमता से सम्पन्न थे। दूसरे देश को उन्होंने ही अपनी काबलियत से अपना बना लिया है।
हमारी पहचान तो भारतीय की ही है, चाहे फिर हमारा जन्म विदेश में ही क्यों न हुआ हो। इस नाते हम भारत से अपना नाता महसूस करते हैं। भारत के राष्ट्रीय पर्वों को हम अपना मानते हैं, उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं। कितने ही प्रवासी उच्च चिकित्सा, तकनीक और राजनीतिक पदों पर विभिन्न देशों में  नेतृत्व कर रहे हैं। यह हम सबके साथ-साथ भारत देश के लिये भी गर्व की बात है।
नोबेल विजेता प्रवासी वी.एस. नायपॉल ने एक बार भारत के भ्रष्टाचार के बारे में टिप्पणी करते हुए उसके महान देश होने पर शंका जाहिर की थी।
मैं नोबल पुरस्कार विजेता वी.एस. नामपाल की बात से कुछ सीमा तक सहमत हूं, बल्कि उसे थोड़ा सुधारकर कहना चाहूंगा कि आज भारत महान नहीं बचा है, कभी भारत महान था। उसके पास सम्पूर्ण मनुष्यता के लिये वैश्विक संस्कृति के बीज मंत्र थे- जो आज पूरे विश्व में छिटके हुए हैं। लिहाजा भारत को अतीत-जीविता से उबरकर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जीना होगा।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 12.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^