ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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प्रतीति की भाप
01-Sep-2016 12:00 AM 2444
प्रतीति की भाप

भाषा एक सेतु की तरह लगती है जिसे मन और बुध्दि के बीच बाँधना पड़ता है। पीड़ाओं के खारेपन में हिलुरते भवसागर में अपनी नौका खेते कवि की आँखें बार-बार भर आती हैं और छलककर सागर में झर जाती हैं। कवि की आँख

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