ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हम जो चाहते हैं
01-Jan-2019 02:13 PM 164     

सहलाना चाहते हैं
हम तुम्हारी कोमल भावनाओं को
मानवता के स्नेहिल स्पर्श से
जिसकी छुअन
जीवन भर रोमांचित करती रहे तुम्हें
और जिस किसी को भी छू ले
तुम्हारी परछाईं
स्पंदित होता रहे
पुलक से
वो भी सारी उम्र

दिखाना चाहते हैं हम
एक नई दुनिया की राह
विचारों के आकाश में
उड़ा ले जाकर तुम्हें
सबकी नजरों के सामने
समझ के पंख लगाकर तुममें
ताकि अपनी ज़मीन से
इंच भर खिसके बगैर भी
समेट सको तुम
अपने दामन में
बेशुमार चाँद-सितारे
और बिखेर सको उन्हें
अपने इर्द-गिर्द की दुनिया के
अंधेरे कोनों में
ताकि पसरती चली जाय
धीरे-धीरे
उजाला-ही-उजाला
चारों ओर।
पढ़ना चाहते हैं हम
अनुभवों के
जीवंत दस्तावेज की तरह तुम्हें
जो दबी पड़ी हो अरसे से
धूल की परतों में लिपटी
किसी जंग खाती आलमारी की दराज में
लिखी गई हो जो
भले ही कुछ अनगढ़ तरीके से

तराशना चाहते हैं हम
कुछ इस तरह तुम्हें
जैसे किसी शिल्पकार को
किसी अनगढ़ पत्थर में भी
दिख जाया करती है संभावना
किसी अनमोल कलाकृति की
और साकार हो उठने के बाद
आंकी जाती है जिसकी कीमत
लाखों करोड़ों डॉलर में
साथ ही संजोया जाने लगता है जिसे
विरासत और संस्कृति की
अमूल्य धरोहर के रूप में

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