ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आधी दुनिया - अधूरी दुनिया
01-Dec-2018 06:39 PM 1650     

भगवान ने अपनी तरफ़ से बड़े इंतज़ाम के साथ कार्य प्रारम्भ किया था। एक अच्छे सीईओ की तरह उन्होंने दो बराबर के पार्टनर बनाये - आदम और हौव्वा। उनके लिये रोटी, कपड़ा और मकान का पूरा बंदोबस्त किया गया था। उन्हें खुली छूट थी कि वे जैसे चाहें दुनिया काम को अन्जाम दें। ज़ाहिर है कि भगवान का द्फ्तर बहिश्त में था। सब जानते हैं कि बहिश्त यानि जन्नत एक निहायत ख़ूबसूरत स्थान है और क्यों न हो, आख़िर वह खुदा के रहने की जगह है। चूँकि भगवान स्वयं समुद्र में (विष्णु), या पर्वत पर (शिव), या फिर कमल के फूल में (ब्रह्मा) रहते हैं तो इंसान के अम्मा-अब्बा यानि आदम और हौव्वा के लिये कोई कोठी बंगला तो हो नहीं सकता था। अतः वे भी प्रकृति के खूबसूरत प्रांगण में ही रहते थे। एक बात और - उस वक़्त ईश्वर ने केवल इंसान बनाये थे। उनकी कोई जात-पात नहीं निर्धारित की थी। आजकल मामला ज़रा मुख़्तलिफ़ है। अब ईसाई उनके निवास स्थल को ईडन गार्डन कहते हैं, मुसलमान जन्नत, और हिन्दू स्वर्ग कहते हैं। ख़ैर क्या फ़र्क़ पड़ता है। मतलब ये कि उन दोनों का काम संसार को आगे बढ़ाना था। शायद ऐसा, बिना किसी झंझट के, हो भी जाता परन्तु पता नहीं कहाँ से कहानी में ट्विस्ट आ गया। कहीं से कोई सांप आ गया और साथ ही एक सेव का पेड़ आ गया। कहते हैं कि सांप ने हौव्वा को भड़काया और हौव्वा ने आदम को सेव खिलाया। लो! इसमें क्या बुराई थी। सेव तो वैसे भी सेहत के लिये लाभदायक होता है। लेकिन कहा जाता है कि इससे आदम की मति भ्रष्ट हो गयी और उसने हौव्वा के साथ मिल कर पाप कर्म किया। कमाल है भई। जिस काम को करने के लिए ख़ुदा ने उन्हें बनाया था वही काम करने के कारण अल्लाह ने उन्हें नैसर्गिक उपवन से जलावतन कर दिया। लो कर लो बात - स्वर्ग में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन से क्या दुनिया बन जाती? चलो जो हुआ सो हुआ। अच्छी बात ये हुई कि उन दोनों ने धरती पे आकर अपना घर संसार बसा लिया। वैसे तो राम ने भली करी और सब ठीक ही रहा, जनसंख्या बढ़ने से दुनिया भी बनने लगी जो अल्लाह मियाँ चाहते थे। लेकिन एक गड़बड़ हो गयी। हौव्वा ने जो सेव को खिलाया था उस हरकत को एक जुर्म क़रार दे दिया गया और उसके कारण हौव्वा बेचारी गुनहगार साबित हो गयी। उसे बरगलाने वाली का ख़िताब मिल गया। पुरुष औने- पौने में भोला-भाला, मासूम बशर बन गया, स्त्री चालाक तथा रिझाने वाली (द्यड्ढथ्र्द्रद्यद्धड्ढद्मद्म) पापिन हो गयी।
मौक़े का फ़ायदा तुरंत उठाया तथाकथित भोले-भाले मर्दों ने। उन्होंने औरतों को एक कमतर (द्मद्वड द्मद्यठ्ठदड्डठ्ठद्धड्ड) इंसान का दर्जा अता कर दिया। अच्छे भले बराबर के जोड़े में से एक बड़ा और दूसरा छोटा हो गया। बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। पूरी रणनीति तैयार करके पुरुषों ने स्त्री को घर की चहरदीवारी में बंद कर दिया। "रिझाने वाली" को दण्ड सुनाकर वे ख़ुद बाज़ार में बैठकर "रिझाने वाली" के पास जाने लगे। इस हरकत का नाम दिया गया "ज़रूरत" का। ये तथाकथित "ज़रूरत" औरतों को भी पड़ सकती है यह किसी ने नहीं सोचा। यही नहीं - औरतों को तो किसी भी चीज़ की "ज़रूरत" नहीं हो सकती। अगर पति का पेट भर गया तो पत्नी के लिये खाना बचा या नहीं कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। पति यदि विधुर हो जाये तो उसकी शादी की जल्दी, मगर विधवा के लिये उम्रभर का बनवास। मर्द को खाना पकाने वाली तथा घर चलाने वाली चाहिये लेकिन बेचारी अनपढ़ बेवा को कमाने वाला नहीं चाहिये। अकेली देखकर अगर लोग बुरी नज़र डालें तो भी दोष औरत का। आदमी पहले की भांति चाक-चौबस्त होकर रहे और औरत के ज़ेवर और सिंगार बंद। और तो और भगवान के घर में जाने तक के नियम क़ानून बन गये। अनेक मंदिरों में (जिनमें सबरीमला भी शामिल है) स्त्रियों का जाना वर्जित है। क्यों? क्योंकि वे रजस्वला होती हैं। रजस्वला होना गंदी बात है। लो जी जिस वजह से तुम जन्म लेकर धरती पर आते हो वो गंदी चीज़ है? फिर तो पुरुषों के शुक्राणु भी अपवित्र हैं सब बंद कर दो और कर दो संसार का अंत। सबरीमला वाले परम्परा की बात करते हैं। उसके तहद तो दलितों का भी प्रवेश वर्जित था। उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद दलितों का प्रवेश सम्भव हो गया। औरतें क्या दलितों से भी गयी गुज़री हैं?
चलो! कर्तव्य और अधिकारों को लेकर तो विरोधाभाष था ही; किन्तु स्त्री को मात्र भोग्या बना देना किस नियम या परंपरा के अंतर्गत आता है? एक सवाल का जवाब कोई नहीं पाता वो यह है कि जब कम उम्र की महिलायें मंदिर में वर्जित हैं तो फिर कम उम्र की लड़कियां देवदासी कैसे बना दी जाती हैं? देवदासी वो लड़कियाँ होती थीं जो भगवान की सेवा में दान कर दी जाती थीं। कोई हमें यह बतायेगा की जब भगवान की सेवा पुरुष कर ही रहे थे तो लड़कियों की ज़रूरत क्यों पड़ी? और अगर पड़ी ही थी तो उन्हें पुजारिन क्यों नहीं बनाया गया? ज़ाहिर है कि ये कन्यायें ईश्वर की नहीं पंडितों की सेवा के लिये थीं। धर्म का इससे बड़ा दुरुपयोग हो सकता है क्या? कमसिन बच्चियां देवदासी बनकर पंडे-पुजारियों की "ज़रूरतों" को पूरा करें - क्या यह जायज़ है? दोग़ले और टुच्चेपन की भी हद्द है। सवाल यह भी उठता है कि केवल देवदासी ही क्यों - देवदास क्यों नहीं? ऐसा ही सवाल हम मौलवी और मुल्लाओं से पूछेंगे कि बहत्तर हूरें ही क्यों, बहत्तर फ़रिश्ते भी तो होने चाहिये। धर्म के नाम पर अगर इन धार्मिक गुंडों ने महिलाओं को मंदिर में जाने से रोका तो बेहतर है कि मंदिर ही बंद कर दिया जाये। वैसे भी धर्म ने समाज का जितना नुकसान किया है उतना तो महायुद्धों ने भी नहीं किया।
दरअसल धर्म का इस्तेमाल जहाँ आम जनता (कहीं की भी हो) को उल्लू बनाने के लिये किया गया वहाँ औरतों को दबाने और उन्हें कमतर साबित करने के लिये सबसे ज़्यादा किया गया। अब चूँकि वक़्त बदल रहा है, तो मर्दों की कूटनीति भी तब्दीली का रुख़ इख़्तियार कर रही है। अरब जैसे भयंकर रूढ़िवादी देश भी नरमी का रुख़ अपना रहे हैं। नरमी अपना क्या रहे हैं, नरमी का दिखावा कर रहे हैं। इस्लामिक देशों में स्त्रियों को कार चलने की इजाज़त नहीं थी। इस बात को लेकर बड़ा हो हल्ला मचा। यानि आदमी अगर कार चला सकते हैं तो औरतों के मामले में मज़हब क्यों टांग अड़ा रहा है। आख़िर खुदा का इससे क्या लेना देना। ख़ैर, देर आये दुरुस्त आये। अरब के राजा ने बेहद दरियादिली का नमूना पेश करते हुए औरतों को कार चलाने की इजाज़त दे दी है। क्या बात है! अर्थात भीख का एक टुकड़ा और महिलाओं की तरफ़ उछाल दिया। ये कोई खुश होने की बात नहीं है साहब। भारत में भी अक्सर पति बड़ी महानता के साथ अपनी पत्नी को बाहर काम करने की अनुमति दे देते हैं। बीबी कमा के भी लाती है और घर का सारा काम भी बदस्तूर करती रहती है। यानि दोगुना बोझ उठाने लगती है।
समाज ने इतनी उन्नति कर ली लेकिन आधुनिक सोच वाले भी औरतों को नीचे गिराने के आधुनिक साधन ढूँढ ही लेते हैं अभी तक बलात्कार के मामलात में अक्सर लड़कियों की पोशाक मसलन जींस, स्कर्ट आदि को दोष दिया जाता था, जबकि मर्दों की इस हरकत का लिबास से कुछ लेना देना नहीं है। हाल ही में अमरीका में एक आदमी को पुलिस ने गिरफ़्तार किया क्योंकि उसने एक सोलह साल की बच्ची का बलात्कार किया था। दोषी के वकील ने अदालत में ये दलील दी कि कन्या ने छोटा और ख़ूबसूरत लेस वाला कच्छा पहना हुआ था जिसका मतलब हुआ कि वह भी सहमत थी। वाह क्या बात है। अरे लड़कियां सुन्दर कपड़े अपने लिये पहनती हैं। फ़ैशन के लिये और अच्छे लगने के लिये पहनती हैं। रेप करवाने के लिये नहीं। बाहरी वस्त्र दरकिनार, अब अंदर के कपड़े भी - हद्द है यार!
इस आधी दुनिया को ईश्वर ने आधा मुक़द्दर भी नहीं दिया। अर्धनारीश्वर के भारत देश ने औरत को नाम देवी का दिया लेकिन दर्जा देवदासी का। मनुस्मृति में लिखा है- "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" वाह कितने और कैसे-कैसे देवता रहते हैं यहाँ!

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