ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ज्ञान बरास्ते चाय-पकौड़े
CATEGORY : व्यंग्य 01-Oct-2018 08:13 PM 457
ज्ञान बरास्ते चाय-पकौड़े

मेरे पति के एक निहायत शरीफ दोस्त हैं। निहायत शरीफ मैंने इसलिए कहा क्योंकि ऐसा उन्हें स्वयं लगता है और दूसरों को भी यही लगता है कि जब भगवान उन्हें बना रहे थे तो शराफत का पूरा डिब्बा ही खाली हो गया था। उन्हें देखने से ही लगता है कि शराफत उनमें कूट-कूट के भरी गई है। अपनी स्त्री को छोड़कर किसी भी परस्त्री को वो नज़र उठाकर नहीं देखते। ये अलग बात है क़ि कोई परस्त्री सामने से आकर रास्ता पूछ ले तो थोड़ा बतिया लेते हैं। उनकी शराफत को शायद उनके माता-पिता ने बचपन में ही पहचान लिया होगा तभी तो उनका नाम "सज्जन" रखा।
वैसे वो ज्यादा किसी के घर आते-जाते नहीं लेकिन हमारे घर "अतिथि देवो भव" के तर्ज पर कभी भी बिना बताये चले आते हैं और इत्मीनान से मेरे पति से राजनीति और खेल पर बातें करते रहते है। "सज्जन" महोदयजी का मानना है कि राजनीति और खेल के बारे में बात करने का पुस्तैनी अधिकार सिर्फ और सिर्फ पुरुषों का है स्त्रियों को तो इस तरह की बहस में पड़ना ही नहीं चाहिए। उन्हें तो रसोईघर में अपना चूल्हा-चौका सम्हालना चाहिए। यही वजह है कि उनकी मुझसे कम और मेरे पति से ज्यादा बात होती हैं और ये बातें तब तक चलती रहती हैं जब तक कि चाय के साथ गरमा-गरम पकौड़े न आ जाये। यहाँ भी उनकी शराफत देखिये कभी पकौड़े ना मिलने पर नमकीन से ही काम चला लेते है, लेकिन जाते चाय पीकर ही हैं।
एक दिन शाम को चाय के वक्त अचानक ही "सज्जन" जी हमारे घर आये। मैंने दरवाजा खोला तो उन्होंने मेरे पति के बारे में पूछा तो। मैंने कहा- वो बाहर गये हैं। आप बैठिये, चाय लीजिये, वो आते होंगे"।
चाय का नाम सुनते ही वो अंदर आ गये और बैठते ही मुझ से बोले- एशियन गेम में तो भारत के खिलाड़ियों ने कमाल ही कर दिया, कितने मैडल झटक लाये।
मैंने एक मुस्कान के साथ चाय का प्याला उनके आगे बढ़ाया।
वे बोले- कमाल करती हैं आप भी। मैं एशियन गेम में खिलाड़ियो के प्रदर्शन की बात कर रहा हूँ और आप सिर्फ मुस्कुरा रही हैं।
अपने देश में किसी विचार पर अपनी राय न दो और चुप रह जाओ तो बोलने वाला व्यक्ति बहुत परेशान हो जाता है और वह आपको तब तक परेशान करेगा जब तक आप उसकी बातों का जबाब नहीं दे देते है। सामने वाला व्यक्ति हमेशा आपसे यही अपेक्षा रखता है क़ि वो जो बोल रहा है उसकी बातों की हां में हां मिलाकर तुरंत ही उसे एक गोल्ड दे देना चाहिये, चुप रहकर उसे इंतज़ार नहीं कराना चहिये।
फिर मैंने उन सज्जन से कहा- बहुत अच्छा प्रदर्शन किया सभी खिलाड़ियों ने। लेकिन जो कमाल हमारे देश की बेटियों ने किया वो काबिले तारीफ है। हमारे देश की बेटियां पूरी कोशिश करती हैं क़ि जहाँ भी जायें गोल्ड मैडल लेकर आयें और लाती भी हैं। लेकिन हमारे देश की विडंबना यह है क़ि जब बेटियां गोल्ड मैडल लाती हैं तो लोग बहुत खुश होते हैं लेकिन जब बेटियां हमारे घर में आती हैं तो लोग उदास हो जाते हैं।
उन्हें मुझसे इस प्रकार के उत्तर की उम्मीद न थी।
मेरी बात से वे थोड़े छनमना गये और बोले- कैसी बात करती हैं आप भी। प्राचीनकाल से हमारे देश में बेटियों को देवी का दर्जा दिया गया है और आज भी जब भी किसी लड़की का जन्म होता यही कहा जाता है लक्ष्मी आई है।
मैंने कहा- सही कहा आपने। जैसे हम लोग लक्ष्मी जी को सभी से छिपाकर तिजोरी में रखते हैं उसी तरह बेटियों को भी रखते हैं घर में छुपा कर और कुछ करने भी नहीं देते। वैसे भी लक्ष्मी जी भी कहाँ कुछ करती हैं। जहाँ एक तरफ अपने देश की बेटियां हर क्षेत्र में आगे हैं, बढ़ रही हैं - चाहे वह खेल का मैदान हो, साइंस हो या अंतरिक्ष। हर जगह अपने देश का और अपने परिवार का नाम रोशन कर रही हैं। वहीं दूसरी तरफ समाज का एक बहुत ही बड़ा वर्ग ये स्वीकार करने को तैयार नहीं कि बेटियों से भी उनका वंश आगे बढ़ सकता है। उन्हें तो आज भी बेटियां बोझ ही लगती हैं।
मेरी बातों को सुनकर सज्जन जी बोले- आज कुछ लड़कियां अच्छा कर रही हैं, लेकिन सभी थोड़ी ना अपने देश का नाम रोशन कर रही हैं।
मैंने कहा- सभी बेटियां कुछ अच्छा इसलिये नहीं कर पा रही हैं क्योंकि हम उन पर विश्वास नहीं करते क़ि वो कुछ अच्छा करेंगी। हम तो स्वयें बेटियों के भाग्यविधाता बन जाते हैं और चाहते हैं कि वो वही करें, जो हम कहें। फिर भी अगर बेटियां नाम रोशन न करें तो उन्हें आम जीवन जीने का हक़ नहीं है?
मुझसे उन्हें ऐसे प्रश्न की उन्हें उम्मीद न थी। कहाँ वो मुझे आजतक एक पाककला में परिपूर्ण महिला समझते थे जिसका कार्यक्षेत्र रसोईघर था। जो बेसन के घोल में करारे पकौड़े बनाती थी और साथ में मस्त अदरक की चाय। ऐसी महिला से वो हार कहाँ मानने वाले थे।
बोल उठे- लड़कियों को किसी ने कहाँ जीवन जीने से रोका है?
मैंने का कहा- कोई और क्यों रोकेगा जब घरवाले ही काफी हैं रोकने के लिये। और घरवाले जीवन जीने के लिये नहीं रोकते। लड़कियों को जीवन में आने से ही रोक देते हैं और नमन है उन माता-पिता को जो नौ महीने भी नहीं रुक पाते ये जानने के लिये क़ि उनकी सन्तान बेटा है या बेटी और जब पता चलता है बेटी आ रही तो उसे वहीं मार गिराते हैं।
मेरी बातें सुनकर सज्जन जी थोड़े गंभीर हो गये। तभी दरवाजे से मेरे पतिदेव आते दिखे। अपने दोस्त को देखकर मुझसे बोले - "अरे ये क्या बात हुई, सज्जन जी को सिर्फ चाय! जाओ पकौड़े भी लाओ।
जी अभी लायी..., कहकर मैं किचन में चली गयी।
जब तक मैं पकौडों के साथ वापस आयीं तब तक सज्जन जी जा चुके थे।

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