ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
गुरु गाँव से गुड़गाँवा तक
01-Mar-2016 12:00 AM 989     

जब भी बहिन के यहाँ गया हूँ, पालम विहार मोड़ पर खड़े हो-हो कर उँगलियों के बीच करीने से नोटें दबाए आरटीवी के कंडक्टर "गुड़गाँवा-गुड़गाँवा' चिल्लाते हुए मुझे बहुत आकर्षित करते रहे हैं। ये ठेठ भाषा में बात करते हैं। कोई कितना भी तुर्रम खाँ क्यों न हो इनकी "रे-तू' से सम्मानित हुए बिना नहीं बचता।
यह औद्योगिक शहर है। उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के मज़दूरों की साइकिलों से अटी सड़कों पर इन कंडक्टरों की आवाज़ें भी अपना खास वजूद रखती हैं। यहाँ साइकिलों और तिल-तिल भरी छोटी-छोटी बसों की सवारी करने वाली जनता को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन नहीं होता कि गुड़गाँव आज गरीब-मज़दूर की शरणस्थली है। भले ही यहाँ उन्हें लंबी-लंबी तनख़्वाहें नहीं मिलतीं लेकिन भूखे भी नहीं सोना पड़ता। मकान का किराया, खाना और दावा-दारू के वास्ते भी कुछ न कुछ बचा के ये लोग घर भी भेज ही देते हैं। इसका सीधा-सा अर्थ है कि यह गाँव न केवल अपना पेट भरता है बल्कि देश के अन्य प्रांतों के हज़ारों गाँवों का भी पेट भरता है।
इस गाँव का अपना इतिहास है। पुराणों से भी इसका गहरा नाता है। महाभारत काल में राजा युधिष्ठिर ने इन्द्रप्रस्थ बसाने के बाद राजधानी के निकटवर्ती इस गाँव को अपने धर्मगुरु द्रोणाचार्य को उपहार स्वरूप दिया था। महान गुरुभक्त एकलव्य का भी इस गुड़गांव से गहरा संबंध है। यहीं के जंगलों में उसने धनुर्विद्या का गहन अभ्यास किया था और यहीं उसने अपनी प्रतिभा के बदले गुरु दक्षिणा में अँगूठा दान देकर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया था। एक शिष्य ने गाँव दान किया था और दूसरे ने अंगूठा वह भी दाएँ हाथ का। किसका दान बड़ा है? यह इसी बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि एकलव्य के दान को दुनिया के हर कोने का बच्चा-बच्चा जानता है और युधिष्ठिर के दान को केवल गुड़गाँव। गुरुदक्षिणा में दिए जाने के कारण इसे गुरुग्राम कहा जाने लगा। अपभ्रंशों के विकास के साथ-साथ जैसे हर ग्राम गाँव हो गया गुरुग्राम भी गुरगांव हो गया और बिगड़ते-बिगड़ते गुरगांव से गुड़गाँव। गुड़गाँव भी कहाँ? गुड़गाँव तो पढे-लिखों के लिए है। आमजन के द्वारा तो इसे हरियाणवी में गुड़गाँवा-गुड़गाँवा ही पुकारे जाते हुए सुना जाता है। पौराणिक दृष्टि से तो अब इसका कोई खास महत्त्व नहीं है। गुरु द्रोणाचार्य के नाम पर एक तालाब के भग्नावशेष और साथ में लगा हुआ एक मंदिर भर है, जो कहने के लिए इसे सुदूर अतीत से भी जोड़ सकता है। इसके अलावा यहाँ शीतला माता का मन्दिर बहुत प्रसिद्ध है। देश-विदेश से पर्यटक शीतला माता की पूजा करने के लिए यहां आते हैं। शीतला माता के मन्दिर के अलावा भी पर्यटक यहां पर कई पर्यटक स्थलों की सैर कर सकते हैं। लेकिन इसे औद्योगिक तीर्थ कहना अधिक तर्क संगत है क्योंकि देशभर के हजारों गाँवों की रोटी का जुगाड़ यहीं से होता है।
भौगोलिक रूप में गुड़गाँव शहर भले ही हरियाणा में है लेकिन यह लगभग समूचे उत्तर भारत का अपना गाँव है। वर्तमान भौगोलिक स्वरूप वाले इस गुड़गाँव की स्थापना 15 अगस्त 1979 ई. को की गई थी। हरियाणा राज्य के दक्षिण-पूर्व में बसा यह शहर हरियाणा वालों की अपेक्षा नई दिल्ली वालों से अधिक दिली रिश्ता रखता है। अघाने पेट घुमंतुओं के लिए भले ही यह पर्यटन का आकर्षण न हो किन्तु रोजी-रोटी की खोज में आने वालों के लिए गुड़गाँव बहुत ही ख़ूबसूरत शहर है। दिल्ली से सटे इस शहर के उत्तर में दिल्ली के अलावा रोहतक भी है। पूर्व में फ़रीदाबाद और दक्षिण में उत्तर प्रदेश की सीमाएं लगती हैं। इसी के जैसे विकास की ओर अग्रसर उत्तर प्रदेश के नोएडा शहर से इसके तार सीधे जुड़े हुए हैं। नए विकसित हो रहे क्षेत्रों में फैक्ट्रियाँ ही फैक्ट्रियाँ हैं। दुनिया भर के देशों की तरह यहां भी सब ओर नवीनतम वास्तु शैली से तैयार की गर्इं शीशे की इमारतें ही इमारतें हैं। यहां 300 फ़ॉर्चुन 500 कंपनी हैं। छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी हर रूप और आकार की देशी-विदेशी कंपनियाँ हैं। इसका क्षेत्र कोई बहुत बड़ा नहीं है। शहरी और ग्रामीण कुल आबादी साढ़े सोलह लाख के आस-पास है, जिनमें ग्रामीण आबादी तो पूरी बीस हज़ार भी नहीं है। इसके बावजूद यहाँ का ग्रामीण इलाका कृषि और दुग्ध उत्पादन में अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति बनाए हुए है। बाहरी इलाकों में उपजने वाले अन्न, दूध और खनिज इसे गाँव कहे जाने का हक़ दिलाए हुए हैं। रबी और खरीफ की प्रमुख फ़सलों में गेहूँ, तिलहन, बाजरा, ज्वार और दलहन आदि महत्त्वपूर्ण फ़सलें हैं, जो इसे खाद्यान्न में आत्म निर्भर बनाती है। उद्योग और व्यापार की दृष्टि से यह औद्योगिक विकास का गलियारा बन चुका है। सूती वस्त्र, यंत्रचालित बुनाई और कृषि उपकरणों से संबंधित उद्योग हैं। यहाँ दवाओं से लेकर दैनिक उपयोग की हर चीज़ कहीं न कहीं आंटी हुई मिल जाएगी। इसीलिए दुनिया भर के प्रवासियों का ध्यान इसने अपनी ओर खींचा है। यह शहर दिल्ली-जयपुर राजमार्ग पर स्थित है। "मेक इन इंडिया' कैम्पेन के अंतर्गत दुनियाभर से यहाँ निवेश बढ़ा है। इधर के कुछ दिनों में इसका जबरदस्त औद्योगीकरण हुआ है। बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियों के कारख़ाने स्थापित किए गए हैं और निरंतर किए भी जा रहे हैं। देश के कोने-कोने से आए लाखों मज़दूर यहाँ काम कर रहे हैं। अपनी आजीविका कमा रहे हैं और सुदूर गाँवों में रह रहे अपने परिवारों को पाल रहे हैं। इसके अलावा गुड़गाँव को उत्तर भारत के आई.टी. सेक्टर का गढ़ भी कहा जाता है। गुड़गाँव ने कुछ ही समय में जबरदस्त प्रगति की है और हरियाणा सरकार इसे नई ऊँचाईयों तक ले जाने के लिए यहाँ नई परियोजनाएँ शुरू करने की कोशिश कर रही है। हैदराबाद के बाद इस शहर ने भी साइबर दुनिया में अपने अंगदी पाँव रोंप दिए हैं। अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण इसको साइबर सिटी के रूप में नई पहचान भी मिल रही है। इस साइबरी क्षेत्र में भी सारी दुनिया को इसने अपनी ओर आकृष्ट किया है। अकेले चीन देश से बीसों कंपनियाँ गुड़गाँव में निवेश कर रही हैं। मेरे कई चीनी छात्र-छात्राएँ गुड़गाँव में स्थित चीनी कंपनियों में सेवा देकर लौटे हैं। वे बता रहे थे कि गुड़गाँव बहुत ही जल्द इंडस्ट्रियल हब बनने वाला है।
देश के प्रस्तावित 100 स्मार्ट शहरों में यह भी शुमार है। इसका भी काया कल्प होगा। लेकिन स्मार्ट सिटी बनाने के पहले उन शहरों का भी निरीक्षण होना ज़रूरी है जो अपनी खूबियों के कारण स्मार्ट बने हुए हैं, खामियों के कारण नहीं। दुनिया भर के स्मार्ट सिटी की लिस्ट में पहले पायदान पर है मशहूर यूरोपियन फुटबॉल क्लब वाला शहर बार्सिलोना। गुड़गाँव की आबादी भी उसी के लगभग है। लेकिन किसी शहर को स्मार्ट सिटी बनने के लिए केवल लंबी-चौड़ी सड़कें, साफ-सुथरी गलियां या बहुमंज़िली इमारतें ही काफी नहीं हैं। इनके साथ-साथ उन्हें कुछ और भी चीज़ें मिलनी चाहिए जिनके अभाव में स्मार्ट सिटी औद्योगीकरण बढ़ने से उलटी दिशा की ओर चलने लग सकते हैं। स्मार्ट बनने के लिए उसे कई कसौटियों पर खरा उतरना पड़ता है। गुड़गाँव के भीतर जो गाँव है अगर वह बचा रहा तो इन कसौटियों पर इसे खरा उतरने में कोई परेशानी नहीं होगी अन्यथा इसकी सुंदरता को ग्रहण लग सकता है। इसकी स्मार्टनेस की चमक-दमक फीकी पड़ सकती है। हमें अपने स्मार्ट सिटी बनाने के पहले इन विंदुओं पर भी गंभीरता से विचार करना होगा कि आखिर इन शहरों में ऐसा क्या खास है जो इन्हें दुनिया भर के अन्य हजारों शहरों से अलग करता है। वे कौन-से मानदंड हैं जिनके आधार पर इन शहरों को दुनिया की बेस्ट सिटी का दर्जा दिया गया है। सिर्फ और सिर्फ अपने आर्थिक विकास और आसमान छूती इमारतों की वजह से तो इनमें से कोई शहर स्मार्ट नहीं बना होगा।
आखिर किसे कहेंगे स्मार्ट सिटी :
- एक शहर जहां की जलवायु शुद्ध हो, लोग खुली हवा में सांस ले सकें और जिससे सहरी जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सके।
- बिजली-पानी की सप्लाई 24 घंटे सुचारु हो यानी शहर में रहने वाले लोगों का जीवन स्तर उच्च हो। सुविधा संपन्न हो।
- दिनभर लोगों को ट्रैफिक में न जूझना पड़े, सार्वजनिक यातायात उपलब्ध हो जो वि?ा स्तरीय हो। सड़कें जाम से मुक्त हों।
- बुनियादी सुविधाएं जैसे किसी चीज की बुकिंग, बिल जमा करना, आदि बेहद सरल हो।
- सड़कें, इमारतें, शापिंग माल, सिनेप्लैक्स सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से बने हों। इमारतें नियम के तहत बनी हैं या नहीं, उनमें जरूरी सुविधाएं सुलभ हैं या नहीं। यह भी किसी शहर को स्मार्ट बनने में बड़ी भूमिका निभाता है।
- शहर के भीतरी इलाकों या नदी-नालों के किनारों पर झुग्गी-बस्तियां न हों। एक ऐसा शहर जहां लोगों के रहन-सहन में काफ़ी समानता हो। लेकिन झुग्गी में रहने वाले लोगों को वैकल्पिक सुविधा मुहैया कराई जाए। उन्हें अनाथ करके न छोड़ दिया जाए। सन् 2022 तक सभी को आवास उपलबध कराना।
- सड़कों पर कूड़ा न हो। सड़कें एकदम साफ हों जिससे जनजीवन को स्वच्छ पर्यावरण उपलब्ध कराया जा सके।

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