ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
गुरु दर्शन
CATEGORY : कहानी 01-Jul-2018 05:40 AM 579
गुरु दर्शन

गाड़ी तैयार है सर..., रामसिंह की आवाज़ थरथरा रही थी। यह गैरज़रूरी घोषणा रामसिंह ने आदत की मजबूरी से की। उसे पता था मुझे पता है। क्योंकि सारी गाड़ी की तैयारी मैंने अपनी आँखों से देखी थी : एक ए.के.-47 मशीनगन ड्राइवर की सीट के नीचे और एक छोटी पिस्तौल मेरे पिछले दरवाज़े में।
"सर जी, बॉडी गार्ड साथ लेकर चलो", अंग्रेजी के सर और हिंदी की जी को जोड़ कर रामसिंह मेरे से गिड़गिड़ा रहा था।
"तुम्हे कोई डर है, तो रामसिंह गाड़ी मैं खुद-ब-खुद चला लूंगा।"
"नहीं सर जी नहीं, मेरी ज़िन्दगी तो कुछ नहीं, पर आप की ज़िन्दगी बहुत-बहुत कीमती है। हज़ारों लोगों की ज़िन्दगी आप पर निर्भर है। आप उन सब के माई-बाप हैं, अन्न दाता।"
रामसिंह की आँखें भर आ रहीं थीं। इस लम्बे चौड़े, बड़ी-बड़ी मूंछों वाले, फौज से आये सैनिक को इस हालत में देखकर अपने को मैं बेबस महसूस कर रहा था। इस मानसिक कमज़ोरी में उसका कोई दोष नहीं था, हालात ही कुछ ऐसे बन आये थे।
काश वो समझ पाता कि अब मुझे अपनी ज़िन्दगी की कोई परवाह नहीं है।
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बारह घंटे निरंतर गाड़ी चलने के बावजूद रामसिंह चौकन्ना था, बन्दूकधारी सिपाही की तरह रामसिंह की आँखें निरंतर सब ओर देख रहीं थीं : कभी दायां शीशा, कभी बायां और फिर पीछे वाला। जब भी वह किसी दूसरी गाड़ी को पिछाड़ता, तो उसकी ओर घूर के देखता; मानो किसी छुपी बन्दूक की नली ढूंढ रहा हो, एक सच्चे सिपाही की तरह। जैसे कि अगर गोलियां चलीं तो वह अपने पाँवों से कत्थक नृत्य कर के गाड़ी की रफ़्तार ऐसे बदलेगा जैसे बौखलाया हुआ कुत्ता सड़क पार करता है और बचा लेगा अपने मालिक को।
हिमालय पर्वत की चोटियां हरे-भरे खेतों के पीछे से आँख मिचोलियाँ खेल रहीं हैं। लहलहाते खेत हाईवे के दोनों ओर फैले हैं, इस हाइवे को बनाया है जे.वी. बिल्डर्स ने। मैं हूँ जे.वी. -- जय वीर।
जागते रहने की मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ, किन्तु पिछले सप्ताह भर न सो पाना, मेरी आयु और मर्सडीज़ कार के पहिये की सड़क से उठती गुंजन, मुझे निद्रा मुद्रा में निरंतर उतारती जा रही है; जहाँ चेतन और उप-चेतन की खाई संकीर्ण होती जा रही है। दिमाग के पर्दे पर चल-चित्र-सी छवियाँ धूमिल पड़ती जा रही है। वे प्लास्टिक की ऐसी गुड़ियों से दिखते हैं, जिनके अंग किसी ने उखाड़कर फिर से जोड़ने का प्रयास किया हो।
मेरे जुड़वां बेटे और बेटी के हाथ किसी ने अदल-बदल कर दिए हैं। भारत के उच्चतम अस्पताल के डॉक्टर भी शर्मिंदा हैं, इस गलती के लिए। पर उनको मैं कोई दोष नहीं देता। दस वर्ष के मासूम बच्चों के मुलायम हाथ एक से ही दिखते हैं। है न?
जहाँ मेरे बेटे का पेट होना चाहिए था वहां बड़ा-सा गड्ढ़ा है, गुड़ी-मुड़ी उलझी-उलझी आँतों से भरा। बेटी का नीचे का बदन नहीं उड़ाया गया, शायद इसलिए कि हम उसकी दुर्दशा देख पाएं।
मेरी अर्धांगिनी के चेहरे का डरा हुआ भाव, साफ़ दिखाई दे रहा है। अजीब सी बात है कि उसका चेहरा ज्यों का त्यों है, जबकि नीचे का आधा बदन धोबी की गठरी-सा दिखता है, एक श्वेत चादर में लिपटा हुआ।
पुलिस ने वायदा किया है कि वो चौबीस घंटों में आतंकवादियों को पकड़ लेगी। पर अब क्या अंतर पड़ता है। पकड़ना था तो धमकी और बम विस्फोट के बीच के चौबीस घंटों में पकड़ना था; उससे पहले जब वे तीनों बम से उड़ा दिए गए, उसी हस्पताल के सामने वाले "स्पेगेटी फ्लाईओवर" पर, जहां मेरे दोनों बच्चों का जन्म हुआ था, चमचमाते प्राइवेट वाड्र्स में।
अब तो बस उनकी तोड़ी मरोड़ी काया पड़ी हैं स्टील की ट्रॉलियों पर। रोने और चिल्लाने की आवाज़ से घर गूँज रहा है। रिश्तेदार, मित्र, और नौकर, सभी मिलकर सुबकियों की जैसे निरंतर कविता पढ़ रहे हैं।
मेरी आँखें मरुस्थल की रेत जैसी सूखी-की-सूखी हैं। गलती से भी एक सुबकी मेरे हलक से नहीं निकली। दु:ख या करुणा का आभास तो गरम तवे से उड़ते पानी के छींटे सा लुप्त हो गया। मेरे बदन का हर परमाणु क्रोध की ज्वाला से तप रहा है। क्रोध की ज्वाला मेरी लाल रक्त कोशिकाओं के साथ सारे बदन में फैल रही है। अब जीने का कोई उद्देश्य नहीं रह गया।
केवल पिस्तौल की एक गोली मेरे मस्तिष्क में छेद कर सकती थी, वो मस्तिष्क जिस पर मुझे बहुत गर्व था, जो उन सब के जीवन बचाने में नाकारा साबित हुआ। किन्तु कायरता से मैं इस जीवन से छुटकारा नहीं पाना चाहता। जीने की अब कोई इच्छा नहीं बची, किन्तु अपने ढंग से इस दुनिया को छोड़ने की इच्छा और प्रबल हो गयी है।
आनंद आश्रम की चोटी से, खुली हवा में छलांग लगाने की इच्छा अभी भी बाकी है। तीस साल पहले नहीं कर पाया, गुरु जी ने पीछे से आकर पकड़ लिया था। किन्तु अब मुझे कोई नहीं रोक सकेगा, गुरूजी भी नहीं। भौतिक विज्ञान से मैंने पहले भी अनुमान लगाया था कि चोटी से खाई तक पहुंचने में पूरा एक मिनिट लगेगा, वह अनुमान आज भी नहीं बदला है; धरती का वातावरण प्रदूषित होने के बावजूद भी इतना भारी नहीं हुआ की मुझे गिरने से रोक ले। किन्तु इससे पहले कि मैं बाहें फैला, बिन पंख वाले पक्षी की तरहां उडूं, गुरु जी से पूछना चाहता हूँ :
क्यों?
मैं ही क्यों??
फिर से मैं ही क्यों???
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आश्रम पहुँचने के आखिर के दस मील पैदल ही जाने होते हैं, हज़ारों वर्षों से यही परंपरा चली आ रही है।
कुछ वर्षों पहले एक राजनीतिज्ञ ने सुझाव दिया था, कि जे.वी. बिल्डर्स यहां एक टोल वाली सड़क बना दे और टोल लेता रहे। एक तो मेरे लिए आमदनी का एक और रास्ता बन जायेगा, और दूसरा वहां पहुंचने में मुझे कम समय लगेगा, मेरी नियमित तीर्थ यात्राओं में।
शायद उसे अपने कमीशन लेने का पूरा ख्याल था। मैंने मना कर दिया। यूं तो कमीशन देने में मुझे कोई एतराज़ नहीं था, किन्तु मैं हर बार पैदल चलना चाहता था; वैसे ही, जैसे तीस वर्ष पहले स्वामी आनंद के दर्शन करने के लिए चला था। क्योंकि इस चढ़ाई ने मुझे जीना सिखाया था; उतना ही, जितना कि स्वामी जी ने।
आज लग रहा है कि काश मैंने वो सड़क बनाई होती। यद्यपि मैं एक फ़ोन लाइन तो लगवा चुका हूँ, ताकि स्वामी जी से हर सप्ताह कम से कम एक बार तो बात कर पाऊँ। जब दिल्ली से मैंने फ़ोन किया था, वो बस इतना ही बोले थे, "हैं जय, जल्दी आ जाओ, मुझे सब पता है।"
चढ़ाई के लिए मैं मानसिक रूप से पूरा तैयार था। नीचे से ऊपर जाते लोगों की एक लम्बी कतार दिख रही थी, कुछ जवान, कुछ बच्चे और कुछ वृद्ध लोग, जिन्हें टोकरी में लाद मज़दूर अपनी पीठ पर ढो रहे थे।
"सर, आप सारा रास्ता पैदल ना चलें। मैंने एक मजदूर का इंतजाम कर लिया है। म्हारे होते हुए आप को इस हालत में, मैं पैदल न जाने दूंगा।" रामसिंह मेरी देखभाल करने की पूरी कोशिश कर रहा है। मेरे से सिर्फ पांच साल छोटा यह हरयानवी जाट अभी भी पहलवान है।
"रामसिंह, मेरी टांगें बम से नहीं उड़ाई गयीं, समझे?"
मुंह लटकाये उसने मेरा थैला लिया और रास्ता साफ़ करते आगे आगे भागने लगा। किसी ने उसको रोका नहीं, शायद सब को मेरे दुर्भाग्य का पता था, इसी लिए उनके चेहरे पे सहानुभूति की झलक दिखाई दे रही थी।
कुछ कुछ देर बाद कोई न कोई या तो मुझे प्रणाम करता हाथ जोड़ कर या मेरे पैरों को छू लेता। उनमें से कोई भी मेरा परिचित न था। किन्तु वो या तो जे.वी. इंडस्ट्रीज का कर्मचारी हो सकता है या उसे मेरी किसी परोपकारी संस्था से कुछ राहत मिली हो। पहले सामान्य रूप से मैं कुछ पल रुक कर कई लोगों से बात किया करता था, पर आज नहीं।
मेरा लक्ष्य है पहले पड़ाव को पार कर दूसरे पड़ाव के रेस्ट-हाउस तक पहुंचना। ये रेस्ट-हाउस भी मैंने ही बनवाए थे। मैं कल तक स्वामी जी के पास पहुंचना चाहता हूँ, हर हालत में।
फिर? फिर मैं नहीं जनता!
कल तीसवीं वर्षगांठ है, मेरे आश्रम जाकर स्वामी जी के पहले दर्शन की। तब भी मैंने सब कुछ खोया था : माता पिता, और प्यारी से जुड़वा बहनों को, कार एसिडेंट में सिविल इंजीनियरिंग की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के कुछ ही दिन बाद।
"हवाई जहाज़ में उड़ो, हवा में नहीं।" स्वामी जी ने कहा था, जब उन्होंने मुझे देखा, चोटी के ऊपर बने मंदिर के छोर पर बाहें फैलाये खड़ा, मानो अभी उड़ जाऊँगा, बिन पंखों के। मेरे दिल की बात उन्होंने पढ़ ली थी मेरी आँखों से। गेरुए चोगे में वो बहुत लम्बे दिख रहे थे, पर जब उन्होंने अपनी बाहों में लिया मुझे तो वो मेरे काँधे तक ही आये।
"जाओ भारत बनाओ।" उन्होंने बड़े आत्मविश्वास से कहा; वही आत्मविश्वास मेरे दिल और दिमाग में घर कर बैठा। और फिर भारत का निर्माण करने में मुझे कभी भी भय का अनुभव नहीं हुआ, चाहे कितनी भी कठिनाइयां मेरे सामने दानव की तरहां तैनात हुई हों।
मेरे माता-पिता और बहिनें फिर तो एक रूप से भाग्यवान थे, उनका अंत क्षण भर में हो गया। मेरे बीवी और बच्चों को चौबीस घंटे तक अपनी मृत्यु को अपनी ओर आते देखना पड़ा, जैसे बिल्ले को आता देख कबूतर, डर से भयभीत। उनको क्या विश्वास था कि में करोड़ों का मालिक जय वीर, किसी न किसी तरह उनको बचा लूँगा। भय से कैसे कांपे होंगे वो जब आतंकवादी उनको बारूद से बाँध कर अपनी गाड़ी में चल दिए, पीछे की खिड़की से बम का रिमोट कंट्रोल उनको देखते हुए, जैसे कि उनकी भेजी हुई वीडिओ में था।
क्या उन्हें मुझ पर विश्वास था, अंत समय तक? या वो समझ गए थे कि मैं उनको नहीं बचा पाऊंगा। इस बीच उन्हें कुछ खाने को मिला कि नहीं? क्या उन्हें तड़पाया गया, शारीरिक यातनाओं से? आतंकवादियों ने मुझे ही क्यों चुना? इसलिए कि मैंने भारत की सीमा पर जाने वाली सड़क बना दी थी, जो भारतीय सैनिकों को वहां तेज़ी से ले जा सकती है। शायद नहीं, यह कुछ अस्वाभाविक है। फिर क्यों? क्यों?? क्यों???
मेरी टांगें मुझे तीव्रता से आगे लिए जा रही हैं, मानो कि मैं लकड़ी की लम्बी लम्बी टांगों पर नट जैसे चल रहा हूँ। स्वामी जी से सीखा हुआ योग और ध्यान अब भी मुझे यूँ चलने योग्य बनाये हुए है। सोचता था कि मैंने काम, क्रोध और लोभ को त्याग दिया है; पर नहीं, कम-से-कम क्रोध को नहीं।
जहां भी संभव था मैं दो-दो सीढ़ियाँ फलांग रहा था। मैंने सड़क नहीं बनाई, इसलिए हर वर्ष अपने कर्मचारियों को भेज कर, सीढ़ियों की मरम्मत कराता रहा। हर वर्ष बर्फ पिघलने पर जब पानी तीव्रता से बहता, तो कई सीढ़ियां भी बह जातीं।
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बिस्तर पर लेटा तो हर मांसपेशी आग उगलने लगी। यह तेज़ी से चढ़ने की वजह से था? या मेरे अंदर सुलगते हुए क्रोध की वजह से? किसी तरह मुझे दाहगृह से अपना ध्यान हटाना है।
चहकते हुए झींगुर, चिल्लाते हुए उल्लू, और गरजते हुए जानवरों की आवाज़ ने कुछ देर मेरा ध्यान बँटा दिया, तीस वर्ष पुराने जंगलों की ओर; तब थोड़े से तीर्थयात्री ही आते थे और रात पत्थर की कुटियाओं में सोते थे।
तब कच्ची लकड़ी के दरवाज़े के बाहर तेंदुए भी घूमते थे। अब एक बहुमंज़िली इमारत है, जिसमें सैंकड़ों लोगों ने महीनों पहले अपने-अपने कमरे बुक कर लिए थे। सबसे ऊपर की मंज़िल पे मेरा अपना तीन कमरों का फ्लैट है। उनके सामने के बरामदे में रामसिंह सिंह तैनात है, ए.के.-47 के साथ।
जब मैंने आश्रम फ़ोन किया तो किसी ने बताया की स्वामी जी ध्यान में हैं। मैंने भी ध्यान लगाने की कोशिश की, किन्तु विचलित मन ध्यान में ठहरना नहीं चाहता था, उसको तो वही भयानक दृश्य दिख रहे थे। एक हल्की-सी दस्तक मुझे फिर इस दुनिया में वापस ले आयी।
"नहीं, अभी तुम जे.वी. साहब से नहीं मिल सकतीं।" रामसिंह ने किसी को ज़ोर से कहा।
"रहम करो, जा लेने दो मुझे, मेरे बच्चे को उनके आशीर्वाद की ख़ास ज़रूरत है।" एक महिला की धीमी सी आवाज़ आयी।
"सुबह आना।" रामसिंह बोला।
"राम, इन्हे अंदर आने दो।" बिस्तर से बिना उठे ही मैंने कहा।
एक मासूम-सी औरत, औरत क्या बीस साल से कम की जवान बच्ची थी, जो अपने बच्चे को बाहों में लिए, सर झुकाये अंदर आयी। उसका काला कश्मीरी कुरता, नफ़ीस कड़ाई वाला, पर सिलवटों से भरा और कहीं कहीं से फटा, उसके पहनने के लायक नहीं रहा था।
मैंने दरवाज़े के पास रखे सोफे पे बैठने का इशारा किया। बच्चे को बाहों में यूं भरे हुए वो बैठ गयी, मानो वो कोई पुतला हो। पुराने से कपड़ों में लिपटा, नाज़ुक सा बच्चा सोता रहा।
"क्या कर सकता हूँ मैं तुम्हारे लिए?"
"इस को...," वो सहम के फिर से बोली, "मेरे बेटे को गोद ले लीजिये।"
"क्या? क्यों?"
"मैं अकेली इसकी परवरिश नहीं कर सकती।"
"अकेले? क्यों? इसके पिता कहां हैं?"
उसका चेहरा झुक गया और वो ज़मीन की ओर देखने लगी।
"मुझे अब नहीं जीना।" वो बोली, कांपती हुई आवाज़ में।
मेरी धड़कन मनो रुक गयी। ज़ुबान बेज़ुबान हो गयी। मैंने निगलने की कोशिश की, पर कुछ हलक से नीचे उतरा नहीं। मेरे मरने की इच्छा अब तक मेरा एक हिस्सा बन चुकी थी, पर किसी और की यह इच्छा होना कुछ और बात थी।
"जो भी हो" में धीमे से बोला, "इस बच्चे की परवरिश तुम्हें करनी ही होगी, भगवान की देन है यह।"
"आपके साथ इसकी ज़िन्दगी बन जाएगी और आपको भी इसकी ज़रुरत है।"
"नहीं, मुझे कोई नहीं चाहिए", मैं चिल्लाया। गुस्से की एक लहर मेरे अंदर बिजली की तरहां कौंध गयी, "तुम्हें कोई हक़ नहीं, मुझे बताने का की मुझे क्या चाहिए।"
"फिर आपको क्या हक़ है मुझे ज़िंदा रहने को कहने का?"
"तुम्हें क्या मालूम कि मुझे क्या चाहिए?"
"आपके चेहरे पर मैंने देखा था, जब आपके पाँव छुए मैंने, आज सुबह।"
"मैं जानता हूँ कि मुझे क्या चाहिए, और तुम उसको बदल नहीं सकतीं।" मैं सीधा बैठ गया, उसको जाने का इशारा देते हुए।
"इस बच्चे को आपकी ज़रूरत है और आपको इसकी, जिसका बाप कोई है उन सबमें से जिन्होंने कश्मीर से हमें निकालते हुए हज़ारों आदमियों की जानें लीं और उनसे ज़्यादा औरतों की इज़्ज़त।"
मैं स्तंम्भित रह गया, अभी तक मैं क्यों नहीं समझा था इसकी दुर्दशा। आखिर बोला, "देखो, तुम्हें जो भी चाहिए मैं उसका बंदोबस्त कर दूंगा। कल सुबह फिर आ जाना।"
वो बेमन वापिस चली गयी, एक अजीब सा सन्नाटा छोड़ते हुए। सोचते-सोचते मेरी झपकी लग गयी।
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अगले दिन वो वापिस नहीं आयी। मुझे फ़िक्र तो हुयी, पर गुरू जी तक पहुंचने की जल्दी में प्रातःकाल निकल पड़ा। आखिरी चढ़ाई आसानी से पूरी हो गयी, क्योंकि ज़्यादातर लोग प्रातःकाल नहीं चल पाते।
मैं सोचता रहा कि किसकी ज़्यादा दुर्दशा है, उसकी या मेरी। मैंने परिवार खो दिया, उसे बच्चा मिला, पर परिवार नहीं।
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जब मैं आश्रम पहुंचा तो सूरज पहाड़ी की पश्चिम वाली खाई में डूब रहा था। उस ओर गहरी खाई मुझे बिन देखे दिख रही थी और उसके तल में कल-कल चलता जल का एक स्रोत।
दर्शकों की बाहर लगी लम्बी पंक्ति बिलकुल हिल नहीं रही थी। और सब के चेहरे उतरे हुए थे। स्वामी जी का एक सेवक जल्दी से मुझे अंदर ले गया।
"जे.वी. साहब आप ठीक समय पे आ गए।" वह बोला, आँखों में आंसू लिए हुए।
"क्या हुआ?" किसी दुखद समाचार का चेहरा मुझे दिख रहा था।
"स्वामी जी ने कहा था कि आप आ रहे हो, चिंता की कोई बात नहीं।" अब एक आंसू बह ही निकला, उसने चुपके से पोछने की कोशिश की।
"क्या मतलब, कहाँ है वो?" मैं सब ओर नज़र दौड़ा रहा था, जाने पहचाने रास्तों से आते जाते।
"उन्होंने समाधी ले ली।"
मैं किंकर्तव्य विमूढ़ वृक्ष सा खड़ा रह गया। कुछ समय बाद मुझे होश आया तो समझा उसके कहने का क्या अर्थ था कि, "तुम जल्दी आ जाओ।"
"पर दो दिन पहले ही तो मैंने उनसे बात की थी।" मैंने फिर भी पुछा।
"दो दिन पहले हमें भी नहीं पता था। कल उन्होंने विधिवत स्नान किया और ध्यान में बैठ गये।"
"मेरा इंतज़ार क्यों नहीं किया?" मैं अपनी बेबसी को क्रोध में बदल रहा था। "कैसे किया?"
सेवक बहुत शांति से बोला, "चौबीस घंटे तक उन्होंने ध्यान किया और फिर शव आसान में लेट गये और अपने आत्मबल से शरीर के सब अंगों को धीरे-धीरे चलने से रोक लिया। इतना शक्तिमान था उनका मनोबल।"
बात करते करते हम उस कमरे तक पहुँच गए जिसका एक छज्जा उस खाई की ओर खुलता है।
वहां स्वामी जी का पार्थिव शरीर एक मृग छाल पे पड़ा है, श्वेत चादर में लिपटा।
निराशा का एक भंवर मेरे अंदर उठ रहा है। मैं कुरुक्षेत्र में अर्जुन सा भयभीत हो रहा हूँ। मेरे कदम अपने आप उस छज्जे की ओर मुझे ले जा रहे हैं, जहां से एक ही कदम मुझे हवा में उड़ा देगा। मेरा दिमाग एक पागल इंसान की तरहां घूम रहा है।
जैसे ही मैंने अगला कदम लिया, स्वामी जी बोले, "जय लौट आओ।" मुड़ के देखा तो स्वामी जी ज्यों के त्यों लेटे हैं, सचमुच के शव आसन में।
सेवक के हाथ में एक कागज़ का पन्ना है। स्वामी जी की लिखावट मुझे साफ़ दिख रही है।
प्रिया जय,
समय आ गया है कि जब इस आश्रम का सारा कार्यभार मैं तुम पर छोड़ दूँ। जैसे मेरे गुरूजी ने मुझे सौंपा था।
अपना ख्याल रखना। क्योंकि अब तुम्हें उन लाखों लोगों का ख्याल करना है जो नित्य यहाँ आते हैं।
अब तुम्हीं हो स्वामी आनंद।
मैं उनके बदन के पास झुक गया। आंसुओं की झड़ी निरंतर बहने लगी। मेरा सारा बदन सिसकियों से हिलने लगा। जब होश आया तो सब ओर अँधेरा ही अँधेरा था। एक इकलौता दिया जल रहा था। उस दिए की सुनहरी रौशनी में उनका चेहरा आनंद से दमक रहा था। एक हलकी सी मुस्कान उनके चेहरे पर अभी भी बिखरी थी। सारे जीवन का योगाभ्यास और समाधि की क्रिया के कारण उनका पार्थिव शरीर कई दिन तक क्षय नहीं होगा, यह मुझे पता था।
मैं उस छज्जे से खाई की ओर बढ़ा, जो कई सौ मीटर नीचे जा रही थी। मैंने एक कदम लिया, बाहें फैलाईं और क्षतिग्रस्त हवाई जहाज़ की तरह सीधा नीचे गिरने लगा। तीव्र गति से टकराती हवा मेरे कानों में सीटी बजा रही थी। आँखों से आंसू निकल कर ऊपर को जा रहे थे।
मेरे सारे शरीर में एक कँपन सी फैल गयी और मेरी कुण्डलनी से एक बिजली की धारा सातों चक्रों को पार कर, मेरे सहस्रा चक्र से निकलकर अंतरिक्ष में पहुँच गयीं। मैं भ्रमित दुनिया से निकलकर जैसे वापस इस दुनिया में आ गया, मुझे प्रतीत हुआ जैसे स्वामीजी स्वयं मुझे गेरुआ वस्त्र धारण करा रहे हैं।
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अगले ही दिन, मैं उन गेरुआ वस्त्रों में बैठा सब लोगों को दर्शन दे रहा था। उनके जीवन की कठिनाइयों की कहानियों ने मुझे मेरी अपनी कहानी भुला दी।
तभी मुझे वह कश्मीरी महिला दिखाई दी। वो मुस्कराते-मुस्कुराते मेरे पास आई, मेर पाँव छुए और अपने बेटे को मेरी गोदी में डाल दिया। कुछ ही क्षणों बाद उसका बच्चा खिलखिला उठा, मानों उसमें किसी प्रफुल्लित आत्मा ने प्रवेश पा लिया हो। महिला ने उसे बड़े वात्सल्य से उठाया, और ख़ुशी ख़ुशी चली गयी।
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ये बहुत साल पहले की बात है।
रामसिंह सिंह मेरे साथ रह गया। वह ए.के.-47 को रखना चाहता था। मैंने मना कर दिया। जे.वी. इंडस्ट्रीज को अब एक बोर्ड देखता है।
दर्शन लेने वालों की पंक्तियाँ इतनी बढ़ गयी हैं कि एक छोर से दूसरा छोर दिखायी नहीं देता।
जब भी कोई मुझे कहता है कि उसके जीने का कोई कारण नहीं बचा, मैं यही कहानी उसको सुना देता हूँ।
और हां, आश्रम के अगले गुरू की मुझे अभी भी तलाश है। तुम जहां भी हो आनंद, आश्रम आ जाओ। मैं प्रतीक्षा करूँगा, जब तक तुम सांसारिक सुखों और दुखों के भोग से निवृत्त नहीं हो लेते।

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