ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
गुजिश्ता वक्त की तस्वीर पढ़ना आना चाहिए
01-Oct-2018 08:38 PM 375     

गुजिश्ता वक्त की तस्वीर

किसी रतजगे को पार करके आया मुसाफिर
आंखों में फैली थकान की चादर को समेटे हुए
नींद का इंतजार नहीं करता
नींद चली आती है
सफेद घोड़ों पर सवार होकर।

स्याह आसमान की छाती पर
गहरा समुंदर सिलवटें लिए फिरता है
लहर आती है
लहर जाती है
चांदनी की बारिश में मुस्कुराती हुई
तुम्हारी मूरत-सी।

कुछ ख्वाब उड़ते हैं
घोड़े पर सवार होकर
चांद की मुलायम रौशनी पर
फैले सुकून की दास्तान को
बार-बार बुनता है वक़्त
गुनगुनाता है।

सैकड़ों गुलाब उभर आते हैं आंखों में
जब उजाले से लिपटी हुई
एक गुजिश्ता वक्त की तस्वीर
उभर आई हो आंखों में
तमाम बातें गुजर गई
एक मुकम्मल बात के बाद।

 


पढ़ना आना चाहिए

तुम्हें सूखी मिटटी को भी पढ़ना आना चाहिए
एक आशबार की तरह
मत लौट आना मरुस्थलों से
पानी की नाउम्मीद करके
गुमसुम हवाओं के तिलिस्म
अभी ठहरे हैं गठरी में समुंदर बांधे।

किसी टूटी हुई नींद का रतजगा भी
किसी सैलाब से कम नहीं होता
जब चढ़े हो मन की दहलीज पर मेहंदी के रंग
किसी दरिया में ढलकर
रात भी बह जाएगी घुटनों के बल।

महज चार दिन का नहीं होता
यह हजारों मील फैला आंसुओं का नमकीन सोता
यकीनन बूंद गिरती मुसलसल आंख
मुस्कुराहट की कोरों पर टिकी एक कश्ती है
जिसका अधसोया हुआ माझी
किसी साहिल के इंतजार में
बार-बार करवट बदल रहा हैै।

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