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गुजिश्ता दौर के ऐतिहासिक चरित्र
01-Sep-2016 12:00 AM 5052     

साहित्यिक दृष्टि से आज हिंदी बहुत समृद्ध है। नाना विधाओं के साहित्य से हिन्दी का रचना संसार जगर-मगर है। कविता की सरिता तो आठवीं-नवीं सदी में ही बह निकली थी। लेकिन गद्य का झरना उन्नीसवीं सदी में आके फूटा। गद्य की विधाओं में सबसे प्रमुख विधा उपन्यास है और इस उपन्यास लेखन की परंपरा आधुनिक काल के अपने प्रथम चरण भारतेंदु युग से ही आरंभ हो जाती है। आरंभ तिलस्म और ऐय्यारी से होता है। बाबू देवकी नंदन खत्री के इस ऐय्यारी और औपन्यासिक तिलस्म के मोहजाल में बंधकर दक्षिण भारतीयों तक ने हिन्दी सीखी। पर यह तिलस्म ज़्यादा लंबे समय तक नहीं चला। मुंशी प्रेमचंद ने इस विधा को  तिलस्म और राजा-रानी के रंगमहलों  से निकालकर भारतीय जनजीवन के बीच रखा। इसी बीच छिड़ी आजादी की लड़ाई ने भी अपना रंग दिखाया। उपन्यास को एक और दिशा यानी इतिहास की ओर भी हाथ पकड़कर ले जाने की कोशिश की। इस कोशिश में उसके हाथ लगे वृन्दावन लाल वर्मा। उन्होंने बहुमूल्य ऐतिहासिक उपन्यास लिखे। लेकिन उनके बाद यह सरिता जैसे किसी पठार के पीछे अटक के रह गई थी। इसलिए ऐतिहासिक उपन्यासों के लेखन की यह परंपरा बहुत समृद्ध नहीं बन पाई। लेकिन उत्साहित करने वाली बात यह है कि उस पठार को तोड़ने का काम साहित्य के दशरथ मांझी डॉ. सुधाकर अदीब ने "शाने तारीख़" और "रंगरांची" की छेनी-हथौड़ी से कर दिया है।
इनके इन दोनों उपन्यासों से अभी हाल में मेरा साबका पड़ा। पहला है शेरशाह पर आधारित "शाने तारीख़" और दूसरा है "रंग रांची"।
शेरशाह सूरी महज एक बादशाह नहीं "शाने तारीख़" था। वह अपने समय का एक ऐसा व्यक्ति था जो किसी राजवंश में नहीं जन्मा था! एकदम धूल से उठा एक ऐसा व्यक्तित्व था जो संघर्ष की आँधियों में तपकर मध्यकालीन भारत के राजनैतिक आकाश पर एक तूफ़ान की तरह छ गया। एक ऐसा अभूतपूर्व तूफ़ान जो सिर्फ पांच बरस चला, मगर जो अपना असर सदियों तक के लिए इस धरती पर छोड़ गया। हुमायूँ के सुयोग्य बेटे अकबर ने भी अपने पूर्ववर्ती शेरशाह के सुशासन और उसकी धार्मिक सहिष्णुता का अनुगमन किया और उसके दिखाये मार्ग पर सुदीर्घ काल तक चलकर ही वह महान बना। शेरशाह ने सूत्र रूप में जो राजकाज के सिद्धांत दिये उन्हें और भी विकसित कर जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर इतिहास में अपना नाम अमर कर गया। लेकिन जो लोग अपनी राह खुद बनाते हैं इतिहास में उनका नाम चाहे जितना श्वेत और श्याम हो, समय उनसे प्रेरित होकर उसमें नित नये रंग भरता है। शेरशाह सूरी इस लिहाज से अकबर महान से भी अधिक एक रचनात्मक प्रतिभासंपन व्यक्ति और उससे बड़ा राष्ट्र-निर्माता था। यदि उसे अपने जीवन में दस-पंद्रह बरस और मिले होते तो शायद लोग अकबर को भी उस तरह याद न करते जैसा आज करते हैं। शेरशाह वास्तव में इतिहास का गौरव था।
"रंगरांची" मीरा के जीवन पर केन्द्रित उपन्यास है। उसके जीवन संघर्षों की गाथा है यह। इस दृष्टि से जीवनी परक ऐतिहासिक उपन्यास कहना अधिक तर्क संगत लगता है। जीवनी इसलिए कि इसमें उनके जीवन का क्रमिक और प्रामाणिक विकास मिलता है। इतिहास इसलिए कि केवल मीरा के जीवन का ही नहीं समूचे राजपूताने की शौर्यगाथा का तिथिवार घटनाक्रम यहाँ मौजूद है। उपन्यास इसलिए कि मीरा के जीवनाख्यान को  अपने ढंग से विकसित कर उसे न्याय दिलाने के लिए उपन्यासकार ने इतिहास को केवल हाज़िर-नाज़िर मानकर कसम  खाने भर के लिए रखा है। यह इसलिए भी कि यहाँ इतिहास की मीरा नहीं साहित्य की मीरा हैं। यहाँ मीरा के जीवन में  इतिहास की जितनी दखल है बस उतना भर इतिहास यहाँ है
"रंगरांची" में इतिहास, भक्ति और साहित्य  की त्रिवेणी प्रवाहित है। लेकिन प्रयाग की भौतिक त्रिवेणी की तुलना में इस मानसी त्रिवेणी की भक्ति-सरस्वती साहित्य और इतिहास की गंगा यमुना से अधिक वेगवती है। उपन्यास अट्ठारह आरोहों में विभक्त है। सभी आरोह मीरा के पदों की प्रथम पंक्तियों से आरंभ होते हैं। पीया बिन सूनो छै म्हारो देश, मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई, दरस बिन दूखन लागे नैन, म्हाने चाकर राखो जी और मैं तो गिरिधर के रंग रांची जैसे उपशीर्षक प्रथम दृष्टि में ही अपनी काव्यात्मकता से आकृष्ट कर लेते है। पूरे उपन्यास को उपशीर्षकों में बांटना सोद्देश्य है। ये सभी मीरा के जीवन में समाई वैष्णवी भक्ति की शक्ति को नाना रूपों-स्वरूपों में व्याख्यायित करने की चेष्टाएँ हैं। ये चेष्टाएँ बताती हैं कि मीरा केवल भक्त थीं। वे कुछ और थी ही नहीं। गृहस्थ होकर भी वे गृहस्थ कब थीं? वे तो सदा संन्यासिनी ही रहीं। कृष्ण के रंग में रंगी मीरा।
सन् 1516 ईसवी के सामंती समाज वाले कालखंड में मीरा ब्याह के चित्तौड़गढ़ आई थी। जिस गढ़ में वह आई थी उसकी मर्यादाएँ और रूढ़ियाँ तो प्राचीरों से भी अधिक अलंघ्य थीं। कुँवर भोजराज के संयोगकाल में तो ये उतनी भयावह नहीं लगी थीं  जितनी कि उनके देहावसान के बाद। वे जम की फांसी लगने लगती हैं। इसीलिए वह उन्हें काटना चाहती है और प्रभु से आराधना करती है "काटो जम की फांसी।"
इस उपन्यास में इतिहास का आना घटना भर है कोई अनिवार्य  प्रयोजन का हेतु नहीं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि लेखक उन घटनाओं के परिणामों की अनदेखी कर आगे बढ़ जाए। उसे लगता है कि भाई-भाई के बीच की मारकाट में राजपूती शान बघारना भला वीरता कैसे हो सकती है? इसीलिए इस परिवेश को पाकर लेखक की करुणा भी विद्रोही हो जाती है।
प्रत्येक आरोह में उद्धृत पदों और उनके विस्तार के जरिए मीरा की भक्ति की हर व्याख्या भावुक करती है। लेकिन विवाह के बाद मीरा के इस आध्यात्मिक दांपत्य सुख को भौतिक पुरुष ने जिस तरह से बाँट लिया था, उसकी व्याख्या करते हुए "अदीब" एक सामान्य साहित्यकार से बहुत ऊपर उठकर अध्यात्म-पुरुष बन जाते हैं। इनकी  मीरा भी स्वयं कहती है, "मीरा जो केवल श्रीकृष्ण की अनन्य दासी बनकर रहना चाहती थी, उसकी साँसों पर अब एक राजपुरुष का अधिकार था।" मीरा के अध्यात्म को शब्द दे पाना इतना आसान भी नहीं था, पर यहाँ इतना आसान कर दिया है कि इन पंक्तियों पर नज़र पड़ते ही ये आँखों से होते हुए भीतर उतर जाती हैं।
उपन्यासकार युद्धों की विनाशलीला से आहात है। शायद इसीलिए वह राणा सांगा के युद्धों और उनकी वीरता की निरर्थकता को कोसते हुए विक्रमादित्य से कहलाता है, सारी ज़िंदगी बाबों सा युद्ध लड़ते रहे। और शत्रुओं से लड़ने में मेवादी सेना को कटवाते रहे। पर आखीर में गुज़रे तो मुट्ठी भर सैनिक और कौड़ियों के बराबर खजाना हमारे लिए छोड़ गए। इतनी मारकाट और रक्तपात से आखीर हमें क्या मिला?
मीरा चाहे दुर्ग में रहीं चाहे दुर्ग से बाहर ,वे कभी किसी से डरीं बिल्कुल नहीं। उनकी क्रांतिधर्मी चेतना सदैव सजग रही। भोजराज के देहावसान पर सती होने से उन्होंने साफ-साफ माना कर दिया था। इनका सती होने से इनकार करना मध्यकालीन समाज में एक बड़ी क्रान्ति थी। मीरा अपने मजबूत तर्कों से सती प्रथा का खंडन करती हैं, जो जीवन हमें परमात्मा ने दिया है उसे हम ऐसी अविवेकपूर्ण मान्यताओं के सम्मुख क्यों अग्नि की भेंट चढ़ा दें?
इस क्रान्ति की आग उनकी चेतना में सतत सुलगती रहती थी। ऐसी आग वाली  मीरा भला आत्महत्या कर सकती थी। पर,जब वह समुद्र की ओर गई तो लोगों ने यहाँ तक कि उसकी सहेली ललिता ने भी समझा था कि मीरा ने आत्महत्या कर ली। लेकिन मीरा उद्विग्न बहुत थीं। इन परिस्थितियों के माध्यम से उपन्यासकार सुधाकर अदीब मीरा की मृत्यु के रहस्य को रहस्य ही रहने देना चाहते हैं। ब्राह्मणों के अपने साथ ले जाने के आग्रह मीरा को डिगा न सके। वे मुख्य  पुजारी से अनुमति लेकर द्वारकाधीश के विग्रह से मिलीं और "घुटनों के बल बैठीं।"वे उस अवस्था में बैठकर अपने इष्ट से कुछ शिकायत करना चाहती थीं। एक ऐसी शिकायत जो सारे स्त्री समाज की थी।
उपन्यासकार ने उन्हें उसी स्थिति में बैठे रहने देकर कहानी की उत्सुकता को और बढ़ा दिया है। वे कथा को समापन की ओर ले जाते हुए शंख नहीं बजाते हैं बल्कि ऐसा लगता है कि आहिस्ता से कथा की उस पुस्तक को बंद करते हुए उस पर कुछ फूल रख रहे हैं।

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