ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
गुजरते समय में पत्रकारिता
CATEGORY : रम्य रचना 01-Apr-2017 12:40 AM 212
गुजरते समय में पत्रकारिता

सुना है कि जब से इंडिया टीवी का मालिक बदल गया है, उसका लहज़ा भी
बदल गया। ज़ाहिर है वे कार्यकर्ता हैं और अपने अन्नदाता की ही भाषा बोलेंगे -
his master's voice! साहबान, बदल जाये अगर माली चमन होता नहीं
खाली, रोकड़ा तब भी आता था, रोकड़ा अब भी आयेगा। परन्तु बेचारी जनता
क्या करे? नेता तो बदनाम हैं ही, ये खबरी भी कुछ कम नहीं।

हम हमेशा से पत्रकार बनना चाहते थे। नई किताब के पन्नों की खुशबू हमें पागल कर देती थी। सिर्फ स्कूली किताबें नहीं बल्कि पत्र-पत्रिकाओं की महक भी हमें दीवाना बना देती थी। स्कूल और कॉलेज की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में तथा निबन्ध-लेखन में हम अव्वल आते। ज़ाहिर है कि हम लेखन को ही अपना व्यवसाय बनाना चाहते थे। लेकिन भैया, उस गुज़रे ज़माने में बच्चों का भविष्य और उनका कैरिअर उनके माँ-बाप निश्चित करते थे। सफल माँ-बाप बच्चों को अपनी ही तरह सफल देखना चाहते थे और असफ़ल माँ-बाप अपने ख्वाबों की ताबीर अपने बच्चों में देखना चाहते हैं। यानि बच्चे ना हुये खरबूज़े हो गये। जी हाँ खरबूजा चाकू पर गिरे तो भी कटे और चाकू ख़रबूज़े पर गिरे तो भी खरबूजा कटे। अब्बाजान हमें कलेक्टर बनाना चाहते थे। वे स्वयं न्यायाधीश थे अतः बेटी को भी उसी मुक़ाम पर देखना चाहते थे। अम्मीजान ने फ़रमाया "घर का कुछ काम नहीं करती (यह मात्र एक जुमला था, वरना घर में तो नौकरों की फौज़ थी) -- बस किताबी कीड़ा बनी रहती है, जर्नलिस्ट बन कर तो दीमक बन जायेगी। बेहतर है कि अब्बा की बात मान ले। तो साहब पत्रकार तो हम नहीं बन सके  लेकिन लिक्खाड़ बनने से हमें कोई नहीं रोक सका। यह और बात है कि बरसों तक हम छुपे-रुस्तम ही रहे। मतलब ये कि किसी को बताया ही नहीं अपने इस फ़न के बारे में।
चलिये इस दुखती रग को छोड़ें, आगे चलते हैं। उपन्यास तथा समीक्षाओं के अलावा पत्रिकायें और अख़बार पढ़ना हमारा ख़ास शगल रहा है। इस शग़ल के तहद हमने भांति-भांति की अच्छी और बुरी पत्रिकाओं में फ़र्क़ करना सीख लिया। साथ ही एक सवाल जो हमारे ज़हन में उठता था वो है कि पत्रकारिता की भूमिका क्या है। सही जवाब तो यही होना चाहिये कि पत्रकार निरपेक्ष दृष्टि से घटनाओं को देखे, परखे और फिर वर्णन करे या सूचना दे। रिपोर्ताज सही एवम नैतिक होनी चाहिये। किन्तु यदि वह पत्रकार ना बन कर किसी दल विशेष का कार्यकर्ता बन जाये तो उसे दल का प्रवक्ता कहना ज़्यादा सही होगा। आलोचनात्मक भाषा में उसे दल का माउथपीस भी कह सकते हैं। अगर इस किस्म के पत्रकार शिष्टता और तर्क की सीमा लाँघ जायें तो हम भी हद से आगे बढ़ कर उन्हें दलाल की संज्ञा दे सकते हैं। हमारे अब्बाजान नवभारत टाइम्स पढ़ा करते थे। हमने पूछा कोई दूसरा अख़बार क्यों नहीं, वे बोले "बेटा फलां अख़बार फलां पार्टी का है और अमुक पत्रिका अमुक दल की हैै।" हमें कुछ समझ नहीं आया कि ऐसा कैसे हो सकता है। ख़बर तो ख़बर है, उसका "उस" पार्टी या "इस" पार्टी से क्या लेना देना? पर चुप रहे। उस ज़माने में बड़ों से ज़ुबान लड़ाने का रिवाज़ नहीं था।
आज जब टीवी पर मुख़्तलिफ़ चैनल देखते हैं तब अब्बा की बात समझ में आती है। एक ही बात को किस प्रकार से तोडा-मरोड़ा जा सकता है यह हुनर  एक पत्रकार भलीभांति जानता है। उदाहरण के तौर पर एक चिड़ियाघर में एक बच्चा शेर की मांद में गिर गया। शेर उसे दबोचने वाला ही था कि एक कर्मचारी ने बच्चे को बचा लिया। दो पत्रकार वहां मौजूद थे। एक ने लिखा कि बहादुर कर्मचारी ने बच्चे का जीवन बचाया। दूसरे ने लिखा "पशुओं पे अत्याचार! एक व्यक्ति ने शेर की खुराक छीनकर अमानवीय कार्य किया है। लीजिये साहब, दोनों ने अपना-अपना काम किया मगर कैसे!
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बात करें तो साहब एनडी टीवी वाले हमेशा हद पार कर देते हैं। कोई हमें बताये कि क्या हमेशा एक ही पार्टी गलत होती है? हम तो हर पार्टी के प्लस और माइनस पॉइंट देखते हैं। (कांग्रेस के भी) खैर थोड़ी जाँच (गूगल) करने पर ज्ञात हुआ कि जितने भी लोग इससे जुड़े हैं उन सबका डीएनए एक ही है, मसलन बरखा दत्त -- जम्मू कश्मीर बैंक के सभापति हसीब द्राबु की तीसरी पत्नी हैं। अमृता राय (44) -- दिग्विजय सिंह की दूसरी बीबी हैं। सोनिया शर्मा -- कांग्रेस के र.स.न. सिंह की दूसरी बीबी हैं। निधि राज़दान -- जम्मू-कश्मीर  के भूतपूर्व मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला की (शायद) पत्नी हैं। शायद इसलिए कि कुछ वक़्त पहले वो साथ रहती थी और तब तक बीबी नहीं बनी थीं, अब क्या स्थिति है - वो जाने या खुदा जाने - हम तो भैया कछु ना जानें। अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि इनमें से कोई भी पहली बीबी नहीं है। वैसे ही जैसे कि मुग़ल खानदान में जितनी प्रेमी जोड़ियां हुईं - शाहजहां-मुमताज़, अकबर-जोधा, इत्यादि उनमें से कोई भी अपने आशिक़ की पहली बीबी नहीं थी। सभी दूसरे से लेकर तेहरवें नम्बर तक पे थीं। कोई हमें बतायेगा कि इन मशहूर आशिक़ों को अपनी पहली बीबी से इश्क़-विश्क क्यों नहीं हुआ? जाने भी दो यारों हमें क्या? लेकिन एनडी टीवी की बात चली है तो बता दें कि लोग इसे शादी.कॉम कहते हैं। और बात और बात लेकिन मानना पड़ेगा कि चैनल रोमांटिक अवश्य है।
सुना है कि जब से इंडिया टीवी का मालिक बदल गया है, उसका लहज़ा भी बदल गया। ज़ाहिर है वे कार्यकर्ता हैं और अपने अन्नदाता की ही भाषा बोलेंगे - ण्त्द्म थ्र्ठ्ठद्मद्यड्ढद्ध"द्म ध्दृत्ड़ड्ढ! साहबान, बदल जाये अगर माली चमन होता नहीं खाली, रोकड़ा तब भी आता था, रोकड़ा अब भी आयेगा। परन्तु बेचारी जनता क्या करे? नेता तो बदनाम हैं ही, ये खबरी भी कुछ कम नहीं। एक परिचर्चा का विषय था "संघ का आतंकवाद और न्याय की असफलता।" सारा कटाक्ष और सारी आलोचना एक दल-विशेष की ओर थी। वक्ता और प्रवक्ता थे - तीस्ता सीतलवाड़, शशी  थरूर, कविता कृष्णन, प्रो. अपूर्वानंद, सीताराम येचुरी। सब के सब ढाक के तीन पात।
अखबारों को छोड़ें, साहित्यिक पत्रिकायें तक राजनीति का शिकार हो गयीं। हाय! क्यों याद आ रहे हैं गुज़रे हुये ज़माने। वो चंदामामा की तिलस्मी दुनिया और साप्ताहिक हिंदुस्तान तथा धर्मयुग के रोमान्स। ये वो वक़्त था जब सचमुच साहित्य समाज का दर्पण होता था। अब तो उस दर्पण में  ऐसा बाल आया है कि तस्वीर विकृत दिखायी पड़ती है। अंग्रेजी की महंगी पत्रिकाओं में मशहूर व्यक्तियों की फोटो के अलावा कुछ भी सारगर्भित नहीं होता। अपेक्षित सस्ती हिंदी की पत्रिकायें अंग्रेजी के शब्दों से भरी रहती हैं। भाषा का स्तर अधोपतन की ओर जा रहा है। इस निराशाजनक स्थिति का एक ही कारण है। वह है अपने देश और अपनी भाषा के प्रति प्रेम एवं सम्मान का अभाव। हमारे प्रवासी भारतीय हिंदी बोलने में शर्म महसूस करते हैं - देश में भी और विदेश में भी। स्वयं देसी मानुस अंग्रेजी के तलुए चाटते हैं। सवाल भाषा का हो या साहित्य का अथवा पत्रकारिता का - कुछ भी ठीक करने के लिये शक्ति चाहिये और शक्ति है नेताओं के पास। तो हमें कैसे नेता चाहियें?
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं
अब एक दृष्टि  डालिये अपने नेताओं पर - क्या सूरत-ए-हाल नज़र आती है! केजरीवाल गप्पू जी के पास कोई मुद्दा नहीं है सिवाय देश के प्रधानमंत्री को गालियां देने के। राहुल पप्पू जिन किसानों की लड़ाई लड़ रहे हैं क्या ये हालात सिर्फ तीन वर्षों से हैं? क्या 2014 से पहले सब ठीक था? मुलायम जी कहते हैं "मोदी ठग है।" लो भाई ने भाई को खूब पहचाना।
सबब तलाश करो अपने हार जाने का
किसी की जीत पे रोने से कुछ नहीं होगा।
जनता बेचारी अवश्य है परन्तु  बेवक़ूफ़ नहीं, ना ही उसकी याददाश्त कमज़ोर है। जैसे ही पप्पू ने अखिलेश से ना केवल "दिल का रिश्ता" जोड़ा बल्कि उसके मातहत भी काम करने को तैयार हो गये। शीला दीक्षित बिना किसी शर्त और बिना किसी पद के सपा से हाथ मिलाने को तैयार हो गयीं। ये सब वोटर्स को दिखायी भी देता है और समझ भी आता है। वक़्त पर गधे को बाप बनाना कोई नेताओं से सीखे। ये और बात है कि सपा ने गलत आदमी को गधा कह दिया। महाभारत के बाद यादव वंश समाप्त हो गया। श्री कृष्ण के वंशज अपने पूज्य पिता और बुज़ुर्गों का सम्मान ना कर सके, वही उनके विनाश का कारण बना। ऐसा लगता है कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है। दूसरी बात, अख़लाक़  के  मामले में सपा ने न्याय से नहीं, वोट की राजनीति से काम लिया। बालक अखिलेश! मुसलमान बेवक़ूफ़ नहीं हैं। वे देखते हैं कि नेता लोग किस तरह उन्हें शोषित कर रहे हैं।
जनता ने अपना फ़ैसला सुना दिया है। तो क्या कह रहे थे पप्पू भैया कि मोदी जी डरे हुए हैं? थर-थर तो आप काँप रहे हैं। माया की माया कौन जानता है। कहती हैं- मशीन ख़राब थी। बहन जी फिर तो कोई भी परिणाम नहीं निकलता। हास्यास्पद बात तो ये है कि वे बोलती हैं कि कोई भी बटन दबाओ, नाम मोदी का ही आता है। अरे मेरी विदुषी बुआ, ऐसा होता तो पंजाब में कांग्रेस कैसे जीती? जाने दो यह तर्क पढ़े-लिखों की समझ में आता है। बहू डिम्पल ने कहा "हमारे अपने दो नौजवान (राहुल और अखिलेश) काफी हैं, मोदी की ज़रूरत नहीं है। कहाँ हैं दिखायी नहीं दे रहे।
कौन कहता है नहीं देखा तमाशा  हमने
पानी बिन गलता हुआ देखा बताशा हमने
राजनेताओं को देखा है दौलत से भरपूर
और जनता की भी देखी  है हताशा हमने
वैसे जनता की ताक़त को भी नकारा नहीं जा सकता, ये बात भी जनता ने साबित कर दी है।

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