ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कश्मीर के कब्र खोदने वाले
01-Sep-2019 07:12 PM 359     

मेरा काम न तो रोचक है और न ही मेरे धन्धे में पैसा है। मैं राजी-रोटी के लिए कब्रें खोदता हूं। सदियों से मेरे पुरखे यही काम करते आए हैं। उनके पास काश्त करने के लिए जमीन नहीं थी और न ही उन्होेंने कभी किसी व्यापार में हाथ डाला। मेरे पिता कई बार शेखी में आकर कहा करते, "कब्र खोदने का काम सदाबहार व वर्चस्व वाला धन्धा है। यह कारोबार अभी आने वाले समय में खत्म होने वाला नहीं।"
अपने कस्बे में मुझे हिकारत की नजर से देखा जाता है। मुझसे मिलना अशुभ समझा जाता है। अगर मैं कहीं जा रहा हूं तो समझ लो कि मुझे अभी किसी की मौत का समाचार मिला है। फिर भी अपने शहर के लोगों के लिए मैं एक आवश्यक बुराई हूं जिसका होना उतना ही जरूरी है जितना कि न होना। मैं ही हूं जो इन लोगों की मौत के बाद की अगली यात्रा के लिए कब्र खोदता हूं। रेजिमेंट बाजार के दक्षिण के सुनसान एरिया के उजड़े कब्रिस्तान के धूलभरे सुनसान क्षेत्र में ही मेरा काम-धंधा है।
मैं छोटा था तभी से मैंने इस काम में अपने पिता का हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। टीबी की लम्बी बीमारी के बाद जब मेरे पिता का देहांत हुआ तब से सारा काम मैं ही कर रहा हूं। इस कठोर शारीरिक काम ने पिता की सेहत पर काफी बुरा असर डाला था। कब्र खोदने जैसे तुच्छ काम के साथ-साथ उन्हेें अन्य छोटे काम करने पड़ते थे ताकि बड़े-से परिवार का भरण-पोषण कर सके।
जब शहर के आसपास किसी की मौत होती है तो सबसे पहले मुझे ही सूचना दी जाती है। एक आदमी को मेरी तलाश में भेज दिया जाता है। अगर मैं कहीं बाहर गया हूं तो फटाफट एक आदमी वहां के लिए रवाना कर दिया जाता है ताकि कब्र खोदने का काम सही समय पर शुरू किया जा सके।
इस तत्परता का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि अब मेरे खस्ताहाल कब्रिस्तान में आम आदमी के लिए जगह कम ही बची है। हां अगर मरने वाला अमीर है और नई जगह खरीद सकता है तब साफ-सुथरी जगह पर कब्र खोदने में मुझे ज्यादा समय नहीं लगता। यह काम तो कोई अनाड़ी भी कर ले मगर पुरानी कब्र के ऊपर नई कब्र खोदना बहुत मुश्किल काम है जिसका भेद सिर्फ मुझे ही पता है।
जैसे ही मुझे किसी के मरने का समाचार मिलता है सर्दी हो या धूप, बरसात हो या आंधी, मैं कब्रिस्तान में पहुंचकर अपनी कस्सी और कुदाल को उठा लेता हूं जो अब तक बड़े आराम से एक पुराने शेड में पड़े रहते हैं। मैं सारे कब्रिस्तान का चक्कर लगाता हूं और सबसे पुरानी कब्र को तलाशता हूं।
कई बार तो पुरानी कब्र को दुबारा खोदते समय मुर्दे के कुछ अधगले अंग मेरे हाथों में आ जाते हैं जिन्हे मैं किसी अन्य जगह दबा देता हूं। ऐसा उन केसों में बहुधा होता है जहां घर के लोग मृत के शरीर पर खास रसायनों का लेप करते हैं ताकि मुर्दा शरीर को दूर से आने वाले रिश्तेदारों के आखिरी दर्शनों के लिए कुछ ज्यादा देर तक रखा जा सके। यदि कोई मुर्दा पूरी तरह मिट्टी में नहीं मिला होता तो मैं उस कब्र को मिट्टी से ढँककर दूसरी सही जगह का चुनाव करता हूं।
इन गले-सड़े मांस के लोथड़ों व अन्य भयानक दृश्यों से अब मेरा दिल नहीं दहलता। मेरे लिए यह सब मेरे काम का हिस्सा है। खुदाई करते समय या हाथों से इस गन्दी मिट्टी को हटाते समय मैं कोई दस्ताने नहीं पहनता। दस्ताना पहनकर कुशलता से काम नहीं हो पाता। बचपन से ही मैं इस तरह काम करने का अभ्यस्त हूं।
पूरे दिन की मशक्कत के बाद कब्र खोदने की एवज मेें मुझे सात-आठ सौ रूपए ही मिल पाते हैं। हां, अगर मरने वाले के रिश्तेदार अमीर होते हैं तो हजार-बारह सौ से ऊपर कमाई हो जाती है। यह भी भाग्य की विडम्बना ही है कि मेरी कमाई इस बात पर निर्भर करती है कि मेरे इलाके में कितने लोगों की मौत होती है। कई बार साथ के इलाकों से भी बुलावा आ जाता है अगर वहां की कब्रें खोदनेवाला कहीं बाहर गया हो या बीमार हो।
बाकी के दिनों में जब मैं कब्रें नहीं खोदता तब मेरी दिनचर्या बहुत ही अनियमित होती है। छोटे-मोटे कई धंधे पीटता हूं मैं। कहीं मजदूरी, कहीं चौकीदारी और कहीं किसी शोरूम के बाहर सिक्रूटीमैन की तैनाती। ये काम परेशान नहीं करते मुझे। कब्रें खोदने के दौरान कई बार मेरा दिल डूबता है खासकर तब जब कोई अपना मरता है या कोई जवान मौत होती है और विधवा की दिल दहला देने वाली चीखें सुनाई देती हैं।
इन दिनों सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया है। मौत का कारोबार बहुत ही बुरे दौर से गुजर रहा है। खुदा के इलावा कई और भी हैं जो मासूम लोगों को मौत के घाट उतारते हैं। उग्रवाद, बन्द, लूट-मार, जातीय दंगे और बम विस्फोटों से रोजाना बीसियों मासूम लोग मरते हैं और कई बार तो मुझे मजदूर लगाकर एक साथ कई कब्रें खुदवानी पड़ती हैं। कई बार तो मुर्दे इतनी ज्यादा संख्या में आ जाते हैं कि पुरानी कब्रों के ऊपर मिट्टी की नई पर्त बिछाकर उन्हेें किसी तरह साफ मिट्टी से ढँकना पड़ता है।
मैंने असंख्य मुर्दा शरीरों को उठाया है। मैंने बीस मुर्दों को एक ही कब्र में दफन किया है। सभी स्थानों की कब्रें मुर्दा जिस्मों से अटी पड़ी हैं। क्षेत्र में बढ़ रहे उग्रवाद ने हजारों मासूमों को लील लिया है। इस क्षेत्र के नौजवान शहीदों की पीड़ा मुझसे ज्यादा कौन समझ सकता है भला। अब इलाके में सेहतमंद युवकों की कमी आ गई है। बहुतों ने बंदूकें उठा ली हैं और अनेकों फर्जी एनकांउटर में मारे जा चुके हैं। अपने सिपाहियों के हौसले बुलन्द रखने के लिए बहुधा पुलिस ऐसे काम करती है।
मैं सारी सच्चाई जानता हूं क्योंकि मैं ही विख्यात मिलिटेंट कमांडर हमीद का अभागा पिता हूं। हमीद मेरा एक ही बेटा था। मेरी दो बेटियों का एक ही भाई। एक दिन वह सीमा पार गया और अगले जाड़े तक कमांडर बनकर लौटा। क्या करता डिग्री लेने के बाद भी पांच साल तक उसे कोई भी नौकरी नहीं मिली।
ये रही उसकी कब्र। अब मुझे रोना नहीं आता। मेरी आंखों के आंसू बिल्कुल सूख चुके हैं। उसकी कब्र पर मैंने ये अक्षर खुदवाए हैं - अपने प्रिय बेटे हमीद की याद में, जिस ने अपनी जवानी और अपने अब्बा का बुढ़ापा खराब कर दिया।
रिफ्त ने उसके लिए एक छोटा-सा मकबरा भी कब्र के ऊपर बना दिया ताकि हमीद को गर्म सर्द हवा न लगे। पागल है वह। ये सर्द और गर्म आहें तो अब मेरे लिए रह गई हैं। रिफ्त अमीर लोगों के लिए कब्र के ऊपर नक्काशी व यादगारी शब्द लिखने का काम करता है। केवल बड़े लोग ही कब्र की मँहगी जगह खरीदकर मकबरे बनवाते हैं और नक्काशी करवाते हैं।
रिफ्त की कहानी भी बहुत दुखभरी और संर्घषमयी है। वह दस साल पहले श्रीनगर आ गया था। रिफ्त अभी नासमझ लड़का ही था जब उसके पिता गुजर गए। सात बच्चों का बड़ा-सा परिवार और रिफ्त की मां सब्जी बेचकर पालती थी उसे। रिफ्त बड़ा था। रोजगार के सिलसिले में शहर आ गया और मुझे पहली बार तब मिला जब हम दोनों ग्रेंड माल का निर्माण करने वाली कम्पनी में काम करते थे। वह एक नायाब और कुशल कारीगर की तरह संगमरमर काटना सीख गया था।
ग्रेंड माल का निर्माण रुक गया। एक स्थानीय राजनैतिक दल ने बन्द का आयोजन किया। वे किसानों के हितों की बात कर रहे थे जिनसे जमीन अधिग्रहण करके ये विशेष आर्थिक जोन बनाए जा रहे थे। हजारों मजदूर निकाल दिए गए। मैंने रिफ्त को अपने साथ चलने का मशविरा दिया। वह मेरे साथ मेरे कस्बे में आ गया। यहां एक छोटी-सी निर्माण कम्पनी में मैंने उसे संगमरमर काटने के काम पर लगवा दिया। हमीद के जाने का गम अब मुझे ज्यादा नहीं सालता था।
कब्रों पर नाम और जज्बातभरी इबारतें खुदवाने का काम भी आसपास उसे मिलने लगा था। आसपास हो रही जवान मौतें देखकर रिफ्त कभी-कभी उदास हो जाता तो मैं उसे समझाता, "देख पगले, जो कुछ हो रहा है वह इसलिए कि हमने अपनी आत्मा पर परदा डाल दिया है। हमने अल्लाह की सीख माननी छोड़ दी है।"
न केवल रिफ्त बल्कि मेरा छोटा भाई मकबूल भी इन दिनों सहमा-सहमा और अशक्त रहने लगा है। उसके दामाद को उग्रवादियों ने पुलिस इन्फार्मर समझकर मार दिया था। मकबूल श्रीनगर के मशहूर डाक्टर कौल साहब के यहां पन्द्रह साल की उम्र से ही बतौर हेल्पर काम करता था। जब वहां हर समय तनाव का माहौल रहने लगा तो वह यहां कस्बे में भाग आया। यहां पंजीकृत होकर डॉक्टरी करने लगा। उसकी किस्मत अच्छी थी। दुकान चल निकली। एक शाम मकबूल के सामने एक खून से लथपथ लाश रखी गई। सरकारी हस्पताल का डॉक्टर छुट्टी लेकर बाहर गया हुआ था। पुलिस ने मकबूल से कहा कि वह जल्द पोस्ट-मार्टम की रिर्पोट फाइनल कर दे।
उसके बाद तो यह सिलसिला थम नहीं पाया। मकबूल पत्थर के जिगर वाला था। वह पुलिस की गाड़ी पर चढ़कर आठ लाशों का पोस्टमार्टम कर आया था। बम धमाकों के बाद ऐसी ही बदकिस्मत लाशें आती, किसी की टांग नहीं, किसी का धड़ नहीं और किसी का सिर नहीं। जब मकबूल का दामाद मारा गया तब तो वह पागल हो उठा। वह रात को सो नहीं सकता था। कटी-फटी लाशें उसके सपने में आकर उसे परेशान करती।
वह चिड़चिड़ा हो गया। वह हर वक्त सिगरेट पीने लगा। पुलिस को इनकार नहीं कर सकता था। जब पोस्टमार्टम के लिए कोई लाश उसके सामने लाई जाती तो वह गुस्से और पागलपन के मारे अपने साथियों पर जंगलियों की तरह चीखता। कई बार वह खाना खा रहा होता तो पुलिस की गाड़ी आ जाती। खाना बीच में ही छोड़कर उसे लाश की पोस्टर्माटम रिर्पोट बनानी पड़ती। कई बार तो आधी रात को यह काम करने को कहा जाता।
अब कुछ हालात बेहतर हुए हैं और सुरक्षा बलों को हर तरफ तैनात किया गया है तो मकबूल के लिए अब नई तरह की परेशानियां सामने आ रही हैं - सुरक्षा बलों के परेशान जवानों द्वारा आत्महत्या या सिविलियन द्वारा नहरों में डूबकर मरने, जहर खाने या पंखे से लटककर जान देने के असंख्य मामले।
हर शहर और हर गांव में मकबूल और मुझ जैसे लाखों मातम मनाने वाले लोग मेरी प्यारी कश्मीर वादी में हैं। इस वैली के बारे में एक शायर ने कभी कहा था कि "अगर दुनिया में कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं है।"
अब तो यह घाटी हमारे लिए एक दुखभरा नरक बन चुकी है जहां हर रात का अर्थ है एक भयानक स्वप्न और हर भोर हमारी आंखों के सामने इन्सानियत की हत्या की जाती है। फिर भी रिफ्त को देखकर मैं कुछ-कुछ आशावान हूं। वह जवान है, हुनरमंद है। मेरी बड़ी बेटी नूरा से उसकी अगले माह शादी होने वाली है। मेरे घर में खुशियों की शहनाई बजेगी। अल्लाह-हू-अकबर! खुदा तू महान है।

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