ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
घर सँवरने से दुनिया सँवरती है
CATEGORY : शब्द चित्र 01-Jan-2017 12:54 AM 1810
घर सँवरने से दुनिया सँवरती है

मेरा घर अब दोस्तों को अपने घर से दूर लगता है। मुझे बच्चे घर से दूर लगते हैं। मैं भी घर से कुछ दूर जाता सा लगता हूँ। क्या घर से दूर जाने के लिए ही घर में रहने आया हूँ? श्यामला हमेशा घर में रहती है। वह कभी घर से दूर जाती ही नहीं। अगर कुछ दिनों के लिए घर से दूर चली जाये तो उसे घर की याद आती रहती है, घर को खाली छोड़ना उसे भाता ही नहीं। वह सुरुचि की देवी है जो चालीस साल से घर को गढ़ रही है। उससे पूछता हूँ कि तुम्हें घर के अलावा दीन-दुनिया की कोई चिन्ता नहीं सताती? वह कहती है कि मुझे घर से फुर्सत मिले तब मैं दीन-दुनिया के बारे में सोचूँ। वह सवाल करती है कि क्या घर के बारे में सोचना काफी नहीं, क्या घर दुनिया से बाहर है, क्या घर सँवरने से दुनिया नहीं सँवरती? उसके ये सवाल सबसे बड़े सवालों की तरह मेरा पीछा करते हैं -- क्या घर को बचाये बिना देश और दुनिया बचायी जा सकती है?
कितना शोर है कि दुनिया विश्व ग्राम में बदल रही है और सब पास आ रहे हैं। पर इण्टरनेट पर पास दिखायी देते उनके चेहरे कितने दूर दिखायी देते हैं। समय इतना कम पड़ गया कि किसी से मिलने का समय ही नहीं बच रहा। बस कभी-कभी दूर से फोन पर आवाज ही सुनायी देती रहती है। बिना कहीं गये बहुत से काम घर में बैठे-बैठे ही हो रहे हैं, घर से निकलने की फुर्सत ही नहीं मिल रही। जो घर से दूर निकल गये उन्हें मालूम ही नहीं कि घर कब लौट सकेंगे। धीरे-धीरे घर लौटने की याद कम होती जा रही है। लगता है कोई किसी को याद ही नहीं कर रहा और दुनिया चल रही है। जो जगहें और उनमें बसा हुआ जीवन पीछे छूटता जा रहा है उसे भुलाने में ज्यादा देर नहीं लग रही जैसे कुछ था ही नहीं ।
पहले कभी यहाँ घना जंगल था, उसी में छोटे-छोटे गाँव बसे थे। यहाँ कोलार नदी पर बाँध बना है जिसका पानी खेतों को सींचने के काम आता है। पर यहाँ भी खेती की जमीन पर मकान उगाने का सपना साकार होने लगा। जंगल सिमटता गया, नयी सड़कों के आसपास कॉलोनी बनने लगी और सड़क कोलार रोड कहलायी। तरु-लताओं से दूर एक बची रह गयी छोटी-सी पहाड़ी के करीब हमारी कॉलोनी कान्हा कुन्ज कहलाती है।
एक समय यहाँ उपजाऊ धरती के बीच अकबरपुर गाँव बसा था जो पटवारी के लाल बस्ते में अभी भी बसा हुआ है। यहाँ बसते गये शहरियों के बीच अभी भी देशी कुत्ते और सुअर घूमते रहते हैं। सुअरों को अब नये जमाने की गंदगी परोसी जाने लगी है। पर उन्हें बदली हुई दुनिया में खो जाने की कोई जल्दी नहीं, वे तो अपने में मगन घूमते रहते हैं। कभी शहरियों की शिकायत पर नगर निगम की गाड़ी उन्हें बड़े सबेरे पकड़कर कहीं दूर छोड़ आती है पर वे अपने गाँव का पता अभी भूले नहीं हैं, शाम तक फिर लौट आते हैं। कुत्ते अभी भी रात को वैसे ही भौंकते है जैसे गाँव की चौकीदारी कर रहे हों। वे इस कॉलोनी में भी अपना-अपना इलाका बाँधकर रहते हैं। लोग और उनके विलायती कुत्ते भले ही घर से न निकलें पर ये कुत्ते रोज अपने दल-बल से निकलते हैं और जब तक वे अपने इलाके से एक-दूसरे पर बड़ी देर तक भौंक न लें, उन्हें चैन नहीं पड़ता। जो कुछ ग्रामीण किस्म के शहरी उन्हें रोटी खिलाते हैं, कुत्ते उनके घर के बाहर ही डेरा डालकर बैठे रहते हैं और वहीं खड़े होकर दूसरे कुत्तों पर भौंकते हैं। जिनकी नींद खराब होती है वे कुत्तों की आलोचना करते हैं तब भी कुत्तों का भौंकना बन्द नहीं होता। वे इस कॅालोनी के स्वयम्भू पहरेदार हैं। विलायती कुत्तों के मालिक अपने कुत्तों को इनकी सोहबत से दूर रखते हैं। जो विदेशी कुत्तों के पिल्ले बेचने का धन्धा करते हैं वे अपनी कुतिया देशी कुत्तों से बचाते रहते हैं ।
कान्हा कुन्ज में शिव मंदिर भी है और उसमें दुर्गा, गणेश, हनुमान भी एक-दूसरे के पास बसे हुए हैं। हरे-भरे पीपल का ऊँचा-पूरा वृक्ष सब देवताओं पर छाया किये है। पुजारी स्पीकर पर रोज आरती गाते हुए कहता है -- मैं मूरख-खल-कामी कृपा करो भर्ता। मैं सोचने लगता हूँ जो आदमी खुलेआम अपने आपको मूर्ख-खल और कामी कह रहा है उसकी मदद कोई भी भला कैसे कर सकता है। अपने पाप स्वीकार करने का चलन वैसे भी चर्च में है, मंदिरों में कहाँ। मंदिर की सीढ़ियों पर तो पुण्यात्माओं के नाम खुदे रहते हैं। कॉलोनी की कुछ स्त्रियाँ मंगल और शनिवार को संकट निवारण के लिए हनुमान चालीसा बाँचती हैं। नये फिल्मी गानों की तर्ज पर भजन गाती हैं।
भारत में देवताओं की जितनी मर्मस्पर्शी स्तुतियाँ रची गयीं उतनी संसार में ढूँढे नहीं मिलेंगी। जिन्हें शंकराचार्य, वल्लभाचार्य, जयदेव, तुलसीदास, सूरदास आदि अनेक विभूतियों ने रचा है और जो गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होती रहती हैं। पर लोग न जाने क्यों बम्बईया फिल्मी गानों की बंदिश में ईश्वर को बाँध लेने पर तुले हुए हैं। खयाल आता है कि शायद यह अराजकता आपातकाल के समय बनी -- जय संतोषी माँ -- फिल्म के भड़कीले शोर से भरे सतही गानों से भी फैली होगी। आश्चर्य होता है कि ये गीत कवि प्रदीप ने लिखे थे -- मेरी इज्जत का सवाल है माँ, निभा दो अपना नाता, मदद करो संतोषी माता।
वही कवि प्रदीप जिनकी करुणा से भरी आवाज के बिना कोई राष्ट्रीय त्योहार नहीं मनाया जाता और कवि निराला ने भी उनके भावप्रवण गीतों की प्रशंसा की थी। मुझे याद है, सागर शहर के मनोहर टॉकीज में यह फिल्म देखने वाले लोग गेट पर जूते उतार देते, फिर भीतर जाते और जब यह गाना बजता तो स्क्रीन की तरफ सिक्के फेंकते। टॉकीज का मालिक उनसे विनती करता कि सिक्के मत फेंकिए, स्क्रीन में आग लग जायेगी पर अंधभक्त कहाँ मानने वाले हैं वे तो राजनीतिक सत्ता के प्रति असंतोष से भरे देश में सिनेमा हाल में बैठकर संतोषी माता से मदद माँग रहे थे। कौन थी यह संतोषी माता? इसकी रचना आपातकाल में ही क्यों की गयी? वह कोई पौराणिक देवी नहीं, उसे तो किसी दुष्ट बुध्दि ने धन्धे के लिए गढ़कर लाखों पोथियाँ बेच लीं और कुछ वर्षों बाद यह देवी पता नहीं कहाँ बिला गयी -- नये देवता नहीं रचे जा सकते, यह दुनिया तो नये दुष्टों की रचना कर सकती है और जिनसे त्राण पाने के लिए देवता व्याकुल दिखायी दे रहे हैं। मिर्जा गालिब कितने परेशान थे कि आदमी को इन्साँ होना भी मयस्सर नहीं ।
जिन्हें नाज है धर्म पर, वो कहाँ हैं? क्या उन्हें इस पाखण्ड पर प्रश्न नहीं उठाना चाहिए। यह कब तक चलेगा कि भारत में धर्म के नाम पर सब चलता है। भारतीय संस्कृति ने कनफोड़ भजन गाने वालों को नहीं, शान्त ज्ञानवान भक्तों को ही आदरणीय माना है। भारत का तत्त्वबोध किसी ईश्वर के फेर में नहीं रहा। उसने पूरी सृष्टि को अनन्त देवात्मक माना और अनुभव किया कि प्रत्येक जन्म और मरण जड़-चेतन के संयोग और वियोग से घटित होता रहता है। इस संयोग और वियोग से भरे जीवन में एक स्थायी उत्प्रेरक सत्ता संसार को न जाने कब से चला रही है और उसे ही कई-कई नामों से पुकारा गया। उस सत्ता को मनुष्य में फलीभूत हो सकने के लिए ही ज्ञानपूर्ण भक्ति का आवाहन किया गया जो देह के सारे धर्मों को त्यागकर ही पायी जा सकती है। वह अनपेक्षित है, उसमें मोह और लोभ के लिए कोई जगह नहीं होती। उस भक्ति को पाने के लिए राग और विराग के बीच कामनाहीन प्रेम का सेतु बाँधना पड़ता है। इस प्रेम में अपने आपको पाकर फिर उसी में खो देना पड़ता है। प्रेम कोई क्रिया नहीं, वह हमारे होने में अपने आप घटता है -- गुलजार का ही एक गीत है -- सिर्फ अहसास है ये, रूह से महूसस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो। भक्ति और प्रेम गहरी खामोशी में ही घट सकते हैं, शोर में नहीं। वे किसी बोल और आवाज में नहीं समाते। वे मौन संकीर्तन की तरह देह में गूँजते रहते हैं। उनकी आहट कोई और नहीं सुन पाता ।
कान्हा कुन्ज के पास ही बड़ा दशहरा मैदान है। यहाँ विजयीदशमी को रावण का पुतला जलाया जाता है। पुतला बनाने के लिए राजस्थान से कारीगर आते हैं। वे दशहरा मैदान में तम्बू तानकर बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाने के लिए रावण-रचना करने लगते हैं। लोग न जाने कब मान बैठे कि बुराई का प्रतीक जलाने से बुराई मिट जाती होगी ।
इसी दशहरा मैदान में हर हफ्ते सब्जी मण्डी भरती है। गंदे नालों के पानी से सींची गयी और जहरीले रसायन पिलाकर उगायी जाती सब्जियाँ और फल यहाँ बेचे जाते हैं। कभी भारी मन से सोचने लगता हूँ कि क्या हमारे किसानों को भी जीवन की परवाह नहीं रही। उन्हें अपनी फसलें उगाने के लिए जहरीले समझौते क्यों करना पड़ रहे हैं। अन्न ब्रह्म को अपने खेतों में अँकुरित करने की कला जानने वाले किसान यह कैसे भूल गये कि अन्न से मानव जाति और दूसरे प्राणी उस वीर्य को पाते हैं जिससे संसार स्वस्थ सन्तानों से भरा-पूरा रहता है। राष्ट्र बलशाली होता है। अनुभव में आता है कि राजनीति, बाजार और धर्म के कुटिल गठबन्धन ने हमारे किसानों को अपना ईमान खोने के लिए विवश कर रखा है। साधु कहलाने वाले लोग बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से सौदा करके आर्गेनिक खेती का मँहगा धन्धा कर रहे हैं। नेता अपने फॉर्म हाउस में आर्गेनिक फसलें उगाकर स्वस्थ-सानंद नजर आते हैं। व्यापारी जहर बेचकर मालामाल हो रहे हैं पर उसे खुद नहीं खा रहे हैं और देश के जीवन की नसों-नाड़ियों में जहर घुलता जा रहा है। लोग कभी-कभार गुस्से से भरते हैं और बीच सड़क पर बुराई के पुतले जलाकर घर लौट जाते हैं पर बुराई नहीं मिटती ।
कोई बताये कि किस धर्मग्रंथ में रावण को बुराई का प्रतीक निरूपित किया गया है। वह तो उसी प्रकृति से जन्मा है जिससे सब जन्म लेते हैं। प्रकृति की अँगनाई में युधिष्ठिर और दुर्योधन, दोनों ही जन्म ले सकते हैं उन्हें कभी जड़ से नहीं मिटाया जा सकता। मनुजरूप राम भी सदोष आदर्श होकर भारतीय समाज की श्रध्दा के पात्र बने हैं। इस संसार में कोई निर्दोष आदर्श स्थापित नहीं किया जा सकता। मनुष्य को पूरा मनुष्य बना रहने के अलावा कुछ और होने की जरूरत नहीं और दुनिया बड़े मजे से चलती रहेगी। ईमान कोई निर्दोष आदर्श नहीं पर जितना हो सके उसे होना तो चाहिए।
यह संसार गुड़-गोबर से सना हुआ है और इसमें बसी आग राम और रावण, दोनों को चलाती है। पर राम और कृष्ण में बसी आग उनकी प्रकृति के सत्व से गोबर को भी अपनाकर मधुर बना लेती है। किसान इस सचाई को अच्छी तरह पहचानते हैं। वे गोबर की खाद बनाकर खेत में डाल देते हैं और गन्ना बो देते हैं फिर उसका रस निकाल लेते हैं। वे संसार के गुण-अवगुण में बसी रसरूप सत्ता को पृथ्वी से दुह लेने की कला जानते हैं। भूमिजा सीता भी रावण को बुरा मानकर त्यागती नहीं, उसे राम बनाकर अपनाती हैं। जब रावण का शरीर पृथ्वी पर गिरकर माटी में मिलने के लिए तत्पर होता है उसी समय उसकी देह में बसी आग राम में समा जाती है। शरीर मिटता है, उसके साथ चलने वाला कामनाहीन तेज नहीं मिटता। यह तेज राम और रावण में भेद भी नहीं करता। जिन्हें यह खाद बनाना नहीं आता, पराजय उन्हीं की होती है। बुराई जीती नहीं जाती, उसकी खाद बनाकर उसे अपनाना पड़ता है। अनुभव में आता है कि हम किसी को बदल नहीं सकते फिर भी अपना सकते हैं।
गांधी जी के समकालीन धर्मपाल ने एक दिलचस्प किस्सा सुनाया -- बापू अपने आश्रम में रोज लोगों को काम बाँटते थे। एक दिन किसी आश्रमवासी ने बापू से कहा कि जिन अमुक व्यक्ति को आप काम सौंपते हैं वे तो रोज शाम को जी भर के शराब पीते हैं। तब बापू मंद मुस्काते हुए बोले, मुझे यह अच्छी तरह मालूम है, इसीलिए तो उन्हें दिन डूबने से पहले पूरे होने वाले काम सौंपता हूँ। उनसे जो काम मैं लेता हूँ, वे काम कोई दूसरा कर भी नहीं सकता। यही क्या कम है कि उनकी आधी जिन्दगी देशवासियों के काम आ रही है और आधी वे अपने लिए जी लेते हैं, जिसे मैं बदल नहीं सकता पर उन्हें अपना तो सकता हूँ। लगता है कोई कविता कभी पूरी नहीं होती, अधबनी कविताओं से ही जीवन चलता है।
हर अकेले को लगता है वह अधबना-अधूरा है और पूरा होना चाहता है। जब नहीं हो पाता तो दो होकर देखता है और फिर भी अधूरा ही रहता है। बहुत होकर देखता है तब भी पूरा नहीं पड़ता। वह बहुत होकर अकेला हो जाता है और बहुतों को अकेला कर देता है। कभी कोई पूरा नहीं होता। घर बनते ही अधूरा लगने लगता है, एक और कमरा बना लेने से भी पूरा नहीं होता। हम दोनों अपने-अपने अधूरेपन को मिलाकर एक अधूरे घर में पूरा होने की कोशिश करते रहते हैं और फिर भी लगता है कि अभी अधूरे हैं। कभी लगता है बच्चे घर से दूर चले गये हैं और कभी लगता है कि हमसे दूर चले गये हैं। बच्चे फोन लगाकर कहते हैं कि हम आपके बिना पूरे नहीं हो पाते और हम कहते हैं कि तुम्हारे बिना अधूरे हैं। लगता है कि पूरापन बहुत सारे अधूरेपन से पाया जा सकता है। बेलन से दही नहीं मथा जा सकता और मथानी से रोटी नहीं बेली जा सकती। दोनों का अधूरापन अपने-अपने दो काम तो कर ही देता है। इसी तरह बहुत सारे काम पूरे हो जाते हैं। पर न जाने क्यों लगता रहता है कि अभी बहुत-सा काम अधूरा पड़ा है। अधूरे और अधबने से चलता काम पूरा नहीं लगता। पड़ौस के घर की दीवाल के सामने आ जाने से घर की खिड़की तक अधूरी लगने लगती है। धूप के बिना आँगन, पानी के बिना धरती, हवा के बिना पत्ते और शब्द के बिना घर का आकाश कितना अधूरा लगता है। फूलों को वृन्त पर झरता हुआ देखो तो लगता है वे भी अधूरे हैं, शायद पूरा होने के पहले ही झर रहे हैं। किसी से भी मिलो, वह अधूरा लगता है। जो अपने आपको पूरा मानकर किसी से नहीं मिलते, उनसे भी मिलो तो अधूरे ही लगते हैं ।
कोई किताब पूरी पढ़कर भी अधूरी लगती है और अपना लिखा हुआ तो कभी पूरा नहीं लगता, फिर भी इस लिखे हुए को पूरा करने में लगा हूँ और यह पूरा ही नहीं होता। न जाने क्यों अधूरा स्वीकार करने का मन नहीं होता और कुछ भी पूरा होता दिखाई नहीं देता। कोई पूरी जिन्दगी जी पाया, इसका आज तक कोई सबूत नहीं मिला, सब पूरा होने की कोशिश में अधूरे ही मरते रहते हैं और फिर कहीं जन्म लेकर अधूरे होने लगते हैं। अधूरा-अधबनापन पीछा ही नहीं छोड़ता और एक हम हैं कि पूरा होने की कोशिश में अधूरे ही मरे जा रहे हैं। पूरे होने की हड़बडी में कोई अपने आपको अधूरा मानने को तैयार नहीं। आधे-अधूरे से कुछ पूरा नहीं होता और पूरा कहलाने के लिए हमेशा आधे-अधूरे को जगह निकालना पड़ती है। पूरा भी आधे-अधूरे से ही चलता है।

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