ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ग़ज़ल कल्पना रामानी
CATEGORY : ग़ज़ल 01-Feb-2016 12:00 AM 300
ग़ज़ल कल्पना रामानी

एक

 

मुझको तो गुज़रा ज़माना चाहिए
फिर वही बचपन सुहाना चाहिए
जिस जगह उनसे मिली पहली दफा
उस गली का वो मुहाना चाहिए
तैरती हों दुम हिलातीं मछलियाँ
वो पुनः पोखर पुराना चाहिए
चुभ रही आबोहवा शहरी बहुत
गाँव में इक आशियाना चाहिए
भीड़ कोलाहल भरा ये कारवाँ
छोड़ जाने का बहाना चाहिए
सागरों की रेत से अब जी भरा
घाट-पनघट, खिलखिलाना चाहिए
घुट रहा दम बंद पिंजड़ों में खुदा!
व्योम में उड़ता तराना चाहिए
थम न जाए यह कलम ही "कल्पना'
गीत गज़लों का खज़ाना चाहिए।

 

दो

 

हक़ किसी का छीनकर, कैसे सुफल पाएँगे आप?
बीज जैसे बो रहे, वैसी फसल पाएँगे आप
यूँ अगर जलते रहे, कालिख भरे मन के दिये
बंधुवर! सच मानिए, निज अंध कल पाएँगे आप
भूलकर अमृत वचन, यदि विष उगलते ही रहे
फिर निगलने के लिए भी, घट-गरल पाएँगे आप
निर्बलों की नाव गर, मझधार मोड़ी आपने
दैव्य के इंसाफ से, बचकर न चल पाएँगे आप
प्यार देकर प्यार से, आनंद पल-पल बाँटिए
मित्र! तय है तृप्त मन, आनंद-पल पाएँगे आप
शुद्ध भावों से रचें, कोमल गज़ल के काफिये
क्षुब्ध मन के पंक में, खिलते कमल पाएँगे आप
याद हो वेदों की भाषा, मान संस्कृति का भी हो
सुन मनुज! सम्मान का, विस्तृत पटल पाएँगे आप।

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