ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ग़ज़ल एक दो
CATEGORY : ग़ज़ल 01-Apr-2017 01:11 AM 554
ग़ज़ल एक दो

एक

जहाँ पर हो गयी समझो शम"अ से बंदगी की हद
वहीं पे ख़त्म होती है पतंगे की ख़ुदी की हद
खड़ी पाई का तो बस काम ही है रोकना सबको
किसी दिन तय करेगी ये मेरी भी ज़िंदगी की हद
जहाँ उम्मीद की इक भी किरण पहुँची नहीं अब तक
वहीं तक है सुनो मन में हमारे तीरगी की हद
अभी तो है तुम्हारे साथ बस दो चार पल गुज़रे
अभी से पार कैसे हो गयी है आशिक़ी की हद
किसी के हाथ फैले देखकर दिल बैठ जाता है
कभी देखी है मेरी जेब ने भी मुफ़लिसी की हद
समंदर हो कि मौसम हो या फिर लाचार इंसां हो
कहाँ समझे जहां वाले किसी की ख़ामुशी की हद
कई सहरा लिए ख़ुद में भटकता फिर रहा है जो
बताये क्या तुम्हें अनमोल अपनी तिश्नगी की हद।

दो

नींद से ये हुनर लिया जाए
ख़ाब आँखों में भर लिया जाए
चाँद को खिड़कियों के परदों से
रंगे-हाथों ही धर लिया जाए
सच में तब्दील कर कुछ अफवाहें
एक इल्ज़ाम सर लिया जाए
बेख्यालां तेरे ख़्यालों में
डूबकर क्यूँ न मर लिया जाए
दे हुनर बच्चियों के हाथों में
उनके अंदर का डर लिया जाए
एक अनमोल-सी ग़ज़ल कहकर
ख़ुद पे एहसान कर लिया जाए।

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