ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ग़ज़ल Next
हिज्ऱ की रातों में आया लुत्फ़ इक मुद्दत के बाद

एक

हिज्ऱ की रातों में आया लुत्फ़ इक मुद्दत के बाद,
ज़ीस्त के लम्हों में आया लुत्फ़ इक मुद्दत के बाद।

याद में तेरी बहाकर अश्क़ मैं जीता रहा,
मुझको बरसातों में आया लुत्फ़ इक मुद

दास्ताने-ज़ीस्त ज़िंदगी

ज़िंदगी
हासिल हुई न जन्नत, न दोज़ख़ मुझको
बे-मौत मैं मारा गया, दिल दे के तुझको।
कभी ख़ुशहाल किया तो कभी बेज़ार मुझे
गो कि हर रंग में तूने सताया मुझको।
शुक्रिया, जो आईना दिखाया

एक दो तीन : सुभाष पाठक

एक

किसी की शक़्ल से सीरत पता नहीं चलती
के आब देख के लज़्ज़त पता नहीं चलती
ख़ुदा का शुक्ऱ है कमरे में आइना भी है
नहीं तो अपनी ही हालत पता नहीं चलती
छलकते अश्क सभी को दिखाई द

हम-तुम आज़ादी वो मैं हूं

हम-तुम

होश में कैसे रहते आपकी नज़र में रहे
किया तो कुछ भी नहीं फिर भी हम ख़बर में रहे
ग़रीब गाँव का दुख हमसे तो देखा न गया
तमाम ज़िंदग़ी हम इसलिए शहर में रहे
जिन्हें न तुक का

ग़ज़ल एक दो

एक

जहाँ पर हो गयी समझो शम"अ से बंदगी की हद
वहीं पे ख़त्म होती है पतंगे की ख़ुदी की हद
खड़ी पाई का तो बस काम ही है रोकना सबको
किसी दिन तय करेगी ये मेरी भी ज़िंदगी की हद
जह

क्यूँ मुझे बार-बार दिखता है उसकी आँखों में प्यार दिखता है

एक

क्यूँ मुझे बार-बार दिखता है
उसकी आँखों में प्यार दिखता है

उसको पाने की चाह में देखो
हर कोई बेक़रार दिखता है

क्या छुपाता है मेरी नज़रों से
अब मुझे

ग़ज़ल कल्पना रामानी

एक

 

मुझको तो गुज़रा ज़माना चाहिए
फिर वही बचपन सुहाना चाहिए
जिस जगह उनसे मिली पहली दफा
उस गली का वो मुहाना चाहिए
तैरती हों दुम हिलातीं मछलियाँ
वो पुनः

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 12.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^