ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ग़ज़ल Next

ग़ज़ल एक दो
01-Apr-2017 01:11 AM 92
ग़ज़ल एक दो

एक

जहाँ पर हो गयी समझो शम"अ से बंदगी की हद
वहीं पे ख़त्म होती है पतंगे की ख़ुदी की हद
खड़ी पाई का तो बस काम ही है रोकना सबको
किसी दिन तय करेगी ये मेरी भी ज़िंदगी की हद
जह

क्यूँ मुझे बार-बार दिखता है उसकी आँखों में प्यार दिखता है
01-Mar-2017 12:01 AM 533
क्यूँ मुझे बार-बार दिखता है  उसकी आँखों में प्यार दिखता है

एक

क्यूँ मुझे बार-बार दिखता है
उसकी आँखों में प्यार दिखता है

उसको पाने की चाह में देखो
हर कोई बेक़रार दिखता है

क्या छुपाता है मेरी नज़रों से
अब मुझे

ग़ज़ल कल्पना रामानी
01-Feb-2016 12:00 AM 185
ग़ज़ल कल्पना रामानी

एक

 

मुझको तो गुज़रा ज़माना चाहिए
फिर वही बचपन सुहाना चाहिए
जिस जगह उनसे मिली पहली दफा
उस गली का वो मुहाना चाहिए
तैरती हों दुम हिलातीं मछलियाँ
वो पुनः

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