ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
गर्म हवा
01-Dec-2017 06:47 PM 2520     

जाड़े का मौसम आ गया यारों लेकिन हवा गर्म है। आप पूछेंगे भई ये क्या बात हुई? बताते हैं, पहले हम तो समझ लें। बरसात का धूप से कुछ लेना-देना नहीं होता। सर्दियों का भी तपती लू से कोई संबंध नहीं होता। परन्तु क़ुदरत को तमाशा करने की खुजली उठती है। अब इस मज़ाक़ की बात पर एक संजीदा शेर याद आ गया जो ख़ाक़सार ने इसी घटनाक्रम के मुताल्लिक़ लिखा था -
क़िस्मत का था मज़ाक़ हम सुन कर खड़े खड़े
इतना हँसे कि आँख से आँसू निकल पड़े
हुई ना वही बात - हँसने के साथ रोना, जाड़े के साथ गरम हवा! ख़ैर जाने दो। बचपन में कभी-कभी हम धूप में बैठे होते थे और ऊपर से एक बादल छिड़काव-सा करता हुआ गुज़र जाता था। यानि धूप भी और बारिश भी। हमने अम्मीजान से पूछा कि ये क्या माजरा है। वो बोलीं कि जब सियार सियारनी की शादी होती है तो धूप भी खिलती है और बूंदें भी बरसती हैं। हमने पूछा क्यों तो वो बोलीं कि यह एक संकेत होता है कि कहीं कुछ अनहोनी हो रही है - अच्छी या बुरी पता नहीं। भाई साहब हमने तो कभी सियार देखा नहीं, आपने देखा है क्या? शायद चिड़ियाघर में देखा हो। ख़ैर हमें माँ का तर्क तो समझ में नहीं आया, लेकिन किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाने के अलावा चारा भी क्या था। हाँ गर्म हवा का कारण समझ में आ गया। वो है चुनाव (सियार सियारनी के ब्याह से कम विचित्र नहीं) दोस्तों ये सरगर्मी, ये हवा में तपिश सिर्फ चुनाव की देन है। हर तरफ मोर्चे, रथ यात्रायें (वैसे नेता लोग हमेशा विदेशी गाड़ियों में चलते हैं), जगह-जगह रैली, भाषण, जिन्हें केवल वही लोग सुनते हैं जिन्हें इसके लिये पैसे दिये जाते हैं। हम तो भैया दूरदर्शन पर भी चैनल बदल देते हैं अगर किसी नेता का भाषण चल रहा हो - चाहें वह प्रधानमंत्री के मन की बात ही क्यों ना हो। जाने कहाँ गये वो दिन जब चाचा नेहरू का भाषण सुनने के लिये तमाम जनता शहर के चौक में इकट्ठी हो जाती थी या रेडियो से चिपक कर बैठ जाती थी। क्या है कि अब जनता मोहभंग की स्थिति में है। नेताओं के चेहरों से नक़ाब जो उतर गये। पहले छुप कर कहते खाते थे, अब खुले आम खाते हैं और बाक़ायदा डंके की चोट पर फ़रमाते हैं - चुनाव में इतना खर्चा हुआ है उसकी भरपाई रिश्वत लेकर नहीं करेंगे तो कैसे करेंगे। अगला चुनाव भी तो लड़ना है। तो प्यारे नेताओं यह क्यों कहते हो कि "हम जनता की सेवा के लिये सियासत में आये हैं।" ऐसे होती है सेवा?
भाईसाहब! आप लोग चुनावी फ़ायदे के लिये हिन्दू-मुस्लिम को लड़ाते हो। अपना उल्लू सीधा करने के लिये आतंकियों से इश्क़ लड़ाते हो और झूठ बोल कर जनता को उल्लू बनाते हो। मगर जनाब -
खा चुके ठोकर, दोबारा खायें क्या
आपके चक्कर में फिर आ जायें क्या?
सवाल ही नहीं उठता। सवाल तो ये उठता है कि शहरों में धूल, मिट्टी, पेट्रोल आदि का प्रदूषण कम था जो हर बोलने वाला चिल्ला-चिल्ला कर ध्वनि प्रदूषण कर रहा है। और इस मामले में केवल चुनावी नेता ही दोषी नहीं हैं, अन्य संस्थान भी बराबरी के भागी हैं। स्कूलों में हर दूसरे महीने कोई ना कोई आयोजन होता रहता है। और हर बार बड़ा-सा कान फाड़ू लाउड स्पीकर। अरे यार सारे मोहल्ले को मास्टरों के भाषण और फ़िल्मी गाने सुनाने की क्या ज़रूरत है। लेकिन भारत में तो प्रजातंत्र है। कोई भी, कुछ भी कर सकता है। आप ही कहें साहब कि - हंगामा है क्यों बरपा... अरे भैया ये गुलाम अली की ग़ज़ल या पीने पिलाने की बात नहीं है, बल्कि इस ऊँची आवाज़ के ख़िलाफ़ ऊँची आवाज़ में ऐतराज़ करने का नतीजा है। सारे के सारे पंडित और मुल्ला एकजुट होकर हल्ला मचाने लगे। धर्म और मज़हब की दुहाई देने लगे। मेरे मुसलमान भाइयों शरीयत के वक़्त कान फोड़ने वाले यंत्र नहीं होते थे, तो उसका नाम मत लेना। पंडित बाबाओं हमारी आत्मा की शुद्धि का ठेका मत लेना, उसमें हम स्वयं सक्षम हैं। नहीं माने तो हम भी शायर आदमी हैं - कविता या ग़ज़ल सुनाने लगेंगे। आपको संस्कृति और सभ्यता से परिचित कराने के लिये। आख़िर देश के मान का सवाल है।
देश की बात पर एक सवाल याद आया जो बहुत दिनों से दिमाग़ में कुलबुला रहा है। सवाल यह है कि देश किसका है? ज़ाहिर है हर कोई बोलेगा "हमारा है, हमारा है।" चलो मान लिया, तो दूसरा सवाल है कि देश क्या है? "अजीब अहमकाना सवाल है।" सब बोलेंगे - "देश देश है।" बस यहीं तो मात खा गया हिंदुस्तान। भैये हिन्दू नेताओं के लिये देश दुधारू गाय है - खूब दुहो और अपना घर भरो। मुस्लिम नेताओं के लिये देश एक खिलाया-पिलाया मोटा बकरा है, जिसे जब चाहें इस्लाम के नाम पे ज़िबह कर दो। भारत के आम आदमी के लिये देश उसका घर है। ठीक! लेकिन ये घर केवल चहारदीवारी तक सीमित होकर क्यों रह जाता है। लोग सफाई करके घर का कचरा पड़ोसी के बाग़ या सड़क में क्यों फेंक देते हैं? अपने घर से बाहर का हिस्सा उन्हें अपना नहीं लगता? देश की आब-ओ-हवा, नदियां, झीलें, सड़कें सभी प्रदूषण से पीड़ित हैं। लोग चिल्लाते हैं कि सरकार कुछ नहीं करती। भाई जान आप क्यों नहीं कुछ करते? देश तो आपका भी है। अब आप कचरा फेंके और मोदी आकर झाड़ू लगायें यह तो कोई बात नहीं हुई।
चलें छोड़ें! ज़रा उस परिवार की ओर रुख़ करें जिसने देश को अपनी बपौती मान रखा है। बालक राहुल विदेश जाकर बोलते हैं कि भारत केवल परिवारवाद पर चल सकता है। क्या बात है युवराज। यानि राजा का बेटा राजा - चाहे दिमाग़ से पैदल ही क्यों ना हो। काम-धाम करने की ज़रूरत नहीं बस बैठे-ठाले तख्तनशीन हो गये। याद है कांग्रेस का नारा - देश की नेता इंदिरा गाँधी, देश का बेटा राजीव गाँधी, देश का भविष्य राहुल गाँधी (हाय-हाय ऐसा भविष्य) और भाड़ में जायें महात्मा गाँधी। ऊपर से यह बड़बोलापन तब जबकि ये तथाकथित "गाँधी" असली गाँधी भी नहीं हैं। फ़ीरोज़ को अपने सत्यवादी बापू ने फ़ीरोज़ गाँधी बनाया था - राजनीतिक उद्देश्य और नेहरू की आन के लिये। वो झूठ एक महान सत्य बन गया -- सत्यमेव जयते।
सुना है पप्पू उर्फ़ रोल उर्फ़ राहुल गाँधी का राज्याभिषेक हो रहा है। बढ़िया है! यूपीए में और कोई क़ाबिल नेता तो है ही नहीं। लेकिन भैया ये राहुल बाबा बार-बार मोदी को चायवाला क्यों बोलते हैं? सारे के सारे चायवाले, पानवाले, फलवाले, सब्ज़ीवाले वगैहरा बुरा मान जायेंगे। फिर तुम्हारा "आम आदमी का हमदर्द" वाला जुमला काम नहीं करेगा। बालक! सोच-समझकर तमीज़ से बोला करो --
लोग किरदार की जानिब भी नज़र रखते हैं
सिर्फ दस्तार से इज़्ज़त नहीं मिलने वाली
हाँ जी, हार्दिक पटेल से हाथ मिलाना वैसा ही है जैसा कुछ वक़्त पहले लालू से हाथ मिला कर मुंह की खायी थी। (टिकट - वितरण पर दंगे शुरू हो चुके हैं)। हफ़ीज़ सईद की रिहाई पर राहुल बाबा ने मोदी पर चुटकी ली कि मोदी की नीति कारगर नहीं हुई। बालक ज़रा अपने दिग्विजय सिंह की तरफ भी अपना मुखारविंद कर लो जो आतंकी को "हाफिज जी" कह कर आदरपूर्वक सम्बोधित करते हैं। एक बात और - मंदिर जाकर हिन्दुओं को खुश मत करो (वो तो प्रभावित नहीं हुये) उलटे मुस्लमान नाराज़ हो गये, हमने खुद उर्दू टीवी पर सुना है। हमारी मानो तो बालक, मोदी को कोसना और हेरा फेरी की सियासत छोड़ कर कुछ ठोस काम करो, यानि जहाँ सत्ता में हो वहीं ठीक रहने की कोशिश करो। अपने सिद्धू को समझाओ कि सड़कें ठीक करें, प्रदूषण का उपचार करें, बची-खुची झीलों को बचा लें। आम आदमी को तुम्हारे उड़ते पुल, स्टील की सीढ़ियां, अम्मा की दस रुपये वाली कैंटीन नहीं चाहिये - खुली हवा, चलने को फुटपाथ, पीने को साफ़ पानी चाहिये। ये टिम्बर माफिया, सैंड माफिया और बिल्डर लॉबी को खुश करके जेब भरने से जनता नाखुश हो जायेगी? थोड़ा तो देश का खयाल करो। आरक्षण एक कैंसर है, जहाँ गधे और घोड़ों को एक बराबर रखने की मांग की जा रही है। बाबू जी जिसे क़ुदरत ने जुदा शक्ल और जुदा अक़्ल अता की है उसे तुम एक जैसा कैसे बना सकते हो? अगर "पाटीदार अनामत आंदोलन समिति" (घ्ॠॠच्) हो गयी तो हिंदुस्तान फेल हो जायेगा। वैसे हमें यक़ीन है कि पप्पू कभी पास नहीं हो सकता।
नवंबर खात्मे पर है लेकिन माहौल में चुनाव की सरगर्मी है। अखिलेश मोदी को नेस्तनामूद करना चाहते हैं। तेजस्वी मोदी की खाल खींचना चाहते हैं। राहुल --- ख़ैर जाने दो। ये सब नाकारा और निकम्मे लोग कुछ नहीं करते, हाँ कमाल ज़रूर करते हैं। कमाल तो इस बार भाजपा वाले भी कर रहे हैं। योगी प्रशासन सुधरने की बजाय यूपी को भगवा रंग रहे हैं (हमने कहा भैया ये सिंदूरी रंग अस्ताचल की निशानी है)। शेख अब्दुल्ला पाकिस्तान की तरफदारी करके हिंदुस्तान के ज़ख्म हरे कर रहे हैं। मुलायम कृष्ण भगवान को "यादव" होने के कारण राम से ऊपर रखने की चेष्टा कर रहे हैं। हद है। नरेंदर भैया हमारी सुनो - अपने साधुओं को जंगल में रखो। योगी पर लगाम लगाओ। खटटर और बराला जैसे नेताओं को तड़ीपार करो। और बाक़ी नेताओं तहज़ीब के दायरे में रहो, बस हम इतना ही कह सकते हैं। यह और बात है कि हम --
एक साँप से बोसे की रज़ा मांग रहे हैं
नेता से शराफत की अदा माँग रहे है।

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