ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कार्यस्थल पर गांधी
01-Jun-2019 01:01 AM 159     

"जब मैं निराश होता हूं, और मनन करता हूं तो पाता हूं कि इतिहास में
अंततः सत्य और प्रेम की विजय होती है।" गांधी के इस सूत्र को सत्य मान लेने
का लाभ है कि बदलाव की संभावना और आशावादिता बनी रहती है।

आज के दौर में राजनीति, समाज, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में लगातार गांधी के विचारों की विवेचना और प्रासंगिकता पर चर्चा की जाती है। ये चर्चाएं "सत्य" के प्रयोग और "अहिंसा" की कसौटी और आदर्श को केन्द्र में रखकर की जाती है। इन्हीं कसौटियों के आलोक में यह लेख आम आदमी के जीवन के एक महत्वपूर्ण पक्ष- कार्यस्थल, पर गांधी के विचारों की प्रासंगिकता पर आधारित है। हममें से अधिकांश मध्यमवर्गीय लोगों के दिन का एक बड़ा हिस्सा अपने-अपने कार्यस्थल पर गुजारते हैं। इसका प्रभाव हमारे जीवन पर इतना गहरा होता है कि कार्यस्थल की पहचान और परिस्थितियों के सापेक्ष हम खुद को परिभाषित करने लगते हैं। आधुनिक समय में हमारी जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा की अस्मिता पर कार्यस्थल की अस्मिता का सापेक्षिक प्रभाव बढ़ चुका है। यदि कार्यस्थल की सामान्य व्यवस्थाओं पर निगाह डालें तो आप पाएंगे कि आजकल के कार्यस्थलों ने नौकरशाही के ढांचे को अपना लिया है। इनकी अपनी व्यवस्था और तंत्र होते हैं जो व्यक्ति का निर्वैयक्तिकरण कर देते हैं और उसे नियमों को कार्यरूप देने वाली मशीन में बदल देते हैं। इस स्थापना को आप खुद के जीवन में देख सकते हैं। कार्यस्थल पर हमारी भूमिकाएं और दायित्व ऐसे होते हैं जिसमें व्यक्ति के रूप में हमारे आपसी रिश्ते और संवेदनाएं गौण होते हैं केवल नियमों का क्रियान्वयन प्रमुख होता है। इसमें अधिकारी-कर्मचारी की पूरी व्यवस्था होती है। लिखित और मौखिक पदानुक्रम होते हैं जिनमें दायित्वों का वितरण होता है। विशेषज्ञता का ठप्पा होता है। औपचारिक संवाद और संचार की पुख़्ता व्यवस्था होती है। इस व्यवस्था में फाइल या इस जैसी अन्य कोई सरकारी वस्तु आगे-पीछे करती रहती है। इसमें कौन किससे कब क्या कैसे कहेगा इसके बारे में लिखित और अलिखित नियम होते हैं। यह पूरी व्यवस्था अपने भागीदारों पर तनाव और दबाव पैदा करती है। इनमें आपसी प्रतियोगिता और उठा-पटक को भी देखा जा सकता है। बचने-बचाने, फंसने-फंसाने के इस खेल में सकारात्मक और सृजनात्मक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा खर्च होता है और संगठन की गति भी शिथिल हो जाती है। अंततः हम कुछ करने की स्वाभाविक आकांक्षा के स्थान पर व्यवस्था की कैद को अपनी नियति मान लेते हैं।
व्यवस्था के इस मकड़जाल में गांधी के विचार और विधि एक औजार है जो हमें हमारी भूमिकाओं के सापेक्ष संतुष्टि और सृजन-सुख दे सकते हैं। इस दिशा में गांधी-मार्ग का पहला मंत्र है कि हर व्यक्ति अकेले बदलाव की संभावना को लिए हुए है। यह बदलाव की संभावना किसी नायक के करिश्मे जैसी नहीं है जो पलक झपकते ही सब कुछ ठीक कर देगी। गांधी-मार्ग, व्यक्ति में यह बोध जगाता है कि वह खुद पर और हर आम आदमी की ताकत में विश्वास रखे और सबको साथ लेकर बदलाव को साकार करे। इस मॉडल का उदाहरण वे अफ्रीका से लेकर भारत तक के हर पहल में देते हैं। उन्हें अपनी ताकत पर पूरा भरोसा है। इसी भरोसे के बीज को वे दूसरों में भी बोते हैं। वे केवल राजनीतिक और सामाजिक फलक पर "सुधार" की बात नहीं करते हैं बल्कि खुद की शुद्धि और बदलाव को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। यदि इस प्रक्रिया को हम भी स्वीकार कर लें तो सर्वप्रथम हम "आत्म" की ताकत और विशिष्टता को स्वीकारने लगेंगे। हममें यह विश्वास पैदा होगा कि सार्थक बदलाव और सृजन का केन्द्र हमारे भीतर है। इसके साथ ही "अन्य" से "आत्म" के संबंध को देखने में भेद के साथ पर एकता का भाव पैदा होगा। यह भाव ही सत्य, अहिंसा, शांति और सह अस्तित्व को प्रत्येक बदलाव की कसौटी के रूप में मान्य करता है। ये मूल्य ही हर व्यक्ति को गांधी-मार्ग का पथिक बनाते हैं। यह गांधी मार्ग कार्यस्थल पर हर रोज संभव है। यह चेतना के उस शिखर का प्रतिनिधित्व करता है जहां आपकी वैयक्तिकता व्यक्तिगत प्रभावों, उपलब्धियों और आवश्यकताओं के परे जाकर अपने कत्र्तव्यों और दायित्वों के निर्वहन को अपना धर्म मान लें। यह रास्ता इतना आसान नहीं है। हमें अपने चारों ओर उत्पीड़न, शोषण, हिंसा, भ्रष्टाचार, वाचिक-शारीरिक हिंसा और प्रतियोगिता दिख रही है। इसके प्रभाव में यह नामुमकिन सा लगता है कि सत्य, अहिंसा और प्रेम का मार्ग भी कोई मार्ग है। ऐसी स्थिति में गांधी का कथन याद कीजिए- "जब मैं निराश होता हूं, और मनन करता हूं तो पाता हूं कि इतिहास में अंततः सत्य और प्रेम की विजय होती है।" इस सूत्र को सत्य मान लेने का लाभ है कि बदलाव की संभावना और आशावादिता बनी रहती है। यह सृजनात्मक बदलाव का आधार है जो आपको आत्मोन्नयन के मार्ग पर ले जाएगा।
गांधी का दूसरा मंत्र है सत्य और जीवन एक ही है। इसे मान लेने पर यह भी स्वयंसिद्ध होता है कि व्यक्ति का हित और समाज का हित दो अलग रास्ते नहीं हैं। इस मार्ग पर विचार और क्रिया में विरोधाभास के लिए कोई स्थान नहीं है। जबकि आजकल कार्यस्थल पर विचार और क्रिया के विरोधाभास सबसे बड़ी समस्या है। इसके कुछ उदाहरण देखिए। सत्ता या अफसरशाही लोकतंत्र के बहाने सहमति के रास्ते पर चलने का ढोंग करते हुए अपने विचार को थोपने का प्रयास करते हैं। बैठक-विवरण (मिनट्स ऑफ द मीटिंग) में जोड़-तोड़ करके अधिकारी द्वारा उसे अपने पक्ष में करना इसका एक लोकप्रिय उदाहरण है। इस व्यवहार को स्वीकार कर लेना ठीक रहेगा? प्रायः हम सत्ता के साथ संबंध न बिगड़े इसका ध्यान रखते हुए इस गलत व्यवहार को स्वीकृति दे देते हैं। लेकिन यह मत भूलिए कि हमारा मौन रहना भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को बल देगा। यदि आप अपनी असहमति दर्ज किए बिना इसे व्यवस्था की मजबूरी मानकर स्वीकार कर लेते हैं तो यह आपकी स्वतंत्र चेतना का दमन होगा। जब आप इनके विचारों की खिलाफत करते हैं तो वे कानून की व्याख्या द्वारा अपने अधीनस्थ को भावी खतरे दिखाकर डराएगें। चूंकि शोषक स्वाभवतः कायर होता है इसलिए वह अपने पद और स्थान को सुरक्षित रखने के लिए किसी भी तरह के दायित्व से बचना चाहता है। वह खुद को दायित्व से मुक्त करते हुए अपने मातहतों को फंसाना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में कभी भी अपने धर्म या कर्म के आत्म स्वीकृत मार्ग से डिगना नहीं है। बड़ी स्पष्टता के साथ सत्य का पक्ष लेते हुए असहमति का साहस करना है। आपके इस व्यवहार पर नौकरशाही ऐसा नाटक रचेगी कि मानो वह सत्यावलंबी है बाकि सारे असत्य के रास्ते पर चल रहे हैं। कागजी दांव पेंच से अन्य को असत्य के रास्ते पर ढकेलने का यत्न करेगी। अपनी जिम्मेदारियों को दूसरे पर थोपेगी। याद रखिए ऐसी व्यवस्था के आगे घुटने टेकने से व्यक्ति कमजोर होता जाता है। इस स्थिति में गांधी के विचारों के दो निहितार्थ हैं- पहला, मैं कत्र्तव्यपथ से सत्य के रास्ते से नहीं भटकूंगा। अपने कत्र्तव्य पथ के मार्गदर्शी सिद्धान्त के रूप में गांधी की ताबीज का ख़्याल रखूंगा। दूसरा, सामने वाले के हृदय परिवर्तन की संभावना में विश्वास करूंगा। लेकिन उसके प्रभाव में अपने को सत्य पथ से नहीं डिगने दूंगा। विचारिए कि क्या दायित्व को एक दूसरे पर टालकर अपने को सुरक्षित और दायित्वहीन स्थिति का आनंद लेने में कोई सुख है? यह तो शुद्ध कायरता है। यदि कोई अपने दायित्व को मुझ पर टाल रहा है तो मुझे क्या करना चाहिए? प्रथमतः आप अपनी भूमिका में दायित्व के उस अंश का पालन करें लेकिन उसके षड़यंत्र का हिस्सा न बने। सत्याग्रह का मार्ग अपनाते हुए बिना वाचिक, मानसिक हिंसा किए उसे इस बात का बोध कराए कि वह अपने दायित्व को उठाए। उसमें यह विश्वास पैदा करते कि जिस डर के कारण वह अपने दायित्व को दूसरे पर थोप रहा है उस डर से पार पाने में आप उसकी मदद करेंगे। उसके डर को दायित्व मानकर स्वीकार कर लेने पर आप शोषण और उत्पीड़न का शिकार होंगे। यह ख़्याल रखिए आपके ऐसा करने से उसका डर कम नहीं होगा बल्कि अपने डर को जीतने के लिए दूसरे को फंसाने और उत्पीड़ित करने की उसकी इच्छा बलवती होगी। कई बार पद लोभ और सत्ता की निकटता से लाभ का बोध आपको कत्र्तव्य पथ से डिगाएगा। ऐसी दशा में अपरिग्रह को ध्यान में रखना है। आपकी असली ताकत सत्य से अनुप्राणित आत्मबोध है न कि पद से अलंकृत छद्म बोध। जब आपके कार्यस्थल पर सत्ता अलग-अलग बात कर कुछ लाभ पहुंचाने का यत्न करे और सिद्ध करे कि आप ही व्यवस्था विशेष के उत्कृष्ट कार्यकर्ता हैं तो तुरंत गांधी जी का वह रूप याद करिए जब वे अपनी वैयक्तिक प्रतिभा, प्रतिष्ठा के अलंकरणों के बदले अपने कमजोर से कमजोर साथी के साथ खड़े होते हैं। गांधी का वह रूप सत्ता के शिखर पर विराजमान वायसराय को फोन करके अपने आंदोलनों की जानकारी देते हैं। इसकी परवाह नहीं करते थे कि सत्ता कानून और शक्ति का प्रयोग करके आप को रोक सकती है। क्योंकि उन्हें चोरी-चुपके आगे नहीं बढ़ना था। उन्हें तो वह ताकत पैदा करनी थी कि मैं अकेला भी हूं लेकिन सत्य के लिए खड़ा रह सकता हूं। यदि यह बोध हम विकसित कर लें तो अफसरशाही की मानसिक हिंसा का प्रतिकार करने की ताकत पैदा होगी जो व्यवस्था का विरोध न करके बल्कि व्यवस्था को समाज के लिए हितकर बनाएगी। व्यवस्था के संचालन में "विश्वास" की बहाली करेगी। जब आप विश्वास की परंपरा में चलेंगे तो वचन और शब्द मूल्य हो जाएंगे जिसके लिए सहमति महत्वपूर्ण होंगे न कि "औपचारिक स्वीकृति" मात्र। इससे निर्णयों की ओनरशिप में सभी भागीदारों द्वारा स्वीकार की जाएगी। ऐसा होने पर न तो कोई लोकप्रिय निर्णय लिया जाएगा जिसमें सत्य की कसौटी का उल्लंघन हो और न ही कोई तानाशाही निर्णय होगा जिसमें भागीदारों की आवाज दबा गयी हो। यह जरूर है कि इस तरह के व्यवहार से आप किसी तात्कालिक लाभ के भागीदार न हो लेकिन अंततः आपको संतुष्टि होगी कि आपकी चेतना ने लोकहित के लिए लोकशाही में योगदान किया है न कि स्वार्थ के वशीभूत हो किसी शोषक चेतना की पराधीनता स्वीकार की है। यही भाव ही सही अर्थों में स्वावलंबन है।

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